Resource centre on India's rural distress
 
 

आंकड़ों में गांव

 

[inside]स्टेट ऑव इंडियन एग्रीकल्चर 2011-12[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार
कृषि-उत्पादन और विकास-दर

* देश की समग्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका योगदान वर्ष 1990-91 में लगभग 30 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2011-12 में 15 प्रतिशत से भी कम हो गया है।एक आम भारतीय आज भी अपने व्यय का लगभग आधा खाद्य पदार्थों पर व्यय करता है जबकि भारत के कार्य बल का लगभग आधा भाग अपनी आजीविका हेतु आज भी कृषि क्षेत्र में लगा हुआ है।

* ग्रामीण क्षेत्रों में अनाज की प्रति व्यक्ति मासिक खपत वर्ष 1983-84 में 14.80 कि॰ग्रा॰ से घटकर वर्ष 2004-05 में 12.11 कि॰ग्रा॰ हो गयी है और वर्ष 2009-10 में और कम होकर 11.35 कि॰ग्रा॰ हो गयी है। शहरी क्षेत्रों में यह वर्ष 1983-84 में 11.30 कि॰ग्रा॰ से घटकर वर्ष 2004-05 में 9.94 कि॰ग्रा॰ और वर्ष 2009-10 में 9.37 कि॰ग्रा॰ हो गयी है।

* हाल ही के वर्षों में कुल जीसीएफ में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र के सकल पूंजी निर्माण (जीसीएफ) का अंश 6-8 प्रतिशत के बीच रहा जबकि 1980 के दशक की शुरुआत के दौरान यह 18 प्रतिशत था ।इससे पता चलता है कि गैर कृषि क्षेत्र योजनावधि में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों की तुलना में अधिक निवेश प्राप्त कर रहे हैं।

* यद्यपि कृषि में सार्वजनिक(सरकारी) निवेश बहुत महत्वपूर्ण है परंतु असल में कृषि में कुल निवेश का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा ही सरकारी है; 80 प्रतिशत निजी क्षेत्र से प्राप्त होता है । उदाहरण के लिए, 1980 के दशक की शुरुआत में कृषि में सकल पूंजी निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र (घरेलू क्षेत्र सहित) का अंश लगभग बराबर था, लेकिन वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में निजी क्षेत्र का अंश वर्ष 2004-05 के मूल्यों पर सरकारी  अंश से चार गुना अधिक था।

* कृषि-उत्पादन और कृषि तथा संबंद्ध क्षेत्रों की वृद्धि-दर साल 2010-11 में 7.0 फीसदी तक पहुंची है जो गुजरे छह सालों में सबसे ज्यादा है। @@

* साल 2010-11 में खेती और संबद्ध क्षेत्रों का जीडीपी में योगदान 12.3 फीसदी रहा, वानिकी का  1.4 फीसदी और मात्स्यिकी(फीशिंग) का 0.7 फीसदी। @@

* खेती में वृद्धि का मुख्य संकेत कृषिगत सकल पूंजी-निर्माण(जीसीएफ) से मिलता है।. जीडीपी में

* कृषि ने जितने मूल्य का योगदान किया उससे तुलना करके देखें तो कृषिगत सकल पूंजी निर्माण साल 2010-11 में 20.1 फीसदी तक पहुंचा है जबकि साल 2004-05 में 13.5 फीसदी था।(आकलन 2004-5 के मूल्यों पर आधारित है)। @@

* कृषि में सार्वजनिक निवेश के मामले में, जैसाकि राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी में परिभाषित है, 80 प्रतिशत से अधिक बड़ी और मंझोली मध्यम सिंचाई स्कीमों के लिए  निर्धारित है। यहां तक कि कृषि में निजी निवेश के मामले में भी लगभग आधी सिंचाई (मुख्यतः भूजल के माध्यम से) हेतु निर्धारित है।अतः सिंचाई अब भी कृषि में संपूर्ण निवेश में सबसे महत्वपूर्ण घटक है।

* सकल सिंचित क्षेत्र वर्ष 1990-91 में 34 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2008-09 में 45.3 प्रतिशत हो गया है। हालांकि विभिन्न राज्यों में विभिन्न फसलों में सिंचित कवरेज में बहुत बड़ी भिन्नता है।यद्यपि पंजाब (98), हरियाणा (85), उत्तर प्रदेश (76), बिहार (61), तमिलनाडु (58) और पश्चिम बंगाल (56) में सिंचाई के अधीन आधे से भी अधिक फसल क्षेत्र है, ओडिशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, झारखंड और असम में सिंचाई के अधीन बहुत कम क्षेत्र है।

* आकलन किया गया है कि 2050 तक लगभग 22ः भौगोलिक क्षेत्र एवं 17ः जनसंख्या को जल की अत्यन्त कमी का सामना करना पड़ेगा। जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता जो 2010 में लगभग 1704 क्यूबिक मीटर थी, वह 2050 में 1235 सीएम (क्यूबिक मीटर) मानी गई है।

* उर्वरकों का समग्र उपभोग वर्ष 1991-92 के 70 किग्रा॰/है॰ से बढ़कर 2010-11, में 144 किग्रा॰/है॰ हो गया है।

* वर्तमान में भारत विश्व में उर्वरक-नाईट्रोजन का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, और फास्फेट उर्वरक के लिए इसका स्थान तीसरा है। पोटाश का पूर्ण रूप से आयात किया जाता है। नाईट्रोजन और फास्फोरस की खपत में चीन के बाद भारत का स्थान दूसरा है।

* 2010-11 के दौरान रासायनिक उर्वरकों की खपत (पोषक तत्वों के संबंध् में) 282 लाख टन रही है जिसमें नाइट्रोजन की 166 लाख टन, फास्फेटिक की 81 लाख टन तथा पोटासिक उर्वरक की 35 लाख टन मात्रा शामिल है। उर्वरकों की अखिल भारत औसत खपत जो 2004-05 में 95 कि॰ग्रा॰ प्रति है॰ थी, 2010-11 में बढ़कर 144 कि॰ग्रा॰ प्रति है॰ हो गई है।

