Resource centre on India's rural distress
 
 

किसान और आत्महत्या

 

खास बात

राष्ट्रीय स्तर पर हुई कुल आत्महत्याओं में किसान-आत्महत्याओं का प्रतिशत साल 1996 में 15.6% , साल 2002 में 16.3%  साल 2006 में 14.4% , साल 2009 में 13.7%  तथा साल 2010 में 11.9% तथा साल 2011 में 10.3% रहा है। #

साल 2011 में जितने लोगों ने भारत में आत्महत्या की उसमें, 18.1 फीसद तादाद गृहणियों की थी। किसानों की संख्या आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में  10.3 फीसदी थी जबकि सरकारी नौकरी करने वालों की तादाद आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में 1.2 फीसदी, प्राईवेट नौकरी करने वालों की 8.2 फीसदी, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में काम करने वालों की 2.0 फीसदी, छात्रों की 5.7 फीसदी, ब्रेरोजगार लोगों की 7.7 फीसदी तथा वणिज-व्यवसाय के क्षेत्र में स्व-रोजगार में लगे लोगों की संख्या आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की तादाद में 5.3 फीसदी थी तो स्वरोजगार में लगे पेशेवर लोगों की संख्या 3.1 फीसदी जबकि इससे भिन्न किसी अन्य तरह के काम को स्वरोजगार के तौर पर अपनाने वाले लोगों की तादाद 19.5 फीसदी। #

साल 2011 में भारत में जिन 135585 लोगों ने आत्महत्या की उसमें  स्वरोजगार में लगे लोगों का प्रतिशत 38.28  ( कुल. 51901) था। #

साल 2011 में स्वरोजगार में लगे कुल 51901 लोगों ने आत्महत्या की। इसमें किसानों की संख्या 14027 यानी 27.03  फीसदी है।#

  साल 1997 - 2006  यानी दस सालों की अवधि में भारत में 1,66,304  किसानों ने आत्महत्या की।*  

 साल 1997 - 2006  के बीच किसानों की आत्महत्या में सालाना 2.5  फीसद चक्रवृद्धि दर से बढ़त हुई।*

आत्महत्या करने वाले किसानों में ज्यादातर नकदी फसल की खेती करने वाले थे, मिसाल के लिए कपास(महाराष्ट्र), सूरजमुखी,मूंगफली और गन्ना(खासकर कर्नाटक में)।**

सेहत की खराब दशा, संपत्ति को लेकर पारिवारिक विवाद, घरेलू कलह और बेटी को ब्याहने की गहन सामाजिक जिम्मेदारी सहित शराब की लत ने किसानों को कर्ज ना चुकता कर पाने की स्थिति में आत्महत्या की तरफ ढकेला।**

जिन स्रोतों से किसानों ने कर्ज लिया उनमें महाजन एक प्रमुख स्रोत रहे। २९ फीसदी कर्जदार किसानों ने महाजनों से कर्ज हासिल किया। ***.

 

# National Crime Records Bureau, http://ncrb.nic.in/

http://ncrb.nic.in/CD-ADSI2011/table-2.11.pdf

http://ncrb.nic.in/ADSI2010/table-2.11.pdf

http://ncrb.nic.in/CD-ADSI2009/table-2.11.pdf

http://ncrb.nic.in/adsi/data/ADSI2006/Table-2.11.pdf

http://ncrb.nic.in/adsi/data/ADSI2002/atable%202.11.pdf

http://ncrb.nic.in/adsi/data/ADSI1996/table-5s.pdf
 


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डाक्टर रिताम्बरा हेब्बार(२००७): ह्यूमन सिक्यूरिटी एंड द केस ऑव फार्मस् स्यूसाइड इन इंडिया-ऐन एक्सपोलोरेशन http://humansecurityconf.polsci.chula.ac.th/Documents/Presentations/Ritambhara.pdf


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सीपी चंद्रशेखर, जयति घोष (2005):द बर्डेन ऑव फार्मर्स डेट, माइक्रोस्केन

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2016 में प्रकाशित [inside]नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की नई रिपोर्ट एक्सीडेन्टल डेथ्स् एंड स्यूसाइड इन इंडिया(2015) के कुछ प्रमुख तथ्य[/inside]निम्नलिखित हैं—

http://www.im4change.org/farm-crisis/farmers039-suicides-14.html?pgno=2#accidental-deaths-suicides-in-india-2015-released-in-2016 

 

• साल 2015 में भारत में कुल 1,33,623 लोगों ने आत्महत्या की. 

 

•  आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या साल 2015 में 8,007 रही जो कि इस साल आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 5.99 फीसद है. साल 2015 में कुल 4595 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की जो 2015 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 3.44 फीसद है. अगर किसान और खेतिहर मजदूरों की संख्या को आपस में जोड़ें तो कहा जा सकता है कि 2015 में खेतिहर काम में लगे कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की जो आत्महत्या करने वाले कुल लोगों(2015) की संख्या का 9.43 फीसद है.

 

• साल 2015 में आत्महत्या करने वाले किसानों में पुरुषों की संख्या 7,566 थी जबकि आत्महत्या करने वाली महिला-किसानों की संख्या 441 रही यानी आत्महत्या करने वाले किसानों में पुरुषों की संख्या प्रतिशत पैमाने पर 94.49 फीसद और महिलाओं की संख्या 5.51 फीसद है. 

 

•  आत्महत्या करने वाले किसानों में 27.41 फीसद सीमांत किसान थे जबकि ऐसे 45.41 फीसद किसान छोटे किसान की श्रेणी में आते हैं यानी 2015 में आत्महत्या करने वाले कुल 8007 किसानों में 72.79 फीसद(कुल 5813) सीमांत और छोटी जोत के किसान थे. 

 

•  किसान-आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र से प्रकाश में आयीं. महाराष्ट्र में 2015 में कुल 3030 किसानों ने आत्महत्या की. इसके बाद तेलंगाना का स्थान है जहां आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 1,358 रही. कर्नाटक में 1197 किसानों ने 2015 में आत्महत्या की. प्रतिशत पैमाने पर देखें तो कुल किसान-आत्महत्या में महाराष्ट्र की किसान-आत्महत्या की संख्या 37.8 फीसद रही, तेलंगाना की 17.0 फीसद और कर्नाटक की 14.9 प्रतिशत. छत्तीसगढ़ (854 किसान-आत्महत्या), मध्यप्रदेश (581 किसान-आत्महत्या) तथा आंध्रप्रदेश (516 आत्महत्या) में कुल किसान-आत्महत्या का क्रमशःr 10.7 फीसद, 7.3 फीसद और 6.4 फीसद केंद्रित रहा. 2015 में इन छह राज्यों से कुल किसान-आत्महत्याओं का 94.1 फीसद हिस्सा(8,007 में 7,536) केंद्रित रहा.  

 

• ' कर्जदारी' और 'खेती-बाड़ी से जुड़ी परेशानियां' किसान-आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह रही. 2015 में कुल 8,007 में 3,097 यानी 38.7 फीसद मामलों में किसान-आत्महत्या की वजह कर्जदारी या खेती-बाड़ी से जुड़ी परेशानियां साबित हुईं. 2015. किसान-आत्महत्या की अन्य बड़ी वजहों में शामिल हैं 'पारिवारिक समस्याएं' (933 किसान-आत्महत्या), ' बीमारी' (842 किसान-आत्महत्या) और ' नशाखोरी' (330 किसान-आत्महत्या), क्रमश 11.7 फीसद, 10.5 फीसद तथा 4.1 फीसद किसान-आत्महत्याओं की वजह साबित हुए. 

 

• साल 2015 में पुरुष किसानों की आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह रही कर्जदारी. कर्जदारी के कारण 2978 पुरुष किसानों ने आत्महत्या की. पुरुष किसानों की आत्महत्या की दूसरी बड़ी वजह रही खेती-बाड़ी से जुड़े मामले. खेती-बाड़ी से जुड़ी परेशानियों के कारण 1494 किसानों ने आत्महत्या की. 

 

•  महिला किसानों के मामले में कर्जदारी और पारिवारिक समस्याएं आत्महत्या की प्रमुख वजह रही. 2015 में महिला किसान-आत्महत्या के कुल 441 मामले प्रकाश में आये. इसमें 119 मामलों में आत्महत्या की वजह कर्जदारी रही जो कि 27 फीसद है. महिला किसान-आत्महत्या के 80 मामलों में प्रमुख वजह पारिवारिक समस्याएं रहीं जो 18.1 फीसद है. 

