Resource centre on India's rural distress
 
 

भ्रष्टाचार

खास बात

ट्रांसपेरेन्सी इंटरनेशनल के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स(साल २०14) में भारत १७5 देशों के बीच ८५ वें पादान पर रखा गया था। साल 2010 के इंडेक्स में भारत फिसलकर 87 वें स्थान पर जा पहुंचा था।*

साल २००६-०७ में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों ने ८८३ करोड़ रुपये बुनियादी सेवाओं को हासिल करने के लिए घूस में चुकाये।**

साल २००६-०७ में भारत के सबसे गरीब परिवारों ने पुलिसकर्मियों को २१४ करोड़ रुपये घूस में दिए।**

न्यायपालिका में भी गरीब परिवारों को घूस देना पड़ा। जिन गरीब लोगों ने अदालती कर्मचारियों को घूस चुकाये उनमें से २८ फीसदी को सामान्य अदालती कामकाज मसलन किसी दस्तावेज फोटो-कॉपी हासिल करने के लिए घूस देना पड़ा।***

साल २००५*** और २००७** में केरल में सबसे कम भ्रष्टाचार पाया गया और बिहार में सबसे ज्यादा।

साल २००६-०७ में नरेगा के अन्तर्गत काम पाने वाले २५ फीसदी गरीब परिवारों ने स्थानीय जन-प्रतिनिधि को घूस दिया।**

* करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2014

**इंडिया करप्शन स्टडी-२००७, ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल इंडिया एंड सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज इंडिया करप्शन स्टडी २००७

*** इंडिया करप्शन स्टडी-२००५,ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल इंडिया एंड सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज

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[inside]सीएमएस-इंडिया करप्शन स्टडी 2018 : 2015 टू 2018 हाऊ वेल आर स्टेट प्लेस्ड?नामक अध्ययन के मुख्त तथ्य[/inside] -  

 

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  • सीएमएस-आईसीएस 2018 के सर्वेक्षण में 13 राज्यों के शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों को शामिल किया गया. सर्वेक्षण 11 सार्वजनिक सेवाओं से संबंधित भ्रष्टाचार विषयक धारणा के आकलन के लिए किया गया. 
  • सर्वेक्षण में 75 फीसदी परिवारों ने कहा कि बीते 12 महीनों में सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार या तो बढ़ा है या फिर पहले ही की तरह है, उसमें कमी नहीं आयी है.
  • सीएमएस के 2005 के सर्वेक्षण में 52 फीसद परिवारों ने कहा था उन्हें सर्वेक्षण में शामिल 10 सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में एक ना एक रुप में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा. साल 2018 में ऐसा कहने वालों की तादाद घटकर 27 प्रतिशत हो गई है.
  • तेलंगाना के 73 प्रतिशत, तमिलनाडु के 38 प्रतिशत, कर्नाटक के 36 प्रतिशत, बिहार के 35 प्रतिशत, दिल्ली के 29 प्रतिशत, मध्यप्रदेश के 23 प्रतिशत, पंजाब के 22 प्रतिशत तथा राजस्थान के 20 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में उन्हें रिश्वतखोरी का सामना करना पड़ा या किसी बिचौलिए का सहारा लेना पड़ा. 
  • बीते 12 महीनों में जिन सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में परिवारों को सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा उनमें शामिल हैं परिवहन(21 प्रतिशत), पुलिस(20 प्रतिशत), जमीन संबंधी दस्तावेज/आवास( 16 प्रतिशत), अस्पताली सेवा(10 प्रतिशत). बैंकिंग सेवाओं को हासिल करने में 1 प्रतिशत से भी कम परिवारों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा.  
  • सर्वेक्षण में शामिल 99 फीसद उत्तरदाताओं के पास आधार कार्ड था लेकिन इनमें 7 प्रतिशत को आधार-कार्ड हासिल करने के लिए रिश्वत देना पड़ा. सर्वेक्षण में शामिल 92 फीसद उत्तरदाताओं के पास मतदाता पहचान पत्र मौजूद था लेकिन 3 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें मतदाता पहचान पत्र हासिल करने के लिए रिश्वत चुकानी पड़ी. 
  • सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में होने वाले भ्रष्टाचार के आकलन से संबंधित सीएमएस के 2017 के अध्ययन में 41 प्रतिशत परिवारों ने कहा था कि केंद्र सरकार भ्रष्टाचार कम करने के अपने प्रयासों के लिए प्रतिबद्ध है, 2018 के सर्वेक्षण में ऐसा कहने वाले परिवारों की तादाद घटकर 31 प्रतिशत हो गई है. 
  • सार्वजनिक सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में प्रचलित धारणा तथा अनुभवों के आधार पर राज्यों का समूह बनायें तो सर्वेक्षण से एक निष्कर्ष यह निकलता है कि तमिलनाडु, पंजाब, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान भ्रष्टाचार कम करने के अपने प्रयासों में सबसे पीछे रहने वाले राज्य हैं जबकि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश तथा बिहार ने इस सिलसिले में अच्छा प्रदर्शन किया है. 

 

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से्टर ऑफ मीडिया स्टडीज के नवीनतम अध्ययन [inside]सीएमएस- इंडिया करप्शन स्टडीज 2017 के तथ्य[/inside] बताते हैं कि-- 

 http://cmsindia.org/sites/default/files/Monograph_ICS_2017.pdf

 

 • तुलनात्मक रुप से देखें तो साल 2005 से 2017 के बीच की अवधि में सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने के बारे लोगों में धारणा बनी है कि उनमें भ्रष्टाचार पहले की तुलना में कम हुआ है और उन्हें भ्रष्टाचार के अनुभव भी तुलनात्मक रुप से कम हुए हैं. 


• सीएमएस- इंडिया करप्शन स्टडी के ताजा ग्यारहवें दौर के सर्वेक्षण से पता चलता है कि 20 राज्यों के लगभग 43 प्रतिशत परिवार मानते हैं कि उनके राज्य में बीते एक साल के दौरान सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में भ्रष्टाचार बढ़ा है. 12 साल पहले यानी 2005 में 73 प्रतिशत परिवारों का कहना था कि सार्वजनिक सेवाओं की सुपुर्दगी में भ्रष्टाचार व्याप्त है. 


•  सर्वेक्षण में शामिल आधे से ज्यादा(तकरीबन 56 प्रतिशत) लोगों का मानना है कि नोटबंदी के दौर(नवम्बर-दिसम्बर 2016) के दौरान सार्वजनिक सेवाओं की सुपुर्दगी में भ्रष्टाचार में कमी आयी.


• सीएमएस- इंडिया करप्शन स्टडी 2017 के मुताबिक 20 राज्यों के तकरीबन एक तिहाई परिवारों ने कहा कि बीते एक साल में उन्हें किसी ना किसी सार्वजनिक सेवा को हासिल करने में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा. सीएमएस-इंडिया करप्शन स्टडी 2005 में 53 फीसदी लोगों ने कहा था कि उन्हें सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में बीते एक साल में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा है.


•  साल 2017 के करप्शन स्टडी से पता चलता है कि राज्यों में फराहम की जा रही सार्वजनिक सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के संयुक्त औसत(31 प्रतिशत) की तुलना में कुछ राज्यों में बहुत ज्यादा तादाद में लोग सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार की बात मानते हैं. ऐसे राज्य हैं कर्नाटक (77%), आंध्रप्रदेश (74%), तमिलनाडु (68%), महाराष्ट्र (57%), जम्मू और कश्मीर (44%), पंजाब (42%) और गुजरात (37%).