* राज्यों के बीच उर्वरक खपत में बहुत अध्कि भिन्नता देखी गई है। जबकि पंजाब में 237.1 कि॰ग्रा॰ तथा आन्ध््र प्रदेश में 225.7 कि॰ग्रा॰ प्रति हैक्टेयर खपत है, यह मध्य प्रदेश (81 कि॰ग्रा॰/है॰), उड़ीसा (58 कि॰ग्रा॰/है॰), राजस्थान(48.3 कि॰ग्रा॰/है॰) और हिमाचल प्रदेश (548.8 कि॰ग्रा॰/है॰) की तुलनात्मक रूप से कम है तथा कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में 5 कि॰ग्रा॰/है॰ से नीचे है।

* कृषि राज्य का विषय है अतः भारत में कृषि क्षेत्र का संपूर्ण प्रदर्शन इस पर निर्भर करता है कि राज्य स्तर पर क्या हो रहा है। विभिन्न राज्यों के प्रदर्शन में बहुत बड़ी भिन्नता है। वर्ष 2000-01 से 2008-09 के दौरान राजस्थान (8.2 प्रतिशत), गुजरात (7.7 प्रतिशत) और बिहार (7.1 प्रतिशत) में कृषि वृद्धि उत्तर प्रदेश (2.3 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (2.4 प्रतिशत) से बहुत अधिक रही। उड़ीसा, छत्तीसगढ़ एवं हिमाचल प्रदेश जैसे पहले के खराब प्रदर्शन वाले राज्यों में हाल ही में कृषि में सुदृढ़ वृद्धि का रुख देखा गया है।

* वर्ष 2010-11 के दौरान, खाद्यान्न उत्पादन 244.78 मिलियन टन था जिसमें खरीफ मौसम में 121.14 मिलियन टन और रबी मौसम में 123.64 मिलियन टन उत्पादन हुआ। कुल खाद्यान्न उत्पादन में से अनाज का उत्पादन 226.53 मिलियन टन और दलहन का 18.24 मिलियन टन था।

* वर्ष 2011-12 के लिए वित्तीय द्वितीय अग्रिम अनुमानों के अनुसार, कुल खाद्यान्न उत्पादन 250.42 मिलियन टन के रिकार्ड स्तर पर होने का अनुमान है जो विगत वर्ष के से 5.64 मिलियन टन अधिक है।

* चावल का उत्पादन 102.75 मिलियन टन गेहूं 88.31 मिलियन टन, मोटे अनाज 42.08 मिलियन टन और दालें 17.28 मिलियन टन होने का अनुमान है।

* 2011-12 के दौरान तिलहन उत्पादन 30.53 मिलियन टन, गन्ना उत्पादन 347.87 मिलियन टन और कपास उत्पादन 34.09 मिलियन गांठें (प्रत्येक 170 कि॰ ग्रा॰ की) होने का अनुमान है पटसन उत्पादन 10.95 मिलियन गांठ (प्रत्येक 180 कि॰ग्रा॰ की) होने का अनुमान है। देश के कुछ भागों में असंगत जलवायु घटकों के बावजूद, के आसार अच्छे हैं। वर्ष 2011-12 के दौरान खाद्यान्नों का 245 मिलियन टन का लक्षित रिकार्ड उत्पादन रहा है।

दो अवधियों 1990-91 से 1999-2000 और 2000-01 से 2010-11 हेतु विभिन्न फसलों के क्षेत्र, उत्पादन और उपज की औसत वार्षिक वृद्धि दर-

* कृषि फसलों के उत्पादन में वृद्धि क्षेत्र एवं उपज पर निर्भर करती है। गेहूं के मामले में वर्ष 2000-01 से 2010-11 के दौरान क्षेत्र एवं उपज में वृद्धि; सीमांत रही जो दर्शाता है कि इस फसल में उपज स्तर अधिकतम है और उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाने के लिए नवीन अनुसंधान की आवश्यकता है।

* सभी प्रमुख मोटे अनाजों में( मक्का को छोड़कर क्योंकि इसमें वर्ष 2000-01 से 2010-11 अवधि में 2.68 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई) दोनों अवधियों के दौरान क्षेत्र में नकारात्मक वृद्धि रही। मक्का का उत्पादन भी बाद की अवधि में 7.12 प्रतिशत बढ़ा है। दलहन में खेती के तहत क्षेत्र में विस्तार के कारण इसी अवधि के दौरान चने में 6.39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी।

* उर्वरकों का समग्र उपभोग वर्ष 1991-92 के 70 किग्रा॰/है॰ से बढ़कर 2010-11, में 144 किग्रा॰/है॰ हो गया है।राष्ट्रीय स्तर पर हमारी खेतिहर मिट्टी में लगभग 8-10 मि॰ टन एनपीके(नाइट्रोजन, फॉस्फोरस,पोटैशियम) की विशुद्ध कमी हो रही है। मिट्टी  से सबसे अधिक लिया जाने वाला पोषक-तत्व (के) पोटेशियम है जो 7 मीट्रिक टन लिया जाता है एवं पूति केवल एक मीट्रिक टन की हो पाती है। देश के सभी भागों में सल्फर की कमी पाई जाती है लेकिन सल्फर की कमी दक्षिणी क्षेत्र में सबसे ज्यादा है।

* सोयाबीन में इन दोनों अवधियों में खेती में क्षेत्र विस्तार से उच्च वृद्धि दर दर्ज की गयी। वास्तव में तिलहन ने सामूहिक रूप में दो दशकों में महत्वपूर्ण परिवर्तन दर्शाए हैंः उत्पादकता (उदाहरणार्थ मूंगफली और सोयाबीन) एवं क्षेत्र विस्तार के कारण पिछले दशक की तुलना में 2000 वाले दशक में उत्पादन वृद्धि दर दुगुनी से अधिक हुई है।

* दो अवधियों में उपज में वृद्धि दर में सबसे अधिक वृद्धि मूंगफली एवं कपास में है। वर्ष 2002 में बीटी कपास की शुरुआत के साथ कपास में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे गए हैं। वर्ष 2011-12 तक कपास क्षेत्र का लगभग 90 प्रतिशत बीटी के तहत कवर है। कपास उत्पादन (2002-03 की तुलना में) दुगुने से भी ज्यादा हो गया है, उपज लगभग 70 प्रतिशत तक बढ़ गयी है और कच्चे कपास की निर्यात-क्षमता 10000 करोड़ रुपए से भी अधिक की हो गई है।

* कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र के कुल उत्पादन में पशुधन का अंश वर्ष 1990-91 को समाप्त तीन वर्ष की अवधि (टी॰ई॰) में 20 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2009-10 को समाप्त तीन वर्ष की अवधि (टी॰ई॰) में (वर्ष 2004-05 के मूल्यों पर) 25 प्रतिशत हो गया है। वर्तमान में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों से उत्पादन के कुल मूल्य का लगभग 1/5 खाद्यान्न है जो पशुधन क्षेत्र के हिस्से से कम है और बागवानी क्षेत्र के लगभग बराबर है।

* फलों एवं सब्जियों में 1990-91 से वर्ष 1999-2000 की अवधि की तुलना में वर्ष 2000-01 से 2010-11 में उत्पादन एवं क्षेत्र में उच्च वृद्धि देखी गयी है।

* पिछले 40 वर्षों के दौरान कुल बोया गया क्षेत्र 141 मि॰ है॰ के करीब रहा है। फसल गहनता अर्थात् सकल फसलित क्षेत्र की तुलना में निवल फसल क्षेत्र का अनुपात, हालांकि वर्ष 1970-71 में 118 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2008-09 में 138 प्रतिशत हो गया।

* साल 2011-12 के दौरान फलों की खेती 6.58 मिलियन हैक्टेयर में हुई और फलों का उत्पादनf 77.52 मिलियन टन हुआ। इसका योगदान कुल उत्पादन में 32 फीसदी का रहा।

* शाक-सब्जियों की खेती 8.49 मिलियन हैक्टेयर में हुई, उत्पादन 149.61 मिलियन टन हुआ, उत्पादकता 17.42 टन प्रति हैक्टेयर रही।

* साल 2010-11 में अनुमानों के मुताबिक दूध-उत्पादन 121.8 मिलियन टन हुआ जबकि साल 1990-91 दौरान दूध-उत्पादन 53.9 मिलियन टन हुआ था।राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता साल 1990-91 में 176 ग्राम प्रतिदिन थी जो साल 2010-11 में बढ़कर 281 ग्राम हो गई।

* राष्ट्रीय स्तर पर मांस का उत्पादन साल 2000-01 में 1.5 मिलियन टन था जो साल 2010-11 में बढ़कर 4.83 मिलियन टन हो गया।

.* साल 1990-91 में अंडे का उत्पादन 21.1 बिलियन हुआ था जो साल 2010-11 में बढ़कर 61.45 बिलियन हो गया। एफएओ के आंकड़ों के अनुसार भारत का अंडों के उत्पादन के मामले में साल 2010 में विश्व में तीसरा स्थान था।

* साल 2010-11 में कुल मछली उत्पादन 8.29 मिलियन टन होने का अनुमान है।

  स्रोत-

Source: State of Indian Agriculture 2011-12, http://agricoop.nic.in/SIA111213312.pdf

@@ Economic Survey 2011-12, Ministry of Finance, Government of India, http://indiabudget.nic.in/es2011-12/echap-08.pdf

 

 
 
आगे पढ़े
 
**page**
 
 
  [inside]कृषि एवं सहकारिता विभाग (कृषि मंत्रालय, भारत सरकार) द्वारा जारी वार्षिक रिपोर्ट(2010-11)[/inside] के अनुसार-


http://agricoop.nic.in/Annual%20report2010-11/ARH.pdf

-यद्यपि उद्योग एवं सेवा क्षेत्र में अधिक वृद्धि के कारण राष्ट्र की जीडीपी में कृषिक्षेत्र का योगदान घटकर 14.2 फीसद हो गया है फिर भी यह 58  से अधिक जनसंख्या की आजीविका का मुख्य स्रोत है।


-विश्व के कुल भूक्षेत्र के केवल 2.3 फीसद भाग के साथ भारत को विश्व जनसंख्या के लगभग 17.5 फीसद की अपनी जनसंख्या की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना होता है।


-2010-11 की दूसरी तिमाही में कृषि क्षेत्र 4.4 फीसद की वृद्धि दर तक पहुंचा है जिससे 2010-11 की पहली छमाही के दौरान 3.8 फीसद की समग्र वृद्धि दर प्राप्त हुई है।


-2004-05 के मूल्य पर इस क्षेत्र में 2005-06 में 5.1 प्रतिशत, 2006-07 में 4.2 प्रतिशत, 2007-08 में 5.8 प्रतिशत एवं 2008-09 में (-) 0.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।


-इस क्षेत्र में 2009-10 में रिकार्ड की गई 0.4 प्रतिशत की निम्न वृद्धि दर का मुख्य कारण 2009 में कम वर्षा होना था।


-2004-05 से 2009-10 के दौरान कृषि में कुल निवेश 7.5 फीसद से 7.7 फीसद के बीच प्रतिवर्ष बढ़ा है। विभिन्न योजनाओं संबंधी योजना-परिव्यय 2008-09 में 9865.58 करोड़ रूपये से बढ़कर 2010-11 में 17254 करोड़ हो गया है।


-खरीफ, 2010 में बोया गया क्षेत्रः  चावल (7.0 फीसद) , मक्का (6.9 फीसद), बाजरा (1.4 फीसद), तुर (23 फीसद)  उड़द (12.8 फीसद), मूंग 20.3 (फीसद), मूंगफली (11.6 फीसद), रामतिल (15.8 फीसद), एरंड (18.5 फीसद), कपास (8.4 फीसद), गन्ना (20.4 फीसद), और पटसन (9.7 फीसद) के  मामले में बोए गए क्षेत्र में वृद्धि हुई ।


-सोयाबीन (2.6 फीसद), सूरजमुखी (50.3 फीसद), तिल ( 3.2 फीसद) और ज्वार (1.2 फीसद) के तहत बोये गये क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में कम है।


