Resource centre on India's rural distress
 
 

पलायन (माइग्रेशन)

खास बात

किसी प्रांत से उसी प्रांत में और किसी एक प्रांत से दूसरे प्रांत में पलायन करने वालों की संख्या पिछले एक दशक में ९ करोड़ ८० लाख तक जा पहुंची है। इसमें ६ करोड़ १० लाख लोगों ने ग्रामीण से ग्रामीण इलाकों में और ३ करोड़ ६० लाख लोगों ने गावों से शहरों की ओर पलायन किया। #

पिछले एक दशक को आधार मानकर अगर इस बात की गणना करें कि किसी वासस्थान को छोड़कर कितने लोग दूसरी जगह रहने गए और कितने लोग उस वासस्थान में रहने के लिए आये तो महाराष्ट्र इस लिहाज से सबसे आगे दिखेगा। महाराष्ट्र में आने वालों की तादाद महाराष्ट्र से जाने वालों की तादाद से २० लाख ३० हजार ज्यादा है। इसके बाद आता है दिल्ली(१० लाख ७० हजार), गुजरात(.६८ लाख) और हरियाणा(.६७ लाख) का नंबर।#

उत्तरप्रदेश से जाने वालों की तादाद वहां आने वालों की तादाद से २० लाख ६० हजार ज्यादा है और बिहार से जाने वाली की तादाद बिहार आने वालों की तादाद से १० लाख ७० हजार ज्यादा है।#

भारत में साल १९९१ से २००१ के बीच ७ करोड़ ३० लाख ग्रामीणों ने पलायन किया। इसमें ५ करोड़ ३० लाख एख गांव छोड़कर दूसरे गांव में रहने के लिए गए और लगभग २ करोड़ लोग शहरी इलाकों में गए। शहरों की तरफ जाने वालों में ज्यादातर काम की तलाश करने वाले थे।*

अगर पिछले निवास-स्थान को आधार माने तो साल १९९१ से २००१ के बीच ३० करोड़ ९० हजार लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा जो देश की जनसंख्या का ३० फीसदी है।*

तीन दशकों(१९७१-२००१) के बीच शहरों से शहरों की तरफ पलायन में १३.फीसदी से बढञकर १४.फीसदी हो गया है। *

साल १९९१ से २००१ के बीच एक गांव से दूसरे गांव में पलायन करने वालों की संख्या कुल पलायन का ५४.फीसदी है।*

भारत में आप्रवासी मजदूरों की कुल संख्या साल १९९९-२००० में १० करोड़ २७ हजार थी। मौसमी पलायन करने वालों की संख्या २ करोड़ से ज्यादा हो सकती है। **

# भारत सरकार की जनगणना, http://censusindia.gov.in/Census_And_You/migrations.aspx

* मैनेजिंग द एक्जोडस-ग्राऊंडिंग माइग्रेशन इन इंडिया-अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन द्वारा प्रस्तुत

** ११ वीं पंचवर्षीय योजना, भारत सरकार

एक नजर

जब ठट्ट के ठट्ट लोग पलायन कर रहे हों तो उसकी गिनती का हिसाब रख बड़ा मुश्किल हो जाता है। हालत ये है कि भारत सरकार के जणगणना से संबंधित आंकड़े भी पलायन की ठीक-ठीक तस्वीर बयान नहीं कर पाते। कोई सरकारी एजेंसी इधर खेतिहर संकट या फिर मौसमी पलायन को पहचानने और दर्ज करने के लिए कागज-कलम संभाल रही होती है उधर लोग रोपाई-बुआई का समय जानकर या तो दोबारा अपनी जगह पर लौट आ चुके होते हैं या फिर कहीं और जाने की तैयारी में होते हैं। गन्ने की खेती या फिर ईंट भठ्टा उद्योग में रोजगार के लिए मजदूरों का सामूहिक पलायन अब एक सुनिश्चित बात है। अगर जीविका की संकट के दशा में कोई पलायन करता है या फिर मान लें कि मौसमी पलायन ही कर रहा है तो इसका असर पलायन करने वाले परिवार के बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है, परिवार के बालिग सदस्य चुनाव के वक्त वोट डालने के अधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते और जन्मस्थान पर हों या फिर उस जगह पर जहां रोजगार के लिए जाना पडा हो, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को जो सुविधाएं मिली हैं वह भी हासिल करने से ऐसे परिवार वंचित रहते हैं।