 

•  2015 में खेतिहर मजदूरों के आत्महत्या के मामलों में सबसे बड़ी वजह' पारिवारिक समस्या ' और बीमारी ' साबित हुई. खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के कुल 4595 मामलों में 1843 यानी 40.1 फीसद मामलों में कारण पारिवारिक समस्याएं साबित हुई जबकि आत्महत्या के 872 यानी 19.0 फीसद मामलों में बड़ी वजह बीमारी साबित हुई. 

 

•  कर्नाटक में किसान-आत्महत्या की 79.0 फीसद घटनाओं में मुख्य वजह कर्जदारी रही. महाराष्ट्र में 26.2 फीसद किसान-आत्महत्याओं की वजह खेती-बाड़ी से जुड़ी समस्याएं साबित हुईं. इन समस्याओं का मुख्य अर्थ है- किसी कारण से फसल का मारा जाना..

 

•  किसान-आत्महत्याओं के 71.6 घटनाओं में मृतक की उम्र 30 से 60 साल के बीच थी. 

 

• आत्महत्या करने वाले 9 फीसद किसान 60 साल या इससे ज्यादा उम्र के थे. 

 

• बिहार, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मिजोरम, नगालैंड, उत्तराखंड तथा पश्चिम बंगाल से किसान-आत्महत्या की कोई घटना प्रकाश में नहीं आई. देश के 7 केंद्रशासित प्रदेशों में भी 2015 में किसान-आत्महत्या की कोई घटना प्रकाश में नहीं आई. 

 

• गोवा, मणिपुर, नगालैंड तथा पश्चिम बंगाल से 2015 में किसी भी खेतिहर मजदूर की आत्महत्या की घटना प्रकाश में नहीं आई. केंद्रशासित प्रदेशों में पुद्दुचेरी से 12 खेतिहर मजदूरों के आत्महत्या की घटनाएं दर्ज हुईं जबकि शेष केंद्रशासित प्रदेशों से ऐसी कोई घटना प्रकाश में नहीं आई. 

 

•  स्यूसाइड इन फार्मिंग सेक्टर शीर्षक से अध्याय 2ए में किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के व्यापक आंकड़े दर्ज हैं. आंकड़ों को कृषि-मंत्रालय तथा गृहमंत्रालय की देखरेख में तैयार और प्रस्तुत किया गया है. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 2013 तक के एडीएसआई रिपोर्ट में सिर्फ किसान-आत्महत्याओं का जिक्र रहता था. 

 

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नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों की रिपोर्ट [inside]एक्सीडेंटल डेथ्स एंड स्यूसाइड इन इंडिया 2014[/inside] के किसान-आत्महत्या से संबंधित  प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं-

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/chapter-2A%20farmer%20suicides.pdf 

•  देश में साल 2014 में कुल 1,31,666 वयक्तियों ने आत्महत्या की.

•  आत्महत्या करने वाले लोगों में किसानों की संख्या 5,650 है जो कि आत्महत्या करने वाले लोगों की कुल संख्या का 4.3% है. 

•  किसानों के अतिरिक्त, साल 2014 में 6710 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है जो कि 2014 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों का 5.1 प्रतिशत है. 

• आत्महत्या करने वाले किसानों में पुरुषों की संख्या 5,178 और स्त्रियों की संख्या 472 है. प्रतिशत पैमाने पर यह साल 2014 में हुई कुल किसान आत्महत्याओं का क्रमश 91.6% तथा 8.4% प्रतिशत है. 

• आत्महत्या करने वाले किसानों में 44.5% छोटे किसान और 27.9% सीमांत किसान हैं. साल 2014 में आत्महत्या करने वाले कुल किसानों में छोटे और सीमांत किसानों की संख्या 72.4 प्रतिशत ( कुल 5650 में 4095 किसान) है.

•  महाराष्ट्र से कुल 2,568 किसानों के आत्महत्या की खबरें हैं. तेलंगाना में साल 2014 में 898 तथा मध्यप्रदेश में कुल 826 किसानों ने आत्महत्या की जो कि आत्महत्या करने वाले कुल किसानों की संख्या का क्रमश 45.5%, 15.9%  और 14.6% है.  

• छत्तीसगढ़ (443 किसान-आत्महत्या)  और कर्नाटक (321 किसान आत्महत्या) में आत्महत्या करने वाले किसानों की प्रतिशत संख्या आत्महत्या करने वाले कुल किसानों की संख्या का बरक्स क्रमश 7.8% और 5.7% है.

• उपर्युक्त पाँच राज्यों में कुल 5056 किसानों ने आत्महत्या की है जो कि आत्महत्या करने वाले कुल किसानों की संख्या(5650) का तकरीबन 90 प्रतिशत है.

•  कर्जदारी और दिवालिया होना(20.6% ) तथा पारिवारिक समस्या(20.1% ) को रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या की प्रमुख वजह के रुप में दर्ज किया गया है. आत्महत्या की अन्य वजहों में फसल का मारा जाना (16.8%), बीमारी (13.2%)  तथा शराब या नशे की लत (4.9%) प्रमुख हैं.

•  साल 2014 में कर्जदारी और दिवालियापन तथा पारिवारिक समस्या पुरुष किसानों की आत्महत्या की प्रमुख वजह रहा है. आत्महत्या करने वाले कुल किसानों में 21.5 प्रतिशत ने दिवालियापन या कर्जदारी के कारण और 20 प्रतिशत नें पारिवारिक समस्याओं के कारण आत्महत्या की. 

•  महिला किसानों के मामले में खेती-बाड़ी से जुड़े मुद्दे, पारिवारिक समस्याएं, विवाह-संबंधी मुद्दे तथा कर्जदारी और दिवालियापन आत्महत्या की प्रमुख वजहें हैं. आत्महत्या करने वाली महिला किसानों में उपर्युक्त कारणों से क्रमश 21.4% ( 472 में 101), 20.6% , 12.3%  तथा 10.8% ने उपर्युक्त कारणों से आत्महत्या की.  

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सीएसडीएस(लोकनीति) द्वारा प्रस्तुत स्टेट ऑफ इंडियन फार्मर्स: ए रिपोर्ट (2014) नामक अध्ययन देश के 18 राज्यों में दिसंबर 2013 से जनवरी 214 के बीच 137 जिलों के 274 गांवों में कराए गए सर्वेक्षण पर आधारित है। इस अध्ययन के अनुसार


• सर्वेक्षित 83 फीसदी किसानों ने खेती को अपना मुख्य पेशा बताया जबकि 79 फीसदी का कहना था कि खेती उनके आय-उपार्जन का मुख्य साधन है। शेष का कहना था कि उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा गैर-खेतिहर कामों से हासिल होता है।
•    90 फीसदी किसानों ने खेती करने की वजह बताते हुए कहा कि यह पेशे के रुप में पुश्तैनी रुप से चला आ रहा है जबकि 10 फीसदी किसानों ने हाल ही में खेती-बाड़ी को अपना पेशा बनाया था।
•    राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 59 वें दौर की गणना पर आधारित सिच्युएशन असेसमेंट सर्वे ऑफ फार्मर्स, 2003 नामक अध्ययन में कहा गया था कि 60 फीसदी किसान परिवार अपने किसानी के पेशे को पसंद करते हैं जबकि 40 फीसदी किसान परिवार विकल्प होने की स्थिति में उसे छोड़ना पसंद करेंगे। सीएसडीएस के सर्वे से भी इस बात की पुष्टी होती है। सीएसडीएस के उपर्युक्त सर्वे के अनुसार तीन चौथाई किसान अपने पेशे को छोड़ना चाहते हैं।
•    मध्य भारत के 84 फीसदी किसान अपने किसानी के पेशे को पसंद करते हैं जबकि उत्तर और पूर्वी भारत में ऐसे किसानों की तादाद क्रमश 67 और 69 प्रतिशत है। जब इन किसानों से पूछा गया कि क्या आप किसानी के पेशे को पसंद करते हैं तो 72 फीसदी ने हां में उत्तर दिया जबकि 22 प्रतिशत ने स्पष्ट स्वर में ना कहा।
खेती को नापसंद करने के कारण
•  भूमिहीन किसानों ने खेती के पेशे को सर्वाधिक संख्या में नापसंद किया जबकि सर्वे में भूस्वामित्व का आकार बढ़ने के साथ किसानों में खेती को पसंद करने की प्रवृति देखी गई।
•   अच्छी आमदनी का अभाव खेती को नापसंद करने का प्रमुख कारण है। तकरीबन 36 प्रतिशत किसानों ने इसे खेती को नापसंद करने की वजह बताया। 18 प्रतिशत किसानों ने कहा कि परिवार के दबाव में आकर वे किसानी कर रहे हैं। 16 प्रतिशत ने कहा कि किसानों में वे अपना कोई भविष्य नहीं देखते। 9 प्रतिशत का कहना था कि वे कोई और काम करना चाहते हैं जबकि 8 प्रतिशत किसानों का कहना था कि खेती में जोखिम और मेहनत ज्यादा है इसलिए वे खेती करना पसंद नहीं करते।
खेती-बाड़ी के काम में परिवार के अन्य सदस्यों की प्रतिभागिता
•    66 फीसदी किसानों ने कहा कि परिवार की महिलाएं भी खेती के काम में भागीदारी करती हैं। बड़ी जोत वाले किसानों के बीच यही आंकड़ा 73 फीसदी का है जबकि भूमिहीन किसानों में 42 फीसदी का।