-कृषि उत्‍पादनः 2009-10 के चौथे अग्रिम आकलन के अनुसार खाद्यान्न उत्पादन 218.20 मिलियन टन आकलित किया गया है, जिसमें 103.84 मिलियन टन का खरीफ खाद्यान्न एवं 114.36 मि0टन का रबी खाद्यान्न शामिल है। इसके अलावा, 2008-09 (अंतिम आकलन) में 219.90 मिलियन टन की तुलना में सभी अनाजों का उत्‍पादन 203.61 मिलियन टन हुआ। 2009-10 में गेहूं एवं चावल का उत्पादन क्रमशः 80.71 मिलियन टन एवं 89.13 मिलियन टन आकलित किया गया है।


-हालांकि तिलहनों का उत्पादन 2008-09 में 27. 72 मिलियन टन से कम होकर 2009-10 में 24. 93 मिलियन टन हो गया। मूंगफली एवं एरंड बीज के उत्पादन में कमी के कारण ऐसा हुआ।

 

-कृषि में उत्पादकता वृद्धि मुख्य तौर पर पूंजी निर्माण पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र में जीडीपी की तुलना में इस क्षेत्र में सकल पूंजी निर्माण जीसीएफ (निवेश) 2005-06 में 15.8 प्रतिशत से 2009-10 में 20.3 प्रतिशत तक अनवरत रूप से बढ़ा है।

 

(कृषि में पूंजी निर्माण: सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश अथवा पूंजी निर्माण में सिंचाई संबंधी निर्माण कार्य, कमान क्षेत्र विकास, भू-सुधार, वन रोपण, राज्य फार्मों का विकास आदि शामिल है। निजी क्षेत्र में पूंजी निर्माण में शामिल हैं:-भूमि के सुधार/पुनरोद्धार समेत निजी क्षेत्र में निर्माण कार्यकलाप, गैर-रिहायशी इमारतों, फार्म हाउस का निर्माण, कुओं एवं अन्य सिंचाई निर्माण कार्य इत्यादि। मशीनरी घटक में ट्रैक्टर, परिवहन उपकरण, कृषि मशीनरी/उपकरण शामिल है। इसमें पशुधन विकास भी शामिल है।)
 

·       सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स् ऑफिस द्वारा जारी(फरवरी 7,2011) 2010-11 के अग्रिम अनुमानों के अनुसार कृषि और उसके सहयोगी क्षेत्रों का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 14.2 फीसद का है(साल 2004-05 के मूल्यों के आधार पर)

 

·         साल 2004-05 से साल 2007-08 के बीच की अवधि में कृषि और उसके सहायक क्षेत्रों का सकल घरेलू उत्पादन में योगदान 5,65,426 करोड़ रुपये से बढ़कर 6,55,080 करोड़ रुपये हो गया। इसके बाद अगले दो सालों(2008-09 से 2009-10) तक ठहरी रही।

 

·         साल 2004-05 में कृषि और सहायक क्षेत्रों का योगदान जीडीपी में 19.0 फीसदी था, साल 2008-09 में 15.7 फीसदी और साल 2009-10 में 14.6 फीसदी।

 

 

  [inside]इकॉनॉमिक सर्वे-2010-11[/inside] के अनुसार- http://indiabudget.nic.in/es2010-11/echap-08.pdf

 

 

·        सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स् ऑफिस के अग्रिम अनुमान के हिसाब से साल 2010-11 में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र में 5.4 फीसदी की बढ़ोतरी होगी

 

·         सकल घरेलू उत्पाद में समग्र साल 2004-05 से साल 2010-11 की अवधि में समग्र बढ़ोतरी का औसत 8.62 फीसदी का रहा जबकि कृषि क्षेत्र के लिए इसी अवधि में यह आंकड़ा 3.46 फीसदी की बढोतरी का है।

 

·         साल 2009-10 में दक्षिण-पश्चिम मानसून की स्थिति दयनीय रही और खरीफ की फसल का बहुत नुकसान हुआ लेकिन रबी की फसल बेहतर होने से कृषि-उत्पादन की दर तनिक (0.4 फीसदी) बढ़ी।

 

·         कृषि और उसके सहायक क्षेत्रों में सकल पूंजी निर्माण(ग्रास कैपिटल फॉरमेशन) साल 2004-05 से 2009-10 के बीच 6.6 से 8.2 फीसदी के दरम्यान रहा।

·         लगातार चार सालों, 2005-06 से 2008-09 तक खाद्यान्न के उत्पादन में बढ़ोतरी देखी गई। यह बढ़त साल 2008-09 में 234.47 मिलियन टन की रिकार्ड ऊँचाई तक पहुंच गई। साल 2009-10 में खाद्यान्न के उत्पादन में सूखे के कारण गिरावट (218.11 मिलियन टन) आई।

 

·         कृषि मंत्रालय द्वारा जारी अग्रिम अनुमानों(तारीख 9.2.2011) में कहा गया है कि साल 2010-11 में खाद्यान्न का उत्पादन 232.07 मिलियन टन होने की संभावना है जो पिछले साल के मुकाबले(234.47 मिलियन टन) थोड़ा ही कम है। संभावना है कि गेहूं( 81.47 मिलियन टन),दाल  (16.51 मिलियन टन) और कपास (170 किलोग्राम वज़न की कुल 33.93 मिलियन गांठें) के उत्पादन में रिकार्ड बढ़त होगी।

 

·         अग्रिम अनुमान के मुताबिक चावल का उत्पादन साल 2010-11 में 94.01 मिलियन टन होगा जो पिछले साल के मुकाबले 5.52 फीसदी अधिक है।

 

·         साल 2010-11 में गेहूं का उत्पादन अग्रिम अनुमानों के मुताबिक 81.47 मिलियन टन होगा जो पिछले साल के मुकाबले 0.83 फीसदी अधिक है।  

 

·         साल 2010-11 में मोटहन का उत्पादन अग्रिम अनुमानों के मुताबिक 40.08  मिलियन टन होगा जो पिछले साल के मुकाबले 19.46  फीसदी अधिक है।

 

·         साल 2010-11 में दाल का उत्पादन अग्रिम अनुमानों के मुताबिक 16.51   मिलियन टन होगा जो पिछले साल के मुकाबले 12.62 फीसदी अधिक है।

 

·         साल 2008-09 में पशुपालन और मत्स्यपालन का योगदान जीडीपी में 4.07 फीसदी था जो कृषि और उसके सहयोगी क्षेत्रों के कुल योगदान का 29.7 फीसदी है।

 

·         साल 2009-10 में, पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्र में 112.5 मिलियन टन दूध, 59.8 अरब अंडे, 43.2 मिलियन किलो ऊन, और 4.0 मिलियन टन मांस का उत्पादन हुआ।

·         भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन करने वाला देश है। भारत में साल 1950-51 में दूध का उत्पादन 17 मिलियन टन था जो साल 2009-10 में बढ़कर 112.5 मिलियन टन हो गया है।.

