Resource centre on India's rural distress
 
 

खेतिहर संकट

खास बात

· घाटे का सौदा जानकर तकरीबन २७ फीसदी किसान खेती करना नापसंद करते हैं। कुल किसानों में ४० फीसदी का मानना है कि विकल्प हो तो वे खेती छोड़कर कोई और धंधा करना पसंद करेंगे। #

पिछले चार दशकों में भूस्वामित्व की ईकाइ का आकार ६० फीसदी घटा है। साल १९६०-६१ में भूस्वामित्व की ईकाइ का औसत आकार २.हेक्टेयर था जो साल २००२-०३ में घटकर .०६ हेक्टेयर रह गया।##

· पंजाब में नाइट्रोजन जनित उर्वरक और कीटनाशकों के भारी इस्तेमाल से पानी, खाद्यान्न और पशुचारे में नाइट्रटेट और कीटनाशी अवयवों का का संघनन खतरे की सीमा से ऊपर तक बढ़ा है ।*#

· साल १९९७ से २००६ के बीच १,६६,३०४ किसानों ने आत्महत्या की।*

किसानी के संकट की कई वजहों हैं, मसलन-घटती आमदनी, लागत ज्यादा फायदा कम, बढता कर्ज आदि।*

 

किसानी में व्याप्त संकट के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों ने आत्महत्या की।*

# सम आस्पेक्टस् ऑव फार्मिंग, २००३, सिचुएशन एसेसमेंट ऑव फार्मरस्,एनएसएस, ५९ वां दौर(जनवरी-दिसंबर २००३)

## सम आस्पेक्टस् ऑव ऑपरेशनल लैंड होल्डिंग इन इंडिया, २००३, रिपोर्ट संख्या-. 492(59/18.1/3), एनएसएस, ५९ वां दौर, (जनवरी-दिसंबर २००३)

अगस्त, २००६

*# वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट-एग्रीकल्चर फॉर डेवलपमेंट २००८, www.worldbank.org

* के नागराज(२००८): फार्मर्स् स्यूसाईड इन इंडिया,मैग्नीट्यूड एंड स्पैटियल पैटर्नस्,मैक्रोस्कैन।

एक नजर

कहा जा रहा है जिस मंदी ने पूरे विश्व को चपेट में ले रखा है उससे भारत अपने ग्रामीण बाजार की ताकत के कारण बच सका। हालांकि यह बाक सच है कि ग्रामीण भारत के भीतर उपभोक्ता बनने की अकूत संभावनाएं हैं लेकिन देश अभी इन संभावनाओं को साकार करने के आसपास भी नहीं पहुंचा है।राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार एक तिहाई किसानों को खेती नापसंद है और 40 फीसदी का कहना है कि अगर उनका बस चले तो वे खेती को छोड़ जीविका का कोई और ही रास्ता ढूंढ लें। किसानों के गिरते जीवन-स्तर का सबसे दर्दनाक बयान उनके कैलोरी-उपभोग के आंकड़ें करते हैं। साल 1983 में ग्रामीण आबादी में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन कैलोरी-उपभोग की मात्रा 2309 किलो कैलोरी थी जो साल 1998 में घटकर 2011 किलो कैलोरी हो गई यानी 15 सालों में कैलोरी उपभोग के मामले में 15 फीसदी की गिरावट आयी।

ये बात ठीक है कि ग्रामीण भारत में सोना और मोटरसाईकिल की खरीदारी को लेकर एक विचित्र ललक है और ये चीजें खास तौर से दहेज में देने के लिए खरीदी जाती हैं मगर यह खरीदारी गैर-खेतिहर आमदनी या फिर उधार के पैसों से होती है।प्रति व्यक्ति भूस्वामित्व की ईकाई का आकार भी घट रहा है। साल 1960 में प्रति किसान भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 2.6 हेक्टेयर था जो बांट-बखरे के कारण साल 2000 में घटकर 1.4 हेक्टेयर रह गया। खेती लगातार घाटे का सौदा बनते जा रही है।


मुंबईया फिल्मों में नजर आने वाले मगरूर जमींदार बस हमारी कल्पना की ऊपज बनकर रह गए हैं। जिन्हें धनी किसान(10 हेक्टेयर से ज्यादा की मिल्कियत वाले) कहा जाता है बेचारे उन गरीबों की भी तादाद बिहार और बंगाल जैसे निर्धन गिने जाने वाले राज्यों में एक फीसदी से कम और तुलनात्मक रुप से धनी माने जाने वाले राज्यों पंजाब और हरियाणा में 8 फीसदी है।जो बाकी बचे वे सारे किसान छोटे,मंझोले और सीमांत किसान की श्रेणी में आते हैं और गुजर-बसर लायक आमदनी जुटाने के लिए रोजाना की हाड़तोड़ मशक्कत पर मुनहस्सर हैं।

भारत में कृषि-योग्य भमि का 60 फीसदी हिस्सा सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भर है और इस जमीन पर अभी हरित क्रांति ने अपनी धानी चूनर नहीं लहरायी है। ये बात ठीक है कि पुराणकथा का दर्जा पा चुकी हरित क्रांति ने देशवासियों में भरोसा जगाया कि पेट भरने के लिए विदेशों का मुंह देखने की जरुरत नहीं है लेकिन इस पुराणकथा की सफलता की कहानी उन्हीं इलाकों में लिखी जा सकी जहां सिंचाई की सुविधा है और आकार के हिसाब से देखें तो हरित क्रांति के हिस्से में देश की कुल कृषि-योग्य भूमि का लगभग एक तिहाई हिस्सा आता है।हरित क्रांति वाले इलाकों में भी खेतिहर संकट पाँव पसार चुका है क्योंकि खेती में लागत ज्यादा है,भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जमीन की उर्वरा शक्ति छीज रही है और खेतिहर ऊपज का मोल भी कुछ खास उत्साहित करने वाला नहीं है। नतीजतन खाद्यान्न उत्पादन की जो वृद्धिदर अस्सी के दशक में 3.5 फीसदी थी वह घटकर नब्बे के दशक में 1.8फीसदी रह गई। अस्सी के दशक में किसानों की आतमहत्या की बात एकदम अनहोनी थी और कभी ये भी सोचा गया कि किसानों की आत्महत्या का मामला कुछ गरीब इलाकों का ही रोग-लक्षण है लेकिन अब बात एकदम बदल गई है और किसानों की आत्महत्या की खबरें पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक और केरल जैसे धनी और अग्रणी माने वाले राज्यों से भी आ रही हैं।

गरीब और सिंचाई के लिए वर्षाजल पर निर्भर रहने वाले किसानों का फायदा और भी कम हो गया है। खेतिहर लागत लगातार बढ़ते जा रही है और इस संकट पर सितम की हालत यह कि ना तो उनकी पहुंच में कोई वैज्ञानिक बीज भंडार मौजूद है और ना ही कर्ज लेने के लिए कोई भरोसेमंद संस्था।साथ में स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी सुविधाएं भी उन्हें नहीं मिल रहीं। भारत में किसानों को सब्सिडी दी जाती है और इस पर बड़ी तीखी टिपण्णियां की जाती हैं लेकिन ऑर्गनाइजेशन फॉर योरोपीयन इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन के देशों में किसानों को जितनी सब्सिडी हासिल है उससे तुलना करें तो पता चलेगा कि भारत के किसान को मिलने वाली सब्सिडी इन देशों के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी के शतांश भी नहीं है।(भारत में प्रति किसान सब्सिडी 66 डॉलर है जबकि जापान में 26 हजार डॉलर, अमेरिका में 21 हजार डॉलर और ऑर्गनाइजेशन फॉर योरोपीयन इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन के देशों में 11 हजार डॉलर)

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बुजुर्गों की आबादी पर केंद्रित नई सरकारी रिपोर्ट [inside]एल्डरली इन इंडिया: प्रोफाइल एंड प्रोग्राम्स 2016 के महत्वपूरण तथ्य[/inside]---

 

• लगभग सात करोड़ तीस लाख यानि देश की 71 फीसद बुजुर्ग आबादी गांवों में रहती है जबकि 3 करोड़ 60 हजार की की संख्या में बुजुर्ग आबादी(कुल का 29 प्रतिशत) शहरी इलाकों में रहती है.

 

•  साल 2001 से 2011 के बीच बुजुर्ग आबादी की वृद्धि 35.5 प्रतिशत रही जबकि इसके पिछले दशक में बुजुर्ग आबादी में बढोत्तरी 25.2 प्रतिशत हुई थी. आम आबादी 2001-2011 के बीच 17.7 प्रतिशत बढ़ी जबकि इसके पहले के दशक में आम आबादी में 21.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई थी. 