फसल उपजाने का तरीका
•    46 प्रतिशत किसानों ने कहा कि वे साल में दो फसलों को उपजाते हैं जबकि 28 प्रतिशत किसानों ने कहा कि वे साल में दो से ज्यादा फसल उपजाते हैं। 26 प्रतिशत किसानों का कहना था कि वे साल में एक फसल उपजाते हैं। इस आंकड़े में क्षेत्रवार बहुत ज्यादा भिन्नता पायी गई।
•   सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि 60 प्रतिशत किसान धान-गेहूं की खेती करते हैं जबकि 41 प्रतिशत किसानों ने सर्वेक्षण में धान की खेती को अपने लिए प्रमुख बताया, 21 प्रतिशत किसानों का कहना था कि वे मुख्य फसल के तौर पर गेहूं उपजाते हैं।
बीज
•    70 प्रतिशत किसान परंपरागत या स्थानीय तौर पर उपलब्ध बीजों का इस्तेमाल करते हैं। जब पूछा गया कि क्या आप संकर बीजों का इस्तेमाल करना चाहेंगे तो 63 प्रतिशत किसानों ने हां में जवाब दिया। मात्र 4 प्रतिशत किसानों ने कहा कि वे आनुवांशिक रुप से प्रवर्धित बीज(जीएम सीड्स) का इस्तेमाल करते हैं।
•   36 प्रतिशत किसानों की राय थी कि संकर बीज स्थानीय बीजों की तुलना में ज्यादा फायदेमंद हैं। 18 प्रतिशत किसानों की राय इसके विपरीत थी। 32 प्रतिशत किसानों ने स्थानीय और संकर बीज दोनों को फायदेमंद माना।
उर्वरक
•    सर्वेक्षित 40 फीसदी किसानों ने कहा कि वे रासायनिक और जैविक दोनों ही तरह के उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं। 35 प्रतिशत का कहना था कि वे सिर्फ रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं जबकि 16 प्रतिशत का कहना था कि वे सिर्फ जैविक उर्वरक का प्रयोग करते हैं।
कीटनाशक
•   सर्वेक्षण के दौरान यह पूछने पर कि आपलोग कीटनाशकों का इस्तेमाल किस हद तक करते हैं, 18 प्रतिशत का कहना था कि वे नियमित तौर पर कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं जबकि 28 प्रतिशत ने कहा कि वे समय-समय पर कीटनाशकों का उपयोग करते हैं जबकि 30 प्रतिशत का कहना था कि जरुरत पड़ने पर ही वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं।13 फीसदी किसानों ने कहा कि वे कभी भी खेती में कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करते।
•    54 प्रतिशत छोटे किसानों ने कहा कि वे कीटनाशकों को इस्तेमाल नियमित रुप से करते हैं। मंझोले किसानों में कीटनाशकों का प्रयोग करने वालों की संख्या 27 प्रतिशत जबकि बड़े किसानों में 10 प्रतिशत थी।
सिंचाई
•    सर्वेक्षित किसानों में केवल 40 प्रतिशत ने कहा कि उनके हिस्से की समूची कृषि-भूमि के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। सिंचाई के साधन के रुप में उपयोग किए जाने वाले तरीके में सर्वाधिक प्रचलन पंप, बोरिंग वेल और ट्यूब वेल है। 45 प्रतिशत किसानों ने इन्हें ही सिंचाई का प्रधान साधन बताया। 38 प्रतिशत किसानों का कहना था कि उनके खेतों में सिंचाई के लिए गांव तक नहर की सुविधा उपलब्ध है। सिंचाई के परंपरागत साधन जैसे तालाब और कुएं अब भी महत्वपूर्ण हैं। 34 प्रतिशत किसान सिंचाई के लिए कुएं पर जबकि 30 प्रतिशत किसान सिंचाई के लिए तालाब पर आश्रित हैं। केवल 18 प्रतिशत किसानों ने कहा कि सिंचाई के लिए उन्हें सरकारी ट्यूब वेल हासिल है।
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नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित [inside]एक्सीडेंटल डेथ एंड स्यूसाइड इन इंडिया-2013[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

 
·  साल 2003-2013 यानी एक दशक की अवधि में हर साल औसत एक लाख से ज्यादा व्यक्तियों ने भारत में आत्महत्या की।

·  साल 2003 में भारत में आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या 1,10,851 थी जो साल 2013 में बढ़कर 1,34,799 हो गई। यह एक दशक के भीतर तकरीबन 21 प्रतिशत का इजाफा है। साल 2011 तक प्रतिवर्ष आत्महत्या की संख्या में वृद्धि के रुझान हैं इसके बाद के सालों में घटती के रुझान देखे जा सकते हैं।

·  साल 2003-2013 की अवधि में जनसंख्या में 15 फीसदी की बढोत्तरी हुई जबकि आत्महत्या दर में वृद्धि इस अवधि में 5.7 प्रतिशत की रही। इस तरह आत्महत्या दर में दी गई अवधि में मिश्रित रुझान देखने को मिलता है।

·  आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में सरकारी श्रेणी की नौकरी करने वाले लोगों की संख्या 1.3% है जबकि प्राइवेट श्रेणी की नौकरी करने वाले लोगों की संख्या 9.2% ।

·   आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में पब्लिक सेक्टर यानी सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरी करने वाले लोगों की संख्या 1.9% है जबकि छात्रों की संख्या 6.2% और बेरोजगारों की संख्या 7.2% ।

·   आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में स्वरोजगार में लगे लोगों की संख्या 38.0% है। इस 38.0% की तादाद में 8.7% लोग खेती-बाड़ी यानी किसान श्रेणी के हैं जबकि 5.2% लोग छोटे-मोटे व्यवसायी तथा 2.9% लोग पेशेवर श्रेणी के।

·    मध्यप्रदेश में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में 25.1% तादाद महिलाओं की है, गुजरात में जितने लोगों ने साल 2013 में आत्महत्या की राह अपनायी उसमें महिलाओं की तादाद 24.2% है जबकि उत्तरप्रदेश में 22.1%।

·    आत्महत्या करने वाले लोगों में सर्वाधिक संख्या (22.1%) प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा हासिल करने वाले लोगों की है। माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या 23.6% तथा निरक्षर लोगों की संख्या 18.5% है। आत्महत्या करनेवाले कुल लोगों में मात्र 3.3% लोग स्नातक स्तर की शिक्षा वाले थे तथा मात्र 0.5% लोग एम ए स्तर की शिक्षा प्राप्त थे।

·    आंध्रप्रदेश में आत्महत्या करनेवाले कुल लोगों में निरक्षर लोगों की तादाद 33.1%, दादरा नगर हवेली में 31.0%, राजस्थान में 30.3% तथा अरुणाचल प्रदेश में 28.4% थी। सिक्किम में आत्महत्या करनेवाले 40.2% लोग प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त थे जबकि गुजरात में 37.6% , नगालैंड में 32.4% तथा पश्चिम बंगाल में ऐसे लोगों की तादाद 32.2% थी।  मिजोरम में आत्महत्या करने वाले लोगों में 61.1% लोग माध्यमिक श्रेणी की शिक्षा प्राप्त थे जबकि त्रिपुरा में ऐसे लोगों की तादाद 41.3% तथा अंडमान निकोबार में 38.3% और नगालैंड में 37.8% थी।