• जिन राज्य में दस प्रतिशत से भी कम लोगों ने कहा कि उन्हें बीते एक साल में सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में भ्रष्टाचार का अनुभव हुआ, उनके नाम हैं हिमाचल प्रदेश(3 प्रतिशत) और केरल(4 प्रतिशत) 


•  सर्वेक्षण में शामिल सभी 20 राज्यों में तकरीबन सभी परिवारों ने कहा कि जब भी सार्वजनिक सेवा प्रदान करने वाले अधिकारियों ने उनसे कहा कि आपको घूस देना होगा, उनके पास घूस देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था.


• घूस ना देने पर सेवा ना प्रदान करने की सबसे ज्यादा घटना(3.5 प्रतिशत) भूमि संबंधी कागजात हासिल करने में हुई. इसके बाद सेवा प्रदान करने से इनकार की सबसे ज्यादा घटना पुलिस-सेवा(1.8 प्रतिशत) के मामले में देखने में आयी. 

 

•  सर्वक्षण में शामिल परिवारों का यह भी कहना था कि पीडीएस का राशन कार्ड बनवाने, बच्चे को सरकारी स्कूल में दाखिल देने या फिर अदालती मामले में सुनवाई की तारीख जल्दी देने के लिए उनसे न्यूनतम 20 रुपये से लेकर अधिकतम 50 हजार रुपये तक की घूस मांगी गई. 

 

•  सर्वेक्षण में शामिल सभी 20 राज्यों के लोगों द्वारा 10 सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में चुकायी गई घूस की राशि को जोड़ दें तो रकम 6350 करोड़ रुपये की आती है. 2005 में यह आंकड़ा 20500 करोड़ रुपये का था.

 

•  हालांकि 58 प्रतिशत आम नागरिक आरटीआई के बारे में जानते हैं लेकिन 1 प्रतिशत से भी कम लोग सूचना मांगने के लिए आरटीआई का इस्तेमाल करते हैं जबकि इस कानून को लागू हुए एक दशक का समय हो रहा है. 

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नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित [inside]सीएचआरआई के नये शोध- फैक्ट एंड फिक्शन- गवर्नमेंटस् एफोर्टस् टू कॉमबैक्ट करप्शन नामक अध्ययन के तथ्य[/inside] के अनुसार—

http://www.humanrightsinitiative.org/download/CHRI-IndiaCorruptionstats.pdf 

 

--- एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2001 से 2015 के बीच 29 राज्यों और 7 संघशासित प्रदेशों में भ्रष्टाचार के कुल 54,139 मामले दर्ज हुए. आई पेड ब्राइव नाम के वेबसाइट के मुताबिक इसी अवधि में तकरीबन दोगुने (1,16,010) लोगों ने कहा कि हमें किसी ना किसी काम के लिए घूस देनी पड़ी है.

 

--- साल 2001 स 2015 के बीच देश भर में लगभग पांच लाख( (5,01,852 ) मामले दर्ज हुए जबकि इसी अवधि में भ्रष्टाचार के केवल 54,139 मामले दर्ज हुए. दूसरे शब्दों में हत्या के प्रति 10 मामलों पर भ्रष्टाचार के दर्ज मामलों की संख्या केवल 1 रही.

 

---- 2001 से 2015 के बीच अपहरण अथवा अगवा करने की कुल 5.87 लाख घटनाएं प्रकाश में आयीं दूसरे शब्दों में कहें तो अपहरण अथवा अगवा करने के प्रत्येक 11 मामलों पर देश भर में भ्रष्टाचार का केवल एक मामला विधि-प्रवर्तन अधिकरणों द्वारा दर्ज हुआ.

 

----- 2001 से 2015 के बीच डकैती के देश भर में 3.54 लाख (3,54,453 ) मामले दर्ज हुए दूसरे शब्दों में डकैती के प्रत्येक 6 मामलों पर भ्रष्टाचार का केवल एक मामला विधि-प्रवर्तन अधिकरणों द्वारा दर्ज हुआ.

 

---- देश के 29 राज्यों और 7 संघशासित प्रदेशों में पंद्रह साल की अवधि में 54,139 मामले दर्ज हुए जिसमें केवल 55.26% (29,920 ) मामलों में अदालती सुनवाई की कार्यवाही पूरी हुई. शेष मामले या तो अदालतों में लंबित है या अभियुक्त मामले के अदालत पहुंचने से पहले ही छूट गये अथवा प्रथम सूचना रिपोर्ट ही निरस्त हो गई.

 

---  जिन राज्यों में भ्रष्टाचार के दर्ज मामले सबसे ज्यादा संख्या में अदालती सुनवाई के लिए पहुंचे उन राज्यों में केरल में दोषसिद्धि की दर सबसे ज्यादा( 62.95%) रही.

 

---- बंगाल, गोवा, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा तथा मेघालय में भ्रष्टाचार के बहुत से मामलों की अदालती सुनवाई हुई लेकिन एक भी मामले में अभियुक्त पर दोषसिद्धि नहीं हो सकी.  पंद्रह साल की अवधि में मणिपुर में केवल एक मामले में अभियुक्त को दोषी करार दिया जा सका.

 

---- हिमाचल प्रदेश को छोड़ दें तो 28 राज्यों और 7 संघशासित प्रदेशों में पंद्रह साल की अवधि में भ्रष्टाचार के मामलों में 43,394 अभियुक्तों पर मुकदमे चले. इस अवधि में 68.19% (29,591) अभियुक्त अदालतों द्वारा साक्ष्य के अभाव में बरी करार दिए गए. दूसरे शब्दों में कहें तो 31.81% (13,803)  अभियुक्तों को ही पंद्रह साल की अवधि में भ्रष्टाचार के मामलों में सजा हो पायी.

 

----    जम्मू-कश्मीर में 90 फीसद भ्रष्टाचार के मामलों में अभियुक्त साक्ष्य के अभाव में बरी करार दिये गये जबकि गोवा, नगालैंड तथा त्रिपुरा में शत-प्रतिशत अभियुक्त अदालतों से बरी हुए. 

करप्शन परसेप्शन इंडेसक्स सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। 0 से 100 अंकों के पैमाने पर 0 का अंकमान सर्वाधिक भ्रष्टाचार की स्थिति का संकेत करता है जबकि 100 का अंक सर्वाधिक भ्रष्टाचार-मुक्त स्थिति का। अंकों के पैमाने पर जिस देश ने जितने कम अंक अर्जित किए हैं उनके बारे में माना जा सकता है कि वहां रिश्वतखोरी का प्रचलन उतना ही ज्यादा है, भ्रष्टाचारियों को दंड उतना ही कम मिलता है और वहां संस्थाएं नागरिकों की जरुरतों के प्रति उतनी ही कम जवाबदेह हैं।

 

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http://www.transparency.org/cpi2014/results

 

ट्रांसपेरेन्सी इंटरनेशनल द्वारा प्रस्तुत [inside]करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2014[/inside] के तथ्यों के अनुसार-

 

साल 2013 में भारत का करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में अर्जित अंकमान 36 था(इतना ही अंकमान 2012 में भी था)। यह अंकमान 2014 में बढ़कर 38 हो गया है। करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में भारत का स्थान 175 देशों की सूची में अब 85 वें स्थान पर पहुंच गया है। चीन 175 देशों की सूची में 36 अंकों के साथ 100वें स्थान पर है।

 

भारत में लोकतंत्र अत्यंत सक्रिय दशा में है लेकिन इस लोकतंत्र का एक स्याह पक्ष भी है। नागरिक संगठनों और मीडिया की सक्रियता के बावजूद भ्रष्टाचार भारत में एक बड़ी समस्या के रुप में मौजूद है।