 

• साल 1961 से 2011 के बीच ग्रामीण भारत में बुजुर्ग आबादी की तादाद 5.8 प्रतिशत से बढ़कर 8.8 प्रतिशत तथा शहरी भारत में 4.7 प्रतिशत से बढ़कर 8.1 प्रतिशत हो गई है. 

 

• जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 0-14 आयु-वर्ग की आबादी में 1971 तक बढ़ोत्तरी हुई लेकिन इसके बाद के दशकों में धीरे-धीरे कमी होती गई.  साल 2011 में 0-14 आयु-वर्ग के लोगों की संख्या कुल आबादी में 30.8 प्रतिशत थी. बुजुर्गों की आबादी में 1951 से बढोत्तरी हो रही है और साल 2011 में यह बढोत्तरी 8.6 प्रतिशत पर पहुंच गई है. काम करने योग्य उम्र(15-59 वर्ष) के लोगों की संख्या 1971 से बढ़ रही है और इस आयु-वर्ग के लोगों की संख्या 2011 में कुल आबादी का 60.3 प्रतिशत थी. 

 

• प्रांतवार देखें तो केरल की आबादी में बुजुर्ग लोगों की तादाद सबसे ज्यादा(12.6प्रतिशत) है. इसके बाद गोवा(11.2 प्रतिशत) और तमिलनाडु(10.4 प्रतिशत) का स्थान है. इसकी वजह जीवनशैली और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं हो सकती हैं. 

 

•देश के कुल 68.7 प्रतिशत परिवार या कह लें घरों कोई भी व्यक्ति 60 साल या इससे ज्यादा उम्र का नहीं है. ग्रामीण भारत में 67.5 प्रतिशत घरों में तथा शहरी भारत में 71.2 प्रतिशत घरों में कोई भी व्यक्ति 60 साल या इससे ज्यादा उम्र का नहीं है. देश के तकरीबन 21.6 प्रतिशत घरों में कोई एक व्यक्ति 60 साल या इससे ज्यादा उम्र का है जबकि 9.9 प्रतिशत घरों में दो व्यक्ति इस उम्र के हैं.

 

• 2011 की जनगणना के मुताबिक आम आबादी के लिए लिंगानुपात(प्रति 1 हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या) 943 है जबकि बुजुर्ग आबादी के लिए लिंगानुपात 1033 है. 1951 में भी तकरीबन यही स्थिति थी जब आम आबादी में लिंगानुपात प्रति हजार पुरुषों पर 946 स्त्रियों का था और बुजुर्ग आबादी में 1028 स्त्रियों का. 

 

• नई जनगणना(2011) से पता चलता है कि बुजुर्ग आबादी के बीच विवाहित महिलाओं की संख्या विवाहित पुरुषों की तुलना में कम है. 70 साल की उम्र के बाद 60 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं विधवा हो जाती हैं. 

 

• भारत में आयु-प्रत्याशा शहरी और ग्रामीण दोनों ही इलाके में बढ़ी है. सन् 1970-75 में ग्रामीण इलाके में किसी नवजात की आयु-प्रत्याशा 48 वर्ष की थी जो 2009-13 में बढ़कर 66.3 वर्ष हो गई है, शहरी इलाके में यह वृद्धि 58.9 वर्ष से बढ़कर 71.2 साल पर आ पहुंची है. ग्रामीण भारत के 60 साल की उम्र वाले लोगों के लिए आयु-प्रत्याशा 197-75 में 13.5 वर्ष की थी जो 2009-13 में बढ़कर 17.5 साल की हो गई है. शहरी भारत के 60 साल की उम्र वाले लोगों की लिए यह आंकड़ा 15.7 वर्ष से बढ़कर 19.1 साल का हो गया है. 

 

• 60 साल की उम्र वालों के लिए सर्वाधिक आयु-प्रत्याशा वाला राज्य पंजाब है जहां इसका आंकड़ा पुरुषों के लिए 19.3 वर्ष का है. 60 वर्ष की आयु वाले लोगों के लिए सबसे कम आयु-प्रत्याशा वाले राज्य असम और मध्य प्रदेश हैं जहां आंकड़ा 15.4 वर्ष का है. 60 साल की उम्र की महिलाओं के लिए सर्वाधिक आयु-प्रत्याशा वाला राज्य केरल(21.6 वर्ष) है और बिहार इस उम्र की महिलाओं के लिए सबसे कम आयु-प्रत्याशा(17.5 वर्ष) वाला राज्य.

 

• 2011 की जनगणना के मुताबिक ग्रामीण भारत में 66.4 प्रतिशत बुजुर्ग पुरुष और 28.4 प्रतिशत बुजुर्ग महिलाएं मुख्य या सीमांत कामगार के रुप में आर्थिक गतिविधियों में भाग लेते हैं. शहरों में बुजुर्ग पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 46.1 प्रतिशत का और बुजुर्ग महिलाओं के लिए 11.3 प्रतिशत का है. साल 2001 से 2011 के बीच शहरी और ग्रामीण भारत में आर्थिक गतिविधि में भाग लेने वाली महिलाओं का अनुपात बढ़ा है. 

 

• बुजुर्ग महिलाओं में साक्षरता-दर(28प्रतिशत) बुजुर्ग पुरुषों की साक्षरता-दर(59फीसद) की तकरीबन आधा है. 

 

• शहरी इलाकों में 30.3 प्रतिशत बुजुर्ग व्यक्ति माध्यमिक स्तर तक शिक्षित हैं जबकि ग्रामीण भारत में ऐसे बुजुर्गों की तादाद 7.1 प्रतिशत है. 

 

• 2011 की जनगणना के मुताबिक बुजुर्ग आबादी को दो तरह के रोग सबसे ज्यादा है- एक तो दृष्टि संबंधी और दूसरे चलने-फिरने से सबंधित.  

 

• गांवों में 5.59 प्रतिशत और शहरों में 4.18 प्रतिशत बुजुर्ग एक ना एक तरह की (रोगजन्य) असमर्थता से पीड़ित हैं.

 

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राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के 70 वें दौर की गणना पर आधारित [inside]की इंडीकेटर्स ऑफ एग्रीकल्चरल हाऊसहोल्ड इन इंडिया[/inside]( जनवरी-दिसंबर 2013, प्रकाशित 2015 जनवरी) नामक रिपोर्ट के तथ्यों के अनुसार-

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/Situation%20Assessment%20Survey%20of%20Agricultural%20Households%20in%20NSS%2070th%20Round.pdf

 

--- वर्ष 2012 के जुलाई से 2013 के जून महीने के बीच देश में तकरीबन 90.2 मिलियन खेतिहर परिवार थे। खेतिहर परिवारों की संख्या कुल ग्रामीण परिवारों की संख्या का 57.8 प्रतिशत है।

---- उत्तरप्रदेश में देश के कुल खेतिहर परिवारों की 20 प्रतिशत तादाद रहती है। यूपी में खेतिहर परिवारों की संख्या 18.05 है। राजस्थान के ग्रामीण परिवारों में खेतिहर परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा (78.4 प्रतिशत) है। उत्तरप्रदेश के ग्रामीण परिवारों के बीच खेतिहर परिवारों की संख्या 74.8 प्रतिशत है जबकि मध्यप्रदेश में 70.8 प्रतिशत।

---- केरल में ग्रामीण परिवारों के बीच खेतिहर परिवारों की संख्या सबसे कम (27.3 प्रतिशत) है। तमिलनाडु के ग्रामीण परिवारों के बीच खेतिहर परिवारों की तादाद 34.7 प्रतिशत है जबकि आंध्रप्रदेश में 41.5 प्रतिशत।

---- सर्वेक्षण की अवधि के दौरान देश के लगभग 45 प्रतिशत खेतिहर परिवार ओबीसी समुदाय के थे जबकि 16 प्रतिशत खेतिहर परिवार अनुसूचित जाति के और 13 प्रतिशत खेतिहर परिवार अनुसूचित जनजाति समुदाय के थे।

---- सर्वेक्षण की अवधि में 45 प्रतिशत ग्रामीण परिवार ओबीसी समुदाय के थे जबकि 20 प्रतिशत परिवार अनुसूचित जाति के और 12 प्रतिशत ग्रामीण परिवार अनुसूचित जनजाति के थे।

--- सर्वेक्षण में तकरीबन 63.5 प्रतिशत खेतिहर परिवारों ने खेती को अपनी आमदनी का प्रमुख स्रोत बताया जबकि 22 प्रतिशत खेतिहर परिवारों ने मजदूरी को अपनी आमदनी का प्रधान स्रोत बताया।

---- जिन खेतिहर परिवारों की मालकियत में 0.01 हैक्टेयर या उससे कम जमीन थी उनमें से 56 प्रतिशत ने कहा कि हमारी आमदनी का प्रमुख स्रोत मजदूरी है जबकि 23 प्रतिशत का कहना था कि उनकी आमदनी का प्रमुख स्रोत पशुपालन है।

---- जिन खेतिहर परिवारों की मालकियत में 0.40 हैक्टेयर से ज्यादा की जमीन थी उनमें से ज्यादातर ने खेती को अपनी आमदनी का प्रधान स्रोत बताया  जिन खेतिहर परिवारों के पास -------- 0.01  से  0.04 हैक्टेयर की जमीन थी उन्होंने खेती(42 प्रतिशत) तथा मजदूरी (35 प्रतिशत) दोनों को अपनी आमदनी का प्रधान स्रोत बताया।.