·     आत्महत्या करने वाले लोगों में सर्वाधिक तादाद महाराष्ट्र के लोगों(16,622) की है। इसके बाद तमिलनाडु (16,601) का स्थान है जो कि देशस्तर पर कुल आत्महत्या की घटनाओं की संख्या का 12.3 प्रतिशत( क्रमश महाराष्ट्र और तमिलनाडु के लिए अलग-अलग) है।

·     साल 2013 में आत्महत्या करने वाले लोगों में सर्वाधिक संख्या(12.3 प्रतिशत) महाराष्ट्र राज्य के लोगों की रही। साल 2012 में भी महाराष्ट्र आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या के मामले में दूसरे नंबर(13.4 प्रतिशत) पर था। साल 2011 में महाराष्ट्र में आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या आत्महत्या के शिकार कुल लोगों में 11.8 प्रतिशत थी।

·    देशस्तर पर दर्ज आत्महत्या की कुल घटनाओं(1,34,799) में आंध्रप्रदेश (14,607 आत्महत्या), पश्चिम बंगाल (13,055 आत्महत्या) और कर्नाटक (11,266 आत्महत्या) में दर्ज आत्महत्या की घटनाओं का प्रतिशत क्रमशः 10.8%, 9.7% और 8.4% है। इन पाँच राज्यों में आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या(साल 2013 के लिए) देश में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 53.5% है। आत्महत्या की शेष 46.5% घटनाएं 23 अन्य राज्यों तथा 7 केंद्रशासित प्रदेशों की हैं।

·     केंद्रशासित प्रदेशों में आत्महत्या की सर्वाधिक घटनाएं (2,059) दिल्ली में हुईं, इसके बाद पडुचेरी (546) का नंबर है। कुल सात केंद्रशासित प्रदेशों में आत्महत्या की दर्ज घटनाएं देश में दर्ज आत्महत्या की घटनाओं की कुल संख्या का 2.2% हैं। इसके विपरीत देश के 53 बड़े शहरों में दर्ज आत्महत्या की घटनाओं की कुल संख्या देश में दर्ज आत्महत्या की कुल घटनाओं का 15.8% हैं।

·     आत्महत्या करने की एक बड़ी वजह‘ पारिवारिक समस्या’(24.0%) रही जबकि दूसरी बड़ी वजह रही बीमारी 19.6% । ‘नशे की लत’ (3.4%), ‘प्रेम-संबंध’ (3.3%), ‘दीवालिया होना और आर्थिक-स्थिति में अचानक परिवर्तन’ (2.0%), 'परीक्षा में असफलता’ (1.8%), ‘दहेज संबंधी झगड़े’ (1.7%) और ‘ बेरोजगारी’ (1.6%) आत्महत्या की अन्य प्रमुख वजहों में शामिल हैं।

·     साल 2013 में आत्महत्या करने वाले लोगों में पुरुष: स्त्री अनुपात 67.2:32.8 का रहा। यह पिछले साल यानी 2012 की तुलना में तनिक ज्यादा (66.2:33.8) है।

·     जहां तक कारणों का सवाल है, आत्महत्या करने वाली कुल महिलाओं में सर्वाधिक संख्या ‘दहेज संबंधी विवाद’(97.1%), वाले कारण की श्रेणी में है। इसके बाद ' बांझपन ‘ (64.8%), तथा तलाक (55.6%) जैसे कारण महिलाओं की आत्महत्या के प्रेरक कारणों में अव्वल रहे।

·     आत्महत्या करने वाले लोगों में युवा (15-29 years) तथा मध्य आयु-वर्ग (30-44 years) के लोगों की संख्या बहुतायत है। आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में 34.4% 15-29 आयु-वर्ग के थे जबकि 33.8% मध्य आयु-वर्ग के।

·     आत्महत्या करने वाली कुल महिलाओं में गृहिणी श्रेणी की महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है (कुल 44,256 में 22,742 यानी 51.4%)। आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का यह 16.9 प्रतिशत है। (कुल 1,34,799 में 22,742 ).

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[inside]नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित एक्सीडेंटल डेथ एंड स्यूसाइड इन इंडिया-2012 नामक दस्तावेज[/inside] के अनुसार- http://ncrb.gov.in/

मूल दस्तावेज के लिए कृपया यहां क्लिक करें


•    साल 2012 में एक लाख से ज्यादा(1,35,445) लोगों ने आत्महत्या के चलते जान गंवायी।


•    साल 2002-2012 के दशक में भारत में आत्महत्या की तादाद में 22.7 फीसदी की बढोत्तरी हुई। साल 2002 में आत्महत्या करने वालों की संख्या 1,10,417 थी जो साल 2012 में बढ़कर 1,35,445 हो गई। इस अवधि में देश की आबादी में बढ़ोत्तरी 15 फीसदी की हुई है।


•    आत्महत्या करने वाले लोगों में स्वरोजगार में लगे लोगों की तादाद सबसे ज्यादा यानि 38.7% थी और इस तादाद में 11.4% लोग खेती-बाड़ी या इससे संबद्ध काम में लगे थे। स्वरोजगार में लगे जितने लोगों ने साल 2012 में आत्महत्या की उसमें 4.7% किसी ना किसी तरह का व्यवसाय करते थे जबकि 2.9 फीसदी लोग हाथ के हुनर से जीविका चलाने वाले लोगों में थे।


•    आर्थिक हैसियत में अचानक बदलाव 2 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह रहा जबकि गरीबी आत्महत्या के 1.9 फीसदी मामलों में मुख्य कारण रही।


•    मिजोरम में जितने लोगों ने साल 2012 में आत्महत्या की उसमें 38.2% लोग बेरोजगार थे। साल 2012 में दिल्ली में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में बेरोजगारों की संख्या 19.4% थी।


•    आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में सरकारी नौकरी करने वाले लोगों की संख्या 1.4% थी जबकि निजी क्षेत्र में नौकरी करने वाले लोगों की कुल संख्या 9.4%। आत्महत्या करने वाले लोगों में सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी करने वाले लोगों की संख्या 1.8 फीसदी थी।


•    आत्महत्या करने वाले लोगों में छात्रों का प्रतिशत 5.5% था जबकि बेरोजगार लोगों का संख्या 7.4% थी।


•    साल 2012 में जितने लोगों ने आत्महत्या की उसमें ज्यादातर(23.0%) प्राथमिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त थे। आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में निरक्षर लोगों की संख्या 19.7 फीसदी थी जबकि आत्महत्या के 23 फीसदी मामलों में इस नियति के शिकार व्यक्ति माध्यमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त थे।


•    आत्महत्या करने वाले लोगों में मात्र 3.4% स्नात्क स्तर की शिक्षा प्राप्त थे जबकि स्नात्तकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त ऐसे व्यक्तियों की संख्या आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की कुल तादाद में 0.6 फीसदी थी।


•    आंध्रप्रदेश में 34.7%, पंजाब में 33.8% और राजस्थान में  32.0% फीसदी मामलों में पाया गया कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति निरक्षर है। गुजरात में  36.2% मामलों में, पश्चिम बंगाल में 34.5% मामलों में और मेघालय में 33.6% मामलों में पाया गया कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपर-प्राइमरी स्तर तक शिक्षा प्राप्त है।


•    साल 2012 में सर्वाधिक(12.5% ) आत्महत्याएं तमिलनाडु(16,927) में हुईं। आत्महत्याओं की तादाद के मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर ( आत्महत्याओं की कुल संख्या-16,112) पर रहा। पश्चिम बंगाल में आत्महत्याओं की तादाद  14,957, आंध्रप्रदेश में 14,238 और कर्नाटक में 12,753 रही जो देशस्तर पर आत्महत्याओं की कुल तादाद का क्रमश 11.9%, 11.0%, 10.5%  और 9.4% है।


•    आत्महत्या करने वालों में 25.6 फीसदी ने ‘पारिवारिक समस्याओं की वजह से ऐसा कदम उठाया जबकि 20.8 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह बीमारी रही।


•    आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या में गृहणियों की तादाद 21,904 थी जो आत्महत्या करने वाली महिलाओं की कुल संख्या का 53.8% फीसदी है और आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 18.2% फीसदी।


•    साल 2012 में सर्वाधिक(12.5% ) आत्महत्याएं तमिलनाडु(16,927) में हुईं। आत्महत्याओं की तादाद के मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर (आत्महत्याओं की कुल संख्या-16,112) पर रहा। पश्चिम बंगाल में आत्महत्याओं की तादाद  14,957, आंध्रप्रदेश में 14,238 और कर्नाटक में 12,753 रही जो देशस्तर पर आत्महत्याओं की कुल तादाद का क्रमश 11.9%, 11.0%, 10.5%  और 9.4% है।


•    आत्महत्या करने वालों में 25.6 फीसदी ने ‘पारिवारिक समस्याओं की वजह से ऐसा कदम उठाया जबकि 20.8 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह बीमारी रही।


•    आर्थिक हैसियत में अचानक बदलाव 2 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह रहा जबकि गरीबी आत्महत्या के 1.9 फीसदी मामलों में मुख्य कारण रही।

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नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित एक्सीडेंटल डेथ्स् एंड स्यूसाईड-2011 नामक दस्तावेज के अनुसार, http://ncrb.nic.in/:

 

--साल 2011 में प्रति घंटे 16 लोगों ने आत्महत्या की।

 

--पुरुषों के मामले में आत्महत्या की मुख्य वजह सामाजिक-आर्थिक रहे जबकि महिलाओं के मामले में भावनात्मक और निजी कारण।

 

--आत्महत्या करने वाले पुरुषों में 71.1% विवाहित थे जबकि महिलाओं में 68.2% विवाहित थीं।.