 

 भारत में व्याप्त राजनीतिक भ्रष्टाचार इस बात की सूचना है कि जवाबदेही और पारदर्शिता से संबंधित गवर्नेंस की संरचनाएं भ्रष्टाचारियों को रोक पाने में अक्षम हैं और इन संरचनाओं तक लोगों की पहुंच सीमित हैं। भ्रष्टचार की समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता की जरुरत है ताकि सरकार के शीर्षस्तर से ठोस कदम उठाए जा सकें। मई महीने में ट्रांसपेरेन्सी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि दक्षिण एशिया के देशों में भ्रष्टाचार निरोधी कानून को सख्ती से लागू करने की जरुरत है, साथ ही भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली संस्थाओं को मजबूत करने और ह्वीस्लब्लोअर को सुरक्षा देने की भी सख्त जरुरत है।

 

भारत (38) और चीन (36) सहित प्रशांत-एशियाई क्षेत्र के अन्य उभरते बाजारों मसलन मलेशिया (52), फिलीपिन्स तथा थाईलैंड (दोनों 38) तथा इंडोनेशिया (34) का अंकमान करप्शन परसेप्शन इंडेक्स पर बहुत कम है जो संकेत करता है कि इन देशों का नेतृत्व भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के मामले में कमजोर है, साथ ही इन देशों की अर्थव्यवस्था को भ्रष्टाचार की परिव्याप्ति से खतरा है और लोकतंत्र की दशा लचर है।

साल 2014 के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 175 देशों में तकरीबन दो तिहाई देशों का अंकमान 50 से कम है। 0 से 100 अंकों के पैमाने पर 0 का अंकमान सर्वाधिक भ्रष्टाचार की स्थिति का संकेत करता है जबकि 100 का अंक सर्वाधिक भ्रष्टाचार-मुक्त स्थिति का। साल 2014 में डेनमार्क 92 अंकों के साथ 175 देशों की सूची में सबसे शीर्ष पर है जबकि उत्तर कोरिया और सोमालिया महज 8 अंकों के साथ सूची में सबसे नीचे हैं।

 

करप्शन परसेप्शन इंडेक्स(2014) के लिहाज से शीर्ष के पाँच देशों के नाम हैं-: डेनमार्क (अंक: 92, स्थान: 1), न्यूजीलैंड (अंक: 91, स्थान: 2), फिनलैंड (अंक: 89,स्थान: 3), स्वीडेन (अंक: 87, स्थान: 4) और नार्वे (अंक: 86, स्थान: 5).

 

करप्शन परसेप्शन इंडेक्स(2014) में 175 देशों की सूची में सबसे नीचे के देशों के नाम हैं : सोमालिया (अंक: 8, स्थान: 174), उत्तर कोरिया (अंक: 8, स्थान: 174), सूडान (अंक: 11, स्थान: 173), अफगानिस्तान (अंक: 12, स्थान: 172) और दक्षिम सूडान (अंक: 15, स्थान: 171).

 

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ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल द्वारा प्रस्तुत [inside]ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर 2013[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार http://www.transparency.org/gcb2013/report

 http://www.transparency.org/gcb2013/country/?country=india:

 भारत के 54 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने बीते 12 महीने में पुलिस, न्यायपालिका, रजिस्ट्री, भूमि, स्वास्थ्य, शिक्षा, टैक्स या ऐसी किसी अन्य सेवा-सुविधा को हासिल करने के लिए एक ना एक मामले में रिश्वत दी है।

   भारत के 40 फीसदी उत्तरदाताओं का मानना था कि बीते दो सालों में भ्रष्टाचार काफी बढ़ा है।

  1-5 अंकों के एक पैमाने पर ( जहां 1 का अर्थ है बिल्कुल भ्रष्ट नहीं और 5 का अर्थ है बहुत ज्यादा भ्रष्ट) भारतीय मतदाताओं ने राजनीतिक दलों को 4.4 अंक देते हुए उन्हें सर्वाधिक भ्रष्ट माना। भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस का स्थान भारतीय उत्तरदाताओं की नजर में इसके तुरंत बाद आता है जिसे उन्होंने भ्रष्टाचार के पैमाने पर 4.1 अंक दिए। भारतीय उत्तरदाताओं की नजर में सबसे कम भ्रष्ट सेना है। सेना को भारतीय उत्तरदाताओं ने सबसे कम भ्रष्ट माना और भ्रष्टाचार के पैमाने पर सेना को 2.5 अंक हासिल हुए. स्वयंसेवी संगठनों को भ्रष्टाचार के पैमाने पर भारतीय उत्तरदाताओं ने सर्वेक्षण में 2.9 अंक दिए जबकि मीडिया को 3.2।

  सर्वेक्षण में 86 फीसदी भारतीय उत्तरदाताओं का मानना था कि राजनीतिक दल बहुत ज्यादा भ्रष्ट हैं जबकि 75 फीसदी उत्तरदाताओं का मानना था कि पुलिस बहुत ज्यादा भ्रष्ट है. महज 20 फीसदी उत्तरदाताओं का कहना था कि सेना बहुत ज्यादा भ्रष्ट है।

सर्वेक्षण में शामिल भारतीय लोगों में 62 फीसदी ने कहा कि उनके परिवार के एक ना एक सदस्य ने पुलिस को घूस दिया जबकि 61 फीसदी ने रजिस्ट्री और परमिट के बाबत घूस देने की बात कही जबकि 58 फीसदी का कहना था कि उन्हें जमीन से संबंधित कामों के लिए घूस देना पडा

   सर्वेक्षण में शामिल भारतीय उत्तरदाताओं में से 30 फीसदी ने इस बात से सहमति जतायी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में साधारण आदमी सार्थक भूमिका निभा सकता है जबकि 26 फीसदी भारतीय उत्तरदाता इस बात से सहमत नहीं थे।

    सर्वेक्षण में शामिल भारतीय उत्तरदाताओं में 99 फीसदी ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के तह पाँच गतिविधियों में हिस्सेदारी करने की इच्छा जतायी है। ये गतिविधियां हैं- किसी अर्जी पर हस्ताक्षर करना, विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना, किसी संगठन से जुड़ना, सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल करना और इस इस्तेमाल के लिए ज्यादा खर्च करना।

    वैश्विक स्तर पर देखें तो चार में से एक व्यक्ति यानि 27 फीसदी ने कहा कि बीते बारह महीने में उसे सार्वजनिक संस्था के साथ अपने बरताव में या फिर सार्वजनिक सेवाओं को हासिल करने में घूस देना पडा है।

    सर्वेक्षण में कुल आठ सेवाओं को लेकर सवाल पूछे गये थे। इनमें पुलिस और अदालत के बारे में विश्वभर के लोगों ने माना कि उनके भ्रष्ट होने की आशंका सबसे ज्यादा है। सर्वेक्षण में शामिल तकरीबन 31 फीसदी ने कहा कि उन्हें सेवा हासिल करने के लिए पुलिस महकमे को घूस देनी पड़ी। 

 

 

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[inside]द ड्राइवर्स एंड डायनेमिक्स ऑव इलिसिट फाइनेंशियल फ्लोज् इन इंडिया 1948-2008[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

, http://india.gfip.org/

·   भारत में मौजूद अंडरग्राऊंड अर्थव्यवस्था का गहरा संबंध अवैध ढंग से होने वाले वित्तीय प्रवाह से है। विदेशों में अवैध रुप से मौजूद भारतीय संपदा का कुल मूल्य फिलहाल $462 बिलियन डालर है। जो अंडरग्राऊंड अर्थव्यवस्था का तकरीबन 72 फीसदी है।इसका अर्थ हुआ कि भारत की अंडरग्राऊंड अर्थव्यवस्था का तीन चौथाई हिस्सा जो कि अनुमानतया देश की जीडीपी के 50 फीसदी($640 2008 के अंत में) के बराबर है, देश से बाहर मौजूद है।

