मानवाधिकार

मानवाधिकारों का उल्लंघन

 

  • साल २००४-०५ में मानवाधिकार से संबंधित ७४,४०१ मामले मानवाधिकार आयोग में दर्ज हुए जबकि इसके पिछले साल(२००३-०४) ऐसे मामलों की तादाद ७२,९९० थी। साल २००४-०५ में दर्ज मामलो में ७२,७७५ मामले मानवाधिकार उल्लंघन के थे जबकि १५०० मामले हिरासत में मौत के। दर्ज मामलों में ४ हिरासत में बालात्कार के थे जबकि १२२ फर्जी मुठभेड़ के।
  • साल २००४-०५ में मानवाधिकार आयोग को हिरासत में मौत की जितनी सूचनाएं मिलीं उनमें ७ मौतें (तथाकथित) सुरक्षाबलों या अर्धसैनिक बलों के हिरासत में और १३६ मौते पुलिस हिरासत में हुईं। १३५७ मौतें न्यायिक हिरासत में हुईं।
  • विगत सालों की भांति साल २००४-०५ में भी मानवाधिकार उल्लंघन की सबसे ज्यादा शिकायतें उत्तरप्रदेश से आयीं। उत्तरप्रदेश से मानवाधिकार उल्लंघन की कुल ४४,३५१ शिकायतें आयीं जो आयोद द्वारा दर्ज कुल शिकायतों की संख्या के ५९.६ फीसदी है। उत्तरप्रदेश के बाद इस मामले में दिल्ली(५२२१ शिकायतें) और बिहार(३९१७) का नंबर है।

 

 

एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइटस् द्वारा प्रस्तुत टार्चर इन इंडिया २००८-अ स्टेट ऑव डिनायल नामक दस्तावेज के अनुसार- (http://www.achrweb.org/reports/india/torture2008.pdf): 

 

  • जिन संस्थाओं की जिम्मेदारी लोगों को राज्यतंत्र की प्रताड़ना से बचाने की है उनमें गंभीर कमियां हैं। अदालतें राज्यतंत्र की प्रताड़ना के खिलाफ एक कारगर संस्था साबित हुई हैं लेकिन खास किस्म के कानूनों के अभाव और आपराधिक दंड संहिता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के कानूनों के तहत प्राप्त विशेषाधिकार और अदालती प्रक्रिया में देरी के कारण अदालतों की इस मामले में इंसाफ देने की शक्ति बाधित होती है।
  • साल २००६-०७ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हिरासत में मौत की १५९७ सूचनाएं मिलीं। इसमें १८ मामलों में मृत्यु पुलिस हिरासत में हुई थी और १४७७ मामले न्यायिक हिरासत में मृत्यु के थे। दो मामले ऐसे थे जिसमें मृत्यु सेना या अर्ध सैनिक बलों की हिरासत में हुई। 
  • साल २००५-०६ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हिरासत में मौत की १५७५ सूचनाएं मिलीं। इसमें १२४ मामले पुलिस हिरासत में मौत के थे और १४५१ मामले न्यायिक हिरासत में मौत के। साल २००४-०५ में मानवाधिकार आयोग को हिरासत में मौत की १४९३ सूचनाएं हासिल हुई थीं इसमें १३६ पुलिस हिरासत में मौत के मामले थे और १३५७ मामले न्यायिक हिरासत में मौत के।
     
  • साल २००३-०४ में हिरासत में मौत की कुल १३४० घटनाएं हुई थीं। इसमें १८३ मामले पुलिस हिरासत में मौत के थे और ११५७ मामले न्यायिक हिरासत में मौत के। साल २००२-०३ में आयोग को हिरासत में मौत की १४६३ सूचनाएं मिलीं जिसमें १६२ मामले पुलिस हिरासत में मौत के थे और १३०० मामले में न्यायिक हिरासत में मौत के। १ मामला सैन्यबलों की हिरासत में मौत का था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले पांच सालों में हिरासत में मौत की कुल ७४६८ घटनाएं हुई हैं जिसका सालाना औसत १४९४ मौतों का या फिर रोजाना का औसत ४ मौतों का बैठता है। बहरहाल ये आंकड़े राज्यतंत्र के हाथो हो रही प्रताडना की पूरी तस्वीर बयां नहीं करते। इन आंकड़ों में ये नहीं बताया गया है कि मृत्यु की घटनाएं कानूनी तौर पर जायज कारणों मसलन-बुढ़ापा आदि के कारण हुईं और कितनी मौतें नाजायज कारणों से। फिर इन आंकड़ों से इस बात की भी सूचना नहीं मिलती कि सैन्यबलों या पुलिस के हाथों प्रताड़ना देने की ऐसी कितनी घटनाएं हुईं जिसमें पीडित की मृत्यु नहीं हुई। इसके अतिरिक्त मानवाधिकार आयोग को यह अधिकार नहीं है कि वह सैन्य या अर्धसैन्य बलों के हाथों हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों का ब्यौरा रखे या फिर उनकी जांच करे। मानवाधिकार आयोग अक्सर यह बात कहता है कि संघर्षाच्छान्न इलाके मसलन मणिपुर या फिर जम्मू-कश्मीर में हिरासत में मृत्यु की घटनाएं नहीं हो रही हैं जबकि इन राज्यों में तलाशने पर  हिरासत में मौत के मामलों से जुड़े दस्तावेज आसानी से मिल जाते हैं।
  • प्रताड़ना और हिरासत में मौत के अधिकांश मामलों में देखा गया है कि छोटे मोटे गुनाह(मससन छीनझपट या चोरी) कबूल करवाने के लिए सैन्यबलों या फिर पुलिस ने जो यातना दी उससे पीडित की मृत्यु हो गई।इससे जाहिर होता है कि आर्थिक रुप से समाज के वंचित तबके राज्यतंत्र की प्रताड़ना के ज्यादा शिकार होते हैं।

 

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