खेतिहर संकट

खेतिहर संकट

 

वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट-२००८ के अनुसार www.worldbank.org:


भारत में खेती के दायरे में विविधता लाना जरुरी है-फल और फूल उपजाने पर जोर दिया जाना चाहिए। इससे छोटे और सीमांत किसानों की आमदनी बढ़ायी जा सकती है क्योंकि भारत में उच्चतर मूल्य की फसलों मसलन फल और फूल का बाजार सालाना ६ फीसदी की दर से बढ़ रहा है।


साल १९६० में भूस्वामित्व की औसत इकाई का आकार २.६ हेक्टेयर था जो साल २००० में घटकर १.४ हेक्टेयर हो गया और आकार में घटती का क्रम आगे भी जारी है।


नई प्रौद्योगिकी यानी ई-गवर्नेंस के सहारे भ्रष्टाचार के बढ़ते दायरे पर अंकुश लगाया जा सकता है-कर्नाटक में जमीन के कागजात के कंप्यूटरीकरण के अनुभवों से ऐसा जाहिर होता है।


पंजाब में नाइट्रोजन जनित खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से पानी, भोजन और पशुचारे में नाइट्रेट तथा कीटनाशी रसायनों की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ गई है। खेती की बहुलतावादी पद्धति को अपनाना जरुरी है ताकि रसायनों पर खेती की निर्भरता कम की जा सके। बिजली, खाद तथा खेती में लगने वाली अन्य चीजों पर सब्सिडी देने का चलन है । इससे बड़े किसानों को फायदा होता है और वे खेती की मौजूदा पद्धति में किसी तरह के बदलाव की बात का विरोध करते हैं। पंजाब में बिजली पर बहुत ज्यादा सब्सिडी हासिल होने के कारण सिंचाई में भूजल का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है और इससे पंजाब के बहुतेरे इलाकों में भूमिगत जल का स्तर नीचे चला गया है। चावल का न्यूनतम खरीद मूल्य बढाने से चावल की खेती कीमत के लिहाज से आकर्षक बन पड़ी है लेकिन चावल की खेती में पानी की बहुत ज्यादा जरुरत होती है और इस वजह से भूमिगत जल का स्तर और नीचे गिर रहा है।


खेतिहर सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के लिहाज से शोध और विकास पर साल १९८१ में ०.१८ प्रतिशत का खर्च हुआ था जो बढ़कर साल २००० में ०३४ प्रतिशत हो गया। साल २००० में चीन ने कृषिगत शोध और विकास में ३१५० मिलियन डॉलर का खर्च किया जबकि भारत ने १८५८ मिलियन डॉलर। चीन का कृषिगत शोध और विकास पर खर्च भारत के मुकाबले लगभग दो गुना है।


प्रोफेसर उत्सा पटनायक द्वारा लिखित एगरेरियन क्राइसिस एंड डिस्ट्रेस इन रुरल इंडिया नामक दस्तावेज के अनुसार- जून 10, 2003, http://www.macroscan.net/fet/jun03/fet100603Agrarian%20Cri
sis_1.htm
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खेतिहर संकट के लिए सिर्फ सूखे की स्थिति को दोष नहीं दिया जा सकता । खेती में संकट के हालात १९९० के दशक से चले आ रहे हैं और सूखे के कारण यह स्थिति ज्यादा प्रत्यक्ष हो गई है।


साल १९८३ में भारत के ग्रामीण इलाके में प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति २३०९ किलो कैलोरी भोजन-ऊर्जा हासिल थी जो साल १९९८ में घटकर २०११ किलोकैलोरी हो गई। अगर इस तथ्य को ध्यान में रखें तो ग्रामीण भारत में संकट की स्थिति स्पष्ट हो जाती है।


एक तथ्य ये भी है कि इन सालों में अनाज के सरकारी गोदाम भरे हुए थे जबकि इन्ही सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता में कमी आयी। इससे संकेत मिलते में हैं कि ग्रामीण भारत के लोगों के पास खरीददारी की ताकत कम हुई और इसके फलस्वरुप ना खरीदा हुआ अनाज गोदामों में पड़ा रहा।

 

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