 

·       इस तथ्य से कि देश की अंडरग्राऊंड अर्थव्यवस्था का महज 27.8 फीसदी ही देश में मौजूद है, खुलासा होता है कि सरकार का ध्यान अपनी तरफ बगैर खींचे विपुल धनराशि एकत्र करने की इच्छा ही सीमापारीय अवैध मौद्रिक लेन-देन का मुख्य कारक है।

 

·       साल 1991-2008 यानी उदारीकरण के बाद की अवधि में विनियमन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था से काले धन का प्रवाह विदेशों में बढ़ा है। व्यापार में कीमतों में हेरफेर के अवसर बढ़े हैं, साथ ही वैश्विक स्तर पर मौजूद कुछ टैक्स हैवन कहलाने वाली जगहों ने काले धन के प्रवाह को और बल प्रदान किया है।

 

·       संख्याओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बड़े पैमाने के काले धन के प्रवाह और आमदनी के असमान वितरण के बीच सीधा रिश्ता है।

 

·       साल 1948 से 2008 के बीच भारत को अवैध ढंग से होने वाले वित्तीय प्रवाह के कारण 213 बिलियन डालर का घाटा उठाना पडा है। यह अवैध धन अमूमन भ्रष्टाचार, घूसखोरी, नजराना और टैक्सचोरी के जरिए एकत्र की गई।

 

·       भारत के मौजूदा अवैध वित्तीय प्रवाह का कुल मूल्य कम से कम 462 बिलियन डालर है।

 

·       साल 2008 के अंत में देश की जीडीपी के 16.6 फीसदी के बराबर काला धन विदेशों में गया।

 

·  काले धन का विदेशी प्रवाह सालाना 11.5 फीसदी की रफ्तार से बढ़ा( रियल टर्म में 6.4 फीसदी सालाना)

 

·       भारत को साल 2002-2006 के बीच हर साल 16 बिलियन डालर गंवाना पडा।

 

·       साल 1948 से 2008 के बीच भारत के निजी क्षेत्र में एख बदलाव यह हुआ कि विकसित देशों के बैंकों में जमापूंजी ना रखकर अब वे ऑवशोर फाइनेंशियल सेंटर में अपनी जमा पूंजी रखने लगे हैं। साल 1995 में ऑवशोर फाइनेंशियल सेंटर में ऱखी जमापूंजी 36.4 फीसदी थी जबकि 2009 में 54.2 फीसदी तक पहुंच गई है।

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[inside]ओपेन बजट सर्वे 2010[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार,

http://internationalbudget.org/files/2010_Full_Report-English.pdf

·   स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा तैयार ओपेन बजट सर्वे 2010 में कहा गया है कि इस सर्वेक्षण में शामिल 94 देशों में से 74 देश राष्ट्रीय बजट के मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे बुनियादी मानकों को सुनिश्चित करने में असफल रहे। इससे सार्वजनिक धन के अपव्यय का रास्ता खुलता है।

 

·       दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर इस सर्वेक्षण में बताया गया है कि अध्ययन में शामिल 94 देशों में से महज 7 देशों ने ही अपने बजट के बारे में व्यापक सूचनाएं मुहैया करायीं जबकि 40 देशों ने सूचनाएं दीं तो भी वे सार्थक नहीं थीं।

 

·       जिन देशों का अध्ययन किया गया उन सब का औसत ओपन बजट इंडेक्स 100 अंकों में कुल 42 अंकों का रहा।

 

·       दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, फ्रांस, नार्वे, स्वीडन और अमेरिका बजट के मामले में पारदर्शिता बरतने में शीर्ष पर रहे जबकि इस मामले में सबसे खराब प्रदर्शन चीन, सऊदी अरब, गुयाना, सेनेगल और नवजनतांत्रिक देश इराक का रहा। इन देशों ने अपने नागरिकों को बजट के बारे में कोई सूचना नहीं दी।

 

·       भारत का ओपन बजट इंडेक्स साल 2006 में 53 था जो 2008 में बढ़कर 60 और 2010 में बढ़कर 67 हो गया।

 

·       कुछ समृद्ध देश मसलन गुआया(प्रति व्यक्ति जीडीपी साल 2009 में US$18,600), सऊदी अरब ($23,221), त्निनिडाड और टोबैगो ($19,818), और मलेशिया ($13,770) का ओपन बजट इंडेक्स पर प्रदर्शन अपेक्षाकृत कम आमदनी वाले देशों मसलन भारत (प्रति व्यक्ति जीडीपी $2,941), श्रीलंका ($4,769) और यूक्रेन की तुलना में खराब रहा।

 

·       इंडेक्स में जिन 14 देशों का प्रदर्शन सबसे लचर रहा उनका औसत अंक 2006 में 25 था जो 2010 में बढ़कर 40 हो गया।

 

·       सर्वे में बजट की पारदर्शिता और जवाबदेही के अंतर्राष्ट्रीय मानक अमल में लाये गए। स्वतंत्र बजट विशेषज्ञ द्वारा प्रत्येक देश के बारे में जानकारी एक प्रश्नावली के जरिए जुटायी गई। यह विशेषज्ञ किसी भी भांति संबंधित सरकार के कामों से जुड़ा हुआ नहीं था।

 

·       सर्वेक्षण में शामिल 94 में से केवल 20 देश ऐसे थे जिनका इंडेक्स पर अंक 60 या उससे अधिक था। इंडेक्स में कम से कम 60 अंक पाने वाले देशों के बारे माना गया है कि वे अपने नागरिकों को बजट के बारे में इतनी सूचनाएं देते हैं कि नागरिक सरकारी आमदनी और खर्च के ब्यौरे के बारे में एक समग्र तस्वीर बना सके।

 

·       तकरीबन एक तिहाई देशों ने कुछ ना कुछ सूचनायें दीं और उनका स्कोर 41 से 60 के बीच रहा। यह भी सच है कि मात्र इतनी भर सूचना से बजट को सांगोपांग समझना संभव नहीं था।

 

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[inside]ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल द्वारा प्रस्तुत 2010 करप्शन परशेप्शन इंडेक्स[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार

http://transparency.org/policy_research/surveys_indices/cpi/2010/press#pr:

 

•    भारत करप्शन परशेप्शन इंडेक्स में 3.3 अंकों के साथ 87 वें स्थान पर है जबकि चीन 3.5 अंकों के साथ  78 वें स्थान पर। पाकिस्तान को 2.3 अंकों के साथ 143 वें पादान पर स्थान मिला है जबकि बांग्लादेश को 2.4 अंकों के साथ 134 वां और श्रीलंका को 3.2 अंको के साथ 91 वां स्थान मिला है। कुल 178 देशों का आकलन किया गया है। 
 

इस सूचकांक का निर्माण दस संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत 13 दस्तावेजों के आंकड़ों का इस्तेमाल करके किया गया है। ये सभी दस्तावेज घूसखोरी की घटनाओं की बारंबारता और घूसखोरी के आकार को ध्यान में रखकर प्रशासनिक और राजनयिक क्षेत्रों में मौजूद भ्रष्टाचार का आकलन करते हैं।

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इस सूचकांक में अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक, इकॉनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट, फ्रीडम हाऊस, ग्लोबल इनसाइट और विश्वबैंक के आंकड़ा-स्रोतों का इस्तेमाल किया गया।