----- केरल को छोड़कर अन्य सभी बड़े राज्यों में खेती और पशुपालन तथा अन्य कृषिगत गतिविधियां ज्यादातर खेतिहर परिवारों के लिए आमदनी का प्रमुख स्रोत हैं। केरल में 61 प्रतिशत खेतिहर परिवार अपनी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा गैर-खेतिहर कामों से अर्जित करते हैं।

----- असम, छत्तीसगढ़ तथा तेलंगाना के 80 प्रतिशत से ज्यादा खेतिहर परिवारों ने खेती-बाड़ी को अपनी आमदनी का प्रमुख जरिया बताया। राजस्थान में हालांकि 78 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण परिवार खेतिहर हैं तो भी वहां सिर्फ 47 प्रतिशत खेतिहर परिवारों ने अपनी आमदनी का प्रमुख जरिया खेती-बाड़ी को बताया।

----- मध्यप्रदेश के 78 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के लिए खेती-बाड़ी ही आमदनी का प्रमुख जरिया है जबकि वहां 71 प्रतिशत से कम ग्रामीण परिवार खेतिहर हैं।

----- तमिलनाडु, गुजरात, पंजाब तथा हरियाणा के 9 प्रतिशत खेतिहर परिवारों ने पशुपालन को आमदनी का प्रमुख स्रोत बताया।

----- देश के तकरीबन 93 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के पास घराड़ी की जमीन के अतिरिक्त भी किसी ना किसी तरह की जमीन है जबकि 7 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के पास सिर्फ घराड़ी की जमीन है।

----- देश के ग्रामीण अंचलों में तकरीबन 0.1 प्रतिशत परिवार भूमिहीन हैं। जिन खेतिहर परिवारों के पास 0.01 हैक्टेयर से कम जमीन है उनमें से 70 प्रतिशत परिवारों के पास सिर्फ घराड़ी की जमीन है।

----- देश के तकरीबन 12 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के पास सर्वेक्षण के अवधि में राशनकार्ड नहीं थे। तकरीबन 36 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के पास बीपीएल श्रेणी का राशन कार्ड सर्वेक्षण अवधि में पाया गयाय़ 5 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के पास अंत्योदय श्रेणी का राशन कार्ड था।

----- खेती, पशुपालन, गैर-खेतिहर काम तथा मजदूरी को आपस में मिलाकर देखें तो इन सभी स्रोतों से खेतिहर परिवारों को सर्वेक्षण अवधि में औसतन मासिक आमदनी.6426/ रुपये की थी। सर्वेक्षण अवधि के दौरान खेतिहर परिवारों की आमदनी में खेती तथा पशुपालन से प्राप्त आय का इस मासिक आमदनी में 60 प्रतिशत का योगदान था। आमदनी का तकरीबन 32 प्रतिशत हिस्सा मजदूरी से आ रहा था।

----- सर्वेक्षण अवधि में अखिल भारतीय स्तर पर खेतिहर परिवारों का औसत मासिक व्यय.6223/ रुपये पाया गया।

----- देश के तकरीबन 52 प्रतिशत खेतिहर परिवार कर्जे में हैं। ऐसे हर खेतिहर परिवार पर औसतन 47000/ रुपये का कर्ज है।-

----- आंध्रप्रदेश में तकरीबन 92.9 प्रतिशत खेतिहर परिवारों पर कर्ज है जबकि तेलंगाना में 89.1 प्रतिशत तथा तमिलनाडु में 82.5 प्रतिशत खेतिहर परिवार कर्जे में हैं। असम (17.5 प्रतिशत), झारखंड (28.9 प्रतिशत), छत्तीसगढ़ (37.2 प्रतिशत) में कर्जदार खेतिहर परिवारों की संख्या आंध्रप्रदेश की तुलना में कम है।

---- केरल में खेतिहर परिवारों के ऊपर सबसे ज्यादा कर्ज (.213600/- रुपये) है। इसके बाद आंध्रप्रदेश के खेतिहर परिवारों का नंबर है जहां कर्जदार खेतिहर परिवार पर औसतन 123400 रुपये का कर्ज है।  पंजाब में कर्जदार खेतिहर परिवारों के ऊपर 119500 रुपये का कर्ज है जबकि असम में ऐसे परिवारों के ऊपर 3400 रुपये का तथा झारखंड में ऐसे परिवारों के ऊपर 5700 रुपये का कर्ज है। छत्तीसगढ़ के कर्जदार खेतिहर परिवारों के ऊपर 10200 रुपये का कर्ज है। 

 

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सीएसडीएस(लोकनीति) द्वारा प्रस्तुत स्टेट ऑफ इंडियन फार्मर्स: ए रिपोर्ट (2014) नामक अध्ययन देश के 18 राज्यों में दिसंबर 2013 से जनवरी 214 के बीच 137 जिलों के 274 गांवों में कराए गए सर्वेक्षण पर आधारित है। इस अध्ययन के अनुसार
• सर्वेक्षित 83 फीसदी किसानों ने खेती को अपना मुख्य पेशा बताया जबकि 79 फीसदी का कहना था कि खेती उनके आय-उपार्जन का मुख्य साधन है। शेष का कहना था कि उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा गैर-खेतिहर कामों से हासिल होता है।
•    90 फीसदी किसानों ने खेती करने की वजह बताते हुए कहा कि यह पेशे के रुप में पुश्तैनी रुप से चला आ रहा है जबकि 10 फीसदी किसानों ने हाल ही में खेती-बाड़ी को अपना पेशा बनाया था।
•    राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 59 वें दौर की गणना पर आधारित सिच्युएशन असेसमेंट सर्वे ऑफ फार्मर्स, 2003 नामक अध्ययन में कहा गया था कि 60 फीसदी किसान परिवार अपने किसानी के पेशे को पसंद करते हैं जबकि 40 फीसदी किसान परिवार विकल्प होने की स्थिति में उसे छोड़ना पसंद करेंगे। सीएसडीएस के सर्वे से भी इस बात की पुष्टी होती है। सीएसडीएस के उपर्युक्त सर्वे के अनुसार तीन चौथाई किसान अपने पेशे को छोड़ना चाहते हैं।
•    मध्य भारत के 84 फीसदी किसान अपने किसानी के पेशे को पसंद करते हैं जबकि उत्तर और पूर्वी भारत में ऐसे किसानों की तादाद क्रमश 67 और 69 प्रतिशत है। जब इन किसानों से पूछा गया कि क्या आप किसानी के पेशे को पसंद करते हैं तो 72 फीसदी ने हां में उत्तर दिया जबकि 22 प्रतिशत ने स्पष्ट स्वर में ना कहा।
खेती को नापसंद करने के कारण
•  भूमिहीन किसानों ने खेती के पेशे को सर्वाधिक संख्या में नापसंद किया जबकि सर्वे में भूस्वामित्व का आकार बढ़ने के साथ किसानों में खेती को पसंद करने की प्रवृति देखी गई।
•   अच्छी आमदनी का अभाव खेती को नापसंद करने का प्रमुख कारण है। तकरीबन 36 प्रतिशत किसानों ने इसे खेती को नापसंद करने की वजह बताया। 18 प्रतिशत किसानों ने कहा कि परिवार के दबाव में आकर वे किसानी कर रहे हैं। 16 प्रतिशत ने कहा कि किसानों में वे अपना कोई भविष्य नहीं देखते। 9 प्रतिशत का कहना था कि वे कोई और काम करना चाहते हैं जबकि 8 प्रतिशत किसानों का कहना था कि खेती में जोखिम और मेहनत ज्यादा है इसलिए वे खेती करना पसंद नहीं करते।
खेती-बाड़ी के काम में परिवार के अन्य सदस्यों की प्रतिभागिता
•    66 फीसदी किसानों ने कहा कि परिवार की महिलाएं भी खेती के काम में भागीदारी करती हैं। बड़ी जोत वाले किसानों के बीच यही आंकड़ा 73 फीसदी का है जबकि भूमिहीन किसानों में 42 फीसदी का।

