खेतिहर संकट

खेतिहर संकट

एग्रीकल्चरल सेक्टर स्टडी-क्रिटिकल इश्यूज एंड स्ट्रेटजिक ऑप्शनस् नामक दस्तावेज के अनुसार- http://www.adb.org/Documents/Assessments/Agriculture/IND/A
griculture-Assessment.pdf
:


साल १९९५-९६ से साल २००४-०५ के बीच कृषि-क्षेत्र की बढ़ोतरी सालाना १.८५ फीसदी के दर से हुई। साल १८८४-८५ से लेकर १९९५-९६ के बीच कृषि-क्षेत्र की सालाना बढत ३.६ फीसदी की दर से हुई थी। कृषि-क्षेत्र में बढ़ोतरी का यह धीमापन सबसे ज्यादा दिखता है खाद्यान्नों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता के मामले में। साल १९९१-९५ के बीच प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता सालाना २०७ किलोग्राम थी जो साल २००४-०७ के बीच घटकर १८६ किलोग्राम हो गई।


लगभग दो तिहाई खेतिहर जमीन का एक ना एक स्तर पर अपक्षय हुआ है। केवल एक तिहाई जमीन की उर्वरता शक्ति अच्छी हालत में है। ९ करोड़ ४० लाख हेक्टेयर जमीन वर्षा, बाढ़ या किसी अन्य तरह की जलधारा से अपरदन का शिकार हुई है। २ करोड़ २० लाख हेक्टेयर जमीन अम्लता या लवणीयता का शिकार है.। १ करोड़ ४० लाख हेक्टेयर जमीन पानी के जमाव के कारण डुबाव की स्थिति में है। खेतिहर जमीन सिर्फ अपरदन, अम्लीयता और लवणीयता का ही शिकार नहीं हुई बल्तक उसमें सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी भी हो रही है। उर्वरक नीति में खामी के कारण जमीन में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी आ रही है।


हालांकि मत्स्य पालन और पशुपालन में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है और कृषिगत जीडीपी में इसका हिस्सा ३० फीसदी है लेकिन इस क्षेत्र पर नीतिगत प्राथमिकता और निवेश के मामले में उतना ध्यान नहीं दिया गया है जितने का यह हकदार है। पशुपालन का काम ज्यादातर गरीबों में प्रचलित है और यह उनकी आमदनी का एक बड़ी जरिया है।इसे अतिरिक्त शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र फसली खेती के अनुकूल नहीं होते और इन इलाकों में पशुपालन पर निर्भरता ज्यादा होती है। इसलिए सामाजि समता के मूल्य के लिहाज से भी मत्स्यपालन और पशुपालन पर ध्यान दिया जाना जरुरी है।


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