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नीचे के आरेख से पता चलता है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ५९ दौर के आकलन के समय (जनवरी–दिसंबर 2003).देश में सबसे ज्यादा कर्जदार किसान परिवार आंध्रप्रदेश में थे और इसके बाद महाराष्ट्र में।
विभन्न राज्यों में कर्जदार किसान परिवारों की संख्या
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ५९ वें दौर के आकलन सिचुएशन एसेसमेंट सर्वे ऑव फार्मरस् इनडेटेनेस ऑव फार्मर हाऊसहोल्ड (जनवरी-दिसंबर २००३) के अनुसार-
- ८ करोड़ नब्बे लाख ३५ हजार किसान परिवारों में ४ करोड़ ३० लाख ४२ हजार यानी ४३ फीसदी किसान परिवार कर्जदार हैं। साल १९९१ में एनएसएस ने एक ऐसा ही सर्वेक्षण किया था। उस सर्वेक्षण में कर्जदार किसानों की तादाद २६ फीसदी थी। किसान परिवारों के ऊपर औसतन १२५८५ रुपये का कर्जा है।
- देश में ग्रामीण परिवारों की कुल संख्या १४ करोड़ ७० लाख ९० हजार है और इसमें ६० फीसदी किसान परिवार हैं।
- देश के कुल ग्रामीण परिवारों में किसान परिवारों की तादाद ६० फीसदी है और इसमें ४८ फीसदी परिवारों पर कर्ज है।
- सबसे ज्यादा कर्जदार किसान परिवार आंध्रप्रदेश (८२ फीसदी) हैं । इसके बाद नंबर तमिलनाडु (७४ फीसदी), पंजाब (६५ फीसदी) केरल (६४ फीसदी), कर्नाटक (६१ फीसदी) और महाराष्ट्र (५४ फीसदी) का है।
- हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में ५० से ५३ फीसदी किसान परिवार कर्जदार हैं। जिन राज्यों में कर्जदार किसान परिवारों की संख्या अपक्षाकृत कम है उनके नाम हैं- मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, और उत्तराखंड। इन राज्यों में कर्जदार किसान परिवारों की तादाद १० फीसदी है।
- संख्या के लिहाज से देखें तो उत्तरप्रदेश में कर्जदार किसानों सबसे ज्यादा(६० लाख नब्बे हजार) हैं।आंध्रप्रदेश में कर्जदार किसानों की संख्या ४० लाख नब्बे हजार है।कर्जदार किसान परिवारों की कुल संख्या का आधे से अधिक उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश में रहता है।
- अगर आमदनी के स्रोत को आधार मानकर देखें तो किसानों में जीविका के लिए खालिस खेती पर निर्भर किसान परिवारों की तादाद कुल किसानों में ५७ फीसदी है और इनमें ४८ फीसदी किसान परिवारों पर कर्जा है।
- कुल किसानों परिवारों को सामाजिक वर्ग के हिसाब से बांटकर देखें तो १३.३ फीसदी किसान परिवार अनुसूचित जनजाति के, १७.५ फीसदी किसान परिवार अनुसूचित जाति के, ४१.५ फीसदी किसान परिवार अन्य पिछड़ा वर्ग के और २७.७ फीसदी किसान परिवार बाकी समाजिक वर्गों के हैं।
- अनुसूचित जनजाति के ३६.३ फीसदी, अनुसूचित जाति के ५०.२ फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग के ५१.४ फीसदी और शेष सामाजिक वर्गों के ४९.९ फीसदी किसान परिवारों पर कर्जा है। अनुसूचित जनजाति के किसान परिवारों पर औसतन ५५०० रुपये का, अनुसूचित जाति के कर्जदार किसान परिवारों पर औसतन ७२०० रुपये का. अन्य पिछड़ा वर्ग के किसान परिवारों पर औसतन १३५०० रुपये और शेष सामाजिक वर्ग के कर्जदार किसानों पर औसतन १८१०० रुपये का कर्जा है।
- सर्वेक्षण में ०.०१ हेक्टेयर, ०.०१-०.०४ हेक्टेयर, ०.०४-१.०० हेक्टेयर, १.००-२.०० हेक्टेयर, २.००-४.०० हेक्टेयर, ४.००-१०.०० हेक्टेयर और १० हेक्टेयर से ज्यादा की मिल्कियत वाले किसान परिवारों की कोटियां बनायी गई थीं। इन सात कोटियों में किसान परिवारों का अनुपात क्रमशः १.४ फीसदी, ३२.८ फीसदी, ३१.७ फीसदी, १८ फीसदी, १०.५ फीसदी, ४.८ फीसदी और ०.९ फीसदी है। इन सात वर्गों में कर्जदार किसान परिवारों की संख्या क्रमशः.४५.३ फीसदी, ४४.४ फीसदी, ४५.६ फीसदी, ५१.० फीसदी, ५८.२ फीसदी, ६५.१ फीसदी और ६६.४ फीसदी किसान परिवार कर्जदार हैं।
- अगर राष्ट्रीय स्तर पर मान लें कि कर्जदार किसान परिवारों की संख्या १०० है तो इनमें २९ ने कर्जा महाजनों से लिया। अगर इसी हिसाब को आंध्रप्रदेश पर लागू करें तो वहां १०० (कर्जदार) किसान परिवारों में ५७ ने और तमिलनाडु में ५२ किसान परिवारों ने महाजनों से कर्जा लिया।
- कर्ज से हासिल प्रत्येक १००० रुपये में १११ रुपये शादी-ब्याह या ऐसे ही किसी आयोजन में खर्च किए गए। बिहार में कर्जदार किसान परिवारों ने बाकी राज्यों के कर्जदार किसान परिवारों से इस मद में कहीं ज्यादा खर्च(१००० में २२९ रुपये) किया। इसका बाद नंबर राजस्थान का है जहां कर्ज से हासिल हर हजार रुपये में १७६ रुपये शादी-ब्याह के खर्चे में सर्फ हुए।
- कर्ज के सर्वप्रमुख स्रोत बैंक रहे। कर्जदार किसान परिवारों में ३६ फीसदी ने बैंकों से कर्ज लिया जबकि २६ फीसदी ने महाजनों से।
- कर्ज की सर्वाधिक बकाया रकम पंजाब के किसानों के मत्थे है। इसके बाद नंबर केरल, हरियाणा, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु का है।
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