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सूचकांक में दस में से दस अंक पाने वाले देश को सबसे कम भ्रष्ट देश का दर्जा दिया गया है। दस अंकों के इस पैमाने को आधार मानें तो कुल 178 देशों में से तकरीबन एक तिहाई देश पाँच से भी कम अंक(यानी गहन भ्रष्टाचार का संकेत) हासिल कर सके हैं जिसमें भारत और चीन जैसे देश भी शामिल हैं।

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साल 2010 के सूचकांक में डेनमार्क, न्यूजीलैंड और सिंगापुर 9.3 अंकों के साथ सर्वाधिक कम भ्रष्टाचार वाले देशों में शुमार किए गए हैं। जिन देशों में सरकारे अस्थिर हैं मसलन अफगानिस्तान, म्यांमार और सोमालिया उन्हें 1.4 अंकों के साथ सर्वाधिक भ्रष्ट देशों की श्रेणी में रखा गया है। सूचकांक में सोमालिया 1.1 अंकों के साथ सबसे नीचे है।

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भूटान, चिले, इक्वाडोर हैती, जमैका,कुवैत और कतर जैसे देश 2009 की तुलना में 2010 के सूचकांक में ऊपर पहुंचे हैं यानी यहां भ्रष्टाचार पिछले साल की तुलना में कम हुआ है जबकि चेक गणराज्य, ग्रीस,हंगरी,इटली,मेडागास्कर,नाईजर और सयुंक्त राज्य अमेरिका पिछले साल की तुलना में सूचकांक में ऊपर गए हैं यानी यहां भ्रष्टाचार बढ़ा है।

•    ट्रांसपेरेन्सी इंटरनेशनल के इस दस्तावेज में उन 36 देशों की भी चर्चा है जो ओईसीडी देशों के बीच हुए एंटी-ब्राईबरी कन्वेंशन के अधोहस्ताक्षरी हैं। इसके तहत विदेशी अधिकारियों को घूस देने की मनाही है। दस्तावेज के अनुसार इन 36 देशों में से 20 में यह कानून अमल में नहीं लाया गया है।

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 ट्रांसपरेन्सी इंटरनेशनल द्रारा प्रस्तुत [inside]ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर-2009[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार

http://www.transparency.org/publications/gcr/gcr_2009#press;  http://www.transparency.org/news_room/in_focus/2009/gcr2009#dnld:

  निस्संदेह भारत,चीन और ब्राजील के बारे में यह बात कही जा रही है कि यहां विश्व का सबसे बड़े बाजार विकसित हो रहे हैं और इन देशों की कंपनियों की भूमिका विश्व बाजार में बढ़ रही है लेकिन यह बात भी सच है कि जब व्यवसाय की बात आती है तो इन देशों के व्यवसायिक उपक्रमों को सबसे भ्रष्ट माना जाता है

  व्यवसाय के लिहाज से भ्रष्टाचार हाशिए का नहीं बल्कि केंद्रीय महत्व का विषय है-बात चाहे विकसित देशों की हो या फिर विकासशील देशों की। यह मुद्दा अमेरिका और योरोप के बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रभावित करता है तो चीन के विनिर्माण उद्योग और भारत की सूचना-प्रौद्योगिकी की सेवा प्रदाताओं को भी।विकासशील और संक्रमणकालीन अर्थव्यवस्था वाले देशों में भ्रष्ट राजनेता और सरकारी अधिकारियों को सालाना घूसखोरी से तकरीबन $20 से 40 अरब डॉलर हासिल होते हैं और यह समस्या बढ़ रही है।

 मिस्र,भारत,इंडोनेशिया,मोरोक्को,नाईजीरिया और पाकिस्तान जैसे देशों में तकरीबन 60 फीसदी(ट्रांसपरेन्सी इंटरनेशनल के सर्वेक्षण में शामिल प्रतिनिधियों की कुल संख्या का) व्यवसाय-प्रतिनिधियों को प्रमुख सरकारी संस्थानों ने कहा-घूस देना है, तो स्वागत है।

  ऐसी एक मिसाल भारत की है। मलेरिया रोधी 114 मिलियन डॉलर की एक विश्वबैंक की परियोजना के बारे में पाया गया कि चार योरोपीय कंपनियों ने आपस में सांठ-गांठ करके दवा की बिक्री के ठेके के लिए जो सबसे कम रुपयों का निविदा भरा और ठेका मिलने पर उसके हिस्से कर लिए फिर दवा की कीमतें कम करके बाकी कंपनियों के लिए कम कीमत की निविदा भरने का रास्ता बंद कर दिया।

  चीन में एकाधिकारनिरोधी नया कानून 2008 के अगस्त में लागू हो चुका है और भारत में भी इसकी तैयारियां चल रही हैं।

हालांकि संसद ने कंपीटिशन अधिनियम को साल 2002 में हरी झंडी दे दी थी लेकिन कंपीटिशन कमीशन के सांगठनिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कई आपत्तियां अदालतों में दर्ज की गईं।सुप्रीम कोर्ट ने इस पर 2005 में स्टे दे दिया और सरकार से कहा कि इस कानून में संशोधन किया जाय। सरकार ने 2007 में इसमें संशोधन किए। उम्मीद की जाती है कि अब यह अधिनियम अमल में आ जाएगा।

भारत में इंफोसिस की प्रगति इस बात के साक्ष्य देती है कि अत्यंत भ्रष्ट परिवेश में भी कारपोरेटी इमानदारी का पालन किया जा सकता है। 1981 में एक छोटे से व्यवसाय से शुरुआता करने वाली यह कंपनी अब बहुराष्ट्रीय हो चुकी है।

साल 2008 के ग्लोबल करप्शन रिपोर्ट से जानकारी मिलती है कि भारत के जल संसाधन के क्षेत्र के छुटभैये अधिकारी घूसखोरी के बूते मनचाही पोस्टिंग पाते हैं और फिर इस पद का इस्तेमाल अपने ग्राहकों से घूस लेने में करते हैं। बड़े ओहदे पर विराजमान अधिकारी अपने वरिष्ठों से घूसखोरी की कमाई का बंटवारा करते हैं।

भारत का स्टॉक एक्सचेंज 2008 में जाकर चीन के समान कठोर नीतियां बना सका।
• 2008
के ट्रांसपरेन्सी इंटरनेशनल के ब्राइब पेयरस् इंडेक्स में पाया गया कि भारतीय कंपनियों को अपना काम तेजी से करवाने के लिए छोटे अधिकारियों को घूस देना पड़ता है।

भारत का सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड कंपनियों द्वारा किए गए घोटाले और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जो तरीका अपनाता है उसे सुलह का तरीका कहा जा सकता है जिसमें कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होती, बस दोषी कंपनी से कुछ जुर्माना वसूला जाता है।

वैश्वीकरण और बाजार की बढ़ती के दौर में चीन में अवैध व्यापार बढ़ा है। चीन से कम कीमत के सामान तस्करी के द्वारा नेपाल के रास्ते भारत पहुंचते हैं। नकली नोटों की भी आवाजाही होती है।

 

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हालात 2007

ट्रान्सेपेरेन्सी इंटरनेशनल और सेंटर फार मीडिया स्टडीज द्वारा प्रस्तुत [inside]इंडिया करप्शन स्टडीज[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-(http://www.cmsindia.org/cms/highlights.pdf):

  • गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले (बीपीएल) लगभग एक तिहाई परिवारों ने सर्वेक्षण में शामिल ग्यारह सार्वजनिक सेवाओं में से किसी न किसी को हासिल करने के लिए गुजरे एक साल में रिश्वत दिया।यह सर्वेक्षण अखिल भारतीय स्तर पर किया गया था। इससे पता चलता है कि गरीबों के लिए कोई खास कार्यक्रम बना हो तो भी ये सुविधा उन्हें बगैर रिश्वत चुकाये हासिल नहीं होती।
  • पिछले दो सालों में सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच को बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाये गये हैं।इसके अन्तर्गत सिटीजन चार्टर,सूचना का अधिकार अधिनियम,सोशल ऑडिट,-गवर्नेंस जैसे उपायों का नाम लिया जा सकता है। लेकिन इन उपायों का असर गरीबों तक पहुंचा हो-यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती है।
  • गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों में जिन लोगों ने सरकारी सेवाओं का पिछले एक साल में इस्तेमाल किया उनमें साढ़े तीन फीसदी परिवारों ने स्कूली शिक्षा के लिए और ४८ फीसदी परिवारों ने पुलिस की सहायता हासिल करने के लिए रिश्वत दिये।
  • पिछले साल (यानी २००६) में लगभग चार फीसदी बीपीएल परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मुहैया कराये जाने वाले राशन, स्कूली शिक्षा और बैंकिग सेवाओं को हासिल करने के लिए किसी न किसी बिचौलिये का सहारा लेना पड़ा जबकि आवास की सेवा-सुविधा अथवा जमीन के कागजात निकालने के लिए या उसका पंजीकरण करवाने के लिए १० फीसदी बीपीएल परिवारों को बिचौलिये का सहारा लेना पड़ा।
  • लगभग दो फीसदी बीपीएल परिवार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मुहैया कराये जाने वाले राशन,स्कूली शिक्षा अथवा बिजली आपूर्ति की सेवा का लाभ नहीं उठा सके क्योंकि उन्होंने रिश्वत नहीं दिया या फिर उन्होंने किसी बिचौलिये की मदद नहीं ली। दरअसल पिछले साल (यानी २००६) चार फीसदी से ज्यादा बीपीएल परिवार नरेगा, आवास की सेवा-सुविधा,पुलिस की सहायता और जमीन के दस्तावेज अथवा उसके पंजीकरण की सुविधा का लाभ उठाने से वंचित रहे क्योंकि उन्होंने ना बिचौलिये की मदद ली और ना ही घूस दिया।
  • यह भी एक तथ्य है कि जिन बीपीएल परिवारों ने सर्वेक्षण के दौरान सार्वजनिक सुविधाओं का हासिल करने के लिए घूस देने की बात स्वीकारी उन्होंने यह भी बताया कि घूस लेने वाला व्यक्ति सेवा प्रदान करने वाली मशीनरी का ही अधिकारी या कर्मचारी था और उसे घूस सीधे दी गई।यह अपने आप में गंभीर बात है क्योंकि सर्वेक्षण से यह बात भी सामने आयी कि बीपीएल परिवार के व्यक्तियों को सरकारी दफ्तर का बार बार चक्कर लगाना पड़ा और इसके पीछे कारण यह बताया गया कि संबंधित कर्मचारी या अधिकारी आज काम पर नहीं आया है या अभी मौजूद नहीं है।इससे यह धारणा बलवती होती है कि कोई कार्यक्रम खास गरीबों के लिए बना हो तब भी उसपर अमल के लिए जिम्मेदार सरकारी महकमा कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कोई खास ध्यान नहीं देता।
  • दफ्तर में कागजाती कामकाज बहुत धीमी गति से होता है।इस वजह से गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों को दफ्तरों में काम को समय से करवाने के लिए घूस देने को बाध्य होना पड़ता है।ऐसा नहीं कतरने पर उन्हें वांछित सुविधा से वंचित होना पड़ता है।अध्ययन के दौरान इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि राज्यों में बड़े पैमाने पर किये गए ई-गवर्नेंस के उपायों से स्थिति इतनी सुधरी हो कि लोगों को लगे कि सरकारी अमलों में भ्रष्टाचार कम हुआ है.
  • शोध मेंकुल ग्यारह सरकारी सेवाओं को आकलन के लिए शामिल किया गया था।इसमें पुलिस महकमा और जमीन के कागजात तैयार करने वाला महकमे को गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को सेवा हासिल करने के लिए सबसे ज्यादा घूस देना पड़ा। इसकी तुलना में स्कूली शिक्षा(बारहवीं कक्षा तक) और बैंकिंग सेवा में भ्रष्टाचार का स्तर कहीं नीचे था,लेकिन ये सेवायें भ्रष्टाचार मुक्त नहीं थीं।
  • गरीबों के लिए सरकार द्वारा मुहैया करायी जा रही सेवाओं को प्रदान करने में सर्वाधिक भ्रष्टाचार असम, जम्मू-कश्मीर, बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में था जबकि हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल,दिल्ली और पंजाब में भ्रष्टाचार का स्तर मंझोले दर्जे का था।
  • इस सिलसिले में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कुछ कार्यक्रम सिर्फ गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को लाभ पहुंचाने के लिहाज से बनाये गये हैं मगर सरकारी अमलो में व्याप्त भ्रष्टाचार कते कारण इन कार्यक्रमों का भी गरीबों को समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा था।
  • कुछ सेवाओं मसलन पुलिस महकमे में इस व्याप्त की व्यवस्था की गई है कि सेवा हासिल करने में देरी या दिक्कत हो रही हो तो इस शिकायत की सुनवाई की जाएगी। इस दावे के बावजूद गरीब परिवारों गरीब परिवार ना तो ऐसे महकमे ना तो गरीबों के बीच अपने भ्रष्टाचार मुक्त होने का भरोसा जगा पाये हैं और ना ही गरीब परिवारों को सेवा पहुंचाने के मामले में उनका रवैया बदला है।
  • कुल मिलाकर देखे तो पिछले साल (२००६) गरीबी रेखा के नीचे के जिन परिवारों ने पुलिस महकमा,जमीन के दस्तावेज तैयार करने और जमीन के पंजीकरण करने वाले महकमा या फिर सरकारी आवास मुहैया कराने वाले महकमे की सेवाएं लेनी चाहीं उनका कहना था कि इन महकमों में पहले की तुलना में भ्रष्टाचार बढ़ा है।
  • पूर्वोत्तर के राज्यों,पश्चिम बंगाल और दिल्ली में तुलनात्मक रुप से गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले ऐसे परिवारों की संख्या ज्यादा है जिन्हें बीपीएल कार्ड हासिल नहीं हो सका है।
  • शोध का आकलन है कि पिछले एक साल में गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों ने सरकारी सेवाओं को हासिल करने के लिए ८८३० करोड़ रुपये चुकाये हैं(शोध में कुल ग्यारह सरकारी सेवाओं को शामिल किया गया था)।आकलन के मुताबिक गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों ने बतौर रिश्वत २१४८ रुपये सिर्फ पुलिस महकमे को चुकाये हैं।

 

हालात राज्यवार

 

