किसान और आत्महत्या

किसान और आत्महत्या

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डाक्टर ऋताम्भरा हैब्बर(सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीजस, स्कूल ऑव सोशल साईंसेज, टीआईआईएस) द्वारा प्रस्तुत ह्यूमन सिक्युरिटी एंड द केस ऑव फार्मर-ऐन एक्सपोलेरेशन(२००७) नामक शोध आलेख के अनुसार-
http://humansecurityconf.polsci.chula.ac.th/Documents/Presentations/Ritambhara.pdf

    * किसानों की आत्महत्या की घटना को मानवीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखने की जरुरत है। अगर इस कोण से देखा जाय तो पता चलेगा कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं ठीक उस वक्त हुईं हैं जब भारत के ग्रामीण अंचलों में आर्थिक और सामाजिक रुप से मददगार साबित होने वाली बुनियादी संरचनाएं ढह रही हैं। .
    * हरित क्रांति, वैश्वीकरण और उदारीकरण की वजह से ढांचागत बदलाव आये हैं मगर अधिकारीगण किसानों की आत्महत्या की व्याख्या के क्रम में इन बदलावों की अनदेखी करते हैं। साधारण किसानों की आजीविका की सुरक्षा के लिए फौरी तौर पर उपाय किए जाने चाहिए थे लेकिन इस पहलू की उपेक्षा हुई। आत्महत्या की व्याख्या करने के क्रम में ज्यादा जोर मनोवैज्ञानिक कारणों पर दिया गया।
    * मुख्यतया महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के किसानों ने आत्महत्या की। इन राज्यों में ज्यादातर इलाकों में किसानी वर्षाजल से होने वाली सिंचाई पर निर्भर है। इन राज्यों(खासकर महाराष्ट्र) के आत्महत्या करने वाले किसान नकदी फसल  मसलन,  कपास (खासकर महाराष्ट्र), सूरजमुखी, मूंगफली और गन्ना (खासकर कर्नाटक) उगा रहे थे।
    * उत्पादन की बढ़ी हुई लागत के कारण किसानों को निजी हाथों से भारी मात्रा में कर्ज लेना पड़ा।
    * ऑल इंडिया बॉयोडायनेमिक एंड ऑर्गेनिक फार्मिंग एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के एक जिले जालना के किसानों की आत्महत्या की खबर पर चिन्ता जताते हुए मुंबई हाईकोर्ट को एक पत्र लिखा। इस पत्र का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज को एक सर्वेक्षण करने को कहा। सर्वेक्षण के आधार पर कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से किसानों की आत्महत्या की घटना पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए कहा। टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की मुख्य वजह उत्पादन लागत में हुई असह बढ़ोत्तरी और कर्जदारी है।दूसरी तरफ इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑव डेपलपमेंट रिसर्च (आईजीडीआर) के शोध में किसानों की आत्महत्या का संबंध सरकार या उसकी नीतियों से नहीं जोड़ा गया है। आईजीडीआर की शोध रपट में कहा गया है कि सरकार को ग्रामीण विकास योजनाओं के जरिये गांवों में ज्यादा हस्तेक्षेप करना चाहिए और वहां गैर खेतिहर कामों का विस्तार करना चाहिए।
    * साल २००५ के दिसंबर में महाराष्ट्र की सरकार ने छह जिलों-अमरावती, अकोला, बुलडाना, यवतमाल, वासिम और वर्धा के लिए एक विशेष राहत पैकेज की घोषणा की।
    * कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली कंपनियों ने कर्नाटक और महाराष्ट्र में किसानों को कर्ज देना शुरु किया । इससे किसानों के ऊपर कर्जे का बोझ और बढ़ा।
    * सेहत की गिरती दशा, संपत्ति को लेकर परिवारिक विवाद, घरेलू समस्याएं और बेटी के ब्याह की भारी चिन्ता के मिले जुले प्रभावों के बीच किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए। यह बात जीके वीरेश की अध्यक्षता में बनी समिति की रिपोर्ट में कही गई है।
    * जिन सालों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ीं उन सालों में किसान आंदोलन कमजोर पड़ गया था जबकि १९८० के दसक में महाराष्ट्र में शेतकरी संगठन की अगुआई में किसान आंदोलन मजबूत था।




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