फसल उपजाने का तरीका
•    46 प्रतिशत किसानों ने कहा कि वे साल में दो फसलों को उपजाते हैं जबकि 28 प्रतिशत किसानों ने कहा कि वे साल में दो से ज्यादा फसल उपजाते हैं। 26 प्रतिशत किसानों का कहना था कि वे साल में एक फसल उपजाते हैं। इस आंकड़े में क्षेत्रवार बहुत ज्यादा भिन्नता पायी गई।
•   सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि 60 प्रतिशत किसान धान-गेहूं की खेती करते हैं जबकि 41 प्रतिशत किसानों ने सर्वेक्षण में धान की खेती को अपने लिए प्रमुख बताया, 21 प्रतिशत किसानों का कहना था कि वे मुख्य फसल के तौर पर गेहूं उपजाते हैं।
बीज
•    70 प्रतिशत किसान परंपरागत या स्थानीय तौर पर उपलब्ध बीजों का इस्तेमाल करते हैं। जब पूछा गया कि क्या आप संकर बीजों का इस्तेमाल करना चाहेंगे तो 63 प्रतिशत किसानों ने हां में जवाब दिया। मात्र 4 प्रतिशत किसानों ने कहा कि वे आनुवांशिक रुप से प्रवर्धित बीज(जीएम सीड्स) का इस्तेमाल करते हैं।
•   36 प्रतिशत किसानों की राय थी कि संकर बीज स्थानीय बीजों की तुलना में ज्यादा फायदेमंद हैं। 18 प्रतिशत किसानों की राय इसके विपरीत थी। 32 प्रतिशत किसानों ने स्थानीय और संकर बीज दोनों को फायदेमंद माना।
उर्वरक
•    सर्वेक्षित 40 फीसदी किसानों ने कहा कि वे रासायनिक और जैविक दोनों ही तरह के उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं। 35 प्रतिशत का कहना था कि वे सिर्फ रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं जबकि 16 प्रतिशत का कहना था कि वे सिर्फ जैविक उर्वरक का प्रयोग करते हैं।
कीटनाशक
•   सर्वेक्षण के दौरान यह पूछने पर कि आपलोग कीटनाशकों का इस्तेमाल किस हद तक करते हैं, 18 प्रतिशत का कहना था कि वे नियमित तौर पर कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं जबकि 28 प्रतिशत ने कहा कि वे समय-समय पर कीटनाशकों का उपयोग करते हैं जबकि 30 प्रतिशत का कहना था कि जरुरत पड़ने पर ही वे कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं।13 फीसदी किसानों ने कहा कि वे कभी भी खेती में कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करते।
•    54 प्रतिशत छोटे किसानों ने कहा कि वे कीटनाशकों को इस्तेमाल नियमित रुप से करते हैं। मंझोले किसानों में कीटनाशकों का प्रयोग करने वालों की संख्या 27 प्रतिशत जबकि बड़े किसानों में 10 प्रतिशत थी।
सिंचाई
•    सर्वेक्षित किसानों में केवल 40 प्रतिशत ने कहा कि उनके हिस्से की समूची कृषि-भूमि के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। सिंचाई के साधन के रुप में उपयोग किए जाने वाले तरीके में सर्वाधिक प्रचलन पंप, बोरिंग वेल और ट्यूब वेल है। 45 प्रतिशत किसानों ने इन्हें ही सिंचाई का प्रधान साधन बताया। 38 प्रतिशत किसानों का कहना था कि उनके खेतों में सिंचाई के लिए गांव तक नहर की सुविधा उपलब्ध है। सिंचाई के परंपरागत साधन जैसे तालाब और कुएं अब भी महत्वपूर्ण हैं। 34 प्रतिशत किसान सिंचाई के लिए कुएं पर जबकि 30 प्रतिशत किसान सिंचाई के लिए तालाब पर आश्रित हैं। केवल 18 प्रतिशत किसानों ने कहा कि सिंचाई के लिए उन्हें सरकारी ट्यूब वेल हासिल है।
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एनसीईयूएस यानी नेशनल कमीशन फॉर इन्टरप्राइजेज इन द अन-ऑर्ग्नाइज्ड सेक्टर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट [inside]ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रोमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf


· साल २००० की राष्ट्रीय कृषि नीति में कहा गया कि खेती अपेक्षाकृत अलाभकर पेशा बन गई है क्योंकि खेतिहर उपज का लाभकर मूल्य नहीं मिलता और इसकी वजह से लोग खेती-बाड़ी का धंधा छोड़कर तेजी से शहरों का रुख कर रहे हैं। की वजहों से यह स्थिति पैदा हुई है। परंपरागत खेती में नकदी फसलों को उपजाने का रुझान बढ़ा है,वैश्विक बाजार में मूल्यों के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ रहा है। खेती में इस्तेमाल होने वाले साजो-सामान की कीमतें ज्यादा हैं । इससे खेती में लागत ज्यादा है और किसानों को कर्ज लेना पड़ रहा है,जोखिम ज्यादा है, लाभ की स्थितियां कम रह गई हैं और सरकारी मदद भी धीरे धीरे घट रही है।

 

• जब देश की श्रमशक्ति का 92 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है(इसमें जो लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं उनकी गणना तो की ही गई है साथ में उनकी भी गिनती की गई है जो संगठित क्षेत्र में हैं लेकिन बतौर अनुबंध के काम करते हैं),तो फिर यह बात भी स्वाभाविक है कि समाज के गरीब और कमजोर तबके के लोग भी सबसे ज्यादा इसी हिस्से से होंगे जिन्हें हम अपनी सुविधानुसार आम आदमी कहकर पुकारते हैं।

• संपत्ति की कमी और भूमिहीनता- इन दो बड़ी वजहों से ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूर खेतिहर श्रमिक के तौर पर काम करने के लिए बाध्य होते हैं।साल 2004-05 में खेतिहर मजदूरों में भूमिहीनों की तादाद 19.7 फीसदी थी।

• तकरीबन 86 फीसदी सीमांत और छोटे किसान लगभग 43 फीसदी कृषिभूमि पर खेती-बाड़ी करते हैं जबकि 14 फीसदी मंझोले और बड़े किसान 37 फीसदी कृषिभूमि पर खेती-बाड़ी का काम करते हैं।

• हिन्दू समुदाय के भीतर गिने जाने वाले अनुसूचित जनजाति के 40 फीसदी खेतिहर मजदूर गरीबी रेखा से नीचे हैं। इसके बाद गरीबी-रेखा के नीचे आनेवालों में मुसलिम खेतिहर मजदूरों का नंबर है जिनकी तादाद 31.5 फीसदी है जबकि हिन्दू समुदाय के अनुसूचित जाति के खेतिहर मजदूरों में 31 फीसदी तादाद गरीबी रेखा से नीचे है।

• अनुसूचित जाति(हिन्दू) और अन्य पिछड़ा वर्ग(मुसलिम) में सबसे ज्यादा भूमिहीनता है जबकि उच्च जाति के हिन्दू समुदाय में भूमिहीनता सबसे कम है।

• असंगठित क्षेत्र के 79 फीसदी कामगार, अनुसूचित जाति-जनजाति के 88 फीसदी कामगार, ओबीसी(अन्य पिछड़ा वर्ग) की आबादी का 80 फीसदी हिस्सा और मुसलिम समुदाय का 84 फीसदी हिस्सा गरीब या फिर जीविका के लिहाज से कमजोर स्थिति में है। इन सारे समूहों को सिर्फ पेट भर पाने लाएक हासिल हो पाता है, इन्हें विरले ही काम मिल पाता है और फिर सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से भी आबादी का हिस्सा बड़ी दयनीय दशा में है।इन्हें बड़ी दयनीय दशा में काम करना पड़ता है, काम का परिवेश अस्वास्थ्यकर और असहनीय है जबकि ठीक इसी स्थिति के बीच भारत में 1990 के दशक से आर्थिक-वृद्धि की बात कही जा रही है।

 

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के नागराज द्वारा प्रस्तुत अध्ययन (२००८) -[inside]फार्मरस् स्यूसाइड इन इंडिया,मैग्नीट्यूडस् ट्रेन्डस् एंड स्पैशियल पैटर्नस्[/inside] में कहा गया है कि-

http://www.macroscan.com/anl/mar08/pdf/Farmers_Suicides.pdf

 

· राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अन्तर्गत किसानों की दशा के मूल्यांकन के लिए एक सर्वेक्षण द सिचुएशन एसेसमेंट सर्वे ऑव फारमरस् नाम से हुआ। इससे पता चला गया कि देश के चालीस फीसदी किसान खेती-बाड़ी के काम को पसंद नहीं करते हैं और उनकी राय थी कि अगर कोई विकल्प हो तो वे किसानी को छोड़कर कोई और धंधा कर लेंगे। २७ फीसदी किसानों ने सर्वेक्षण में कहा कि खेती लाभकर धंधा नहीं है और आठ फीसदी किसानों का कहना था कि खेती का काम जोखिम भरा है जबकि अन्य पांच फीसदी किसानों को खेती किसी दूसरे कारण से नापसंद थी।


