Resource centre on India's rural distress
 
 

घटती आमदनी

खास बात

 

दिहाड़ी मजदूरों सहित हर श्रेणी के कामगार के मेहनताने की बढोतरी दर साल 1983-1993 की तुलना में 1993-94 से 2004-05 के बीच घटी है। #

साल 1983 से 1993-94 के बीच रोजगार की बढ़ोतरी की दर 2.03 फीसदी थी जो साल 1993-94 से 2004-05 के बीच घटकर 1.85 हो गई। साल 1993-94 से 2004-05 के बीच कामगारों के मेहनताने की बढ़ोतरी दर और आमदनी में भी पिछले दशक की तुलना में ठीक इसी तरह कमी आई।

साल 1993-94 और 2004-05 के बीच खेतिहर मजदूरी का स्तर बहुत कम रहा है और इस पूरे दशक में इनकी बढ़ोतरी की दर कम हुई है।*.

सीमांत किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी बड़े किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी से बीस गुना कम है। *

जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है वे अपने परिवार का गुजारा खेती से होने वाली आमदनी के सहारे नहीं कर पा रहे। *

ग्रामीण इलाके की महिलाओं को मिलने वाली मजदूरी ग्रामीण इलाके के पुरुषों को मिलने वली मजदूरी से 58 फीसदी कम है। **

शहरी इलाकों की महिलाओं को शहरी पुरुषों की तुलना में 30 फीसदी कम मेहनताना मिलता है। **

ग्रामीण इलाके के पुरुषों को शहरी इलाके के पुरुषों की तुलना में 48 फीसदी कम मेहनताना हासिल होता है। **

# द चैलेंजेज ऑव एमप्लायमेंट इन इंडिया-एन् इन्फॉरमल इकॉनॉमिक पर्सपेक्टिव, खंड-एक, मुख्य रिपोर्ट, नेशनल कमीशन फॉर इन्टरप्राइजेज इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस)अप्रैल,2009

* नेशनल कमीशन फॉर इन्टरप्राइजेज इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस-2007), रिपोर्ट ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर ।

** इम्पलॉयमेंट एंड अन-इम्पलॉयमेंट सिचुएशन इन इंडिया 2005-06, नेशनल सैम्पल सर्वे,62 वां दौर।

 

एक नजर

हिन्दुस्तानी के गांवों में जाइए तो बहुत संभव है जो आदमी आपको सबसे गरीब दिखाई दे वह या तो दलित होगा या फिर आदिवासी।वह या तो भूमिहीन होगा या फिर उसके पास नाम मात्र के लिए थोड़ी जमीन होगी। गंवई इलाकों के ज्यादातर गरीब लोग ऐसे खेतिहर इलाकों में रहते हैं जो आज भी सिंचाई के लिए बारिश के पानी के आसरे है।ऐसे इलाकों में उन्हें ना तो बिजली की सुविधा हासिल है और ना ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं तक ही उनकी पहुंच बन पायी है। रोजगार का कोई वैकल्पिक जरिया भी मय्यसर नहीं है।भुखमरी की हालत से बचने के लिए लाखों लोग दूर-दराज पलायन करने पर मजबूर होते हैं। शुष्क या फिर कम नमी वाले इलाकों में तो हालत और भी गंभीर है। ऐसे इलाकों में जब ना तब सूखा पड़ना एक सामान्य सी बात है और ऐसे इलाकों में खेती से होने वाली वास्तविक आय लगातार कमती जा रही है।एक तो आमदनी कम उसपर सितम बढ़ती हुई बेरोजगारी और खस्ताहाल बुनियादी सेवाओं मसलन-स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, पेयजल और साफ-सफाई का। सूरते हाल ऐसे में काफी गंभीर हो जाती है।(अगर नरेगा के अन्तर्गत हासिल रोजगार को छोड़ दें तो 15 साल से ज्यादा उम्र के केवल 5 फीसदी लोगों को ही सरकारी हाथ से कराये जा रहे कामों में रोजगार हासिल है) राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों से जाहिर होता है कि गंवई इलाकों में नकदी रोजगार बड़ा सीमित है। आश्चर्य नहीं कि साल 1983 में ग्रामीण पुरुषों में 61 फीसदी स्वरोजगार में लगे थे लेकिन साल 2006 में यह अनुपात घटकर 57 फीसदी हो गया।

बैकग्राऊंडर के इस खंड में जिन रिपोर्टों और आंकड़ों को उद्धृत किया गया है उससे पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों में लोगों की आमदनी सालदर-साल कम हो रही है।भारत में खेती आज घाटे का सौदा है।ग्रामीण इलाके का कोई सीमांत कृषक परिवार खेती में जितने घंटे की मेहनत खपाता है अगर हम उन घंटों का हिसाब रखकर उससे होने वाली आमदनी की तुलना करें तो आसार इस फैसले पर पहुंचने के ज्यादा होंगे कि इस परिवार को तो एक लिहाज से न्यूनतम मजदूरी भी हासिल नहीं हो रही है। एनसीईयूस (2007) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 40 फीसदी किसानों का गुजारा खेती से होने वाली आमदनी भर से नहीं तल पाता और उन्हें अपने भरण-पोषण के लिए दिहाड़ी मजदूरी भी करनी पड़ती है, खेती से ऐसे किसान परिवारों को कुल आमदनी का 46 फीसदी हिस्सा ही हासिल हो पाता है।इन सबके बावजूद सीमांत किसान शायद ही दो जून की भरपेट रोटी, तन ढंकने को कपड़ा और सर पर धूप-बारिश झेल सकने लायक छत जुटा पाता है।

जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम की जमीन है वे अपने परिवार की बुनियादी जरुरतों को भी पूरी कर पाने में असमर्थ हैं। एनसीईयूएस की रिपोर्ट के मुताबिक एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है जबकि खेती सहित अन्य सारे स्रोतों से उसे औसतन मासिक 2115 रुपये हासिल होते हैं, जिसमें दिहाड़ी मजदूरी भी शामिल है यानी किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से लगभग 25 फीसदी ज्यादा है। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में बहुत से परिवार कर्ज के बोझ तले दबे है।

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वर्ल्ड बैंक द्वारा प्रस्तुत [inside]एंडिंग एक्स्ट्रिम पॉवर्टी, शेयरिंग प्रॉस्पेरिटी : प्रोग्रेस एंड पॉलिसिज(अक्तूबर 2015)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार:  

http://pubdocs.worldbank.org/pubdocs/publicdoc/2015/10/109701443800596288/PRN03-Oct2015-TwinGoals.pdf

भारत की स्थिति

 

• 2012 में किसी भी देश के मुकाबले भारत में सबसे ज़्यादा गरीब आबादी थी लेकिन राहत की बात यह है कि गरीबी दर की जहां तक बात है तो बड़े गरीब देशों के बीच भारत का नंबर सबसे नीचे है।

 

• बैंक के मुताबिक 'भारत में 2012 के दौरान सबसे ज्यादा संख्या में गरीब थे लेकिन यहां इनकी गरीबी की दर उन देशों में सबसे कम थी जहां सबसे ज्यादा गरीब रहते हैं।’

 

•  साल 2012 में भारत में गरीबों की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा थी लेकिन नयी आकलन पद्धति को अमल में लाने से पता चलता है कि भारत में गरीबों की संख्या वास्तविक से ज्यादा बतायी जाती रही है. उपभोग के आंकड़ों के संग्रहण की पद्धति में परिवर्तन से पता चलता है भारत में गरीबी की दर 21.2 प्रतिशत से कम होकर 12.4 प्रतिशत पर आ गई है.

 

 

•  वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार गरीबों की संख्या में परिवर्तन यूनिफार्म रेफरेंस पीरियड की जगह मोडफाइड मिक्स्ड रेफरेंस पीरियड को आधार बनाने के कारण दिखायी देता है.

 

• यूनिफार्म रेफरेंस पीरियड में नेशनल सैंपल सर्वे के तहत सन् 1950 से लोगों के उपभोग पर किए गए व्यय की गणना के लिए उनसे बीते 30 दिन की अवधि में भोजन तथा अन्य चीजों पर किए गए खर्च के बारे में पूछा जाता है. लेकिन मोडफाइड मिक्स्ड रेफरेंस पीरियड में 30 दिन की जगह उपभोग पर किए गए व्यय की गणना के लिए 7 दिन की अवधि ली जाती है. यह अवधि भोज्य-पदार्थों पर किए गए खर्च के लिए होती है. साथी ही एक वर्ष की अवधि में भोज्य-पदार्थों से इतर सामग्री की खरीद पर किए गए खर्च के बारे में पूछा जाता है जिसे नेशनल सैंपल सर्वे ने 2009-10 की गणना में अपनाया.

 

•     वर्ष 2015 के दौरान गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में 10 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है.

 

•    वर्ष 1990 में गरीबी में कमी लाने के प्रयास आरंभ हुए जिसके तहत वर्ष 2030 तक गरीबी को समाप्त किया जायेगा.

 

•    वर्ष 2012 में 12.8 प्रतिशत अथवा 902 मिलियन लोग गरीबी से प्रभावित थे जबकि वर्ष 2015 में 702 मिलियन अथवा 9.6 प्रतिशत लोग गरीबी से प्रभावित दर्ज किये गये.

 

•    गरीबी में सबसे अधिक गिरावट विकासशील देशों में दर्ज की गयी. जो कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में अधिक निवेश का परिणाम है.

 

•    गरीबी समाप्त करने के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों में शामिल हैं - धीमी वैश्विक वृद्धि दर, अस्थिर वित्तीय बाजार, संघर्ष, उच्च युवा बेरोज़गारी एवं जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव.

 

•    पिछले कुछ दशकों से, तीन क्षेत्रों, पूर्वी एशिया एवं पसिफ़िक, दक्षिण एशिया एवं सब-सहारा अफ्रीका में विश्व की 95 प्रतिशत गरीबी दर्ज की गयी.

 

•    सभी क्षेत्रों में गरीबी में गिरावट दर्ज की गयी, जबकि उन्हीं देशों में जहां संघर्ष व्याप्त है गरीबी में वृद्धि देखी गयी

 

•    सब-सहारा क्षेत्र में गरीबी में भारी गिरावट दर्ज की गयी. वर्ष 1990 में यह 56 प्रतिशत थी जो वर्ष 2015 में 35 प्रतिशत रहने की उम्मीद है.