 

·         देश में दूध की उपलब्धता साल 1968-69 में 112 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन थी जो अब साल 2009-0 में बढ़कर 263 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन हो गई है। बहरहाल वैश्विक औसत 279.4 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन का है।

 

·         भारत में प्रति वर्ष 59.8 अरब से ज्यादा अंडों का उत्पादन होता है। इस हिसाब से भारत में प्रति व्यक्ति सालाना 51 अंडे उपलब्ध हैं। पॉलट्री मीट प्राडक्श साल 2008-09 में 1.85 मिलियन टन रहने का अनुमान जताया गया है।

 

·         मछली का उत्पादन साल 2007-08 में 7.14 मिलियन टन हुआ था जो साल 2009-10 में बढ़कर 7.85 मिलियन टन हो गया। इस क्षेत्र में कुल 1करोड़ 10 लाख व्यक्तियों को रोजगार मिला हुआ है।

 


 **page**

                                                           भारतीय कृषि के कुछ रोचक तथ्य 

[inside]एनएसएस (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण) के ५४ वें दौर के आकलन पर आधारित रिपोर्ट[/inside] संख्या- 451(54/31/3),  जनवरी 1998 – जून 1998 के अनुसार:


फसली खेती के ५९ फीसदी हिस्से में उच्च उत्पादकता के बीज(संकर बीज) का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के ८१ फीसदी हिस्से में उर्वरकों का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के ७४ फीसदी हिस्से में जैविक खाद का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के ४७ फीसदी हिस्से में कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के २२ फीसदी हिस्से में खर-पतवार नाशकों का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के ६६ फीसदी हिस्से में सिंचाई के मानव निर्मित साधनों का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के ५४ फीसदी हिस्से में ट्रैक्टर और पावर टीलर का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के ६ फीसदी हिस्से में हार्वेस्टर का इस्तेमाल होता है।

फसली खेती के ५१ फीसदी हिस्से में खरीफ के दौरान धान के उन्नत बीजों  का इस्तेमाल होता है।

फसली खेती के ६६ फीसदी हिस्से में रबी के दौरान धान के उन्नत बीजों  का इस्तेमाल होता है।

फसली खेती के ६३ फीसदी हिस्से में गेहूं के उन्नत बीजों  का इस्तेमाल होता है।
 
फसली खेती के ६४ फीसदी हिस्से में,अन्य खाद्यान्नो के मामले में,  उन्नत बीजों  का इस्तेमाल होता है।

फसली खेती के ४७ फीसदी हिस्से में दलहन के उन्नत बीजों  का इस्तेमाल होता है।

सरकारी नहर से गावों में फसली खेती का २५ फीसदी हिस्सा सिंचित होता है। 
 
मशीन से जुताई करके जितने हिस्से पर खेती होती है उसके ७२ फीसदी हिस्से पर किराये के पावर टीलर या हार्वेस्टर का इस्तेमाल होता है। 
 
 ६१ फीसदी ग्रामीण परिवार फसली खेती में लगे हैं।
 
१ हेक्टेयर या उससे कम जमीन वाले ऐसे ग्रामीण परिवारों की तादाद ६२ फीसदी है जो साल में बस एक फसल की खेती करते हैं।
 
नहर सिंचित इलाके में दूसरे परिवारों से सिंचाई के साधन किराये पर लेकर सिंचिंत की जाने वाली कृषि भूमि की तादाद ४० फीसदी है। 
 
गैर नहर-सिंचित इलाके में दूसरे परिवारों से सिंचाई के साधन किराये पर लेकर सिंचिंत की जाने वाली कृषि भूमि की तादाद ४९ फीसदी है।  
 
* फसली खेती के दायरे में यहां उन परिवारों को भी शामिल किया गया है जो अपनी जमीन के कुछ हिस्से पर बागवानी करते या फिर पेड़ उगाते हैं लेकिन खरीफ या रबी की मौसमी खेती नहीं करते। एक फसल की खेती करने वाले परिवार का आशय यहां उन परिवारों से है जो साल में एक बार(या तो खरीफ या फिर रबी के मौसम में) उगा पाते हैं। .

.

स्रोत- एनएसएस (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण) के ५४ वें दौर के आकलन पर आधारित रिपोर्ट संख्या- 451(54/31/3),  जनवरी 1998 – जून 1998 :


                                                     भूमि और श्रम

• भारत में प्रचालनात्मक जोतों का औसत आकार वर्ष 1970-71 में 2.28 है॰ था जो क्रमिक रूप से घटकर वर्ष 1990-91 में 1.55 है॰ एवं वर्ष 2005-06 में 1.23 है॰ हो गया है । कृषि संगणना 2005-06 के अनुसार सीमांत जोत (1 है॰ से कम क्षेत्र) का भाग 1995-96 में 61.6 प्रतिशत से बढ़ कर वर्ष 2005-06 में 64.8 प्रतिशत हो गया है। इसके पश्चात् लगभग 18 प्रतिशत छोटी जोत (1-2 है॰), लगभग 16 प्रतिशत मध्यम जोत (2 है॰ से अधिक एवं 10 है॰ से कम) और 1 प्रतिशत से कम बड़ी जोत (10 है॰ एवं उससे अधिक) है।

• देश में 141 मि॰ है॰ (कुल सूचित क्षेत्र का लगभग 46 प्रतिशत) कुल बोया गया क्षेत्र है, 70 मि॰ है॰ (23 प्रतिशत) वन क्षेत्र, 26 मि॰ है॰ गैर कृषि उपयोग के तहत, 25 मि॰ है॰ परती भूमि, 17 मि॰ है॰ बंजर और अकृष्य भूमि, 13 मि॰ है॰ कृषि योग्य बंजर भूमि, 10 मि॰ है॰ स्थायी चारागाह भूमि और अन्य चारागाह भूमि, और 3 मि॰ है॰ क्षेत्र विविध वृक्ष फसलों और उपवनों के अधीन है।