· किसानों की आत्महत्या की घटनाएं महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब और मध्यप्रदेश (इसमें छत्तीसगढ़ शामिल है) में हुईं।

 

· साल १९९७ से लेकर २००६ तक यानी १० साल की अवधि में भारत में १६६३०४ किसानों ने आत्महत्या की। यदि हम अवधि को बढ़ाकर १२ साल का करते हैं यानी साल १९९५ से २००६ के बीच की अवधि का आकलन करते हैं तो पता चलेगा कि इस अवधि में लगभग २ लाख किसानों ने आत्महत्या की। एक बात और, इस सिलसिले में सरकारी तौर पर सटीक आंकड़ा १९०७५३ किसानों आत्महत्या का है लेकिन इस आंकड़े सटीक मानकर स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें तमिलनाडु और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों तथा पांडिचेरी जैसे कई छोटे राज्यों में हुई किसान-आत्महत्या की घटनाओं को नहीं जोड़ा गया है।


· आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से पिछले एक दशक में औसतन सोलह हजार किसानों ने हर साल आत्महत्या की। आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी जाहिर होगा कि देश में आत्महत्या करने वाला हर सांतवां व्यक्ति किसान था।


· साल १९९८ में किसानों की आत्महत्या की संख्या में तेज बढ़ोत्तरी हुई। साल १९९७ के मुकाबले साल १९९८ में किसानों की आत्महत्या में १४ फीसदी का इजाफा हुआ और अगले तीन सालों यानी साल २००१ तक हर साल लगभग सोलह हजार किसानों ने आत्महत्या की।


· साल २००२ से २००६ के बीच यानी कुल पांच साल की अवधि पर नजर रखें तो पता चलेगा कि हर साल औसतन १७५१३ किसानों ने आत्महत्या की और यह संख्या साल २००२ से पहले के पांच सालों में हुई किसान-आत्महत्या के सालाना औसत(१५७४७) से बहुत ज्यादा है। साल १९९७ से २००६ के बीच किसानों की आत्महत्या की दर (इसकी गणना प्रति एक लाख व्यक्ति में घटित आत्महत्या की संख्या को आधार मानकर होती है) में सालाना ढाई फीसद की चक्रवृद्धि बढ़ोत्तरी हुई।


· अमूमन देखने में आता है कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा है और यही बात किसानों की आत्महत्या के मामले में भी लक्ष्य की जा सकती है लेकिन तब भी यह कहना अनुचित नहीं होगा कि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में पुरुषों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा थी।देश में कुल आत्महत्या में पुरुषों की आत्महत्या का औसत ६२ फीसदी है जबकि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में पुरुषों की तादाद इससे ज्यादा रही।


· साल २००१ में देश में किसानों की आत्महत्या की दर १२.९ फीसदी थी और यह संख्या सामान्य तौर पर होने वाली आत्महत्या की घटनाओं से बीस फीसदी ज्यादा है।साल २००१ में आम आत्महत्याओं की दर (प्रति लाख व्यक्ति में आत्महत्या की घटना की संख्या) १०.६ फीसदी थी। आशंका के अनुरुप पुरुष किसानों के बीच आत्महत्या की दर (१६.२ फीसदी) महिला किसानों (.२ फीसदी) की तुलना में लगभग ढाई गुना ज्यादा थी।


· साल २००१ में किसानों की आत्महत्या की सकल दर १५.८ रही।यह संख्या साल २००१ में आम आबादी में हुई आत्महत्या की दर से ५० फीसदी ज्यादा है।पुरुष किसानों के लिए यह दर १७.७ फीसदी रही यानी महिला किसानों की तुलना में ७५ फीसदी ज्यादा।

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[inside]योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार[/inside]-http://planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v3/11th_vol3.pdf


दसवीं पंचवर्षीय योजना के मध्यावधि आकलन के दौरान पता चला कि १९९० के दशक के मध्यवर्ती सालों में खेती और उससे जुड़े क्षेत्रों की बढ़ोत्तरी कमती चली गई। दरअसल,पिछले एक दशक या फिर उससे ज्यादा सालों से भारत में खेती को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।भोजन की उपलब्धता,किसानों की आमदनी और गरीबी से जुड़े निम्नलिखित ताजा रुझान चिन्ता जगाने वाले हैं-


· खेती की बढ़ोत्तरी की दर में कमी ।


· सिंचाई के साधन वाले भूमि क्षेत्र और सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर भूमि क्षेत्र के बीच आर्थिक असमानता बढ़ रही है।


· व्यापारिक उदारीकरण के बाद विश्व-बाजार में मूल्यों का तेज उतार-चढ़ाव।इससे कपास और तेलहन का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को घाटा उठाना पड़ा है।


· प्रौद्योगिकी का असमान और धीमी गति से विकास।


· मौजूद प्रौद्योगिकी का कारगर इस्तेमाल नहीं हो पाना।


· समुचित प्रोत्साहन का ना मिलना और कारगर संस्थाओं का अभाव।


· प्राकृतिक संसाधन-आधार का लगातार क्षय होना।


· भूमिगत जल के स्तर में तेजी से कमी। इससे सीमांत और छोटे किसानों को विशेष रुप से घाटा उठाना पड़ रहा है।


· सकल घरेलू उत्पाद और शहरीकरण के कारण खेतिहर भूमि और पानी की मांग का गैर-खेतिहर क्षेत्रों में बढ़ना।


· ऊपर बताये गए कारणों से किसानी पर संकट गहराया है।इसका एक प्रमाण सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में खेती के हिस्से का लगातार घटते जाना है।साल १९८१-८२ से १९९६-९७ के बीच कृषिगत जीडीपी की सालाना बढ़ोत्तरी साढ़े तीन प्रतिशत थी जो साल १९९७-९८ से २००४-०५ के बीच सालाना महज दो फीसदी रह गई।गिरावट का यह रुझान सबसे ज्यादा उन इलाकों में दिखा जहां खेती की सिंचाई वर्षाजल पर निर्भर है लेकिन कमोबेश यह घटना हर राज्य में घटी और कृषि से जुड़े हर क्षेत्र (बागवानी,पशुधन और मछलियों की उगाही) में इस गिरावट को लक्ष्य किया गया।


· नवीं और दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषिगत जीडीपी में बढ़ोत्तरी का लक्ष्य ४ फीसदी का रखा गया था लेकिन बढ़वार इससे कम रही।दसवीं पंचवर्षीय योजना में कृषिगत जीडीपी की औसत बढ़ोत्तरी नवीं पंचवर्षीय योजना से भी कम रही।दसवीं पंचवर्षीय योजना के पहले तीन सालों यानी २००२-०३ से २००४-०५ के बीच कृषिगत जीडीपी की बढ़ोत्तरी की दर महज एक फीसदी रही।


· खेतिहर उत्पादों के आपूरति पक्ष पर भी कई बातों का बुरा इसर पड़ा। परस्पर संबद्ध इन बातों में शामिल है-प्राकृतिक संसाधन(वर्षा सहित),प्रौद्योगिकी,बुनियादी ढांचा(सिंचाई के साधन सहित) और आर्थिक परिवेश जिसमें मूल्यों के सूचकांक और धनदाता संस्थाएं शामिल है।


· खेतिहर संकट का एक बड़ा कारण हाल के बरसों में व्यापारिक विनिमय दर(टर्मस् ऑव ट्रेड-दो देश जब आपस में व्यापार करते हैं तो इसकी गणना में यह देखा जाता है कि किसी एक वस्तु या सेवा के मोल की तुलना में किसी दूसरी वस्तु या सेवा का मोल कितना है।देखें यह लिंक-http://tutor2u.net/economics/content/topics/trade/terms_of_trade.htm) का खेती के खिलाफ चले जाना है।१९८० से १९९७ के बीच टर्मस् ऑव ट्रेड खेती के पक्ष में था लेकिन १९९९ से यह खेती के खिलाफ चला गया और आजाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि जब खेतिहर उत्पादन गिरा उसी समय खेतिहर उत्पादों के मोल में भी गिरावट आयी।

 

· इससे किसानों की आमदनी में कमी तो आयी ही,उनके ऊपर कर्ज का बोझ भी बढ़ा। आज किसान पहले की अपेक्षा ज्यादा जोखिम की दशा में हैं क्योंकि उदारीकरण से पहले खेतिहर उत्पादों के मूल्य में जितने उतार-चढ़ाव के वे आदी थे उसकी तुलना में विश्व बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव आज कहीं ज्यादा है।