 

--लगातार तीन सालों से बाकी राज्यों की अपेक्षा पश्चिम बंगाल में आत्महत्या करने वालों की तादाद ज्यादा बनी हुई है। साल 2009 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में पश्चिम बंगाल के  11.5% लोग थे, साल 2010 में 11.9% फीसदी और साल 2011 में 12.2%.

 

--पश्चिम बंगाल (12.2%), महाराष्ट्र और तमिलनाडु (प्रत्येक 11.8%), आंध्रप्रदेश (11.1%) और कर्नाटक (9.3%) से आत्महत्या करने वाले लोगों की तादाद, आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की तादाद में 56.2% फीसदी रही।.

 

--साल 2011 में किसान आत्महत्याओं की संख्या() पिछले साल यानी 2010 के मुकाबले कम रही। साल 2010 में 15,933 किसानों ने आत्महत्या की थी। साल 2011 में छत्तीसगढ़ में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की जबकि साल 2010 में छत्तीसगढ़ में 1422 किसानों ने आत्महत्या की थी।

 

--महाराष्ट्र में साल 2011 में  3,337 किसानों ने आत्महत्या की। साल 2010 में महाराष्ट्र में  3,141 किसानों ने आत्महत्या की थी।

 

--साल  2004-2011 के बीच किसान-आत्महत्याओं की संख्या में  कमी के रुझान हैं। साल 2004 में सर्वाधिक यानी  18,241 किसानों ने आत्महत्या की।

 

--साल 2004 से अबतक(2011) केंद्र में मौजूद यूपीए सरकार के शासन की अवधि में देश में कुल  1.18 लाख किसानों ने आत्महत्या की है। गुजरात, कर्नाटक, और यूपी में साल 2004 के बाद से किसान-आत्महत्याओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है।

 

--पूर्वोत्तर के राज्य असम से भी किसान-आत्महत्या की संख्या चिंताजनक है। यहां साल 2010 में कुल 269 किसानों ने आत्महत्या की जबकि साल 2011 में 312 किसानों ने।

 

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नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा प्रस्तुत एक्सीडेंटल डेथ एंड स्यूसाइड (2010) नामक दस्तावेज के अनुसार-http://ncrb.nic.in/

·         देश में हर घंटे घंटे 15 व्यक्ति आत्महत्या करते हैं।

·         साल 2010 में एक लाख से ज्यादा(1,34,599) व्यक्तियों ने आत्महत्या की।

·         आत्महत्या करने वालों में 26.3% फीसदी प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त थे जबकि 22.7% फीसदी की शिक्षा माध्यमिक स्तर की थी और 19.8% फीसदी निरक्षर थे।

·         देश में प्रति 5 आत्महत्याओं में 1 आत्महत्या गृहिणी(हाऊसवाईफ) ने की।

·         आत्महत्या करने वालों में 41.1% फीसदी स्वरोजगार में लगे थे जबकि 7.5% फीसदी बेरोजगार थे। आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की तादाद में सरकारी नौकरी करने वालों की संख्या मात्र 1.4% फीसदी है।

·         आत्महत्या के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि आत्महत्या करने वाले पुरुषों के लिए सामाजिक-आर्थिक कारण जिम्मेदार रहे जबकि आत्महत्या करने वाली महिलाओं के लिए भावनात्मक और निजी कारण।

·         पारिवारिक कारणों से आत्महत्या करने वालों की तादाद कुल आत्महत्या करने वालों में 23.7% फीसदी और बीमारी के कारण आत्महत्या करने वालों की तादाद  21.0% फीसदी रही। इन दो कारणों से कुल आत्महत्या करने वालों में 44.7% फीसदी ने जीवनलीला का अंत किया ।

·         जायदाद के विवाद के कारण खुदकुशी करने वालों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी(48.0%) हुई है।

·         पाँच राज्य- केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में 60 और उससे ज्यादा की उम्र के लोगों में आत्महत्या करने वालों की तादाद 65.8 फीसदी है।

·         आत्महत्या करने वाले कुल व्यक्तियों में पश्चिम बंगाल से 11.9% , आंध्रप्रदेश से 11.8% , तमिलनाडु से 12.3% , तथा महाराष्ट्र से 11.8% और कर्नाटक से 9.4% फीसदी थे। यानी कुल 57.2% फीसदी व्यक्ति मात्र इन्हीं राज्यों के थे।

·         पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा लोगों(11.9%)  ने आत्महत्या की।

·         आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की तादाद में 57 फीसदी लोग दक्षिण के राज्यों आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से थे।

·         ऐसे मामले जब पूरा परिवार आत्महत्या करने को मजबूर हुआ सबसे ज्यादा(23) बिहार से रहे, इसके बाद केरल(22), मध्यप्रदेश(21) और आंध्रप्रदेश(20) का स्थान है।

 

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नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो द्वारा प्रस्तुत एक्सीडेंटल डेथ एंड स्यूसाइड (2009) नामक दस्तावेज के अनुसार- http://ncrb.gov.in/CD-ADSI2009/suicides-09.pdf http://ncrb.gov.in/CD-ADSI2009/snapshots.pdf

http://ncrb.gov.in/CD-ADSI2009/table-2.11.pdf

  देश में साल 2009 में एक लाख से अधिक (1,27,151) लोगों ने आत्महत्या की। पिछले साल जितने लोगों ने आत्महत्या( (1,25,017) की उसकी तुलना में यह 1.7% फीसदी अधिक है।

 

  देश में आत्महत्या की तादाद एक दशक (1999–2009) में 15.0% ( साल 1999 मे 1,10,587 से बढ़कर साल 2009 में 1,27,151 ) बढ़ी है।.

 

   साल 2009 में जितने लोगों ने आत्महत्या की उसमें स्वरोजगार में लगे लोगों की तादाद 39.8% है।इसमें  13.7% की तादाद खेती-किसानी में लगे लोगों की है जबकि 6.1% व्यापार से जुड़े हैं और 2.9% पेशेवर कोटि के हैं।.

 

  साल 2009  में मिजोरम में जितने लोग आत्महत्या के शिकार हुए उसमें 55.1% खेती-किसानी से जु़ड़े थे।मणिपुर में आत्महत्या करने वाले लोगों की कुल संख्या में  29.6% फीसदी तादाद बरोजगारी की थी।

 

यद्यपि महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या की तादाद 2008 के मुकाबले 2009 में घटी(930 की कमी) है फिर भी किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र लगातार दसवें साल भी देश में सबसे आगे (2,872 किसान आत्महत्याएं) बना हुआ है।

 

  साल 2009 में कुल 17,368 किसानों ने आत्महत्या की यानी साल 2008 के मुकाबले एक साल के अंदर किसानों की आत्महत्या की तादाद में 1,172 आत्महत्याओं की बढोतरी हुई है।

 

किसानों की आत्महत्या की तादाद में पिछले साल के मुकाबले 7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ोतरी हुई है।

 

  साल 2009 में 1,27,151 लोगों ने आत्महत्या की। एक साल के अंदर आत्महत्या की दर देश में 1.7% फीसदी बढ़ी है।पिछले साल कुल आत्महत्याओं की तादाद 1,25,017 थी।

 

  साल 2009 में देश में प्रतिदिन 348 लोगों ने आत्महत्या की इसमें किसान-आत्महत्याओं की संख्या प्रतिदिन 48 रही। साल 2004 के बाद से प्रतिदिन औसतन 47 किसानों ने आत्महत्या की है यानी हर 30 मिनट पर एक किसान आत्महत्या।

 

  साल 2009 में जितने लोगों ने आत्महत्या की उसमें निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की तादाद क्रमश  8.4% और 2.3% फीसदी रही जबकि बेरोजगारों की तादाद 7.8% फीसदी।.

