मानवाधिकार

  

सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज द्वारा प्रस्तुत इंडिया एक्सक्लूजन रिपोर्ट- 2015 के प्रमुख तथ्य--

http://www.im4change.org/law-justice/social-justice-20500.html?pgno=2#india-exclusion-report-2015 

इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की टोली ने अपने पाठकों के लिए सार्वजनिक सेवा और समान की हिस्सेदारी में मौजूद सामाजिक गैर-बराबरी का संकेत करने वाले इंडिया एक्सक्लूजन रिपोर्ट-2015 के कुछ तथ्यों का नीचे संकलन किया है—

झुग्गी-बस्तियां

 

• नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट की इंडिकेटर्स ऑफ स्लमस् इन इंडिया(2012) के तथ्यों के मुताबिक एक तिहाई से ज्यादा झुग्गी-बस्तियों में बिजली की सुविधा नहीं, तकरीबन एक तिहाई झुग्गी-बस्तियों में टैपवाटर, शौचालय या कूड़ा निस्तारण की व्यवस्था नहीं है.

 

--- जवाहरलाल नेहरु नेशनल अरबन रिन्युअल मिशन, राजीव गांधी आवास योजना जैसे कार्यक्रमों से 23.9 फीसद ही झुग्गियों को लाभ पहुंचा है.

 

--- राष्ट्रीय स्तर पर 33510 झुग्गी-बस्तियों के होने के अनुमान हैं, इसमें 59 फीसद झुग्गी बस्तियां अनधिकृत हैं यानी झुग्गियों में रहने वाले तकरीबन 3.25 मिलियन परिवारों को सरकार झुग्गी-बस्तियों का वैध निवासी नहीं मानती. 

 

----- के सी शिवरामकृष्णन, ए कुंडू तथा बीएन सिंह(2005) द्वारा प्रस्तुत हैंडबुक ऑफ अरबनाइजेशन इन इंडिया के अनुसार पैसों की कमी के कारण कुछ लोगों को फुटपाथ और गलियों के कोने-अंतरे में रहना पड़ता है ताकि वे अपनी मजदूरी मिले कुछ पैसे बचा सकें.

 

---- 2011 के स्लमस् सेन्सस के तथ्यों से पता चलता है कि तमिलनाडु में 32 फीसद और पंजाब में 39 फीसद झुग्गी-बस्ती आबादी दलितजन की है और 2001 से 2011 के बीच झुग्गी-बस्तियों की दलित जन की आबादी में 37 फीसद का इजाफा हुआ है.

 

--- नेशनल अर्बन हैल्थ मिशन से संबद्ध टेक्निकल रिसोर्स ग्रुप का आकलन है कि झुग्गी-बस्तियों में शिशु मृत्यु दर गैर झुग्गी-बस्ती रिहायश की तुलना में 1.8 फीसद ज्यादा है.

 

----   शहरी इलाकों में शिशुओं की मृत्यु की प्रमुख वजह(तकरीबन 50 फीसद मामलों में) झुग्गी-बस्तियों में स्वच्छ पेयजल का ना होना है.

 

चिकित्सा

 

----- नेशनल सैंपल सर्वे के 71 वें दौर की गणना के अनुसार प्रति बीमारी व्यक्तिगत खर्चा बहुत ज्यादा है- शहरों में पुरुषों के लिए यह खर्च प्रति बीमारी 741 रुपये है और महिलाओं के लिए 629 रुपये. गांवों में पुरुषों के लिए यह खर्च प्रति बीमारी 549 रुपये और महिलाओं के लिए 589 रुपये है. 

 

---- नेशनल सैंपल सर्वे के 71 वें दौर की गणना के हिसाब से शहरों में सरकारी अस्पताल की तुलना में निजी अस्पतालों में प्रति बीमारी व्यक्तिगत खर्चा पुरुषों के लिए डेढ़ गुना तो महिलाओं के लिए दोगुना ज्यादा बढ़ जाता है.

 

--- इस सर्वे के मुताबिक गांवों में सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पतालों में प्रति बीमारी उपचार का खर्चा पुरुषों के लिए 1.9 गुना ज्यादा है तो महिलाओं के लिए 1.6 गुना ज्यादा.  

 

---- सर्वे के मुताबिक सबसे ज्यादा गरीब लोगों की पांचवी श्रेणी में शुमार लोगों के लिए प्रति व्यक्ति प्रति बीमारी खर्च उनके पूरे परिवार के दस महीनों के खर्च के बराबर है, इस श्रेणी के जो व्यक्ति निजी अस्पतालों में उपचार के लिए जाते हैं उनका खर्च इससे भी ज्यादा होता है.

 

--- शहरी इलाकों में निजी अस्पताल में दाखिल कर उपचार करने की प्रसंग बढ़ रहे हैं. 1995-96 में निजी अस्पतालों में दाखिल कर उपचार करने के प्रसंग 56.9 फीसद थे तो 2014 में बढ़कर 68 फीसद हो गये यानी दो दशक के भीतर ऐसे मामलों में 10 फीसद का इजाफा हुआ. 