· खेतिहर उत्पादों के लिहाज से देखें तो बाजार की संस्थाओं के भीतर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आधुनिक फूड रीटेलिंग के रुप में हुआ है।इसके भीतर मार्केंटिंग की लागत और उत्पाद की बर्बादी को कम करने की संभावना है। उपभोक्ताओं को फूड रीटेलिंग के कारोबारी अपेक्षाकृत सस्ती कीमत पर सामान मुहैया कराते हैं और किसान को भी बिचौलियों की अनुपस्थिति में अपने उत्पाद की तुलनात्मक रुप से अच्छी कीमत मिल जाती है।फूड रीटेलिंग के आधुनिक तरीके में एक दिक्कत निवेश से जुड़ी है।फर्ज करें कि फूड रीटेलिंग का व्यापारी अपने व्यापार केंद्र पर जितना निवेश करता है उसके मुकाबले किसान उसको बेचने के लिए इतना उत्पाद नहीं मुहैया करा रहा है कि रीटेलर को लाभ हो तो वह बेचे जाने वाले खेतिहर उत्पादों का आयात करके उसे उपभोक्ताओं को मुहैया कराएगा और इस तरह स्थानीय स्तर पर खेतिहर सामानों का मूल्य घटेगा।


· पिछले दो दशकों से एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृति वित्तीय झटके(मसलन वेतन आयोग के जरिए वेतनभोगी सरकारी कर्मचारियों के वेतन में तेज बढोत्तरी) के बाद खर्चे में कटौती के उपाय करने की रही है और इसके लिए खेती में किए जाने वाले निवेश और उसके विस्तार में कटौती की गई है लेकिन सब्सिडी में नहीं। साल १९७६-८० के बीच खेती को मिलने वाली सब्सिडी कृषिगत जीडीपी का ३ फीसदी थी जो साल २००१-०३ में बढ़कर ७ फीसदी हो गई।इसी अवधि में खेती में सरकारी निवेश कृषिगत जीडीपी के ४ फीसदी से घटकर २ फीसदी रह गया।ज्यादातर सब्सिडी खाद,बिजली और सिंचाई के पानी पर दी जाती है जबकि यह भी एक तथ्य है कि इन सारी चीजों प्राकृतिक संसाधनों की हानि होती है।

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साल २००३ के जनवरी से दिसंबर महीने के बीच राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण(नेशनल सैम्पल सर्वे) के तहत किसानों की स्थिति के आकलन के लिए एक सर्वेक्षण [inside]सिचुएशन असेसमेंट सर्वे ऑव फार्मर-एनएसएसओ[/inside] के नाम से किया गया।५९ वें दौर के इस सर्वेक्षण के अनुसार-


· २७ फीसदी किसानों को खेती करना पसंद नहीं है क्योंकि वे इसे घाटे का पेशा मानते हैं। ४० फीसदी का कहना था कि विकल्प हो तो वे खेती छोड़कर कोई और धंधा कर लेंगे।


· पांच फीसदी किसान परिवारों में कोई ना कोई व्यक्ति स्व-सहायता समूह का सदस्य था। केवल २ फीसद किसान परिवारों के सदस्य किसी पंजीकृत कृषक संगठन के सदस्य थे।


· १८ फीसदी किसान परिवारों को जैविक खाद के बारे में जानकारी थी और फीसद किसान परिवार न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में जानते थे।केवल ८ फीसदी किसान परिवारों को इस बात की जानकारी थी कि विश्व व्यापार संगठन नाम की भी कोई चीज है।४ फीसदी किसान परिवारों ने अपनी फसल का बीमा करवाया था जबकि ५९ फीसदी यह भी नहीं जानते थे कि फसल का बीमा करवाया जा सकता है।२९ फीसदी किसान परिवारों में कोई ना कोई व्यक्ति कोऑपरेटिव सोसायटी का मेंबर था।


· केवल १९ फीसदी किसान परिवारों ने कोऑपरेटिव सोसायटी की सेवाएं हासिल की थीं।कॉऑपरेटिव सोसायटी की सेवा हासिल करने वाले किसान परिवारों ने ज्यादातर या तो कर्ज की सुविधा हासिल की थी या फिर खाद बीज की।


· ४८ फीसदी किसान परिवारों को बीज खरीदना पड़ा था जबकि ४७ फीसदी किसान परिवारों ने पहले की फसल के बीज घर में बचाकर रखे थे।३० फीसदी किसान हर साल बीज की अलग अलग किस्मों का इस्तेमाल करते हैं जबकि ३२ फीसदी किसान परिवार एख साल बीच देके बीज की प्रजाति बदलते हैं।७६ फीसदी किसान खरीफ की फसल के दौरान और ५४ फीसदी किसान रबी की फसल के दौरान खाद का इस्तेमाल करते हैं।


· २७ फीसदी किसान परिवारों ने सर्वेक्षण के दौरान कहा कि उन्हें अपने गांव में खाद मिल जाता है।५६ फीसदी किसान परिवार खरीफ की फसल के दौरान और ३८ फीसदी किसान परिवार रबी की फसल के दौरान जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं।खरीफ की फसल के दौरान ६८ फीसदी किसानों को और रबी की फसल के दौरान ७५ फीसदी किसानों को जैविक खाद अपने गांव में ही मिल जाता है।


· खरीफ के मौसम में ४६ फीसदी किसान परिवार और रबी के मौसम में ३४ फीसदी किसान परिवार उन्नत बीजों का इस्तेमाल करते हैं।१८ फीसदी किसान परिवारों ने कहा कि उन्नत बीज हमें गांव में ही मिल जाता है।.


· खरीफ के मौसम में ४६ फीसदी किसान परिवार और रबी के मौसम में ३१ फीसदी किसान परिवार कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं।खरीफ के दौरान ३० फीसदी और रबी के दौरान २२ फीसदी किसान पशुचिकित्सा की सेवाएं लेते हैं।केवल डेढ़ से दौ फीसदी किसानों ने कहा कि खाद या कीटनाशक के गुणों की जांच की सुविधाएं उन्हें उपलब्ध हैं।


· सर्वेक्षण में खेती के अन्तर्गत कई तरह की गतिविधियां शामिल की गई थी।खरीफ के दौरान खेती योग्य कुल भूमि में से ९६ फीसदी का और रबी के दौरान ९५ फीसदी जमीन का इस्तेमाल फसल उगाने(इसमें रेशम के कीड़े पालना,बागवानी करना और लाह के कीड़े पालना शामिल है) में हुआ।पट्टे पर ली गई खेतिहर जमीन में से ९८ फीसदी का खरीफ के मौसम में और ९७ फीसदी का रबी के मौसम में खेतिहर गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हुआ।


· बागवानी और वृक्षारोपण के काम में कुल खेतिहर जमीन में से ३ फीसदी का खरीफ और ४ फीसदी का रबी के मौसम में इस्तेमाल हुआ।अनुसूचित जाति के किसानों ने अपनी खेतिहर जमीन के महज १-२ फीसदी पर बागवानी या फिर वृक्षारोपण किया।


· जिन किसान परिवारों के पास कुल खेतिहर जमीन एक हेक्टेयर से भी कम है उन किसान परिवारों ने अपनी जमीन के महज १४ फीसदी पर खेती की और ६९ फीसदी जमीन पर डेयरी का काम किया जबकि कुल किसान परिवारों के लिए यह आंकड़ा .३५ फीसदी का है।


· कुल सिंचित भूमि में से ५० फीसदी की सिंचाई खरीफ के मौसम में और ६० फीसदी की सिंचाई रबी के मौसम में ट्यूबवेल से हुई।खरीफ के दौरान कुल सिंचित भूमि से १९ फीसदी की सिंचाई में कुएं से हुई जबकि रबी के मौसम में कुल सिंचित भूमि के १६ फीसदी पर सिंचाई का माध्यम कुंआ था।कुल सिंचित भूमि में से खरीफ के दौरान १८ फीसदी और रबी के दौरान १४ कृषि भूमि पर नहर से सिंचाई हुई।


· कुल सिंचित भूमि में ६२ फीसदी पर खरीफ के दौरान और ६९ फीसदी पर रबी के दौरान अनाज उपजाया गया।कुल सिंचित भूमि में से ४२ फीसदी का इस्तेमाल खरीफ दौरान और ५६ फीसदी का इस्तेमाल रबी के दौरान फसलों को उगाने में हुआ।खरीफ के मौसम में कुलसिंचित भूमि में से ७९ फीसदी की सिंचाई बगैर किसी साधन के इस्तेमाल के हुई रबी के मौसम में कुल सिंचित भूमि के ८३ फीसदी की सिंचाई में किसी साधन का इस्तेमाल नहीं हुआ। कुल सिंचित भूमि में लगभग ५ फीसदी की सिंचाई डीजलपंप से और ४ फीसदी की इलेक्ट्रिक पंप से हुई।.


