कृषि

कमार आदिवासियों की देसी खेती-- बाबा मायारामकमार आदिवासियों की देसी खेती-- बाबा मायाराम

छत्तीसगढ़ के राजिम-नवापारा में मुझे कुछ समय पहले जाने का मौका मिला। वहां सामाजिक कार्यकर्ता रामगुलाम सिन्हा रहते हैं। उन्होंने मुझे उनकी प्रेरक संस्था के काम को देखने के लिए बुलाया था। वे गरियाबंद के कमार आदिवासियों के बीच में लम्बे समय से काम कर रहे हैं।   कमार, आदिम जनजातियों में एक हैं। जो अब भी उनकी पारंपरिक जीवनशैली के करीब हैं और निर्धन हैं। यह आदिवासी गरियाबंद, छुरा और मैनपुर इलाके में पाए जाते हैं। इनका प्रकृति से गहरा जुड़ाव है और उसी पर इनकी आजीविका निर्भर है। जंगलों में कई तरह के कंद, चार, तेंदू, आंवला, महुआ और कई तरह की हरी भाजियां होती हैं। इसके अलावा वे बांस के बर्तन बनाते हैं और बेचते हैं।   गरियाबंद , पूर्व में रायपुर जिले का हिस्सा था, अब स्वतंत्र जिला बन गया है। रामगुलाम सिन्हा स्वयं इसी इलाके के एक गांव के रहनेवाले हैं। बचपन से उन्होंने इस इलाके को करीब

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निराई गुड़ाई का खर्च बचाने के लिए बना डाली ‘जुगाड़’ की मशीननिराई गुड़ाई का खर्च बचाने के लिए बना डाली ‘जुगाड़’ की मशीन

किसान खेती को लेकर धीरे-धीरे ही सही जागरूक और सजग हो रहे हैं। कम लागत की जैविक खेती करने के साथ ही अब किसान कई तरह के देशी जुगाड़ भी अपनाते हैं। ऐसे ही किसानों के लिए मंदसौर के एक मिस्त्री हातिम कुरैशी ने निराई-गुड़ाई के लिए एक जुगाड़ मशीन इजाद की है, जिससे किसानों की लागत कम आती है और बाजार से खर पतवार नासक दवाइयों का छिड़काव नहीं करना पड़ता है। गांव कनेक्शन पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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पहाड़ पर लौटी हरियाली-- बाबा मायारामपहाड़ पर लौटी हरियाली-- बाबा मायाराम

मध्यप्रदेश का एक गांव है रूपापाड़ा। यहां पेड़ लगाने की चर्चा गांव-गांव फैल गई है। पहले यहां आसपास गांव के हैंडपंप सूख चुके थे लेकिन जंगल बड़ा हुआ, हरा भरा हुआ तो उनमें पानी आ गया। लोगों के पीने की पानी की समस्या हल हुई। यह झाबुआ जिले की पेटलावद विकासखंड में है। यहां के लोगों को खेती में पानी नहीं है, सूखे की खेती करते हैं,यानी वर्षा आधारित। लेकिन जब पीने के लिए पानी का संकट खड़ा हुआ तो लोगों को चिंता में डाल दिया। क्या किया जाए, इस पर बातचीत शुरू हुई। पानी लाने और पेड़ लगाने की मुहिम ने जोर तब पकड़ा जब स्थानीय लोग संपर्क संस्था से मिले, अपनी समस्य़ा बताई। संस्था ने गांव वालों पानी बचाने के जहां -जहां काम हुए हैं, उनकी कहानी बताई, लोगों को वहां लेकर गए। महाराष्ट्र के रालेगांव सिद्धी, राजस्थान के अलवर ग्रामीण गए। महाराष्ट्र के रालेगांव सिद्धी में अन्ना हजारे

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पहाड़ी कोरवाओं की बेंवर--- खेती बाबा मायारामपहाड़ी कोरवाओं की बेंवर--- खेती बाबा मायाराम

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है लेकिन यहां ऐसे समुदाय भी हैं, जो धान की खेती नहीं करते। उनमें से एक समुदाय है पहाड़ी कोरवा। पहाड़ी कोरवा उन आदिम जनजाति में एक है जिनका जीवन पहाड़ों व जंगलों पर निर्भर है। यह आदिवासी पहाड़ों पर ही रहते हैं और इसलिए इन्हें पहाड़ी कोरवा कहते हैं। ये लोग बेंवर खेती करते हैं जिसमें सभी तरह के अनाज एक साथ मिलाकर बोते हैं। रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड के आमानारा, गणेषपुरा, सोखामुड़ा, गेरूपानी और बरघाट (मेनपाट) में और कोरबा जिले के पेंड्रा, धोराबारी और करूमछुआ के किसानों ने बेंवर के लिए खेत तैयार कर लिए हैं। आमानारा के भौरू और रामसाय गांव-गांव जाकर देषी बीज बांट रहे हैं और कम होती खेती की खूबियां बता रहे हैं। इस खेती से अत्यंत गरीब, बेसहारा और सब तरह से निराष हो चुके पहाड़ी कोरवा आदिवासी आकर्षित हो रहे हैं। इनमें बेसहारा महिलाएं

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किसानी का तीर्थ बनता तिउसा गांव --- बाबा मायारामकिसानी का तीर्थ बनता तिउसा गांव --- बाबा मायाराम

महाराष्ट्र का एक गांव है तिउसा। यवतमाल से सोलह किलोमीटर दूर। यह गांव किसानों के लिए तीर्थ बन गया है। तीर्थ जहां कुछ अच्छाई है, किसान जहां अपना भविष्य देख रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में किसान आ रहे हैं। खेती-किसानी की बारीकियां सीख रहे हैं। यहां के प्रयोगधर्मी किसान सुभाष शर्मा कई मायने में अनूठी खेती कर रहे हैं, जिसे वे सजीव खेती कहते हैं।     हाल ही मैं अपने कुछ मित्रों के साथ उनके फार्म पर गया। तीस अक्टूबर का दिन था। सुबह के ग्यारह बजे थे। हम वर्धा से गाड़ी से यहां पहुंचे थे। खेत में प्रवेश करते ही मुझे टीन शेड दिखा। वहां कुर्सियां बिछी हुई थीं और ब्लेकबोर्ड के साथ स्कैचपेन रखे थे। पूछने पर पता चला यह प्रशिक्षण केन्द्र है, जहां किसानों को सजीव खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।     यहां किताबें नहीं पढ़ाई जातीं, बल्कि पूरा खेत, फसलें, कीट, पक्षी सभी सीखने का माध्यम हैं।

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