 

•    लैटिन अमेरिका एवं कैरिबियन देशों में वर्ष 2012 के 6.2 प्रतिशत की तुलना में वर्ष 2015 में 5.6 प्रतिशत तक गिरावट देखी जा सकती है.

 

•    दक्षिण एशिया में गरीबी का वर्ष 2012  18.8 प्रतिशत का आंकड़ा वर्ष 2015 में 13.5 प्रतिशत पर पहुंच सकता है.  

 

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देश के  ग्रामीण अंचल के सामाजिक आर्थिक परिवेश के बारे में जुलाई 2015 में जारी की गई [inside]सामाजिक आर्थिक तथा जाति जनगणना 2015[/inside]अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है। ये जानकारियां ग्रामीण परिवारों से संबंधित आवास, भू-स्वामित्व, शैक्षिक परिदृश्य, महिलाओं की स्थिति, संपदा के स्वामित्व, आय आदि के बारे में हैं।

http://www.secc.gov.in/welcome 

इस विशिष्ट जनगणना में 14 मानकों के आधार पर परिवारों के स्वत अपवर्जन तथा 5 मानकों के आधार पर स्वतः समावेशन की पद्धति अपनाकर उनकी वंचना की स्थिति तय की गई है। ये आंकड़े गरीबी के बहुपक्षीय आकलन से संबंधित हैं और ग्राम-पंचायत स्तर पर साक्ष्य आधारित आयोजना का अनूठा अवसर प्रदान करते हैं।

निम्नलिखित 14 मानकों के आधार पर किसी ग्रामीण परिवार को इस गणना में वंचित परिवार की कोटि से बाहर रखा गया है-

 

i.   मोटरचालित दोपहिया, तिपहिया अथवा चरपहिया वाहन होने की स्थिति में;

ii. अगर किसी परिवार के पास तिपहिया या चरपहिया खेती का मोटरचालित यंत्र हो;

iii. किसान क्रेडिट कार्ड होने की स्थिति में जब क्रेडिट कार्ड में क्रेडिट की सीमा 50,000/- रुपये से ज्यादा की हो;

iv.  अगर किसी परिवार का कोई सदस्य सरकारी नौकरी करता हो;

v.  अगर किसी परिवार के पास गैर-खेतिहर उद्यम हो और इसका पंजीकरण सरकार में हुआ हो;

vi.  अगर घर का कोई सदस्य प्रतिमाह दस हजार रुपये से ज्यादा कमाता हो;

vii. अगर घर का कोई सदस्य आयकर दाता हो;

viii. अगर घर का कोई सदस्य प्रोफेशनल टैक्स देता हो;

ix. अगर किसी परिवार के पास तीन या इससे ज्यादा कमरों का मकान हो और उसकी छत और दीवार पक्की हो;

x.  अगर परिवार के पास रेफ्रिजिरेटर हो;

xi.  अगर परिवार के पास लैंडलाईन फोन हो;

xii.  अगर किसी परिवार के पास 2.5 एकड़ से ज्यादा सिंचित भूमि हो और साथ में सिंचाई का एक उपकरण भी हो;

xiii.  किसी परिवार के पास पाँच एकड़ या उससे ज्यादा सिंचित भूमि हो और यह परिवार उस भूमि से साल के दो कृषि मौसमों में फसल उपजाता हो.;

xiv.  अगर किसी परिवार के पास साढ़े सात एकड़ से ज्यादा जमीन हो साथ ही उसके पास सिंचाई का कम से कम एक उपकरण हो

 

निम्नलिखित पाँच मानकों के आधार पर किसी परिवार को स्वतया वंचित परिवार की श्रेणी में रखा गया है-

 

i.  जिस परिवार के पास रहने का ठिकाना ना हो;

ii.  भीख या चंदे के सहारे जीवन बसर करता हो;

iii.  अगर परिवार मैला ढोने के काम में लगा हो;

iv. अगर कोई परिवार आदिम जनजाति श्रेणी का हो;

v.  अगर कोई वैधानिक रुप से बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया गया हो.

 

वंचित परिवार की श्रेणी में आने के लिए निर्धारित 7 मानक निम्नलिखित हैं:

 

i.  अगर किसी परिवार के पास सिर्फ एक कमरे का मकान हो, उसकी दीवार और छत कच्ची हो;

ii.  अगर किसी परिवार में 18 से 59 साल की उम्र का कोई भी व्यस्क सदस्य ना हो;

iii.  अगर परिवार की प्रधान महिला हो और इस परिवार में 16 से 59 साल की उम्र का कोई भी पुरुष मौजूद ना हो;

iv.  अगर किसी परिवार में विकलांग व्यक्ति हों और परिवार का अन्य कोई भी सदस्य शारीरिक रुप से सक्षम की श्रेणी में ना हो;

v.  अगर परिवार अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति श्रेणी का हो;

vi.  ऐसा परिवार जिसमें 25 साल या इससे अधिक उम्र का कोई भी सदस्य साक्षर ना हो;

vii. अगर कोई परिवार भूमिहीन हो और अपनी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा  हाथ की मजदूरी के जरिए कमाता हो.