• गुजरे सालों से गैर कृषि उपयोग के अंतर्गत आने वाली जमीन की मात्रा में  क्रमिक रूप से वृद्धि हुयी है। पिछले 40 वर्षों (1970-71 से 2008-09) के दौरान निवल बोया गया क्षेत्र कुल मिलाकर 141 मि॰ है॰ पर स्थिर रहा है। गैर-कृषि उपयोगों के तहत क्षेत्र 16 मिलियन है॰ से बढ़कर 26 मिलियन है॰ हो गया, जबकि बंजर और अकृष्य भूमि के तहत क्षेत्र 1970-71 में 28 मि॰ है॰ से घटकर 2008-09 में 17 मि॰ है॰ हो गया है। तथापि, सकल फसलित क्षेत्र वर्ष 1970-71 में 166 मि॰ है॰ से बढ़कर वर्ष 2008-09 में 195 मि॰ है॰ हो गया है।

• बढ़ती हुयी जनसंख्या के कारण ऐसा अनुमान है कि प्रति व्यक्ति कुल भूमि उपलब्धता जो 2.19 है॰ विश्व औसत के सम्मुख वर्ष 2001 में 0.32 है॰ थी, वर्ष 2025 में घटकर 0.23 है॰ हो जाएगी और वर्ष 2050 में 0.19 है॰ रह जाएगी।

• भारत में लगभग 120 मि॰ है॰ भूमि अवक्रमित(डिग्रेडेशन) हुयी है और मृदा अपरदन के माध्यम से हर वर्ष लगभग 5334 मि॰ टन मिट्टी की क्षति हो जाती है। 120 मि॰ है॰ अवक्रमित क्षेत्र में से 68 प्रतिशत जल अपरदन के कारण है, 21 प्रतिशत रासायनिक अवक्रमण है, 10 प्रतिशत वायु अपरदन के कारण है और शेष भौतिक-अवक्रमण हैं।

• भारत में लगभग 12 मि॰ है॰ क्षेत्र जल-प्लावित एवं बाढ़-प्रवण है जहां कृष्य फसलों की उत्पादकता काफी प्रभावित होती है। मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र में खरीफ के दौरान अस्थायी जलप्लावन के कारण क्रमशः लगभग 12 एवं 0.53 मि॰ है॰ वर्षा सिंचित जमीन को परती छोड़ा जाता है एवं उसे केवल वर्षा मौसम के उपरान्त ही बोया जाता है। पूर्वी भारत में जलप्लावित कछारी क्षेत्रों में वर्ष में छह महीने से ज्यादा समय के लिए धरातल पर जल जमा रहता है।

• भारतीय स्तर पर लगभग 60 प्रतिशत ग्रामीण श्रमिक बल तथा 45 प्रतिशत शहरी श्रम बल अपने रोजगार में है। ग्रामीण दिहाड़ी मजदूर भारत में कुल कार्य बल का एकल सबसे बड़ा भाग हैं।

• खेती की लागत के आंकड़ों से पता चलता है कि खेती के काम में मजदूरी अधिकतर मामलों में उत्पादन की कुल  लागत के 40 प्रतिशत से अधिक है।

• हाल के वर्षों में भारत के सभी बड़े राज्यों में कृषि मजदूरी में सतत् वृद्धि हुई है। अकुशल कृषि मजदूर हेतु आंध्र प्रदेश में वार्षिक औसत मजदूरी 2008 की तुलना में 2009 में 28.6 प्रतिशत बढ़ी है तथा 2010 में 22.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसी प्रकार उड़ीसा में मजदूरी वृद्धि 2008 की तुलना में 2009 में 20 प्रतिशत तथा 2009 की तुलना में 30.07 प्रतिशत है। पंजाब में वर्ष 2009 में 22.2 प्रतिशत और 2010 में 20.03 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। तमिलनाडु में संगत पिछले वर्षों की तुलना में वर्ष 2009 और 2010 में क्रमशः 20.4 प्रतिशत और 27.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

• मजदूरी में दोहरे अंक की वृद्धि हुई है जो उस अवधि के दौरान की स्फिति दर से भी अधिक है। वर्ष 2008-10 के दौरान केरल में ग्रामीण मजदूरी सर्वाधिक थी जो 216-305 रु॰ के बीच थी। इसके बाद तमिलनाडु आंध्र प्रदेश और कर्नाटक का स्थान आता है। उत्तरी क्षेत्र में हरियाणा ने वर्ष 2008-10 की अवधि के दौरान 121-182 रु॰ के रेंज में सर्वाधिक कृषि मजदूरी दर्ज की इसके बाद 110-162 रु॰ के रेंज में पंजाब, 105-139 के रेंज में राजस्थान का स्थान आता है। पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश ने भी मजदूरी में वृद्धि की है।

• मनरेगा के अंतर्गत रोजगार सुविधाओं ने सुनिश्चित न्यूनतम रोजगार देकर तथा ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि करके ग्रामीण क्षेत्रों में काफी प्रभाव डाला है। मनरेगा के अंतर्गत ग्रामीण परिवारों की मजदूरी में हुई वृद्धि इस प्रकार है-  महाराष्ट्र में 47 रु॰ से 72 रु॰, उत्तर प्रदेश में 58 रु॰ से 100 रु॰, बिहार में 68 रु॰ से 100 रु॰, प॰ बंगाल में 64 रु॰ से 100 रु॰ मध्य प्रदेश में 58 रु॰ से 100 रु॰ जम्मू कश्मीर में 45 रु॰ से 100 रु॰ और छत्तीसगढ़ में 58 रु॰ से 100 रु॰। राष्ट्रीय स्तर पर मनरेगा के अंतर्गत दी जाने वाली मजदूरी वर्ष 2007-08 में 75 रु॰ से बढ़कर 2009 में 93 रु॰ हो गई है।