 

जलापूर्ति और साफ-सफाई

 

• शहरी विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार अधिकतर घरों में पानी की जरुरत से कम आपूर्ति होती है. 1493 शहरों में औसत प्रतिव्यक्ति जलापूर्ति 73 लीटर पर कैपिटा डेली((lpcd) है जबकि इसकी वांचित मात्रा 135 लीटर पर कैपिटा डेली(lpcd) होना चाहिए. मंत्रालय के अनुसार फिलहाल शहरी इलाकों में प्रति दिन जलापूर्ति औसतन तीन घंटे होती है जबकि इसे 24 घंटे होना चाहिए. 

 

--- नेशनल सैंपल सर्वे(2013) के तथ्य बताते हैं कि तकरीबन एक चौथाई घर प्रतिदिन की जलापूर्ति से वंचित हैं. तकरीबन 23 फीसद घरों में जलापूर्ति के लिए कोई ना कोई पूरक उपाय किया गया है जिससे जाहिर होता है कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में जलापूर्ति नहीं होती. 

 

---- 2011 की जनगणना के मुताबिक तकरीबन एक चौथाई( यानी 1 करोड़ 80 लाख से 2 करोड़ 30 लाख तक) परिवारों को अपने आवासीय अहाते में पानी की सुविधा हासिल नहीं है, लगभग 50 फीसद घर ही ऐसे हैं जिनके पास अपने लिए खासतौर से पानी के इस्तेमाल का साधन है, आवासीय परिसर में जलापूर्ति की सुविधा ना होने के कारण परिवारों को औसतन 31 मिनट प्रतिदिन पानी लाने में खर्च करना पड़ता है.

 

• प्रथन एजुकेशन फाउंडेशन के एक सर्वे का निष्कर्ष है कि दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में 42 फीसद परिवार का पेयजल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया से संदूषित है.

 

शौचालय 

 

---- 2011 की जनगणना के मुताबिक तकरीबन 1 करोड़ परिवारों को साफ-सफाई की कोई सुविधा हासिल नहीं है और उन्हें खुले में शौच करना पडता है जबकि 6 फीसद परिवार सार्वजनिक शौचालय अथवा साझे के शौचालय का उपयोग करते हैं और 4 फीसद परिवार जिन शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं उन्हें उचित ढंग से बना हुआ शौचालय नहीं कहा जा सकता. 

 

--- 2011 की जनगणना के मुताबिक एक तिहाई शहरी आबादी नेटवर्कड सीवरेज सिस्टम से जुड़ी है, ऐसा ज्यादातर महानगरों और उनके मध्यवर्गीय रिहायशों में है जबकि ज्यादातर शहरी आबादी सेप्टिक टैंक तथा पिट लैट्रिन का उपयोग करती है.

 

----भारत को साफ-सफाई की सुविधा के अभाव के कारण सालाना 2.4 ट्रिलियन रुपये का घाटा उठाना पड़ता है जो देश की जीडीपी(2006) का 6.4 फीसद है.

 

 ---- साफ-सफाई की सुविधा के पर्याप्त ना होने से सेहत पर जो असरात होते हैं उनकी आर्थिक कीमत तकरीबन 1.75 ट्रिलियन रुपये आंकी गई है.

 

.----- 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में तकरीबन 8 लाख ड्राई लैट्रिन हैं जिन्हें किसी ना किसी मनुष्य को साफ करना पड़ता है, ऐसे 2 लाख ड्राई लैट्रिन सिर्फ शहरों में हैं.

 

--- 1989 में योजना आयोग द्वारा गठित एक टास्कफोर्स का आकलन था कि मानव-मल साफ करने वाले कुल सात लाख लोगों में दलित जातियों के सदस्यों की संख्या 4 लाख है और इनमें 83 फीसद शहरी इलाकों में रहते हैं जबकि 17 फीसद ग्रामीण इलाकों में. मानव-मल साफ करने को मजबूर अन्य तीन लाख लोग मुस्लिम, ईसाई तथा जनजातीय समुदाय के हैं.

 

---- सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 2002-2003 में बताया कि मानव-मल साफ करने वाले लोगों की संख्या देश में तकरीबन 6.8 लाख है और उनमें 95 फीसद दलित हैं जिनसे परंपरागत पेशा कहकर यह काम बलात करवाया जाता है.

 

--- 2011 की जनगणना के मुताबिक तकरीबन 7.5 लाख परिवार अब भी मैला साफ करने का पेशा अपनाने पर मजबूर हैं और ऐसे ज्यादातर परिवार यूपी, राजस्थान, बिहार, मघ्यप्रदेश, गुजरात तथा जम्मू-कश्मीर में हैं. इन मामलों पर सक्रिय संगठनों द्वारा करवाये गये सर्वेक्षण से ऐसे परिवारों की संख्या ज्यादा(12-13 लाख) होने की बात पता चलती है क्योंकि जनगणना में रेलवे-ट्रैक पर पड़ा मानव-मल साफ करने वाले लोगों की गणना नहीं की जाती. 

 


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