खेतिहर संकट

खेतिहर संकट

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार-http://planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v3/11th_vol3.pdf


दसवीं पंचवर्षीय योजना के मध्यावधि आकलन के दौरान पता चला कि १९९० के दशक के मध्यवर्ती सालों में खेती और उससे जुड़े क्षेत्रों की बढ़ोत्तरी कमती चली गई। दरअसल,पिछले एक दशक या फिर उससे ज्यादा सालों से भारत में खेती को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।भोजन की उपलब्धता,किसानों की आमदनी और गरीबी से जुड़े निम्नलिखित ताजा रुझान चिन्ता जगाने वाले हैं-


· खेती की बढ़ोत्तरी की दर में कमी ।


· सिंचाई के साधन वाले भूमि क्षेत्र और सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर भूमि क्षेत्र के बीच आर्थिक असमानता बढ़ रही है।


· व्यापारिक उदारीकरण के बाद विश्व-बाजार में मूल्यों का तेज उतार-चढ़ाव।इससे कपास और तेलहन का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को घाटा उठाना पड़ा है।


· प्रौद्योगिकी का असमान और धीमी गति से विकास।


· मौजूद प्रौद्योगिकी का कारगर इस्तेमाल नहीं हो पाना।


· समुचित प्रोत्साहन का ना मिलना और कारगर संस्थाओं का अभाव।


· प्राकृतिक संसाधन-आधार का लगातार क्षय होना।


· भूमिगत जल के स्तर में तेजी से कमी। इससे सीमांत और छोटे किसानों को विशेष रुप से घाटा उठाना पड़ रहा है।


· सकल घरेलू उत्पाद और शहरीकरण के कारण खेतिहर भूमि और पानी की मांग का गैर-खेतिहर क्षेत्रों में बढ़ना।


· ऊपर बताये गए कारणों से किसानी पर संकट गहराया है।इसका एक प्रमाण सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में खेती के हिस्से का लगातार घटते जाना है।साल १९८१-८२ से १९९६-९७ के बीच कृषिगत जीडीपी की सालाना बढ़ोत्तरी साढ़े तीन प्रतिशत थी जो साल १९९७-९८ से २००४-०५ के बीच सालाना महज दो फीसदी रह गई।गिरावट का यह रुझान सबसे ज्यादा उन इलाकों में दिखा जहां खेती की सिंचाई वर्षाजल पर निर्भर है लेकिन कमोबेश यह घटना हर राज्य में घटी और कृषि से जुड़े हर क्षेत्र (बागवानी,पशुधन और मछलियों की उगाही) में इस गिरावट को लक्ष्य किया गया।


· नवीं और दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषिगत जीडीपी में बढ़ोत्तरी का लक्ष्य ४ फीसदी का रखा गया था लेकिन बढ़वार इससे कम रही।दसवीं पंचवर्षीय योजना में कृषिगत जीडीपी की औसत बढ़ोत्तरी नवीं पंचवर्षीय योजना से भी कम रही।दसवीं पंचवर्षीय योजना के पहले तीन सालों यानी २००२-०३ से २००४-०५ के बीच कृषिगत जीडीपी की बढ़ोत्तरी की दर महज एक फीसदी रही।


· खेतिहर उत्पादों के आपूरति पक्ष पर भी कई बातों का बुरा इसर पड़ा। परस्पर संबद्ध इन बातों में शामिल है-प्राकृतिक संसाधन(वर्षा सहित),प्रौद्योगिकी,बुनियादी ढांचा(सिंचाई के साधन सहित) और आर्थिक परिवेश जिसमें मूल्यों के सूचकांक और धनदाता संस्थाएं शामिल है।


· खेतिहर संकट का एक बड़ा कारण हाल के बरसों में व्यापारिक विनिमय दर(टर्मस् ऑव ट्रेड-दो देश जब आपस में व्यापार करते हैं तो इसकी गणना में यह देखा जाता है कि किसी एक वस्तु या सेवा के मोल की तुलना में किसी दूसरी वस्तु या सेवा का मोल कितना है।देखें यह लिंक-http://tutor2u.net/economics/content/topics/trade/terms_of_trade.htm) का खेती के खिलाफ चले जाना है।१९८० से १९९७ के बीच टर्मस् ऑव ट्रेड खेती के पक्ष में था लेकिन १९९९ से यह खेती के खिलाफ चला गया और आजाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि जब खेतिहर उत्पादन गिरा उसी समय खेतिहर उत्पादों के मोल में भी गिरावट आयी।

 

· इससे किसानों की आमदनी में कमी तो आयी ही,उनके ऊपर कर्ज का बोझ भी बढ़ा। आज किसान पहले की अपेक्षा ज्यादा जोखिम की दशा में हैं क्योंकि उदारीकरण से पहले खेतिहर उत्पादों के मूल्य में जितने उतार-चढ़ाव के वे आदी थे उसकी तुलना में विश्व बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव आज कहीं ज्यादा है।


· खेतिहर उत्पादों के लिहाज से देखें तो बाजार की संस्थाओं के भीतर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आधुनिक फूड रीटेलिंग के रुप में हुआ है।इसके भीतर मार्केंटिंग की लागत और उत्पाद की बर्बादी को कम करने की संभावना है। उपभोक्ताओं को फूड रीटेलिंग के कारोबारी अपेक्षाकृत सस्ती कीमत पर सामान मुहैया कराते हैं और किसान को भी बिचौलियों की अनुपस्थिति में अपने उत्पाद की तुलनात्मक रुप से अच्छी कीमत मिल जाती है।फूड रीटेलिंग के आधुनिक तरीके में एक दिक्कत निवेश से जुड़ी है।फर्ज करें कि फूड रीटेलिंग का व्यापारी अपने व्यापार केंद्र पर जितना निवेश करता है उसके मुकाबले किसान उसको बेचने के लिए इतना उत्पाद नहीं मुहैया करा रहा है कि रीटेलर को लाभ हो तो वह बेचे जाने वाले खेतिहर उत्पादों का आयात करके उसे उपभोक्ताओं को मुहैया कराएगा और इस तरह स्थानीय स्तर पर खेतिहर सामानों का मूल्य घटेगा।


· पिछले दो दशकों से एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृति वित्तीय झटके(मसलन वेतन आयोग के जरिए वेतनभोगी सरकारी कर्मचारियों के वेतन में तेज बढोत्तरी) के बाद खर्चे में कटौती के उपाय करने की रही है और इसके लिए खेती में किए जाने वाले निवेश और उसके विस्तार में कटौती की गई है लेकिन सब्सिडी में नहीं। साल १९७६-८० के बीच खेती को मिलने वाली सब्सिडी कृषिगत जीडीपी का ३ फीसदी थी जो साल २००१-०३ में बढ़कर ७ फीसदी हो गई।इसी अवधि में खेती में सरकारी निवेश कृषिगत जीडीपी के ४ फीसदी से घटकर २ फीसदी रह गया।ज्यादातर सब्सिडी खाद,बिजली और सिंचाई के पानी पर दी जाती है जबकि यह भी एक तथ्य है कि इन सारी चीजों प्राकृतिक संसाधनों की हानि होती है।


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