भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार

से्टर ऑफ मीडिया स्टडीज के नवीनतम अध्ययन सीएमएस- इंडिया करप्शन स्टडीज 2017 के तथ्य बताते हैं कि-- 

 http://cmsindia.org/sites/default/files/Monograph_ICS_2017.pdf

 

 • तुलनात्मक रुप से देखें तो साल 2005 से 2017 के बीच की अवधि में सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने के बारे लोगों में धारणा बनी है कि उनमें भ्रष्टाचार पहले की तुलना में कम हुआ है और उन्हें भ्रष्टाचार के अनुभव भी तुलनात्मक रुप से कम हुए हैं. 


• सीएमएस- इंडिया करप्शन स्टडी के ताजा ग्यारहवें दौर के सर्वेक्षण से पता चलता है कि 20 राज्यों के लगभग 43 प्रतिशत परिवार मानते हैं कि उनके राज्य में बीते एक साल के दौरान सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में भ्रष्टाचार बढ़ा है. 12 साल पहले यानी 2005 में 73 प्रतिशत परिवारों का कहना था कि सार्वजनिक सेवाओं की सुपुर्दगी में भ्रष्टाचार व्याप्त है. 


•  सर्वेक्षण में शामिल आधे से ज्यादा(तकरीबन 56 प्रतिशत) लोगों का मानना है कि नोटबंदी के दौर(नवम्बर-दिसम्बर 2016) के दौरान सार्वजनिक सेवाओं की सुपुर्दगी में भ्रष्टाचार में कमी आयी.


• सीएमएस- इंडिया करप्शन स्टडी 2017 के मुताबिक 20 राज्यों के तकरीबन एक तिहाई परिवारों ने कहा कि बीते एक साल में उन्हें किसी ना किसी सार्वजनिक सेवा को हासिल करने में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा. सीएमएस-इंडिया करप्शन स्टडी 2005 में 53 फीसदी लोगों ने कहा था कि उन्हें सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में बीते एक साल में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा है.


•  साल 2017 के करप्शन स्टडी से पता चलता है कि राज्यों में फराहम की जा रही सार्वजनिक सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के संयुक्त औसत(31 प्रतिशत) की तुलना में कुछ राज्यों में बहुत ज्यादा तादाद में लोग सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार की बात मानते हैं. ऐसे राज्य हैं कर्नाटक (77%), आंध्रप्रदेश (74%), तमिलनाडु (68%), महाराष्ट्र (57%), जम्मू और कश्मीर (44%), पंजाब (42%) और गुजरात (37%).


• जिन राज्य में दस प्रतिशत से भी कम लोगों ने कहा कि उन्हें बीते एक साल में सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में भ्रष्टाचार का अनुभव हुआ, उनके नाम हैं हिमाचल प्रदेश(3 प्रतिशत) और केरल(4 प्रतिशत) 


•  सर्वेक्षण में शामिल सभी 20 राज्यों में तकरीबन सभी परिवारों ने कहा कि जब भी सार्वजनिक सेवा प्रदान करने वाले अधिकारियों ने उनसे कहा कि आपको घूस देना होगा, उनके पास घूस देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था.


• घूस ना देने पर सेवा ना प्रदान करने की सबसे ज्यादा घटना(3.5 प्रतिशत) भूमि संबंधी कागजात हासिल करने में हुई. इसके बाद सेवा प्रदान करने से इनकार की सबसे ज्यादा घटना पुलिस-सेवा(1.8 प्रतिशत) के मामले में देखने में आयी. 

 

•  सर्वक्षण में शामिल परिवारों का यह भी कहना था कि पीडीएस का राशन कार्ड बनवाने, बच्चे को सरकारी स्कूल में दाखिल देने या फिर अदालती मामले में सुनवाई की तारीख जल्दी देने के लिए उनसे न्यूनतम 20 रुपये से लेकर अधिकतम 50 हजार रुपये तक की घूस मांगी गई. 

 

•  सर्वेक्षण में शामिल सभी 20 राज्यों के लोगों द्वारा 10 सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में चुकायी गई घूस की राशि को जोड़ दें तो रकम 6350 करोड़ रुपये की आती है. 2005 में यह आंकड़ा 20500 करोड़ रुपये का था.

 

•  हालांकि 58 प्रतिशत आम नागरिक आरटीआई के बारे में जानते हैं लेकिन 1 प्रतिशत से भी कम लोग सूचना मांगने के लिए आरटीआई का इस्तेमाल करते हैं जबकि इस कानून को लागू हुए एक दशक का समय हो रहा है. 


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