खेतिहर संकट

खेतिहर संकट


एनसीईयूएस यानी नेशनल कमीशन फॉर इन्टरप्राइजेज इन द अन-ऑर्ग्नाइज्ड सेक्टर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रोमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर नामक दस्तावेज के अनुसार-

http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf


· साल २००० की राष्ट्रीय कृषि नीति में कहा गया कि खेती अपेक्षाकृत अलाभकर पेशा बन गई है क्योंकि खेतिहर उपज का लाभकर मूल्य नहीं मिलता और इसकी वजह से लोग खेती-बाड़ी का धंधा छोड़कर तेजी से शहरों का रुख कर रहे हैं। की वजहों से यह स्थिति पैदा हुई है। परंपरागत खेती में नकदी फसलों को उपजाने का रुझान बढ़ा है,वैश्विक बाजार में मूल्यों के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ रहा है। खेती में इस्तेमाल होने वाले साजो-सामान की कीमतें ज्यादा हैं । इससे खेती में लागत ज्यादा है और किसानों को कर्ज लेना पड़ रहा है,जोखिम ज्यादा है, लाभ की स्थितियां कम रह गई हैं और सरकारी मदद भी धीरे धीरे घट रही है।

 

• जब देश की श्रमशक्ति का 92 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है(इसमें जो लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं उनकी गणना तो की ही गई है साथ में उनकी भी गिनती की गई है जो संगठित क्षेत्र में हैं लेकिन बतौर अनुबंध के काम करते हैं),तो फिर यह बात भी स्वाभाविक है कि समाज के गरीब और कमजोर तबके के लोग भी सबसे ज्यादा इसी हिस्से से होंगे जिन्हें हम अपनी सुविधानुसार आम आदमी कहकर पुकारते हैं।

• संपत्ति की कमी और भूमिहीनता- इन दो बड़ी वजहों से ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूर खेतिहर श्रमिक के तौर पर काम करने के लिए बाध्य होते हैं।साल 2004-05 में खेतिहर मजदूरों में भूमिहीनों की तादाद 19.7 फीसदी थी।

• तकरीबन 86 फीसदी सीमांत और छोटे किसान लगभग 43 फीसदी कृषिभूमि पर खेती-बाड़ी करते हैं जबकि 14 फीसदी मंझोले और बड़े किसान 37 फीसदी कृषिभूमि पर खेती-बाड़ी का काम करते हैं।

• हिन्दू समुदाय के भीतर गिने जाने वाले अनुसूचित जनजाति के 40 फीसदी खेतिहर मजदूर गरीबी रेखा से नीचे हैं। इसके बाद गरीबी-रेखा के नीचे आनेवालों में मुसलिम खेतिहर मजदूरों का नंबर है जिनकी तादाद 31.5 फीसदी है जबकि हिन्दू समुदाय के अनुसूचित जाति के खेतिहर मजदूरों में 31 फीसदी तादाद गरीबी रेखा से नीचे है।

• अनुसूचित जाति(हिन्दू) और अन्य पिछड़ा वर्ग(मुसलिम) में सबसे ज्यादा भूमिहीनता है जबकि उच्च जाति के हिन्दू समुदाय में भूमिहीनता सबसे कम है।

• असंगठित क्षेत्र के 79 फीसदी कामगार, अनुसूचित जाति-जनजाति के 88 फीसदी कामगार, ओबीसी(अन्य पिछड़ा वर्ग) की आबादी का 80 फीसदी हिस्सा और मुसलिम समुदाय का 84 फीसदी हिस्सा गरीब या फिर जीविका के लिहाज से कमजोर स्थिति में है। इन सारे समूहों को सिर्फ पेट भर पाने लाएक हासिल हो पाता है, इन्हें विरले ही काम मिल पाता है और फिर सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से भी आबादी का हिस्सा बड़ी दयनीय दशा में है।इन्हें बड़ी दयनीय दशा में काम करना पड़ता है, काम का परिवेश अस्वास्थ्यकर और असहनीय है जबकि ठीक इसी स्थिति के बीच भारत में 1990 के दशक से आर्थिक-वृद्धि की बात कही जा रही है।

 


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