 

   साल 2009 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या में सरकारी नौकरी करने वालों की तादाद 1.3% फीसदी है जबकि इस साल जितनी महिलाओं ने आत्महत्या की उसमें हाऊसवाइफ(गृहिणी) की संख्या 25,092 यानी 54.9% रही जो आत्महत्याओं की कुल संख्या का  19.7% है।

 

  आत्महत्या करने वाले लोगों में जो नियमित वेतनभोगी थे उनमें 40.9% की उम्र 30-44 साल की थी जबकि आत्महत्या करने वाले कुल बेरोजगारों में 39.0 फीसदी इस आयु-वर्ग के थे।

 

  पश्चिम बंगाल में आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या सर्वाधिक (14,648) रही जो कुल आत्महत्याओं का 11.5% है। इसके बाद नंबर आंधप्रदेश का रहा जहां कुल 14,500 लोगों ने आत्महत्या की। तमिलनाडु में आत्महत्या करने वालों की संख्या 14,424 , महाराष्ट्र में  14,300 और कर्नाटक में  12,195  रही जो देश में हुई कुल आत्महत्याओं का क्रमश  11.4%, 11.3%, 11.2%  और  9.6% फीसदी है।

 

  देश में हुई कुल आत्महत्या का 55.1% हिस्सा केवल इन पांच राज्यों में केंद्रित है।

 

    राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो सामूहिक-पारिवारिक आत्महत्या की जिन घटनाओं की सूचना मिली है उसमें आत्महत्या करने वालों की तादाद 209 है। इसमें पुरुषों की संख्या  95  और महिलाओं की  114 है। 14 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों ने इस शीर्षक से जानकारी मुहैया नहीं करायी।

 

  पारिवारिक कलह और  बीमारीकी वजह से आत्महत्या करने वालों की संख्या क्रमश 23.7% और 21.0% है। पारिवारिक कलह और नशे की आदत के कारणों से आत्महत्या करने वालों की तादाद पिछले तीन सालों से बढ़ रही है।

 

   आत्महत्या करने वाले लोगों में अधिकतर (23.7%) माध्यमिक स्तर तक शिक्षित थे। आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में निरक्षर और प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या क्रमश 21.4% फीसदी और 23.4% फीसदी थी।.

 

  साल २००९ में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में केवल 3.1% फीसदी स्नातक-परास्नातक थे। सिक्किम में आत्महत्या करने वाले लोगों में  51.9% फीसदी निरक्षर थे जबकि गुजरात में आत्महत्या करने वालों में. 36.5% फीसदी तादाद प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त लोगों की थी। मिजोरम में आत्महत्या के शिकार लोगों में 68.1% फीसदी और पुद्दुचेरी में आत्महत्या के शिकार लोगों में 59.1% तादाद माध्यमिक स्तर तक की शिक्षाप्राप्त लोगों की थी।

 

 

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मीता और राजीव लोचन द्वारा प्रस्तुत- [inside]फार्मस् स्यूसाइड- फैक्ट एंड पॉसिबल प़लिसी इन्टरवेंशनस्(२००६)[/inside] किसानों की आत्महत्या पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें कतिपय पूर्ववर्ती अध्ययनों मसलन(मिश्र और दांडेकर तथा अन्य) का जायजा लिया गया है और उनकी खामियों की रोशनी में कहीं ज्यादा समग्र अध्ययन प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है। इस अध्ययन के अनुसार-,

http://www.yashada.org/organisation/FarmersSuicideExcerpts.pdf

• आत्महत्याओं का प्रमुख केंद्र महाराष्ट्र का यवतमाल जिला रहा है। सूबे के क्राईम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार साल 2000, 2001, 2002, 2003 और 2004 यहां क्रमश 640, 819, 832, 787 और 786 किसानों ने आत्महत्या की।

 
• आत्महत्या करने वालों में ज्यादातर पुरुष और ३०-५० आयुवर्ग के लोग थे। ये शादीशुदा और शिक्षित किसान थे। इनके ऊपर बेटी या बहन का ब्याह करने जैसी गहन सामाजिक जिम्मेदारी भी थी।आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किसानों में दो बातें समान थीं। एक तो यह कि इन किसानों ने समय के किसी बिन्दु पर अपने को पारिपारिक द्वन्दों को सुलझाने में तथा धन के अभाव में कर्ज चुकता करने में अत्यंत असहाय महसूस किया, दूसरे इन लोगों को किसी ऐसे व्यक्ति या संस्था की मदद भी ना मिली जो इन्हें कारगर पारिवारिक या सार्वजनिक मुद्दे पर सलाह देती या फिर किसी तरह से सहारा साबित होती।

 
• अध्ययन के अनुसार लोगों ने सरकार द्वारा चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी ना होने की बात कही। उन्हे इस बात की भी कोई खास जानकारी नहीं थी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी भी कोई चीज होती है जिसका मार्केंटिंग पर असर पड़ता है।किसानों के पास तकनीकीपरक जानकारी बड़ी कम थी और उन्हें इसके बारे में वक्त जरुरत बताने वाला भी कोई(व्यक्ति या संस्था) नहीं था। ज्यादातर किसानों को फसल बीमा के बारे में भी सूचना नहीं थी।

•आत्महत्या करने वालों में ज्यादातर हिन्दू धर्म के मानने वाले किसान थे। इसका एक कारण संभवतया हिन्दू धर्म में कतिपय हालात में देहत्याग करने के बारे में देशना का मौजूद होना है।

• शराबनोशी और मादक द्रब्यों की लत के लक्षण ग्रामीण आबादी में अध्ययन के दौरान देखने में आये।

• आत्महत्या करने वाले पर सबसे ज्यादा बोझ उस स्थिति में पड़ा जब उसने कर्जा अपने ही किसी रिश्तेदार से लिया हो और यह रिश्तेदार तगादा कर रहा हो। महाजन और बैंक इस मामले में रिश्तेदारों से कहीं कम दबावकारी साबित हुए।

 

दस सूत्री सुझाव:

 
1.सरकारी कारिन्दों और ग्रामीण समुदाय के बीच मोलजोल बढ़ना चाहिए। इसके लिए दौरा, रात्रि विश्राम और ग्रामसभा जैसे उपायों का सहारा लिया जा सकता है। प्रशासन के हर स्तर के अधिकारी ग्राम समुदाय से ज्यादा से ज्यादा मेलजोल रखने की कोशिश करें।

 
2. स्थानीय समुदाय, खासकर किसान समुदाय पर गहरी नजर रखी जाय और उनके बीच किसी तरह के आर्थिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक संताप के लक्षण नजर आयें तो सामाजिक-आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक मदद पहुंचायी जाय।

 
3. जो प्रावधान किसानों और खेतिहर मजूरों के हितों की रक्षा में पहले से मौजूद हैं, मसलन मनी लेंडिंग एक्ट या फिर न्यूमतम मजदूरी का कानून, उन पर कड़ाई से अमल हो।

 
4. कृषि विस्तार की गतिविधियों की कार्यसक्षमता में इजाफा किया जाय।

 5. सरकार समाज कल्याण के नाम पर जिन योजनाओं के तहत मदद मुहैया करा रही है उनकी कारकरदगी बढ़ायी जाय।

6. ग्रामीण आबादी की सेवा में प्रशिक्षित और तनख्वाहयाफ्ता कर्मियों को लगाया जाय। तुरंत मदद देने की जरुरत है।

 7. दूरगामी बदलाव के लिए स्कूली शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए। साथ ही ग्राम और तालुके के स्तर पर समुचित मात्रा में व्यावसायिक शिक्षा भी दी जाय ताकि लोग मौजूदा समय की व्यापारिक और वाणिज्यिक जटिलताओं को समझ सकें।

 8. मीडिया से कहा जाय कि वह आत्महत्या की खबरों को ज्यादा सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत ना करे क्योंकि ऐसी खबरों से आत्महत्या की प्रवृति जोर पकड़ती है।