स्रोत-

Source: State of Indian Agriculture 2011-12, http://agricoop.nic.in/SIA111213312.pdf


                                                        एक गिनती निवालों की

• साल १९५१ में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ३९४ ग्राम खाद्यान्न हासिल था जो साल २००७ में बढ़कर ४३९.३ ग्राम हो गया लेकिन बीच में ऐसा भी वक्त आयी जब प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खाद्यान्न की उपलब्धता घटकर ४१६.२ ग्राम तक पहुंच गई। मिसाल के लिए साल २००१ में।****

• दाल प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत है। साल १९५१ में प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति पर दालों की उपलब्धता ६०. ग्राम थी जो साल २०० में घटकर २९.४ ग्राम रह गई। ****

• १९९० के दशक में प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति २०० ग्राम चावल उपलब्ध था जबकि साल २००० के बाद यह आंकड़ा घटकर २०० ग्राम से नीचे चला गया। ****

**** कृषि मंत्रालय, भारत सरकार

                                                              कहां पहुंची कीमतें

• साल २००८-०९ के दौरान भारत में मुद्रास्फीति( थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित) मार्च महीने के अंत में ७.७ फीसदी थी जो २ अगस्त २००८ को १२.९ फीसदी की ऊंचाई को छू गई।

• साल २००८ के बाद थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति में तेजी से गिरावट आयी। २ अगस्त २००८ से २८ मार्च २००९ के बीच यह गिरावट ५.८ फीसदी की रही।
• 
 स्रोत- रिजर्व बैंक ऑव इंडिया बुलेटिन मई २००९ -
http://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/Bulletin/PDFs/MACPOL6.pdf
                                               पलायन(माइग्रेशन)

 परंपरागत पलायन ( गांवों से शहरों की तरफ) में बढ़ोतरी हुई है। कुल पलायन में इसका हिस्सा साल १९७१ में १६.५ फीसदी था जो साल २००१ में बढ़कर २१.१ फीसदी हो गया।&&

• साल १९९१ से २००१ के बीच भारत में  करोड़ ३० लाख लोगों ने गंवई इलाके से पलायन किया।इसमें ५ करोड़ ३० लाख लोग किसी अन्य गंवई इलाके में गए और २ करोड़ लोग शहरों में पलायन कर गए। अधिकतर काम की तलाश में शहरों में आये।&&

• अनुमानतः साल १९९१ से २००१ के बीच ९ करोड़ ८० लाख लोग देश में एक स्थायी वासस्थान को छोड़कर देश के अंदर ही किसी दूसरे वासस्थान पर चले गए।&&

• साल १९९१-२००१ की अवधि के लिए वास्तविक आप्रवास ( नेट माइग्रेशन) यानी इस बात को आधार बनाएं कि किसी राज्य में  कितने लोग अपने पुराने वास स्थान को छोड़कर आये और कितने उस राज्य के अपने स्थायी वासस्थान को छोड़कर चले गए तो वास्तविक आप्रवास के मामले में महाराष्ट्र सबसे ऊपर दिखेगा जिसके खाते में २० लाख ३० हजार आप्रवासियों का आना दर्ज है(यानी जो महाराष्ट्र छोड़कर स्थायी रुप से चले गए उनकी संख्या को घटाकर)। इसके बाद नंबर आता है दिल्ली(१० लाख ७० हजार) गुजरात (६८ हजार) और हरियाणा(६७ हजार) का।+

• उपर्युक्त अवधि में वास्तविक आप्रवास के हिसाब से घाटे का बड़ा खाता उत्तरप्रदेश (-२० लाख ६० हजार) और बिहार(१० लाख ७० हजार) का रहा।+  

&& मैनेजिंग द एग्जोडस्-अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन, http://www.aifoundation.org/documents/Report-ManagingtheExodus.pdf

  गरीबी

• साल १९९३-९४ में ग्रामीण इलाके के गरीब परिवारों में खेतिहर मजदूर श्रेणी के परिवारों की संख्या ४१ फीसदी थी और साल २००४-०५ में भी यही अनुपात बना रहा।&

• साल २००४-०५ में, ग्रामीण इलाके के गरीब परिवारों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के परिवारों की संख्या ८० फीसदी थी।

• साल १९७३ में ग्रामीण इलाके में २६२३ लाख लोग गरीब थे जबकि साल २००४-०५ में यह संख्या घटकर २२०९ हो गई है। %&

%& 11th Five-Year Plan of the Planning Commission
http://www.planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v3/11v3_ch4.pdf

                                           कर्ज और किसान             

 हेक्टेयर से २.०० हेक्टेयर  जमीन की मिल्कियतज्यादातर कर्जदार किसान ०.०१-०.४० हेक्टेयर जमीन की मिल्कियत वाली श्रेणी (इनकी तादाद कुल परिवारों के बीच ३० फीसदी है), ०.४१-१.०० हेक्टेयर जमीन की मिल्कियत वाली श्रेणी(इनकी तादाद कुल परिवारों के बीच २९.८ फीसदी है) और १.०१  वाली श्रेणी(इनकी तादाद कुल परिवारों के बीच १८.८ फीसदी है) ।

• राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ४८.६ फीसदी किसान परिवार कर्जदार हैं। #

• राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो प्रत्येक किसान परिवार पर औसतन १२५८५ रुपये का कर्जा है।#

• ४.०१-१०.० हेक्टेयर की मिल्कियत वाले ६६.४ फीसदी किसान परिवार और १० हेक्टेयर से ज्यादा की मिल्कियत वाले ६५.४ फीसदी  किसान परिवार कर्जदार हैं। #

• कर्जदार किसान का प्रतिशत तादाद सबसे ज्यादा आंध्रप्रदेश(८२ फीसदी) में हैं। इसके बाद तमिलनाडु(७४.५ फीसदी), पंजाब(६५.४ फीसदी), केरल(६४.४ फीसदी), कर्नाटक(६१.६ फीसदी) और महाराष्ट्र (५४.८ फीसदी) का नंबर है। #

# रिपोर्ट संख्या 498(59/33/1), सिचुएशन एसेसमेंट सर्वे ऑव फार्मर हाऊसहोल्ड, नेशनल सैम्पल सर्वे, ५९ वां दौर(जनवरी-दिसंबर २००३)

