पलायन (माइग्रेशन)

पलायन (माइग्रेशन)


पीप,ल्स यूनियन ऑव डेमोक्रेटिक राइटस् (PUDR) द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज इन द नेम ऑव नेशनल प्राइड(रिपोर्ट) के अनुसार

http://www.pudr.org/index.php?option=com_docman&task=doc_details&Itemid=63&gid=179:

 

  • कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किए जा रहे खेल परिसर के निर्माण कार्यों में श्रमिक कानून की भारी अवहेलना हो रही है।


  • यूनियन के सूत्रों के मुताबिक कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किए जा रहे खेल परिसर की निर्माणभूमि पर ६००० मजदूरों को रोजगार हासिल है।क्षेत्रीय श्रमआयुक्त (रिजनल लेबर कमीशनर) के अनुसार कॉमनवेल्थ खेलगांव के निर्माण स्थल पर महज ४१०६ मजदूर काम कर रहे हैं जिसमें २२९ का दर्जा कुशल मजदूर का है और ८३३ अर्ध-कुशल मजदूर हैं जबकि अकुशल मजदूरों के दर्जे में ३००४ मजदूर हैं।


  • इस खेलगांव के निर्माण में लगे मजदूरों के अनुसार कभी-कभी मजदूरों की तादाद लगभग १५००० हो जाती है। मजदूरों की संख्या को आधिकारिक तौर पर ठीक-ठीक ना बता पाना इस बात का संकेत करता है कि ठेकेदार इस बहाने अपने को जवाबदेही से बचा ले जाते हैं।


  • कॉमनवेल्थ खेलगांव के निर्माण कार्य में लगे मजदूरों का दावा है कि काम की स्थिति ठीक ना होने के कारण अब तक कम से कम ७० मजदूर काम के दौरान जान गंवा चुके हैं।यूनियन के प्रतिनिधियों का कहना है कि जानलेवा दुर्घटनाएं २० की तादाद में हुई हैं।यह संख्या भी अपने आप में खतरे की घंटी है।


  • कॉमनवेल्थ खेलगांव के निर्माण स्थल पर काम करने वाले मजदूर बिहार,झारखंड,उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल के हैं।कुछ मजदूर पंजाब के भी हैं।साथ ही कुछ मजदूर ऐसे हैं जिनका मूल निवास स्थान तो बिहार का है मगर जो खेलगांव के लिए काम करने से पहले महाराष्ट्र के पुणे में काम करते थे और वहां उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हो जाने के बाद यहां आए।


  • खेलगांव के निर्माण कार्य से जुड़े अधिकांश ठेकेदारों ने साल १९७९ के इन्टर स्टेट माइग्रेन्ट वर्कमेन(रेग्युलेशन ऑव एंप्लॉयमेंट एंड कंडीशन ऑव सर्विस) अधिनियम के अन्तर्गत जरुरी लाइसेंस नहीं बनवाये हैं।

 

  • केंद्रीय लोक-निर्माण विभाग(सेंट्रल पब्लिक वर्कस् डिपार्टमेंट),दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए),नई दिल्ली नगरनिगम(एनडीएमसी) और दिल्ली नगरनिगम(एमसीडी) के अंतर्गत होने वाले बुनियादी ढांचे के विकास के अधिकांश कामों को अनुबंध के आधार पर बहुराष्ट्रीय कंस्ट्रक्शन कंपनियों को सौंप दिया गया है। इसका गहरा दुष्प्रभाव ठेके पर बहाल मजदूरों के हक पर पड़ रहा है।

 

  • अधिकांश मजदूरों के पास अपना पहचान पत्र नहीं है।उन्हें सिर्फ गेटपास दिया जाता है।इस गेटपास पर उस कंपनी या ठेकेदार का नाम नहीं होता जिसके लिए वे काम कर रहे हैं ना ही इस पर यह दर्ज होता है कि वे कितने दिनों से काम पर लगे हैं। खेलगांव के निर्माण कार्य में लगे अकुशल दर्जे वाले मजदूरों को ८ घंटे के काम के ८५ से १०० रुपये की दिहाड़ी मिलती है जबकि फरवरी २००९ तक दिल्ली में ऐसे कामों के लिए न्यूनतम मजदूरी १४२ रुपये निर्धारित थी।

 

  • खेलगांव परिसर के लिए निर्माण कार्य में लगे मजदूरों में ५ फीसदी तादाद महिलाओं की है।उन्हें समान काम के लिए पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है।

 

  • खेलगांव परिसर के निर्माण कार्य में लगे मजदूरों को बहाल करने वाली कंपनी के बारे में शायद ही कोई जानकारी है।

 

  • मजदूरी के भुगतान का तरीका और अवधि में मनमानापन है और इससे शोषण की झलक मिलती है।किसी भी मजदूरी को कभी भी पूरी मजदूरी एक साथ नहीं दी जाती।उन्हें भुगतान की गई रकम की पर्ची तक नहीं दी जाती। मजदूरों से ठेकेदार एक पंजी पर दस्तखत करवा लेता है। इस पंजी पर भुगतान की गई रकम और कार्यदिवसों अथवा घंटों के लिए यह भुगतान किया गया उसका कोई जिक्र नहीं होता। मजदूरों को हमेशा भय सताता है कि बकाया रकम मिलेगी या नहीं।


  • अंतिम भुगतान(इसे फाइनल कहा जाता है) के समय ठेकेदार शायद ही मजदूर को उसकी पूरी बकाया राशि का भुगतान करता है।


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