भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार

 ट्रांसपरेन्सी इंटरनेशनल द्रारा प्रस्तुत ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर-2009 नामक दस्तावेज के अनुसार

http://www.transparency.org/publications/gcr/gcr_2009#press;  http://www.transparency.org/news_room/in_focus/2009/gcr2009#dnld:

  निस्संदेह भारत,चीन और ब्राजील के बारे में यह बात कही जा रही है कि यहां विश्व का सबसे बड़े बाजार विकसित हो रहे हैं और इन देशों की कंपनियों की भूमिका विश्व बाजार में बढ़ रही है लेकिन यह बात भी सच है कि जब व्यवसाय की बात आती है तो इन देशों के व्यवसायिक उपक्रमों को सबसे भ्रष्ट माना जाता है

  व्यवसाय के लिहाज से भ्रष्टाचार हाशिए का नहीं बल्कि केंद्रीय महत्व का विषय है-बात चाहे विकसित देशों की हो या फिर विकासशील देशों की। यह मुद्दा अमेरिका और योरोप के बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रभावित करता है तो चीन के विनिर्माण उद्योग और भारत की सूचना-प्रौद्योगिकी की सेवा प्रदाताओं को भी।विकासशील और संक्रमणकालीन अर्थव्यवस्था वाले देशों में भ्रष्ट राजनेता और सरकारी अधिकारियों को सालाना घूसखोरी से तकरीबन $20 से 40 अरब डॉलर हासिल होते हैं और यह समस्या बढ़ रही है।

 मिस्र,भारत,इंडोनेशिया,मोरोक्को,नाईजीरिया और पाकिस्तान जैसे देशों में तकरीबन 60 फीसदी(ट्रांसपरेन्सी इंटरनेशनल के सर्वेक्षण में शामिल प्रतिनिधियों की कुल संख्या का) व्यवसाय-प्रतिनिधियों को प्रमुख सरकारी संस्थानों ने कहा-घूस देना है, तो स्वागत है।

  ऐसी एक मिसाल भारत की है। मलेरिया रोधी 114 मिलियन डॉलर की एक विश्वबैंक की परियोजना के बारे में पाया गया कि चार योरोपीय कंपनियों ने आपस में सांठ-गांठ करके दवा की बिक्री के ठेके के लिए जो सबसे कम रुपयों का निविदा भरा और ठेका मिलने पर उसके हिस्से कर लिए फिर दवा की कीमतें कम करके बाकी कंपनियों के लिए कम कीमत की निविदा भरने का रास्ता बंद कर दिया।

  चीन में एकाधिकारनिरोधी नया कानून 2008 के अगस्त में लागू हो चुका है और भारत में भी इसकी तैयारियां चल रही हैं।

हालांकि संसद ने कंपीटिशन अधिनियम को साल 2002 में हरी झंडी दे दी थी लेकिन कंपीटिशन कमीशन के सांगठनिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कई आपत्तियां अदालतों में दर्ज की गईं।सुप्रीम कोर्ट ने इस पर 2005 में स्टे दे दिया और सरकार से कहा कि इस कानून में संशोधन किया जाय। सरकार ने 2007 में इसमें संशोधन किए। उम्मीद की जाती है कि अब यह अधिनियम अमल में आ जाएगा।

भारत में इंफोसिस की प्रगति इस बात के साक्ष्य देती है कि अत्यंत भ्रष्ट परिवेश में भी कारपोरेटी इमानदारी का पालन किया जा सकता है। 1981 में एक छोटे से व्यवसाय से शुरुआता करने वाली यह कंपनी अब बहुराष्ट्रीय हो चुकी है।

साल 2008 के ग्लोबल करप्शन रिपोर्ट से जानकारी मिलती है कि भारत के जल संसाधन के क्षेत्र के छुटभैये अधिकारी घूसखोरी के बूते मनचाही पोस्टिंग पाते हैं और फिर इस पद का इस्तेमाल अपने ग्राहकों से घूस लेने में करते हैं। बड़े ओहदे पर विराजमान अधिकारी अपने वरिष्ठों से घूसखोरी की कमाई का बंटवारा करते हैं।

भारत का स्टॉक एक्सचेंज 2008 में जाकर चीन के समान कठोर नीतियां बना सका।
• 2008
के ट्रांसपरेन्सी इंटरनेशनल के ब्राइब पेयरस् इंडेक्स में पाया गया कि भारतीय कंपनियों को अपना काम तेजी से करवाने के लिए छोटे अधिकारियों को घूस देना पड़ता है।

भारत का सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड कंपनियों द्वारा किए गए घोटाले और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जो तरीका अपनाता है उसे सुलह का तरीका कहा जा सकता है जिसमें कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होती, बस दोषी कंपनी से कुछ जुर्माना वसूला जाता है।

वैश्वीकरण और बाजार की बढ़ती के दौर में चीन में अवैध व्यापार बढ़ा है। चीन से कम कीमत के सामान तस्करी के द्वारा नेपाल के रास्ते भारत पहुंचते हैं। नकली नोटों की भी आवाजाही होती है।

 


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