                                     हम और वे-एक तुलना

• विश्व के कुल चावल उत्पादन में भारत का योगदान साल २००६ में २१.५१ फीसदी रहा जबकि चीन का २९.०१ फीसदी।*****
• विश्व के कुल गेहूं उत्पादन में भारत का योगदान साल २००६ में ११.४ फीसदी रहा जबकि चीन का १७.२ फीसदी। *****
• साल २००६ में भारत में धान की प्रति हेक्टेयर ऊपज ३१२४ किलोग्राम थी जबकि बांग्लादेश की ३९०४ किलोग्राम, चीन की ६२६५ किलोग्राम, मिस्र की १०५९८ किलोग्राम और अमेरिका की ७६९४ किलोग्राम।*****
• साल २००६ में भारत में गेहूं की ऊपज प्रति हेक्टेयर २६१९ किलोग्राम थी जबकि चीन की ४४५५ किलोग्राम, मिस्र की ६४५५ किलोग्राम, फ्रांस की ६७४० किलोग्राम और अमेरिका की २८२५ किलोग्राम। *****

***** फूड एंड एग्रीकल्चरल ऑर्गनाइजेशन

                                                                  खेती- आंकड़े लागत के 


 साल १९५१-५२ में ६५६०० टन उवर्रक का इस्तेमाल हुआ जबकि साल २००६-०७ में २,१५,६१००० टन का यानी कुल छह दशक में कुल ३३० गुना की बढ़ोतरी।****
• साल २००४-०५ में भारत में खेतिहर जमीन के प्रति हेक्टेयर पर औसतन १०२.१ किलोग्राम उर्वरक का इस्तेमाल हुआ जो जर्मनी(१५३.७ किलोग्राम), फ्रांस(१३९.२ किलोग्राम) और बांग्लादेश(१८४.५ किलोग्राम) से कम है। *******
• खेती के मद में दिए जाने वाले ऋण-प्रवाह की मात्रा साल १९९८-९९ में ३६८६० करोड़ थी जो साल २००६-०७ में बढ़कर २०३२९७ करोड़ हो गई। ******
• साल १९९५ में खेती में १३.५ लाख ट्रैक्टर का इस्तेमाल हो रहा था जबकि साल २००३ में इसकी संख्या लगभग दोगुनी बढ़कर २५.३ लाख हो गई।&
• साल १९५१ में भारत में पशुधन की संख्या १५ करोड़ ५० लाख थी जो साल २००३ में बढ़कर १८ करोड़ ५० लाख हो गई।@

**** कृषि मंत्रालय, भारत सरकार
****** ऋण विभाग, कृषि मंत्रालय
******* फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑव इंडिया
& सेलेक्टेड इंडिकेटरस् ऑव फूड एंड एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट इन एशिया- फूड एंड एग्रीक्लचर ऑर्गनाइजेशन
@ डिपार्टमेंट ऑव एनीमल हजबैंडरी, डेयरिंग एंड फिशरीज,नई दिल्ली

 
• जारी किए गए कुल किसान कार्ड में उत्तरप्रदेश की प्रतिशत पैमाने पर हिस्सेदारी सर्वाधिक(१९.१ फीसदी) है। इसके बाद आंध्रप्रदेश(१६.५ फीसदी), महाराष्ट्र(९.५ फीसदी),मध्यप्रदेश (६.४ फीसदी) का नंबर है(३१ मार्च २००७ तक)******

• साल १९९१-९२ में खाद्यान्न(गेहूं-चावल), दलहन और तेलहन के उच्च गुणवत्ता के प्रामाणित बीज क्रमशः ३५.३५ लाख क्विंटल, ३.२९ लाख क्विंटल और ९.६६ लाख क्विंटल जारी किए गए। साल २००६-०७ में यह मात्रा बढ़कर क्रमशः १०९.८७ लाख क्विंटल, ९.६ लाख क्विंटल और २७ लाख क्विंटल हो गई यानी इस अवधि में तीन गुने की बढ़ोतरी हुई। ********

• साल १९९९-२००० में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के अन्तर्गत बीमित किसानों की संख्या ५.८ लाख(रबी) और ८४.१ लाख (खरीफ) थी जो साल २००६-०७ में बढ़कर ४०.५ लाख(रबी) और १.२९ करोड़(खरीफ) हो गई। ******

****** ऋण विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार
******** बीज प्रभाग, कृषि मंत्रालय

                                                              विषमता

• भारत में लगभग ७२ फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। *+
• ५६.९ फीसदी आबादी १५-५९ साल के आयु वर्ग की है। *+
• भारत के ग्रामीण इलाके में २९ फीसदी पुरुष और ५३ फीसदी महिलाएं निरक्षर हैं।
• भारत की साक्षरता दर ६४.८ फीसदी है। *+
• ग्रामीण भारत(५८.७ फीसदी) में साक्षरता शहरी भारत(७९.९ फीसदी) की अपेक्षा कम है।  *+
• भारत में पुरुष साक्षरता की दर(७५.३ फीसदी) स्त्री साक्षरता की दर(५३.७ फीसदी) से ज्यादा है।  *+
• केरल देश का सर्वाधिक साक्षरता दर(९०.९ फीसदी) वाला राज्य है जबकि बिहार में साक्षरता दर(४७.० फीसदी) सर्वाधिक कम है। *+
• ग्रामीण भारत में लिंग-अनुपात प्रति हजार पुरुष पर ९४६ स्त्रियों का है जबकि शहरी भारत में १००० पुरुषों पर ९०० महिलाओं का अनुपात है। *+
• केरल में प्रति हजार पुरुष पर १०५८ महिलाएं हैं(देश में सर्वाधिक) जबकि हरियाणा में प्रति हजार पुरुष पर ८६१ महिलाएं(देश में सबसे कम) *+
• पुरुषों की कार्य प्रतिभागिता दर ५१.७ है जबकि महिलाओं की २५.६।  *+
• देश में अपंग व्यक्तियों की सर्वादिक तादाद(३० लाख ६० हजार) उत्तरप्रदेश में है। *+

*+भारत की जनगणना २००१,, www.censusindia.gov.in