· खेत जोतने के लिए जिन किसान परिवारों ने मानवीय श्रम का इस्तेमाल नहीं किया उसमें ४७ फीसदी ने डीजल से चलने वाले ट्रैक्टर का और ५२ फीसदी ने पशुओं का इस्तेमाल किया।ऐसे किसानों में ५९ फीसदी ने फसल की कटाई के लिए डीजल से चलने वाली मशीन का इस्तेमाल किया।


राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ५९ वें दौर(जनवरी-दिसंबर २००३) के आकलन (रिपोर्ट संख्या-492(59/18.1/3) पर आधारित [inside]सम आस्पेक्टस् ऑव ऑपरेशनल लैंड होल्डिंग इन इंडिया-एनएसएसओ[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

 

एनएसएस (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण) के छठे भूस्वामित्व सर्वेक्षण में ५२२६५ ग्रामीण और २९८९३ शहरी परिवारों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया। यह सर्वेक्षण २००३ में हुआ। इस सर्वेक्षण में जो तथ्य ग्रामीण भारत से संबंधित हैं उन्हें नीचे लिखा जा रहा है-


साल २००२-०३ में भूस्वामित्व (लैंडहोल्डिंग) की १० करोड़ १० लाख ३० हजार इकाइयां खरीफ के मौसम में और ९ करोड़ ५० लाख ७० हजार इकाइयां रबी के मौसम में जोती गईं या कहें कि इन पर खेती हुई।


साल १९६०-६१ में जोती जा रही भूस्वामित्व की इकाइयों की संख्या ५ करोड़ १० लाख थी। चार दशकों में उनकी संख्या में तेजी से इजाफा हुआ और जोती जा रही भूस्वामित्व की इकाइयों की संख्या साल २००२-०३ में १० करोड़ १० लाख हो गई। बहरहाल यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि जोती जा रही जोती जा रही भूस्वामित्व की इकाइयों की संख्या में जिस गति से बढ़ोत्तरी पहले के तीन दशकों (१९६०-६१ से १९९१-९२) में हुई, बाद के एक दशक(१९९१-९२ से २००२-०३) में उस गति से नहीं हुई।


साल १९६०-६१ में १३ करोड़ ३० लाख हेक्टेयर भूमि पर किसानी हुई थी। साल १९७०-७१ में इसमें ५.६ फीसदी की कमी आयी और इस साल किसानी की जमीन घटकर १२ करोड़ ६० लाख हेक्टेयर रह गई। मौजूदा सर्वेक्षण का आकलन है कि १० करोड़ ८० लाख हेक्टेयर जमीन पर किसानी हो रही है जो साल १९८१-८२ के मुकाबले ८ फीसदी कम है। इस आकलन के आधार पर कहा जा सकता है कि पिछले चार दशकों में किसानी की जमीन में १८.५ फीसदी की कमी आई है और हर दशक में यह कमी औसतन ५ फीसदी की हुई।


बंटवारे के कारण खेतिहर जमीन का छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट में जाना भारतीय खेती की बहुत पुरानी समस्या है। भूस्वामित्व के सर्वेक्षण पर आधारित पिछले चार आकलन बताते हैं ग्रामीण क्षेत्र में खेतिहर जमीन का आकार , भूस्वामित्व की इकाई के रुप में, हालांकि छोटा है लेकिन उसके कुल टुकड़ों की संख्या पहले की तुलना में कम हुई है। साल १९६०-६१ में भूस्वामित्व के प्रत्येक इकाई में ५.७ टुकड़े थे जो साल २००२-०३ में घटकर २.३ हो गए।


साल २००२-०३ में भूस्वामित्व की प्रत्येक इकाई के दायरे में औसतन १.०६ हेक्टेयर जमीन जोत में थी। साल १९९१-९२ में यह आंकड़ा १.३४ हेक्टेयर का और साल १९८१-८२ में यह आंकड़ा १.६७ हेक्टेयर का था। पिछले चार दशकों के भीतर भूस्वामित्व की औसत इकाई में ६० फीसदी की कमी आई है। साल १९६०-६१ में भूस्वामित्व की औसत इकाई २.६३ हेक्टेयर की थी जो साल २००२-०३ में घटकर १.०६ हेक्टेयर की रह गई।

 

साल १९६०-६१ के बाद भूस्वामित्व की संरचना में काफी बदलाव आए हैं। साल १९६०-६१ से लेकर साल २००२-०३ के बीच जोती जा रही जमीन के स्वामित्व में कुछ खास बदलाव नहीं आया लेकिन पट्टे पर दी जाने वाली जमीन का अनुपात इस अवधि में २४ फीसदी से घटकर १० फीसदी रह गया। इससे जाहिर होता है कि पट्टे पर खेत देने के बजाय खुद जोतने -बोने का चलन बढ़ रहा है।


पिछले तीन दशकों में सीमांत कोटि के भूस्वामित्व में साढ़े तीन गुणे की बढोतरी हुई है। साल १९६०-६१ में इनकी संख्या १ करोड़ ९० लाख ६० हजार थी जो साल १९९१-९२ में बढकर ७ करोड़ १० लाख हो गई।


भूस्वामित्व की कुल इकाइयों में सीमांत (१ हेक्टेयर से कम) इकाइयों की संख्या ७० फीसदी है, छोटी श्रेणी (१ हेक्टेयर से २ हेक्टेयर के बीच) की इकाइयों की संख्या १६ फीसदी है, अर्ध-मध्यम आकार (२ से ४ हेक्टेयर) की इकाइयों की संख्या ९ फीसदी है, मंझोले दर्जे(४ से १० हेक्टेयर) की इकाइयों की संख्या ४ फीसदी और बड़ी(१० हेक्टेयर से ज्यादा) इकाइयों की संख्या १ फीसदी से कम है।


किसानी के अमल में शामिल कुल जमीन में सीमांत कोटि की भूस्वामित्व की इकाइयों में १९९१-९१ के बाद से ६-७ फीसदी का इजाफा हुआ है और इनकी संख्या २२-२३ फीसदी पर जा पहुंची है। किसानी के अमल में शामिल कुल जमीन में यह संख्या इस तरह अर्ध-मध्यम और मंझोले दर्जे की भूस्वामित्व की इकाइयों के बराबर हो गई है।


साल २००२-०३ में किसानी के अमल में शामिल कुल जमीन में से १० फीसदी हिस्सा पट्टे पर दी गई जबकि साल १९९१-९२ में यह आंकड़ा ११ फीसदी का था।


बंटाई या पट्टे पर दी गई जमीन की सर्वाधिक तादाद(१९ फीसदी) उड़ीसा में थी। पश्चिम बंगाल के लिए यह आंकड़ा १४ फीसदी, आंध्रप्रदेश, पंजाबा और बिहार के लिए १२ से १३ फीसदी, उत्तरप्रदेश के लिए १२ फीसदी और हरियाणा के लिए ११ फीसदी का है।


१५ बड़े राज्यों को ध्यान में रखकर देखें तो साल २००२-०३ में पट्टे में दी गई जमीन का अनुपात सबसे ज्यादा(१७ फीसदी) पंजाब और हरियाणा(१४ फीसदी) में है। इस मामले में ये दो राज्य साल १९८१-८२ और १९९१-९२ में भी आगे थे।उड़ीसा में भी पट्टे पर दी गई जमीन का तादाद अच्छी खासी(१३ फीसदी) है। बाकी बड़े राज्यों में १० फीसदी से कम जमीन पट्टे पर दी गई।


साल १९६० के दशक में हुई हल्की बढ़ोतरी को छोड़ दें तो पट्टे पर दी जाने वाली जमीन की तादाद प्रतिशत पैमाने पर लगातार घट रही है। साल १९६०-६१ में इसकी तादाद २० फीसदी थी (१० हेक्टेयर से ज्यादा वाली कोटि को छोड़कर बाकी सभी कोटियों के लिए) जो साल २००२-०३ में घटकर १०-११ फीसदी रह गई है। बड़े आकार की जमीन को पट्टे पर देने के मामले में बढ़ोतरी हुई है। इस कोटि की १४ फीसदी जमीन साल २००२-०३ में पट्टे पर दी गई। यह संख्या साल १९६०-६१ की तुलना में ज्यादा है।


पट्टे पर दी गई जमीन का रुप बंटाईदारी है। पट्टे पर दी जाने वाली कुल जमीन के ४१ फीसदी हिस्से पर यही रुप लागू होता है। दी गई जमीन के एवज में एक बंधी बंधायी ऊपज या फिर बंधी बंधायी रकम लेने के चलन में भी इजाफा हुआ है। साल २००२-०३ में पट्टे पर दी गई जमीन के ५० फीसदी हिस्से पर यही चलन अमल में था।


पंजाब और हरियाणा खेती के मामले में देश के दो अग्रणी राज्य हैं और इन राज्यों में पट्टे पर दी गई जमीन पर भूस्वामी एक बंधी बंधायी रकम पर वसूलना ज्यादा बेहतर समझते हैं। पंजाब में पट्टे पर दी गई कुल जमीन में से ७९ फीसदी जमीन एक बंधी-बंधायी रकम के एवज में दी गई और हरियाणा में पट्टे पर दी गई जमीन के ७१ फीसदी पर यही चलन अमल में लाया गया।


गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में पट्टे पर दी गई जमीन के एवज में एक तयशुदा मात्रा में ऊपज लेने का चलन है। करेल को छोड़कर दक्षिण के बाकी सभी राज्यों में पट्टे पर दी गई जमीन के ६० फीसदी हिस्से पर भूस्वामी ऊपज की एक निश्चित मात्रा वसूलता है।


पट्टे पर दी गई जमीन के बंटाईदारी वाले रुप का सर्वाधिक चलन उड़ीसा(७३ फीसदी), भूतपूर्व बिहार(६७ फीसदी), असम(५५ फीसदी) और भूतपूर्व उत्तरप्रदेश(५३ फीसदी) है। मध्यप्रदेश(छ्तीसगढ़ सहित) राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में बंटाईदारी वाले रुप का चलन पट्टे पर दी गई जमीन के ३५-४० फीसदी हिस्से पर है।


साल २००२-०३ के खरीफ के मौसम में कुल जोत के ८७ फीसदी हिस्से पर और रबी के मौसम में ५७ फीसदी पर रोपाई-बुआई का काम हुआ।


साल २००२-०३ में बुआई-रोपाई के काम लायी गई कुल जमीन में से ४२ फीसदी हिस्सा खरीफ के मौसम में और ६७ फीसदी हिस्सा रबी के मौसम में सिंचिंत हुआ।


पंजाब में जितनी जमीन पर रोपाई-बुआई हुई उसका ९७-९८ फीसदी हिस्सा सिंचिंत था और आंकड़ा रबी-खऱीफ दोनों ही मौसम की खेती पर लागू होता है। हरियाणा और पंजाब में रबी के मौसम में सिंचित भूमि की तादाद ९१ फीसदी और खरीफ के मौसम में सिंचित भूमि की तादाद ७८-८० फीसदी है। असम में रबी के मौसम में भी सिंचित भूमि का तादाद २२ फीसदी से ज्यादा नहीं रही ।


खरीफ और रबी दोनों ही मौसमों में बुआई-रोपाई के कुल रकबे के ६४ फीसदी पर अनाज की खेती हुई।

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वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट-२००८ के अनुसार www.worldbank.org:


भारत में खेती के दायरे में विविधता लाना जरुरी है-फल और फूल उपजाने पर जोर दिया जाना चाहिए। इससे छोटे और सीमांत किसानों की आमदनी बढ़ायी जा सकती है क्योंकि भारत में उच्चतर मूल्य की फसलों मसलन फल और फूल का बाजार सालाना ६ फीसदी की दर से बढ़ रहा है।


साल १९६० में भूस्वामित्व की औसत इकाई का आकार २.६ हेक्टेयर था जो साल २००० में घटकर १.४ हेक्टेयर हो गया और आकार में घटती का क्रम आगे भी जारी है।


नई प्रौद्योगिकी यानी ई-गवर्नेंस के सहारे भ्रष्टाचार के बढ़ते दायरे पर अंकुश लगाया जा सकता है-कर्नाटक में जमीन के कागजात के कंप्यूटरीकरण के अनुभवों से ऐसा जाहिर होता है।


पंजाब में नाइट्रोजन जनित खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से पानी, भोजन और पशुचारे में नाइट्रेट तथा कीटनाशी रसायनों की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ गई है। खेती की बहुलतावादी पद्धति को अपनाना जरुरी है ताकि रसायनों पर खेती की निर्भरता कम की जा सके। बिजली, खाद तथा खेती में लगने वाली अन्य चीजों पर सब्सिडी देने का चलन है । इससे बड़े किसानों को फायदा होता है और वे खेती की मौजूदा पद्धति में किसी तरह के बदलाव की बात का विरोध करते हैं। पंजाब में बिजली पर बहुत ज्यादा सब्सिडी हासिल होने के कारण सिंचाई में भूजल का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है और इससे पंजाब के बहुतेरे इलाकों में भूमिगत जल का स्तर नीचे चला गया है। चावल का न्यूनतम खरीद मूल्य बढाने से चावल की खेती कीमत के लिहाज से आकर्षक बन पड़ी है लेकिन चावल की खेती में पानी की बहुत ज्यादा जरुरत होती है और इस वजह से भूमिगत जल का स्तर और नीचे गिर रहा है।


खेतिहर सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के लिहाज से शोध और विकास पर साल १९८१ में ०.१८ प्रतिशत का खर्च हुआ था जो बढ़कर साल २००० में ०३४ प्रतिशत हो गया। साल २००० में चीन ने कृषिगत शोध और विकास में ३१५० मिलियन डॉलर का खर्च किया जबकि भारत ने १८५८ मिलियन डॉलर। चीन का कृषिगत शोध और विकास पर खर्च भारत के मुकाबले लगभग दो गुना है।


प्रोफेसर उत्सा पटनायक द्वारा लिखित [inside]एगरेरियन क्राइसिस एंड डिस्ट्रेस इन रुरल इंडिया[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार- जून 10, 2003, http://www.macroscan.net/fet/jun03/fet100603Agrarian%20Crisis_1.htm:


खेतिहर संकट के लिए सिर्फ सूखे की स्थिति को दोष नहीं दिया जा सकता । खेती में संकट के हालात १९९० के दशक से चले आ रहे हैं और सूखे के कारण यह स्थिति ज्यादा प्रत्यक्ष हो गई है।


साल १९८३ में भारत के ग्रामीण इलाके में प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति २३०९ किलो कैलोरी भोजन-ऊर्जा हासिल थी जो साल १९९८ में घटकर २०११ किलोकैलोरी हो गई। अगर इस तथ्य को ध्यान में रखें तो ग्रामीण भारत में संकट की स्थिति स्पष्ट हो जाती है।


एक तथ्य ये भी है कि इन सालों में अनाज के सरकारी गोदाम भरे हुए थे जबकि इन्ही सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता में कमी आयी। इससे संकेत मिलते में हैं कि ग्रामीण भारत के लोगों के पास खरीददारी की ताकत कम हुई और इसके फलस्वरुप ना खरीदा हुआ अनाज गोदामों में पड़ा रहा।

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एग्रीकल्चरल सेक्टर स्टडी-क्रिटिकल इश्यूज एंड स्ट्रेटजिक ऑप्शनस् नामक दस्तावेज के अनुसार- http://www.adb.org/Documents/Assessments/Agriculture/IND/Agriculture-Assessment.pdf:


साल १९९५-९६ से साल २००४-०५ के बीच कृषि-क्षेत्र की बढ़ोतरी सालाना १.८५ फीसदी के दर से हुई। साल १८८४-८५ से लेकर १९९५-९६ के बीच कृषि-क्षेत्र की सालाना बढत ३.६ फीसदी की दर से हुई थी। कृषि-क्षेत्र में बढ़ोतरी का यह धीमापन सबसे ज्यादा दिखता है खाद्यान्नों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता के मामले में। साल १९९१-९५ के बीच प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता सालाना २०७ किलोग्राम थी जो साल २००४-०७ के बीच घटकर १८६ किलोग्राम हो गई।


लगभग दो तिहाई खेतिहर जमीन का एक ना एक स्तर पर अपक्षय हुआ है। केवल एक तिहाई जमीन की उर्वरता शक्ति अच्छी हालत में है। ९ करोड़ ४० लाख हेक्टेयर जमीन वर्षा, बाढ़ या किसी अन्य तरह की जलधारा से अपरदन का शिकार हुई है। २ करोड़ २० लाख हेक्टेयर जमीन अम्लता या लवणीयता का शिकार है.। १ करोड़ ४० लाख हेक्टेयर जमीन पानी के जमाव के कारण डुबाव की स्थिति में है। खेतिहर जमीन सिर्फ अपरदन, अम्लीयता और लवणीयता का ही शिकार नहीं हुई बल्तक उसमें सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी भी हो रही है। उर्वरक नीति में खामी के कारण जमीन में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी आ रही है।


हालांकि मत्स्य पालन और पशुपालन में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है और कृषिगत जीडीपी में इसका हिस्सा ३० फीसदी है लेकिन इस क्षेत्र पर नीतिगत प्राथमिकता और निवेश के मामले में उतना ध्यान नहीं दिया गया है जितने का यह हकदार है। पशुपालन का काम ज्यादातर गरीबों में प्रचलित है और यह उनकी आमदनी का एक बड़ी जरिया है।इसे अतिरिक्त शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र फसली खेती के अनुकूल नहीं होते और इन इलाकों में पशुपालन पर निर्भरता ज्यादा होती है। इसलिए सामाजि समता के मूल्य के लिहाज से भी मत्स्यपालन और पशुपालन पर ध्यान दिया जाना जरुरी है।