कृषि/साफ-सफाई

देश के पर्यावरण को बचाने के लिए अकेले दम पर लगाए 1 करोड़ पेड़

दुर्ग। दारीपल्ली रमैया वो शख्स हैं जिनके बिना खम्मम में कोई भी कार्यक्रम पूरा नहीं होता। इस महान शख्स ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी। हर एक समारोह में रमैया को भले ही पुरस्कारित किया जाता हो, लेकिन समारोह के अंत में वह भीड़ द्वारा फेंके गए प्लास्टिक प्रोडक्ट्स को उठाने का काम करते हैं। इसके चलते कई बार लोग उन्हें कूड़ा बिनने वाला समझ लेते हैं, लेकिन चाहे उनके बारे में जो समझे वह अपने लक्ष्य पर अटल रहते हैं। पत्नी ने भी की पूरी मदद 68 वर्षीय रमैया पिछले कई दशकों से पेड़ लगाने का काम करते आ रहे हैं और उन्होंने अभी तक अपने जीवन में एक करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए हैं। रमैया के इस मिशन में उनकी पत्नी का योगदान भी है। वह पेड़ लगाने और पौधों को पानी देने का काम निरंतर रूप से करती हैं। रमैया कहते हैं

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एक रुपए खर्च नहीं और खुले में शौच से मुक्त हो गए 69 गांव

हरदा (मध्‍यप्रदेश)। ऑपरेशन मलयुद्घ (खुले में शौच से मुक्ति) से हरदा जिले की 39 पंचायतों के 69 गांव खुले में शौच के कलंक से मुक्त हो गए। अब अगले छह माह में पूरे जिले की 213 पंचायतों को भी इस कलंक से मुक्ति दिलाने के लिए अभियान छेड़ा जाएगा। इसे सफल बनाने के लिए न तो एक रुपए का अलग से बजट खर्च किया गया और न ही श्रेय लूटने की होड़ मची बल्कि गांव के सरपंच-सचिव और वहां की जनता को जिम्मेदारी का अहसास करवाकर सफलता हासिल की। रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी रेडियो पर मन की बात में इस अभियान की सफलता पर ऑपरेशन मलयुद्घ और जिले के अफसरों की तारीफ की, लेकिन इस अभियान के असल हीरो जिपं सीईओ गणेशशंकर मिश्रा व कलेक्टर रजनीश श्रीवास्तव ही नहीं हैं। इसके लिए गांव के सरपंच-सचिव और जनता की पहल का बड़ा योगदान है। मालूम हो कि मई 2014

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जब शौच से उपजे सोना

जब कोई युवा पढ़ाई- लिखाई करके शहरों की ओर भागने की बजाय अपनी शिक्षा और नई सोच का उपयोग अपने गाँव, ज़मीन, अपने खेतों में करने लगे तो बदलाव की एक नई कहानी लिखने लगता है, ऐसे युवा यदि सरकार और संस्थाओं से सहयोग पा जाएं तो निश्चित ही क्रान्तिकारी परिवर्तन ला देते हैं। ऐसी ही एक कहानी है ‘जब शौच से उपजे सोना’ की और कहानी के नायक हैं युवा किसान श्याम मोहन त्यागी...... आर के श्रीनिवासन, डाऊनटूअर्थ की रपट   (साभार-http://hindi.indiawaterportal.org/node/3102 ) अपने हरे-भरे खेतों की ओर उत्साह और खुशी से इशारा दिखाते हुए श्याम मोहन त्यागी बताते हैं “आसपास के खेतों के मुकाबले मेरी फ़सल ज्यादा अच्छी हुई है, कारण मानव मल-मूत्र की बनी खाद।“ अपने खेतों की ओर देखते हुए उनकी आंखों में चमक है। श्याम मोहन त्यागी गांव- असलतपुर, वाया भोपुरा मोड़, गाजियाबाद, के निवासी हैं। श्याम ने अपने खेतों में रासायनिक खादों का इस्तेमाल करना सन् 2006 से बन्द कर दिया था। खाद के लिये वह अपने गांव के सार्वजनिक शौचालय से मानव मल-मूत्र

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