 2015 के जुलाई महीने में जारी किए गए सामाजिक आर्थिक एवं जातिगत जनगणना (www.secc.gov.in) के तथ्यों के अनुसार:

ग्रामीण परिदृश्य

• देश में तकरीबन 73.4 प्रतिशत परिवार ग्रामीम क्षेत्रों में रहते हैं। देश में कुल 24.39 करोड़ परिवार हैं जिसमें 17.91 करोड़ परिवार ग्रामीण हैं।

 

•  जनगणना में अपनाये गये 14 अपवर्जी मानकों के आधार पर पाया गया कि  ग्रामीण क्षेत्र में कुल अपवर्जित परिवारों की संख्या 7.05 करोड़ (39.4  प्रतिशत) है.

• स्वतया समावेशन के लिए तयशुदा पाँच मानकों के आधार पर जनगणना में पाया गया कि 16.5  लाख परिवार अत्यंत ही गरीब हैं. यह संख्या कुल ग्रामीण परिवारों की संख्या का 0.92 प्रतिशत है.

• जनगणना का आकलन है कि देश के ग्रामीण अंचल में तकरीबन 8.69 करोड़ यानी  48.5 परिवार निर्धारित सात मानकों में से किसी एक मानक के आधार पर वंचित श्रेणी में हैं.

ग्रामीण भारत में वंचित परिवार- एक नजर

•  सामाजिक आर्थिक एवं जातिगत जनगणना 2011 के अनुसार देश के ग्रामीण अंचल में तकरीबन 2.37  करोड़ परिवार (13.2 प्रतिशत) एक कमरे के मकान में रहते हैं जिसकी दीवार और छत कच्ची है.

•  ग्रामीण अंचल में तकरीबन 65.15 लाख परिवार (3.64  प्रतिशत)  ऐसे हैं जिनमें 18-59 साल की आयु का कोई भी व्यस्क व्यक्ति नहीं हैं.

• ग्रामीण भारत में तकरीबन 68.96 लाख परिवार किसी महिला के अभिभावकत्व में हैं जो कि कुल ग्रामीण परिवारों का 3.85 प्रतिशत है. ऐसे घरों में कोई भी पुरुष सदस्य 16-19 वर्ष की आयु के बीच का नहीं है.

 •  ग्रामीण अंचल में तकरीबन 7.16 लाख (0.40 प्रतिशत)  परिवारों में शारीरिक रुप से विकलांग व्यक्ति हैं और ऐसे परिवार में कोई भी बालिग सदस्य शारीरिक रुप से सक्षम नहीं है.

•  ग्रामीण अंचल में अनुसूचित जाति और जनजाति के कुल 3.86 करोड़ परिवार हैं जो कि कुल परिवारों का 21.5 प्रतिशत है. 

 •  ग्रामीण अंचल में तकरीबन 4.21 करोड़ (23.5 प्रतिशत) परिवार ऐसे हैं जिनमें 25 साल या इससे ज्यादा उम्र का कोई भी व्यस्क सदस्य साक्षर नहीं है.

•  तकरीबन 5.37 करोड़ ( लगभग 30 प्रतिशत) ग्रामीण परिवार भूमिहीन हैं और उनकी जीविका मुख्य रुप से हाथ से की जाने वाले मजदूरी पर निर्भर है.

 जीविका के स्रोत

•  तकरीबन 5.39 करोड़ ग्रामीण परिवार ( लगभग 30 प्रतिशत) जीविका के लिए  खेती-बाड़ी पर आश्रित हैं.

•  देश के ग्रामीण अंचल में 9.16 करोड़ ( लगभग 51.1 प्रतिशत) परिवार जीविका के लिए एक ना एक रुप में हाथ की मजदूरी पर आश्रित हैं.

•  राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो देश के 38.3 प्रतिशत ग्रामीण परिवार अपनी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा दिहाड़ी मजदूरी से हासिल करते हैं. नगालैंड में यह आंकड़ा 6.03 प्रतिशत का है जबकि तमिलनाडु में 55.8 प्रतिशत का. 

•  तकरीबन 44.84 लाख ग्रामीण परिवार (लगभग 2.5 प्रतिशत) ऐसे हैं जिन्हें पूर्णकालिक या अंशकालिक तौर पर घरेलू नौकर बनकर जीवन बसर करना पड़ता है.

•  तकरीबन 4.08 लाख ग्रामीण परिवार ( तकरीबन 0.23 प्रतिशत) कूड़ा-कचरा बीनकर जीविका कमाते हैं.

•  ग्रामीण इलाकों में तकरीबन 28.87  लाख गैर-खेतिहर उद्यम (1.61  प्रतिशत) हैं.

•  गैर खेतिहर तथा सरकार में पंजीकृत उद्यम वाले ग्रामीण परिवारों की संख्या राष्ट्रीय स्तर पर 2.73 प्रतिशत है. छत्तीसगढ़ के लिए यह आंकड़ा 0.57 प्रतिशत का है जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए 19.54 प्रतिशत का.

 •  तकरीबन 6.68 लाख (तकरीबन 0.37 प्रतिशत) भीख या दान से हासिल रकम या सामान के सहारे अपनी जीविका चलाते हैं। तमिलनाडु और मणिपुर में ऐसे निराश्रय लोगों की तादाद 0.05 प्रतिशत है जबकि पश्चिम बंगाल में 1.26 प्रतिशत.

 •  तकरीबन 2.5 करोड़ परिवार ( लगभग 14 प्रतिशत) सरकारी नौकरी, निजी क्षेत्र की नौकरी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में हासिल नौकरी पर आश्रित हैं.