  • ग्यारह सरकारी सेवाओं को अध्ययन के लिए शामिल किया गया था और इनको मुहैया कराने के मामले में केरल में भ्रष्टाचार का स्तर सबसे नीचे था।
  • हिमाचल प्रदेश: इस राज्य में अधिकांश सेवाओं में भ्रष्टाचार बाकी राज्यों की तुलना में कम था।
  • गुजरात: बाकी राज्यों की तुलना में यहां भ्रष्टाचार कम था लेकिन कुछ सेवाएं मसलन शिक्षा, भू-प्रशासन और न्यायपालिका में बाकी सेवाओं की तुलना में भ्रष्टाचार कहीं ज्यादा था।
  • आंध्रप्रदेश-इस राज्य में बाकी सेवाओं की तुलना में सरकारी अस्पताल और जल-आपूर्ति विभाग में भ्रष्टाचार कहीं ज्यादा था।
  • महाराष्ट्र: इस राज्य की नगरपालिकाएं देश की पांच सबसे भ्रष्ट सेवाओं में शुमार हैं।
  • छत्तीसगढ़: भ्रष्टाचार के मामले में इस राज्य की स्थिति मध्यप्रदेश की तुलना में बेहतर है।
  • पंजाब: पीडीएस,पुलिस न्यायपालिका और नगरपालिका का महकमा बाकी महकमों की तुलना में कहीं ज्यादा भ्रष्ट है।.
  • पश्चिम बंगाल : इस राज्य में जलापूर्ति के लिए जिम्मेदार महकमा देश में सबसे ज्यादा भ्रष्ट है।.
  • उड़ीसा : इस राज्य की न्यायपालिका देश की चार सबसे भ्रष्ट न्यायपालिकाओं में एक है।
  • उत्तरप्रदेश : यहां के बिजली आपूर्ति विभाग,स्कूली शिक्षा और आयकर विभाग में भ्रष्टाचार बाकियों की तुलना में ज्यादा है।
  • दिल्ली: दिल्ली में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सेवाएं देश में सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं।
  • तमिलनाडु : भ्रष्टाचार के पैमाने पर यह राज्य १२वीं पादान पर था लेकिन इस राज्य में स्कूली शिक्षा,अस्पताल,आयकर विभाग और नगरपालिका की सेवाएं देश में सबसे ज्यादा भ्रष्ट पायी गईं। आश्चर्य की बात यह कि तमिलनाडु में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बाकी राज्यों की तुलना में बेहतर है और यह राज्य शिक्षा के विकास-सूचकांक के लिहाज से भी बहुत आगे है।
  • हरियाणा: स्कूली शिक्षा,भू-प्रशासन और पुलिस महकमा बाकी राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा भ्रष्ट है।
  • झारखंड: भ्रष्टाचार के पैमाने पर इस राज्य की सेवाएं बिहार की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर हैं।
  • असम: यहां का पुलिस महकमा देश के सबसे भ्रष्ट पुलिस महकमों में एक है।बिजली-आपूर्ति का महकमा भी सबसे भ्रष्ट सेवाओं में एक है।
  • राजस्थान: यहां की न्यायपालिका देश की सबसे कम भ्रष्ट न्यायपालिकाओं में एक है।
  • कर्नाटक: भ्रष्टाचार के पैमाने पर यह राज्य चौथी पादान पर था क्योंकि कुछ महत्त्वपूर्ण सेवाएं जैसे-आयकर विभाग, न्यायपालिका, नगरपालिका और आरएफआई (ग्रामीण वित्तीय सेवा) जैसी सेवाओं की स्थिति यहां भ्रष्टाचार के लिहाज से बदतर थी लेकिन इस राज्य में बिजली आपूर्ति और स्कूली शिक्षा का महकमा बाकी राज्यों की तुलना में कहीं कम भ्रष्ट है।
  • मध्यप्रदेश: इस राज्य में गरीबों को सरकारी सेवा मुहैया कराने के मामले में सुधार कार्य शुरु किये गए हैं। इसके बावजूद यह राज्य भ्रष्टाचार के पैमाने पर सबसे भ्रष्ट सेवाओं वाले राज्यों में महज दो से ही पीछे यानी तीसरी पादान पर है।.
  • जम्मू-कश्मीर: अस्पताल और ग्रामीण वित्तीय सेवाओं को छोड़कर यहां बाकी सारी सेवाएं देश में सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं।आश्चर्य नहीं कि यह राज्य देश के सबसे भ्रष्ट सरकारी सेवाओं वाले राज्यों में दूसरी पादान पर है।.
  • बिहार: शोध में अध्ययन के लिए कुल ग्यारह सरकारी सेवाओं को शामिल किया गया था और यह राज्य इन सेवाओं में भ्रष्टाचार के लिहाज से देश में सबसे आगे है।

 

(नोट: शोध में शामिल ग्यारह सेवाओं के नाम हैं-पुलिस सेवा (अपराध और यातायात), न्यायपालिका, भू-प्रशासन, नगरपालिका सेवाएं, सरकारी अस्पताल, सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस-राशन कार्ड और आपूर्ति) , आयकर विभाग (व्यक्ति की पहुंच),जलापूर्ति,स्कूल (१२ वीं कक्षा तक) , और ग्रामीण वित्तीय सेवाएं। स्रोत-ट्रान्सपेरेन्सी इंडिया इन्टरनेशनल का अध्ययन)

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हालात २००५

ट्रान्सपेरेन्सी इंडिया इन्टरनेशनल और सेटर फॉर मीडिया स्टडीज ने बीस राज्यों में १४४०५ नागरिकों के सर्वेक्षण के आधार पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। [inside]इंडिया करप्शन स्टडी-२००५[/inside] नामक इस रिपोर्ट के अनुसार-

http://www.prajanet.org/newsroom/internal/tii/ICS2k5_Vol1.pdf:

 

  • भ्रष्टाचार की मौजूदगी को जांचने के लिए शोध में कुल ग्यारह सेवाओं को शामिल किया गया था।एक तिहाई नागरिकों का मानना था कि इन ग्यारह सेवाओं के उपभोक्ता और उससे संबंधित अधिकारी दोनों को ही यह बात पता होती है कि कितनी रकम बतौर घूस देने पर सेवा को हासिल किया जा सकता है।शोध में शामिल ग्यारह सेवाओं के नाम हैं-पुलिस सेवा (अपराध और यातायात), न्यायपालिका, भू-प्रशासन, नगरपालिका सेवाएं, सरकारी अस्पताल, सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस-राशन कार्ड और आपूर्ति) , आयकर विभाग (व्यक्ति की पहुंच),जलापूर्ति,स्कूल (१२ वीं कक्षा तक) , और ग्रामीण वित्तीय सेवाएं।
  • भ्रष्टाचार के पैमाने पर पुलिस महकमा सबसे आगे था।पुलिस महकमें के बाद निचली अदालतों और जमीन के दस्तावेज तैयार करने वाले तथा जमीन का पंजीकरण वाले विभाग का सबसे ज्यादा भ्रष्ट पाये गए।जहां तक सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार का सवाल है-लोगों से कहा जाता है कि दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं।मरीजों को दाखिला देने से इनकार किया जाता है,डॉक्टर से परामर्श करने और उसकी सेवाएं लेने से मरीजों को रोका जाता है।बिजली आपूर्ति की दशा को सुधारने के लिए कई सुधार किये गये हैं लेकिन इस अमले में भ्रष्टाचार का स्तर ज्यादा है।इन सेवाओं की अपेक्षा सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति कुछ अच्छी है क्योंकि इसमें सीधे सीधे घूस देने के लिए नहीं कहा जाता।
  • सरकारी सेवाओं को मुहैया कराने के मामले में केरल में सबसे कम भ्रष्टाचार है और बिहार में सबसे ज्यादा।भष्टाचार के मामले में जम्मू-कश्मीर का नंबर बिहार के तुरंत बाद है।तमिलनाडु,महाराष्ट्र,कर्नाटक,राजस्थान और असम में बी भ्रष्टाचार तुलनात्मक रुप से ज्यादा है।इन राज्यों की तुलना में हिमाचल प्रदेश में कहीं कम भ्रष्टाचार है।
  • पिछले साल (यानी २००४) में जितने लोगों ने पुलिस महकमे से सहायता मांगी उनमें से तीन चौथाई लोगों पुलिस सहायता से संतुष्ट नहीं थे।८८ फीसदी लोगों ने माना कि पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार है।
  • जहां तक न्यायपालिका का सवाल है,इसकी सेवाओं को हासिल करने के लिए जितने लोगों ने घूस दिये उसमें से ४१ फीसदी ने कहा कि हमने फैसले पर असर डालने के लिए रिश्वत दी,३१ फीसदी ने कहा कि अदालती प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए घूस देनी पड़ी जबकि २८ फीसदी ने किसी दस्तावेज की प्रतिलिपि या फिर केस को सुनवाई वाली सूची में रखने जैसे दैनंदिन कामों के लिए रिश्वत दी।

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क्या कहती है सरकार ?