9. मृतक के परिवार को मुआवजा के रुप में धन प्रदान करने की जगह परिवार के सदस्य को रोजगार प्रदान किया जाय या फिर कोई योग्य व्यवसाय खोलने में मदद दी जाय।

 
10. वास्तिविक जोतदार को सब्सिडी सीधे दी जाय

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मुजफ्फर असदी द्वारा प्रस्तुत [inside]फार्मस् स्यूसाइड इन इंडिया - एग्ररेरियन क्राइसिस, पाथ ऑव डेवलपमेंट एंड पॉलिटिक्स इन कर्नाटक[/inside] नामक अध्ययन के अनुसार-

http://viacampesina.net/downloads/PDF/Farmers_suicide_in_india(3).pdf:

 
• खेतिहर संकट की शुरुआत साल १९८० के दशक में हो चुकी थी। किसानों की आत्महत्या की शुरुआत पर ध्यान देना ठीक है लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरुरी है खेतिहर संकट की शुरुआत पर ध्यान देना। साल १९८० के दशक में टर्मस् ऑव ट्रेड खेती के खिलाफ जाने शुरु हुए। महाराष्ट्र में शेतकारी संगठन तमिलनाडु में व्यावसायीगल संघम् और कर्नाटक में राज्य रैयत संघ राज्य सरकार द्वारा चलायी जा रही नीतियों का इस अवधि में विरोध कर रहे थे।

 
• गंभीर से गंभीर खेतिहर संकट की दशामें भी कर्नाटक में किसानों के आत्महत्या करने का कोई इतिहास नहीं मिलता. कर्नाटक में यह प्रवृति आंध्रप्रदेश से आयी। कर्नाटक में किसी किसान की आत्महत्या की पहली खबर उत्तरी इलाके से आयी। यह इलाका आंध्रप्रदेश की सीमा के निकट है।

 
• कर्नाटक में किसानों की आत्महत्या की शुरुआती खबरें साल १९९८ में आईं। इस साल बीदर जिले के दो किसानों ने आत्महत्या की। ये किसान अरहर की खेती करते थे जो एक तरह से नकदी प्ररित खेती है।१९९८ के बाद के दो सालो में उत्तरी कर्नाटक के बीदर और गुलबर्गा इलाके से आत्महत्या की खबरें आयी। यह इलाका सूखा आशंकित कहलाता है और पिछड़ा भी है।.साल २००० के बाद अपेक्षाकृत समृद्ध इलाकों मसलन, माड्या, हासन, शिमोगा, दावणगेरे और चिकमंगलूर तक में किसानों आत्महत्या करने लगे। किसानों की आत्महत्या घटनायें भरपूर पानी की धरती बेलगाम और भरपूर सिचाई सुविधा संपन्न मांडया जिले से भी आईं। तटीय इलाके में कहीं कम किसानों ने आत्महत्या की।

 
• अनुमानतया साल १९९९-२००१ के बीच कर्नाटक में ११० किसानों ने आत्महत्या की। एक अनुमान के अनुसार साल १९९८ से साल २००६ के बीच कर्नाटक में ३००० किसानों ने आत्महत्या की। कर्नाटक के क्राइम ब्रांच द्वारा उपलब्ध करवाये गए तथ्यों के अनुसार साल १९९८ से २००२ के बीच कुल १५८०४ किसानों ने आत्महत्या की।साल १९९६ से २००२ के बीच कर्नाटक में कुल १२८८९ पुरुष और २८११ महिला किसानों ने आत्महत्या की। १ अप्रैल २००३ से १ जनवरी २००७ तक कर्नाटक में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या ११९३ रही।

 
• जिन किसानों ने आत्महत्या की उन सभी पर कर्ज का बोझ एकसमान नहीं था। किसी के ऊपर ५००० रुपये का कर्जा था तो किसी के ऊपर ५०००० रुपये का। अधिकतर किसानों ने छोटी अवधि के लिए कर्ज लिए थे। .

 
• किसानों की आत्महत्या का एक दुखद पहलू यह भी है कि ऐसे ज्यादातर किसान २५-३५ आयु वर्ग के थे।

 
• २१ वीं सदी के शुरुआती सालों में कर्नाटक में खेती की बढ़ोतरी दर नकारात्मक रही। इससे जुड़ा एक तथ्य है- साल १९९५-९६ से २००२-०३ के बीच विभिन्न क्षेत्रों की औसत जीडीपी दर ५.८६ रही जबकि खेती की १.८७। इस अवधि में उद्योगों के लिए यह आंकड़ा ५.९३ फीसदी का और सेवा क्षेत्र के लिए ८.१८ फीसदी का रहा।

 
• कर्नाटक में आत्महत्या करने वाले किसानों में ज्यादातर ओबीसी समूह के थे। बहरहाल, अगड़ी जातियों(लिंगायत और वोक्कालिंगा के )किसानों ने भी आत्महत्या की।

 
• कर्नाटक सरकार ने विश्वबैंक से जो कर्ज लिया वह किसानों के हित के विपरीत गया। इस कर्ज के कारण साल २००१ में आर्थिक पुनर्रचना की गई। बैंक ने कर्ज इस शर्त पर दी की सरकार बिजली के मामले में ना तो नियामक की भूमिका निभायेगी और ना ही वितरक की। बिजली की कीमतें अचानक बढ़ गईं।

 
• कर्नाटक की सरकार महाजनों पर लगाम कसने में नाकाम रही। यहां सरकार सहकारिता आंदोलन को भी सफल ना बना सकी। कर्नाटक में ग्रामीण स्तर पर कुल ३२३८१ सहकारी संस्थाएं हैं। इनमें से तकरीबन ४० फीसदी घाटे में चल रही हैं जबकि २० फीसदी अब खत्म हो गईं हैं अथवा उनमें कोई कामकाज नहीं होता।

 
• कर्नाटक सरकार बीटी कॉटन के फील्ड ट्रायल के लिए अनुमति देने वाली कुछेक पहली सरकारों में एक है।

 
•साल 2002, 143 तालुके को सूखाग्रस्त घोषित किया गया।साल 2003, में  176 तालुके में से 159 तालुके को सूखाग्रस्त घोषित किया गया। सुखाड़ की स्थिति उत्पादन में कमी की जिम्मेदार रही क्योंकि रोपाई-बुआई का रकबा घट गया।

 

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[inside]के नटराज द्वारा प्रस्तुत अध्ययन (२००८) -फारमरस् स्यूसाइड इन इंडिया,मैग्नीट्यूडस् ट्रेन्डस् एंड स्पैशियल पैटर्नस्[/inside] में कहा गया है कि- http://www.macroscan.com/anl/mar08/pdf/Farmers_Suicides.pdf

    * किसानों की आत्महत्या की घटनाएं महाराष्ट्र,कर्नाटक,केरल,आंध्रप्रदेश,पंजाब और मध्यप्रदेश(इसमें छत्तीसगढ़ शामिल है) में हुईं।
    * साल १९९७ से लेकर २००६ तक यानी १० साल की अवधि में भारत में १६६३०४ किसानों ने आत्महत्या की। यदि हम अवधि को बढ़ाकर १२ साल का करते हैं यानी साल १९९५ से २००६ के बीच की अवधि का आकलन करते हैं तो पता चलेगा कि इस अवधि में लगभग २ लाख किसानों ने आत्महत्या की।
    * आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से पिछले एक दशक में औसतन सोलह हजार किसानों ने हर साल आत्महत्या की। आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी जाहिर होगा कि देश में आत्महत्या करने वाला हर सांतवां व्यक्ति किसान था।
    * साल १९९८ में किसानों की आत्महत्या की संख्या में तेज बढ़ोत्तरी हुई। साल १९९७ के मुकाबले साल १९९८ में किसानों की आत्महत्या में १४ फीसदी का इजाफा हुआ और अगले तीन सालों यानी साल २००१ तक हर साल लगभग सोलह हजार किसानों ने आत्महत्या की।
    * साल २००२ से २००६ के बीच यानी कुल पांच साल की अवधि पर नजर रखें तो पता चलेगा कि हर साल औसतन १७५१३ किसानों ने आत्महत्या की और यह संख्या साल २००२ से पहले के पांच सालों में हुई किसान-आत्महत्या के सालाना औसत(१५७४७) से बहुत ज्यादा है। साल १९९७ से २००६ के बीच किसानों की आत्महत्या की दर (इसकी गणना प्रति एक लाख व्यक्ति में घटित आत्महत्या की संख्या को आधार मानकर होती है) में सालाना ढाई फीसद की चक्रवृद्धि बढ़ोत्तरी हुई।
    * अमूमन देखने में आता है कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा है और यही बात किसानों की आत्महत्या के मामले में भी लक्ष्य की जा सकती है लेकिन तब भी यह कहना अनुचित नहीं होगा कि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में पुरुषों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा थी।देश में कुल आत्महत्या में पुरुषों की आत्महत्या का औसत ६२ फीसदी है जबकि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में पुरुषों की तादाद इससे ज्यादा रही।
    * साल २००१ में देश में किसानों की आत्महत्या की दर १२.९ फीसदी थी और यह संख्या सामान्य तौर पर होने वाली आत्महत्या की घटनाओं से बीस फीसदी ज्यादा है।साल २००१ में आम आत्महत्याओं की दर (प्रति लाख व्यक्ति में आत्महत्या की घटना की संख्या) १०.६ फीसदी थी। आशंका के अनुरुप पुरुष किसानों के बीच आत्महत्या की दर (१६.२ फीसदी) महिला किसानों (६.२ फीसदी) की तुलना में लगभग ढाई गुना ज्यादा थी।
    * साल २००१ में किसानों की आत्महत्या की सकल दर १५.८ रही।यह संख्या साल २००१ में आम आबादी में हुई आत्महत्या की दर से ५० फीसदी ज्यादा है।पुरुष किसानों के लिए यह दर १७.७ फीसदी रही यानी महिला किसानों की तुलना में ७५ फीसदी ज्यादा।