अपवर्जित श्रेणी में शामिल परिवारों के बारे में जानकारी

•  सिंचाई की सुविधा से संपन्न भूमि के स्वामित्व वाले परिवारों की संख्या ग्रामीण इलाकों में 25.63 प्रतिशत है. यह आंकड़ा छत्तीसगढ़ में 2.13 प्रतिशत और उत्तरप्रदेश में 50.31 प्रतिशत है.

 •  मोटरचालित तिपहिया या चौपहिया खेती-बाड़ी के उपकरण वाले परिवारों की संख्या 4.12 प्रतिशत है. केरल के लिए यह आंकड़ा 0.36 प्रतिशत का है जबकि पंजाब के लिए 16.16 प्रतिशत है.

•  ऐसे किसान-परिवार जिनके पास किसान क्रेडिट कार्ड है और जिसकी क्रेडिट सीमा 50 हजार या उससे अधिक है, 3.62 प्रतिशत है. लक्षद्वीप के लिए यह आंकड़ा 0.24 प्रतिशत का है जबकि हरियाणा के लिए 9.63 प्रतिशत.

• ऐसे किसान-परिवारों की तादाद जिनके पास जमीन तो नहीं है लेकिन किसान  क्रेडिट कार्ड है, 0.39 प्रतिशत है.  दादरा और नगरहवेली के लिए यह आंकड़ा 0.10 प्रतिशत और  दमन और दीयू के लिए 4.65  प्रतिशत का है.

 •   सिंचाई के उपकरण वाले ग्रामीण परिवारों की संख्या राष्ट्रीय स्तर पर 9.87 प्रतिशत है. यह आंकड़ा अरुणाचल प्रदेश के लिए 0.72 प्रतिशत है जबकि हरियाणा के लिए 23.54 प्रतिशत.

 •  ऐसे परिवारों की संख्या जिनके पास जमीन तो नहीं है लेकिन सिंचाई के उपकरण है 0.89 प्रतिशत है.  जम्मू-कश्मीर के लिए यह आंकड़ा 0.15 प्रतिशत का है जबकि दमन और दियू के लिए 8.52 प्रतिशत है.

 •  आयकर अथवा पेशवर कर चुकाने वाले ग्रामीण परिवारों की संख्या 4.58 प्रतिसत है. छत्तीसगढ़ के लिए यह आंकड़ा 1.81 प्रतिशत का है जबकि अंडमान निकोबार के लिए 23.21% का.

 •  राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे ग्रामीण परिवारों की संख्या जिनके पास किसी भी किस्म का फोन नहीं है 27.93 प्रतिशत है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए यह आंकड़ा 3.94 प्रतिशत का है तो छत्तीसगढ़ के लिए 70.88 प्रतिशत का.

 •  सरकारी नौकरी वाले ग्रामीण परिवारों की संख्या 5  प्रतिशत है. आंध्रप्रदेश के लिए यह आंकड़ा 1.93 प्रतिशत का है जबकि लक्षद्वीप के लिए 41.1 प्रतिशत का.

 •   ऐसे ग्रामीण परिवारों की संख्या जिनमें सर्वाधिक आय अर्जित करने वाला कोई एक सदस्य 10 हजार या इससे अधिक कमाता है 8.29 प्रतिशत है. छत्तीसगढ़ के लिए यह आंकड़ा 3.2 प्रतिशत का है जबकि लक्षद्वीप के लिए 43.19 प्रतिशत का.

• ऐसे ग्रामीण परिवारों की संख्या जिनके पास रेफ्रिजेरेटर है, 11.04 प्रतिशत है. बिहार के लिए यह आंकड़ा 2.61 प्रतिशत है जबकि गोवा के लिए 69.37 प्रतिशत.

 •  ऐसे ग्रामीण परिवारों की संख्या जिनके पास मोटरचालित दुपहिया, तिपहिया या चौपहिया वाहन या मछली मारने वाली नौका है, 20.69 प्रतिशत है. त्रिपुरा के लिए यह आंकड़ा 8.09 प्रतिशत है जबकि गोवा के लिए 65.85 प्रतिशत. 

विस्तार से जानकारी के लिए यहां क्लिक किया जा सकता है 

 

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ग्लोबल मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स(एमपीआई) यानी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक जार्ज वाशिंग्टन यूनिवर्सिटी से संबद्ध शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। साल 2014 का ग्लोबल एमपीआई इंडेक्स 108 देशों में व्याप्त बहुआयामी गरीबी की गहराई के बारे में सूचना देता है। यह सूचकांक पारिवारिक स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जीवन-स्तर के मामले में व्याप्त वंचना की स्थितियों की प्रकृति और विस्तार का मापन करता है। ग्लोबल एमपीआई निर्देशांक के जरिए पता चलता है कि गरीब कौन है और वह किन स्थितियों की वजह से गरीब है। यह पता होने से नीति-निर्माता संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं और गरीबी हटाने के लिए बेहतर योजनाओं का निर्माण कर सकते हैं। वैश्विक बहुआयामी गरीबी निर्देशांक गरीबी की गहराई का पता देता है। यह बताता है कि किसी एक ही समय में कोई व्यक्ति अभाव की कितनी स्थितियों से गुजर रहा होता है।

[inside]ग्लोबल मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स 2014[/inside](जून माह में प्रकाशित) के मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं- 

रिपोर्ट डाऊनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें-

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/MPI%20document%201_2.pdf

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/MPI%20Document%202_1.pdf

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/MPI%20document%203.pdf
 

भारतीय परिदृश्य

• भारत में वंचित लोगों की तादाद 34 करोड़ 30 लाख 50 हजार है- भारत की कुल आबादी में 28.5% फीसदी लोग वंचित की श्रेणी में हैं।

• एमपीआई के लिहाज से भारत दक्षिण एशिया में सर्वाधिक गरीब देशों में दूसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर युद्ध-जर्जर अफगानिस्तान है।

• 90 देशों के गरीबों में सर्वाधिक असमानता वाले देश भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यमन, सोमालिया शामिल हैं।
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वैश्विक परिदृश्य

• एमपीआई 2014 में 108 देशों को शामिल किया गया है। इन देशों में विश्व की कुल आबादी का 78% हिस्सा रहता है। कुल 1 अरब 60 करोड़ यानी 30 फीसदी लोगों को निर्देशांक के हिसाब से बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त कहा जाएगा।.

• बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त 1 करोड़ 60 लाख लोगों में 85 प्रतिशत ग्रामीण हैं जबकि आमदनी आधारित गरीबों के आकलन में गरीबों की 70 से 75 फीसदी तादाद को ग्रामीण बताया जाता है।
 
• बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त 1 करोड़ 60 लाख लोगों 52 फीसदी लोग दक्षिण एशिया में रहते हैं और 29 फीसदी उपसहारीय अफ्रीका में। बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त सर्वाधिक(71प्रतिशत) लोगों मंझोली आमदनी वाले देशों के निवासी हैं।

• बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त लोगों की सर्वाधिक संख्या(प्रतिशत पैमाने पर) नाइजर में है। इस देश की 89.3% आबादी बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त है।

• तकरीबन हर वह देश जिसने बहुआयामी गरीबों की संख्या कम करने में सफलता पायी है, वहां गरीबों के बीच व्याप्त असमानता में भी कमी आई है।

• सर्वाधिक कम विकसित देश तथा निम्न आयवर्ग में शामिल देशों में बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त लोगों की संख्या(अविकल पैमाने पर) में सबसे ज्यादा कमी आई है।

• नेपाल में पाँच सालों(2006 से 2011) में बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त लोगों की संख्या 65 फीसदी से घटकर 44 फीसदी रह गई है।

• दक्षिण एशिया में कुल मिलाकर 42 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त है।


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एनएसएस के 68 वें दौर की गणना पर आधारित रिपोर्ट [inside]लेवल एंड पैटर्न ऑफ कंज्यूमर एक्सपेंडिचर 2011-12(प्रकाशित 2014 की फरवरी)[/inside] के अनुसार-

http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/nss_rep_555.pdf

(यह रिपोर्ट पूरे देश के 7469 गांव और 5268 शहरी खंड से हासिल सूचनाओं पर आधारित है। उपभोक्ता व्यय पर सूचना एकत्र करने के लिए दो अलग-अलग सूचियां तैयार की गईं और पहली सूची में 101662 परिवारों से तथा दूसरी सूची में 101651 परिवारों से जानकारी हासिल की गई)


--- रिपोर्ट के अनुसार 2011-12 में ग्रामीण भारत में प्रतिव्यक्ति औसत मासिक उपभोक्ता व्यय 1430 रुपये और शहरी भारत में 2630 रुपये का है। दोनों के बीच में 84 प्रतिशत का अन्तर है।

--- 5 प्रतिशत निर्धनतम ग्रामीण जनता का प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय 521 रुपये था। 5 प्रतिशत निर्धनतम नगरीय जनता का प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय 700 रुपये था।

--- एमपीसीई(मंथली पर कैपिटा एक्सपेंडिचर) अर्थात प्रतिव्यक्ति मासिक व्यय के लिए बनाए गए स्तरों में ग्रामीण आबादी के ऊपरले यानी समृद्धतम 5 प्रतिशत हिस्से का प्रतिव्यक्ति औसत मासिक व्यय 4481 रुपये था। यह राशि निर्धनतम 5 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के एमपीसीई की तुलना में 8.6 गुणा ज्यादा है।

--- नगरीय आबादी के ऊपरले यानी समृद्धतम 5 प्रतिशत हिस्से का प्रतिव्यक्ति औसत मासिक व्यय 10282 रुपये था। यह राशि नगरीय आबादी के निर्धनतम 5 प्रतिशत आबादी के एमपीसीई की तुलना में 14.7 गुना ज्यादा है।

--- प्रमुख राज्यों के बीच केरल ग्रामीण एमपीसीई के मामले में सबसे आगे(2669 रुपये) रहा। इसके बाद पंजाब(2345 रुपये) और हरियाणा(2176 रुपये) थे। अन्य सभी प्रमुख राज्यों का औसत एमपीसीई 1000 रुपये से लेकर 1760 रुपये के बीच पाया गया।

--- उड़ीसा और झारखंड के ग्रामीण हिस्से में सबसे कम औसत एमपीसीई(1000 रुपये) पाया गया जबकि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाके में औसत एमपीसीई 1030 रुपये पाया गया। बिहार, मध्यप्रदेश एवं उत्तरप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों औसत एमपीसीई 1120 रुपये से लेकर 1160 रुपये के बीच पाया गया।

--- नगरीय क्षेत्र में सर्वोच्च एमपीसीई(3817 रुपये) वाला राज्य हरियाणा रहा। इसके बाद, इस मामले में केरल(3408 रुपये) एवं महाराष्ट्र(3189 रुपये) का औसत एमपीसीई नगरीय क्षेत्रों के लिए अन्य राज्यों की तुलना में ऊंचा पाया गया।

--- बिहार को छोड़कर (नगरीय एमपीसीई 1507 रुपये) किसी भी प्रमुख राज्य का नगरीय एमपीसीई 1860 रुपये से कम नहीं था।

--- पंजाब के औसत ग्रामीण एमपीसीई से वहां के नगरीय खंडों का औसत एमपीसीई 19 फीसदी अधिक था जबकि केरल में यह 28 फीसदी तथा बिहार में 34 प्रतिशत अधिक था। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल, झारखंड एवं महाराष्ट्र में नगरीय औसत ग्रामीण औसत से करीब दोगुना ज्यादा था।

--- समान संदर्भ अवधि द्वारा मापा गया वास्तविक एमपीसीई 1993-94 से 2011-12 यानी 18 साल की अवधि में ग्रामीण भारत में 38 प्रतिशत तथा शहरी भारत में 51 प्रतिशत बढ़ा है।

--- गुजरात, राजस्थान एवं तमिलनाडु में औसत एमपीसीई नगरीय क्षेत्र में अखिल भारतीय औसत से कम था, किन्तु ग्रामीण क्षेत्र में नहीं।

-- भारत के ग्रामीण परिवारों का 2011 के दौरान कुल-व्यय में खाद्य-पदार्थों के उपभोग पर किए गए व्यय का हिस्सा 53 प्रतिशत था। इसमें अनाज एवं उसके स्थानापन्न पर 10.8 प्रतिशत, 8 प्रतिशत दूध और दूध से बनी चीजों पर और 6 प्रतिशत खर्च सब्जियों पर हुआ। अखाद्य मद वर्ग में खाना बनाने के इंधन और रोशनी का भाग 8 प्रतिशत, वस्त्र एवं जूते का 7 प्रतिशत, चिकित्सा खर्चे का 6.7 प्रतिशत, यात्रा एवं अन्य उपभोक्ता सेवाओं का 4 प्रतिशत तथा  उपभोक्ता वस्तुओं पर हुए खर्च का हिस्सा 4.5 प्रतिशत था।

--- औसत नगरीय भारतीय के लिए पारिवारिक उपभोग के मूल्य का 42.6 प्रतिशत खाद्य पर, 6.7 प्रतिशत अनाज पर एवम् 7 प्रतिशत दूध एवं दूध से बने पदार्थ पर व्यय हुआ था।

---- कुल उपभोक्ता व्यय में अधिकतर खाद्य मद समूहो का हिस्सा नगरीय भारत की तुलना में ग्रामीण भारत में अधिक था, फल एवं प्रसंस्कृत आहार इसके अपवाद रहे। नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों के बीच उपभोक्ता व्यय के मामले में सर्वाधिक अन्तर अनाज के मामले में( नगरीय भाग 6.9 प्रतिशत, ग्रामीण भाग 10.8 प्रतिशत तथा किराया(नगरीय 6.2 प्रतिशत, ग्रामीण 0.5 प्रतिशत), एवं शिक्षा( नगरीय 6.9 प्रतिशत, ग्रामीण 3.5 प्रतिशत) के मामले में पाया गया।

--- प्रति व्यक्ति औसत अनाज की खपत प्रतिमाह(सभी उम्र के व्यक्तियों के लिए) ग्रामीण भारत में 11.2 किलो एवं नगरीय भारत में 9.2 किलो था।

--- ग्रामीण भारत में 10 प्रतिशत जनता के लिए प्रति व्यक्ति औसत मासिक अनाज की खपत 10.0 किलो के आसपास थी। एमपीसीई में बढ़त के साथ ही, यह बढ़ते हुए देखी गई, तेजी से यह बढ़त 10-20 वर्ग में 11 किलो तक पहुंची और फिर धीरे-धीरे बढ़कर 80-90 वर्ग में 11.5 किलो तक पहुंची। नगरीय भारत में एमपीसीई में बढ़त के साथ प्रति व्यक्ति अनाज की खपत में परिवर्तन का कोई स्पष्ट तरीका(पैटर्न) नहीं था। केवल शिखर के 5 प्रतिशत जनता को छोड़कर विभिन्न वर्गों के प्रति व्यक्ति मासिक खपत 9.1 किलो से 9.5 किलो के बीच थी।

--- 1993-94 से 2011-12 तक 18 सालों में महीने में प्रति व्यक्ति अनुमानित अनाज की खपत(जिसमें खरीदे गए प्रसंस्कृत आहार में अनाज का हिसाब शामिल नहीं है) ग्रामीण भारत में 13.4 किलोग्राम से 11.2 किलोग्राम और नगरीय भारत में 10.6 किलोग्राम से 9.3 किलोग्राम तक गिरी है।

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नेशनल कमीशन ऑन एम्पलॉयमेंट इन अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस) के दस्तावेज [inside]रिपोर्ट ऑन कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रोमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर[/inside] के अनुसार- http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf:

· भारत के ग्रामीण इलाके में खेती से होने वाली आमदनी का हिस्सा ४६ फीसदी है जबकि मजदूरी से होने वाली आमदनी का हिस्सा भी काफी बड़ा यानी ३९ फीसद है।ग्रामीण भारत के बारे में एक तथ्य यह है कि कुल किसान परिवारों में ४५ फीसद के पास १ हेक्टेयर से भी कम जमीन है।इसी कारण ग्रामीण इलाकों में किसान परिवारों की कुल आमदनी का एक बड़ा हिस्सा मेहनत-मजदूरी से आता है ना कि खेतिहर उपज से।एक हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवार भरण-पोषण के लिए खेती के साथ-साथ मजदूरी पर भी निर्भर हैं।

· राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो खेती से होने वाली मासिक आय ९६९ रुपये है।इस आकलन में भूमि के हर वर्ग यानी सीमांत से लेकर बड़े किसानों तक को शामिल किया गया है। सीमांत किसान की खेती से होने वाली मासिक आमदनी ४३५ रूपये है जबकि बड़े किसान की ८३२१ रुपये।

· सीमांत किसान की औसत आमदनी बड़े किसान की औसत आमदनी से बीस गुना कम है।

· चूंकि छोटे और सीमांत किसानों की संख्या बहुत ज्यादा और आमदनी बहुत कम है इसलिए हर भूमि-वर्ग के किसानों को एक साथ मिलाकर खेती से होने वाली मासिक आमदनी का आकलन राष्ट्रीय स्तर पर करने पर आमदनी का औसत कम आता है।

· खेती के साथ-साथ आमदनी के बाकी स्रोतों को भी मिला दें तो राष्ट्रीय स्तर पर एक किसान परिवार की मासिक आमदनी २११५ रुपये आती है और इस आमदनी को प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा महज ३८५ रूपये मासिक का आता है।अलग-अलग भूमि-वर्ग के किसान परिवारों के बीच मासिक आमदनी का अन्तर भी बहुत ज्यादा है।एक हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी जहां १३८० रूपये है वहीं १० हेक्टेयर और उससे ज्यादा की मिल्कियत वाले किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी ९६६७ रुपये है।

· खेती के अतिरिक्त बाकी अन्य स्रोतों से होने वाली आमदनी को एक साथ करें तो सबसे ज्यादा मासिक आमदनी जम्मू-कश्मीर के किसान परिवारों की(लगभग ५५०० रुपये) है।इसके बाद नंबर आता है पंजाब(४९६० रूपये) और केरल का(४००४ रूपये) ।सबसे कम मासिक आमदनी(१०६२रूपये) उड़ीसा के किसान परिवारो की है।कम आमदनी वाली किसान परिवारों में मध्यप्रदेश का स्थान दूसरा(१०६२ रूपये) और राजस्थान का तीसरा(१५०० रूपये) है।

· किसान-परिवारों के मामले में जहां तक औसत खर्च का सवाल है,जमीन के बढ़ते आकार के साथ-साथ इसमें इजाफा होता देखा गया है।बड़े किसान की कोटि में आने वाले परिवारों का औसत मासिक खर्च ६००० रुपये से ज्यादा है।राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च २७७० रूपये और औसत मासिक आमदनी २११५ रूपये है।इससे संकेत मिलते हैं कि किसान परिवारों की औसत मासिक आमदनी से उनका औसत मासिक खर्च कहीं ज्यादा है- छोटे और सीमांत किसान परिवारों पर यह बात विशेष रूप से लागू होती है।

· आकलन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जिन किसान परिवारों के पास २ हेक्टेयर से कम जमीन है उनकी मासिक आमदनी उनके मासिक खर्चे से कम है।दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवार अपने भरण पोषण के लायक आमदनी नहीं जुटा पा रहे हैं।

· कुल मिलाकर देखें तो,खेतिहर मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी बहुत कम है और इस मजदूरी में १९९३-९४ से लेकर २००४-०५ के बीच यानी एक दशक में बढ़ोत्तरी की दर बढ़ने के बजाय घटी है।

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· ग्रामीण इलाके में नियमित मजदूरी या वेतन पाने वाले मजदूर अथवा कर्मचारी को,अगर वह पुरूष है तो औसतन १३८ रुपये ७४ पैसे और महिला है तो ८७ रुपये ७१ पैसे मिलते हैं यानी पुरूष और महिला के बीच मेहनताने में अंतर लगभग ५० रूपये का है।शहरी इलाके में मजदूरी कहीं ज्यादा है।शहरी इलाके में नियमित मजदूरी पर बहाल पुरूष को २०५ रूपये ८१ पैसे हासिल होते हैं जबकि स्त्री को १५८ रूपये २३ पैसे यानी शहरी इलाके में दिहाड़ी पर काम करने वाली स्त्री को पुरूष की तुलना में यहां भी रोजाना लगभग ५० रूपये कम मिलते हैं।

· सरकार द्वारा चलाये जा रहे लोक-कल्याण के कामों में पुरूष को बतौर मजदूरी औसतन ५६ रूपये हासिल होते हैं जबकि महिला को ५४ रूपये।