 

[inside]ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार[/inside]- (http://www.planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v1/11th_vol1.pdf):

  • राजकाज की दशा सुधारने की राह में एक बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार से लड़ना है।आम मान्यता बन चली है कि प्रशासनिक अमलों के हर गोशे में भ्रष्टाचार व्याप्त है।
  • कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत को उन देशों की सूची में रखा है जहां भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर व्याप्त है।मिसाल के तौर पर ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल ने साल २००६ में जो इंडेक्स जारी किया उसमें भारत का स्थान भ्रष्टाचार के मामले में ७० वां था और इस संस्था ने भारत को भ्रष्टाचार के मामले में ब्राजील, चीन, मिस्र और मैक्सिको के करीब माना।
  • लोक कल्याण की सेवाओं में आज भ्रष्टाचार काफी गंभीर स्थिति में पहुंच गया है। पिछले कुछ दशकों में भ्रष्टाचार के प्रसार और आकार में बड़ी तेजी आयी है। सरकारी कामकाज के की स्तरों पर भ्रष्टाचार व्याप्त है और हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार एक दूसरे को बढ़ावा देते हुए चल रहा है साथ ही सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों की छवि पर इसका खराब असर पड़ रहा है।
  • भ्रष्टाचार से समाज का नेतिक ताना-बाना तो कमजोर होता ही है,इसका सीधा और प्रत्यक्ष असर देश की राजनीतिक स्थिति, आर्थिक विकास और राजकाज (गवर्नेंस) की बेहतरी पर पड़ता है। अगर समाज में भ्रष्टाचार व्याप्त हो तो वहां मूल्य आधारित राजनीति अपने मायने खो देती है। ऐसे समाज में यह विश्वास कायम नहीं रह पाता कि सरकार निष्पक्ष होकर सबके लिए समान रुप से विधि पर आधारित शासन चला रही है।
  • भ्रष्टाचार के कारण जिस राजस्व को लोक कल्याण के कार्यों के लिए सरकारी खजाने में जाना चाहिए वही राजस्व निजी हाथों में इक्कठा होने लगता है।ईमानदार सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों का मनोबल गिरता है जबकि भ्रष्टों को बढ़ावा मिलता है।आज सरकारी कामकाज में जो फिजूलखर्ची, काहिली और गैर-बराबरी दिखाई देती है उसका एख बड़ा कारण भ्रष्टाचार ही है।
  • गरीबों पर भ्रष्टाचार की गाज खास रुप से गिरती है क्योंकि उनके पास रिश्वत देने के लिए रकम नहीं होती।भ्रष्टाचार के कारण निजी क्षेत्र को गति मिलती है और इसकी कीमत आखिरकार उपभोक्ता को चुकानी पड़ती है। लोक-कल्याणकारी सेवाओं का बुनियादी ढांचा चरमरा उठता है। भ्रष्टाचार के कई और दुष्प्रभाव गिनाये जा सकते हैं लेकिन इस सिलसिले में सबसे जरुरी बात यह है कि भ्रष्टाचार जब भी बढ़ता और गहरा होता है, सामाजिक जीवन के ताने बाने पर बुनियादी अर्थों में दुष्प्रभाव डालता है इसलिए भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए हरसंभव और तत्काल कदम उठाये जाने चाहिए।
  • भारत में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार और उसके दुष्प्रभावों पर चहुंओर चिन्ता व्याप्त है। इस समस्या ने लोगों के मन में असहाय होने का भाव पनपा है और लोग अब भ्रष्टाचार को रोजमर्रा की बात मानने लगे हैं। इससे एक खास तरह का नियतिवाद उनके मन में घर करता जा रहा है और कभी कभी तो लोग-बाग निराशा में भ्रष्टाचार के पक्ष में तर्क भी देने लगते हैं।
  • नतीजतन भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एकतरफा विकल्प सुझाये जाते हैं। मिसाल के तौर पर कोई कहता है कि संविधान में मूलगामी बदलाव करने होंगे तो कोई कहता है कि पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था को निजी हाथों में सौंप देना चाहिए और हर सरकारी काम का विकेंद्रीकरण कर देना चाहिए।

 

कुछ सुझाव जिनपर गंभीरता पूर्वक अमल करना होगा-

  • भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम,१९८८ और इससे संबंधित कानूनों की पुनर्समीक्षा की जाय और केंद्र तथा राज्यों के सतर्कता आयोग को ज्यादा अधिकार दिए जायें।
  • कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जेनरल और उससे जुड़ी व्यवस्था की भूमिका मजबूत करनी होगी ताकि भ्रष्टाचार के मामलों का निगरानी हो सके और सरकारी धन के लेन देन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
  • राज्यों और उनकी संस्थाओं द्वारा लोक-कल्याण के लिए जो सेवाएं चलायी जा रही हैं उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार पर नजर रखना जरुरी है।
  • निजी उद्यम (ये चाहे स्वदेशी हों या फिर बहुराष्ट्रीय) के साथ सरकार का लेन-देन एक आचार संहिता के आधार पर हो और इस आचार संहिता को कड़ाई से लागू किया जाय।
  • जज,वकील,डाक्टर,मीडियाकर्मी,चार्टर्ड एकाउन्टेंट और आर्किटेक्ट सरीखे लोग भ्रष्टाचार पर निगाह रखने के लिए खुद के तईं भी व्यवस्था कायम करें।

 

भारत के बारे में ट्रान्सपेरेन्सी इंटरेनेशनल इंडिया के कुछ तथ्य-

  • ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा तैयार किए गए करप्शन परशेप्शन इंडिक्स में भारत साल २००८ में १७९ देशों के बीच ८५ वें स्थान पर रहा।िस तरह करप्शन परसेप्शन इंडेक्स पर बारत की स्थिति में साल २००२ के २.७ के मुकाबले साल २००८ में ३.४ अंकों का सुधार हुआ।
  • साल २००८ के जुलाई में वाशिंग्टन पोस्ट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक भारत के ५४० सांसदों में एक चौथाई पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।इनमें मानव-तस्करी के रैकेट चलाना,गबन करना,बलात्कार और हत्या करने जैसे अपराध भी शामिल हैं।
  • ट्रांसपेरेन्सी इंटरनेशनल के साल २००५ के अध्ययन के मुताबिक भारत में ५० फीसदी लोगों को सरकारी दफ्तरों में काम करवाने के लिए रिश्वत देने अथवा किसी बिचौलिये को तलाशने का निजी और प्रत्यक्ष अनुभव है।
  • ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल के अनुसार भारत की अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार का कारण मुकदमों के फैसले में होने वाली देरी,जजों की संख्या में कमी और अदालती कार्रवाही का जटिल होना है।कानूनों की अधिकता से इन सब कारणों में और इजाफा होता है।