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डाक्टर ऋताम्भरा हैब्बर(सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीजस, स्कूल ऑव सोशल साईंसेज, टीआईआईएस) द्वारा प्रस्तुत [inside]ह्यूमन सिक्युरिटी एंड द केस ऑव फार्मर-ऐन एक्सपोलेरेशन(२००७)[/inside] नामक शोध आलेख के अनुसार-
http://humansecurityconf.polsci.chula.ac.th/Documents/Presentations/Ritambhara.pdf

    * किसानों की आत्महत्या की घटना को मानवीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखने की जरुरत है। अगर इस कोण से देखा जाय तो पता चलेगा कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं ठीक उस वक्त हुईं हैं जब भारत के ग्रामीण अंचलों में आर्थिक और सामाजिक रुप से मददगार साबित होने वाली बुनियादी संरचनाएं ढह रही हैं। .
    * हरित क्रांति, वैश्वीकरण और उदारीकरण की वजह से ढांचागत बदलाव आये हैं मगर अधिकारीगण किसानों की आत्महत्या की व्याख्या के क्रम में इन बदलावों की अनदेखी करते हैं। साधारण किसानों की आजीविका की सुरक्षा के लिए फौरी तौर पर उपाय किए जाने चाहिए थे लेकिन इस पहलू की उपेक्षा हुई। आत्महत्या की व्याख्या करने के क्रम में ज्यादा जोर मनोवैज्ञानिक कारणों पर दिया गया।
    * मुख्यतया महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के किसानों ने आत्महत्या की। इन राज्यों में ज्यादातर इलाकों में किसानी वर्षाजल से होने वाली सिंचाई पर निर्भर है। इन राज्यों(खासकर महाराष्ट्र) के आत्महत्या करने वाले किसान नकदी फसल  मसलन,  कपास (खासकर महाराष्ट्र), सूरजमुखी, मूंगफली और गन्ना (खासकर कर्नाटक) उगा रहे थे।
    * उत्पादन की बढ़ी हुई लागत के कारण किसानों को निजी हाथों से भारी मात्रा में कर्ज लेना पड़ा।
    * ऑल इंडिया बॉयोडायनेमिक एंड ऑर्गेनिक फार्मिंग एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के एक जिले जालना के किसानों की आत्महत्या की खबर पर चिन्ता जताते हुए मुंबई हाईकोर्ट को एक पत्र लिखा। इस पत्र का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज को एक सर्वेक्षण करने को कहा। सर्वेक्षण के आधार पर कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से किसानों की आत्महत्या की घटना पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए कहा। टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की मुख्य वजह उत्पादन लागत में हुई असह बढ़ोत्तरी और कर्जदारी है।दूसरी तरफ इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑव डेपलपमेंट रिसर्च (आईजीडीआर) के शोध में किसानों की आत्महत्या का संबंध सरकार या उसकी नीतियों से नहीं जोड़ा गया है। आईजीडीआर की शोध रपट में कहा गया है कि सरकार को ग्रामीण विकास योजनाओं के जरिये गांवों में ज्यादा हस्तेक्षेप करना चाहिए और वहां गैर खेतिहर कामों का विस्तार करना चाहिए।
    * साल २००५ के दिसंबर में महाराष्ट्र की सरकार ने छह जिलों-अमरावती, अकोला, बुलडाना, यवतमाल, वासिम और वर्धा के लिए एक विशेष राहत पैकेज की घोषणा की।
    * कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली कंपनियों ने कर्नाटक और महाराष्ट्र में किसानों को कर्ज देना शुरु किया । इससे किसानों के ऊपर कर्जे का बोझ और बढ़ा।
    * सेहत की गिरती दशा, संपत्ति को लेकर परिवारिक विवाद, घरेलू समस्याएं और बेटी के ब्याह की भारी चिन्ता के मिले जुले प्रभावों के बीच किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए। यह बात जीके वीरेश की अध्यक्षता में बनी समिति की रिपोर्ट में कही गई है।
    * जिन सालों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ीं उन सालों में किसान आंदोलन कमजोर पड़ गया था जबकि १९८० के दसक में महाराष्ट्र में शेतकरी संगठन की अगुआई में किसान आंदोलन मजबूत था।

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[inside]सीपी चंद्रशेखर और जयति घोष द्वारा प्रस्तुत आलेख बर्डेन ऑव फार्मरस् डेट[/inside] नामक आलेख में कहा गया है-
http://www.macroscan.com/the/food/sep05/fod140905Farmers_Debt.htm

    * किसानों के ऊपर कर्जदारी के बड़े कारणों में एक है शादी ब्याह के खर्चे की वजह से लिया जाने वाला कर्ज लेकिन किसानों द्वारा लिए गए कुल कर्ज में इस कारण से लिए कर्ज की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम(११ फीसदी) है। शादी ब्याह के खर्चे की वजह से सबसे ज्यादा कर्जा बिहार के किसान परिवारों ने लिया। वहां २२.९ फीसदी किसान परिवारों ने इस मद में कर्ज लिए। इसके तुरंत बाद नंबर राजस्थान का है जहां शादी ब्याह के खर्चे को पूरा करने के लिए १७.६ फीसद किसान परिवारों ने कर्ज लिए।
    * किसानों की एक बड़ी तादाद महाजनों से कर्ज लेने के लिए बाध्य हुई। कर्ज लेने वाले किसानों में २९ फीसदी ने महाजनों से कर्ज लिया है। .
    * महाजनी कर्ज की सबसे ज्यादा तादाद बिहार(४४ फीसदी) और राजस्थान(४० फीसदी) है। खेती के काम में जिन सामानों का प्रयोग होता है उन्हें बेचने वाले सौदागर या फिर वैसे सौदागर जो खेतिहर उत्पाद को खरीदते हैं-कर्ज के प्रमुख स्रोत बनके उभरे हैं। कर्जदार किसानों में १२ फीसदी ने ऐसे ही सौदागरों से कर्ज लिए। बहरहाल कर्ज हासिल करने सरकारी स्रोत अब भी प्रमुथ बने हुए हैं। कर्जदार किसानों में से ५० फीसदी से अधिक ने सहकारी समितियों अथवा सरकारी बैंकों से कर्ज लिया।
    * लिए गए कर्ज की मात्रा का संबंध जमीन की मिल्कियत से भी है। जो किसान जितनी बड़ी जमीन का मालिक है उस पर उतना ही कर्ज है। एक तथ्य यह भी है कि जमीन की मिल्कियत के बढ़ने के साथ कर्जदार किसानों की संख्या में भी बढोतरी को भी चिह्नित किया जा सकता है।
    * बहुत छोटे और सीमांत किसानों के ऊपर भी कर्ज का भारी बोझ है। ऐसे किसानों की आमदनी बहुत कम है और इससे संकेत मिलते हैं कि किसान एक से ज्यादा कारणों से लगातार कर्ज के दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं।