पलायन (माइग्रेशन)

पलायन (माइग्रेशन)

 

अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन द्वारा प्रस्तुत मैनेजिंग द एग्जोडस्--ग्राऊंडिंग माइग्रेशन इन इंडिया नामक दस्तावेज के अनुसार-(http://www.aifoundation.org/documents/Report-ManagingtheEx
odus.pdf
):


  • साल २०२१ तक भारत में मेगा-सिटीज की संख्या विश्व में सर्वाधिक होगी और शहरीकरण तथा पलायन के कारण शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों की संख्या में अभूतपूर्व बढोत्तरी होगी।हर मेगा-सिटीज(बड़े शहर) में एक करोड़ से ज्यादा लोग निवास कर रहे होंगे।


  • पलायन (माइग्रेशन) को किसी व्यक्ति के विस्थापन के अर्थ में परिभाषित किया गया है। पलायन करने वाला व्यक्ति अपनी जन्मभूमि अथवा स्थायी आवास को छोड़कर देश में ही कहीं अन्यत्र रहने चला जाता है। साल २००१ में भारत में अपने पिछले निवास स्थान को छोड़कर कहीं और जा बसने वाले लोगों की संख्या ३० करोड़ ९० लाख थी।कुल जनसंख्या में यह आंकड़ा ३० फीसदी का बैठता है। साल १९९१ की जनगणना से तुलना करें तो २००१ में पलायन करने वाले लोगों की तादाद में ३७ फीसदी का इजाफा हुआ है। आकलन के मुताबिक साल १९९१ से २००१ के बीच ९ करोड़ ८० लाख लोग अपने पिछले निवास स्थान को देश में कहीं और रहने के लिए विवश हुए।.


  • परंपरागत तौर पर पलायन गांवों से शहरों की तरफ होता रहा है। इस प्रवृति में धीरे धीरे बढ़ोत्तरी हुई है।गांवों से शहरों की तरफ पलायन का आंकड़ा कहता है कि १९७१ में पलायन करने वाले कुल लोगों की तादाद में गांव से पलायन करने वाले लोगों की संख्या १६.५ फीसदी थी जबकि साल २००१ में गांवों से शहरों की तरफ पलायन करने वाले लोगों की यह संख्या २१.१ फीसदी पर जा पहुंची।


  • पिछले तीन दशकों (१९७१-२००१) में एक शहर से दूसरे शहर को पलायन करने वाले लोगों की संख्या में भी १३.६ फीसदी के मुकाबले १४.७ फीसदी का इजाफा हुआ है।


  • साल २००१ में एक गांव से दूसरे गांव में जा बसने वाले लोगों की संख्या पलायन करने वाले कुल लोगों की संख्या का ५४.७ फीसदी थी।


  • पिछले एक दशक यानी १९९१ से २००१ के बीच शहरों को छोड़कर गांव में जा बसने वाले लोगों की संख्या ६० लाख २० हजार थी।

 

  • मौसमी पलायन('Seasonal migration') की प्रवृति ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से जारी है-खासकर यह प्रवृति भूमिहीन और भरण पोषण के लिए मजदूरी का सहारा लेने वाले सीमांत किसानों के तबके में लक्ष्य की जा सकती है। कह सकते हैं कि ग्रामीण इलाकों में जीविका के साधनों की कमी और इसकी तुलना में शहरी इलाके में जीविका के साधनों की भरमार पलायन का मुख्य. कारण है।अन्य कारणों में हम बढ़ते सूचना प्रवाह और बड़े शहरों की बढ़ती तादाद का नाम ले सकते हैं।ऐसे बदलाव के बीच गांव के लोग बेहतर अवसर की तलाश में शहरों की रूख करते हैं।जनजातीय इलाकों में बाहरी लोगों की बसाहट, निर्माण कार्यों से होने वाला विस्थापन और जंगलों की कटाई पलायन का मुख्य कारण है। ध्यान देने की बात यह भी है कि विवाह की वजह से एक निवास स्थान छोड़कर दूसरे निवास स्थान पर जा बसने वाले लोगों की संख्या कुल पलायन करने वालों लोगों की ५० फीसदी है।


  • भारत में ग्रामीण इलाकों के कुल ७ करोड़ ३० लाख लोगों नें साल १९९१-२००१ के बीच पलायन किया।इसमें एक गांव को छोड़कर दूसरे गांव जा बसने वालों की तादाद ५ करोड़ ३० लाख है जबकि गांव छोड़ शहर जा बसने वालों की संख्या लगभग २ करोड़।ज्यादातर लोगों के पलायन का कारण जीविका की तलाश रहा।इस आंकड़े में मौसमी पलायन करने वाले लोगों की गणना नहीं की गई है।

 

  • उड़ीसा , बिहार , राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे गरीब राज्यों के शहरों में लोगों की तादाद में बड़ी तेजी से इजाफा हुआ है।ऐसे राज्यों में कृषि-क्षेत्र में उत्पादकता कम और बेरोजगारी ज्यादा है,साथ ही शहर के आधारभूत ढांचे पर दबाव ज्यादा है।इससे संकेत मिलता है कि गरीब राज्यों में गांवों से शहरों की तरफ पलायन के लिए कई सहयोगी कारण मौजूद हैं।


  • गांव से शहरों की तरफ पलायन करने वाले लोगों को जाति,नातेदारी तथा गंवई संबंध सूत्रों के सहारे शहरों में जीविका के साधन तलाशने में मदद मिलती है।


  • पलायन का एक संबंध शहरी इलाके के कामों के स्वरूप में आ रहे बदलाव (अनुबंध आधारित काम) तथा झोपड़पट्टियों की बढ़ती संख्या से है।


  • राष्ट्रीय औसत से संकेत मिलता है कि प्रत्येक अधिसूचित झुग्गी-बस्ती में लगभग २५० परिवारों का आवास है जबकि अनधिकृत झुग्गियों में ११२ परिवारों का।


  • देश के शहरी इलाके में झुग्गीबस्तियों की संख्या लगभग ५२ हजार है और इसमें ५१ फीसदी अधिसूचित कोटि में आती हैं।


  • आकलन के अनुसार शहरी इलाके में रहने वाला हर सांतवां व्यक्ति झुग्गीबस्ती का निवासी है।


  • लगभग ६५ फीसदी झुग्गीबस्ती सरकारी जमीन पर आबाद हैं।इन जमीनों की मिल्कियत यै तो स्थानीय निकायों के हाथ में है अथवा राज्य सरकार के हाथ में।


  • देश में सबसे ज्यादा झुग्गीबस्तियों की संख्या महाराष्ट्र में है।महाराष्ट्र में लगभग १७३ से लेकर ११३ झुग्गीबस्तियां अधिकृत की कोटि में आती है जबकि ६० झुग्गीबस्तियां अनधिकृत हैं।


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