पलायन मौसमी तर्ज पर हो या फिर जीविका की संकट की स्थिति में सबसे गहरी चोट दलितों और आदिवासीयों पर पड़ती है जो गरीबों के बीच सबसे गरीब की श्रेणी में आते हैं और जिनके पास भौतिक या मानवीय संसाधन नाममात्र को होते हैं। यह बात खास तौर से आंध्रप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, और महाराष्ट्र के सर्वाधिक पिछड़े और सिंचाई के लिए मुख्यतः वर्षा पर आधारित जिलों पर लागू होती है। पलायन के सूरते हाल में महिला का खेतिहर मजदूर के रुप में और पुरुषों का असंगठित क्षेत्र में रोजदारी का कोई काम खोजना एक आम बात है।

अगर पलायन जीविका के परंपरागत स्रोत पर संकट आने के कारण हो रहा है तो इससे असंगठित क्षेत्र में उद्योगों के पनपने को बढ़ावा मिलता है और शहरों में बड़ी बेतरतीबी से झुग्गीबस्तियों का विस्तार होता है। छोटी और असंगठित क्षेत्र में पनपी फैक्ट्रियों के मालिक पलायन करके आये मजदूरों से खास लगाव रखते हैं क्योंकि एक तो ऐसे मजदूर कम मेहनताने पर काम करने को तैयार रहते हैं दूसरे छोटी-मोटी बातों को आधार बनाकर इनके काम से गैर हाजिर रहने की भी संभावना कम होती है। ऐसे मजदूर ठेकेदार के कहने में होते हैं और स्थानीय मजदूरों की तुलना में मोलभाव करने की इनकी ताकत भी कम होती है। मजदूरों की यह कमजोरी और कम मेहनताना भले ही कुछ समय के लिए उद्योगों के फायदे में हो लेकिन आगे चलकर देश की बढ़ोतरी की कथा में ऐसे मजदूरों की भागीदारी नहीं हो पाती क्योंकि उनके पास खरीदने की तकात कम होती है और इसलिए उपभोग की ताकत भी जबकि बाजार बढ़ते हुए उपभोग से ही बढता है। इसी कारण अकसर यह तर्क दिया जाता है कि गांवों से शहरों की तरफ पलायन तभी समृद्धि की राह खोल सकता है जब मजदूरों के लिए ज्यादा मेहनताना पाने का आकर्षण हो और दूसरी तरफ गांवों से खदेड़ने वाली गरीबी हो।   

साल 1991 से 2001 के बीच 7 करोड़ 30 लाख ग्रामीण अपने मूल वास स्थान से कहीं और जाने के लिए विवश हुए। इसमें से अधिकतर(5 करोड़ 30 लाख) किसी अन्य गांव में गए जबकि एक तिहाई से भी कम यानी 2 करोड़ शहरों में पहुंचे। शहरों में पहुंचने वाले ज्यादातर रोजगार की तलाश में आये।मौसमी तौर पर पलायन करने वालों की संख्या लगभग 2 करोड़ है लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या आधिकारिक आंकड़े से 10 गुना ज्यादा हो सकती है।


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[inside]माइग्रेशन इन इंडिया २००७-२००८, नेशनल सैंपल सर्वे,भारत सरकार[/inside] के आंकड़ों के अनुसार-
http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/nss_press_note_533_15june10.pdf:


क. गुजरे ३६५ दिनों में पूरे परिवार का पलायन

• ग्रामीण इलाकों में पारिवारिक पलायन(हाऊसहोल्ड माइग्रेशन) का प्रतिशत १ रहा जबकि शहरी क्षेत्र में ३ फीसदी।

• ज्यादातर पलायन सूबे के अंदर ही हुआ। ग्रामीण इलाको में सपरिवार पलायन करने वालों में ७८ फीसदी और शहरी इलाको में सपरिवार पलायन करने वालों में ७२ फीसदी का पिछला आवास सूबे के अंदर ही था।

•ग्रामीण इलाको से सपरिवार पलायन करने वालों की तादाद अपेक्षाकृत ज्यादा(५७ फीसदी) रही।

• शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों से पलायन करने का प्रमुख कारण आजीविका की खोज थी। गांवों से ५५ फीसदी पलायन जीविका की खोज के कारण हुआ।
ख. पलायन करने वाले.
 
• भारत में २९  किसी ना किसी कारण से पलायन करने वालों की संख्या २९ फीसदी है।

• शहरों में पलायन की दर(कुल आबादी में पलायन करके आने वाले लोगों की तादाद) ३५ फीसदी है जबकि ग्रामीण इलाकों में यह दर २६ फीसदी है।

• शहर और गांव दोनों ही इलाकों में पलायन करने वालों में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की तुलना में ज्यादा है। ग्रामीण इलाके में पलायित लोगों में महिलाओं की तादाद ४८ फीसदी है जबकि पुरुषों की महज पांच फीसदी। शहरों में पलायित पुरुषों की तादाद २६ फीसदी है जबकि महिलाओं की ४६ फीसदी।

• ग्रामीण इलाके में अनुसूचित जनजाति में पलायन सबसे कम(२४ फीसदी) है।

• शहरी इलाके में ओबीसी तबके में पलायन सर्वाधिक कम(३३ फीसदी) जबकि अन्य वर्ग नामक कोटि में सर्वाधिक यानी ३८ फीसदी है।

• साक्षरता के हिसाब से देखें तो ग्रामीण इलाके में निरक्षर लोगों में पलायन का प्रतिशत ४ है जबकि स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त लोगों में यही प्रतिशत १४ का है।
• ग्रामीण इलाकों में जो लोग पलायन कर रहे हैं उनमें ९१ फीसदी का पलायन किसी ना किसी ग्रामीण इलाके से दूसरे ग्रामीण इलाके में हो रहा है जबकि ८ फीसदी शहर से ग्रामीण इलाके में पलायन करने वाले लोग हैं।

• शहरी पुरुष आप्रवासियों में ६० फीसदी और शहरी महिला आप्रवासियों में ५९ फीसदी ग्रामीण इलाके से पलायन करके शहर पहुंचे हैं।

• शहरी और ग्रामीण दोनों ही इलाकों में महिलाओं के पलायन का सबसे बड़ा कारण शादी है। (ग्रामीण इलाके के लिए ९१ फीसदी और शहरी इलाके के लिए ६१ फीसदी) ।

•  पुरुष के पलायन का मुख्य कारण आजीविका की तलाश है (शहरी क्षेत्र के लिए ५६ फीसदी मामलों में और ग्रामीण क्षेत्र के लिए २९ फीसदी मामलों में )

• ग्रामीण इलाके से पलायन करने वाले ज्यादातर पुरुष स्वरोजगार में हैं। कुल पलायन करने वाले लोगों में १६ फीसदी स्वरोजगार में लगे थे. नए सिरे से हुए पलायन के बाद यह तादाद बढ़कर २७ फीसदी हो गई है।
• जहां तक शहरी इलाके के पलायन करने वाले पुरुषों का सवाल है, इसमें वेतनभोगी या नियमित मजदूरी हासिल करने वालों की तादाद में तेज बढ़ोतरी हुई है( पुराने पलायन करने वालों में वेतनभोगियों की तादाद १८ फीसदी थी तो नए सिरे से पलायन करने वालों के कारण यह तादाद बढ़कर ३९ फीसदी हो गई।


ग. सीमित अवधि के आप्रवासी

• सीमित अवधि के आप्रवासन की दर(आबादी में सीमित अवधि के लिए पलायन करने वालों का अनुपात) ग्रामीण इलाकों के लिए १.७ फीसदी जबकि शहरी इलाके के लिए १ फीसदी से भी कम रही।

• ग्रामीण इलाके से सीमित अवधि के लिए पलायन करने वालों में आधे से अधिक दिहाड़ी मजदूरी के काम में लगते हैं।
• सीमित अवधि के लिए पलायन करने वाले कुल लोगों में स्वरोजगार में लगे ग्रामीण पुरुषों की संख्या ३२ फीसदी है।

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अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन द्वारा प्रस्तुत [inside]मैनेजिंग द एग्जोडस्--ग्राऊंडिंग माइग्रेशन इन इंडिया[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-(http://www.aifoundation.org/documents/Report-ManagingtheExodus.pdf):


  • साल २०२१ तक भारत में मेगा-सिटीज की संख्या विश्व में सर्वाधिक होगी और शहरीकरण तथा पलायन के कारण शहरी इलाकों में रहने वाले लोगों की संख्या में अभूतपूर्व बढोत्तरी होगी।हर मेगा-सिटीज(बड़े शहर) में एक करोड़ से ज्यादा लोग निवास कर रहे होंगे।


  • पलायन (माइग्रेशन) को किसी व्यक्ति के विस्थापन के अर्थ में परिभाषित किया गया है। पलायन करने वाला व्यक्ति अपनी जन्मभूमि अथवा स्थायी आवास को छोड़कर देश में ही कहीं अन्यत्र रहने चला जाता है। साल २००१ में भारत में अपने पिछले निवास स्थान को छोड़कर कहीं और जा बसने वाले लोगों की संख्या ३० करोड़ ९० लाख थी।कुल जनसंख्या में यह आंकड़ा ३० फीसदी का बैठता है। साल १९९१ की जनगणना से तुलना करें तो २००१ में पलायन करने वाले लोगों की तादाद में ३७ फीसदी का इजाफा हुआ है। आकलन के मुताबिक साल १९९१ से २००१ के बीच ९ करोड़ ८० लाख लोग अपने पिछले निवास स्थान को देश में कहीं और रहने के लिए विवश हुए।.


  • परंपरागत तौर पर पलायन गांवों से शहरों की तरफ होता रहा है। इस प्रवृति में धीरे धीरे बढ़ोत्तरी हुई है।गांवों से शहरों की तरफ पलायन का आंकड़ा कहता है कि १९७१ में पलायन करने वाले कुल लोगों की तादाद में गांव से पलायन करने वाले लोगों की संख्या १६.५ फीसदी थी जबकि साल २००१ में गांवों से शहरों की तरफ पलायन करने वाले लोगों की यह संख्या २१.१ फीसदी पर जा पहुंची।


  • पिछले तीन दशकों (१९७१-२००१) में एक शहर से दूसरे शहर को पलायन करने वाले लोगों की संख्या में भी १३.६ फीसदी के मुकाबले १४.७ फीसदी का इजाफा हुआ है।


  • साल २००१ में एक गांव से दूसरे गांव में जा बसने वाले लोगों की संख्या पलायन करने वाले कुल लोगों की संख्या का ५४.७ फीसदी थी।


  • पिछले एक दशक यानी १९९१ से २००१ के बीच शहरों को छोड़कर गांव में जा बसने वाले लोगों की संख्या ६० लाख २० हजार थी।

 

  • मौसमी पलायन('Seasonal migration') की प्रवृति ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से जारी है-खासकर यह प्रवृति भूमिहीन और भरण पोषण के लिए मजदूरी का सहारा लेने वाले सीमांत किसानों के तबके में लक्ष्य की जा सकती है। कह सकते हैं कि ग्रामीण इलाकों में जीविका के साधनों की कमी और इसकी तुलना में शहरी इलाके में जीविका के साधनों की भरमार पलायन का मुख्य. कारण है।अन्य कारणों में हम बढ़ते सूचना प्रवाह और बड़े शहरों की बढ़ती तादाद का नाम ले सकते हैं।ऐसे बदलाव के बीच गांव के लोग बेहतर अवसर की तलाश में शहरों की रूख करते हैं।जनजातीय इलाकों में बाहरी लोगों की बसाहट, निर्माण कार्यों से होने वाला विस्थापन और जंगलों की कटाई पलायन का मुख्य कारण है। ध्यान देने की बात यह भी है कि विवाह की वजह से एक निवास स्थान छोड़कर दूसरे निवास स्थान पर जा बसने वाले लोगों की संख्या कुल पलायन करने वालों लोगों की ५० फीसदी है।


  • भारत में ग्रामीण इलाकों के कुल ७ करोड़ ३० लाख लोगों नें साल १९९१-२००१ के बीच पलायन किया।इसमें एक गांव को छोड़कर दूसरे गांव जा बसने वालों की तादाद ५ करोड़ ३० लाख है जबकि गांव छोड़ शहर जा बसने वालों की संख्या लगभग २ करोड़।ज्यादातर लोगों के पलायन का कारण जीविका की तलाश रहा।इस आंकड़े में मौसमी पलायन करने वाले लोगों की गणना नहीं की गई है।

 

  • उड़ीसा , बिहार , राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे गरीब राज्यों के शहरों में लोगों की तादाद में बड़ी तेजी से इजाफा हुआ है।ऐसे राज्यों में कृषि-क्षेत्र में उत्पादकता कम और बेरोजगारी ज्यादा है,साथ ही शहर के आधारभूत ढांचे पर दबाव ज्यादा है।इससे संकेत मिलता है कि गरीब राज्यों में गांवों से शहरों की तरफ पलायन के लिए कई सहयोगी कारण मौजूद हैं।


  • गांव से शहरों की तरफ पलायन करने वाले लोगों को जाति,नातेदारी तथा गंवई संबंध सूत्रों के सहारे शहरों में जीविका के साधन तलाशने में मदद मिलती है।


  • पलायन का एक संबंध शहरी इलाके के कामों के स्वरूप में आ रहे बदलाव (अनुबंध आधारित काम) तथा झोपड़पट्टियों की बढ़ती संख्या से है।


  • राष्ट्रीय औसत से संकेत मिलता है कि प्रत्येक अधिसूचित झुग्गी-बस्ती में लगभग २५० परिवारों का आवास है जबकि अनधिकृत झुग्गियों में ११२ परिवारों का।


  • देश के शहरी इलाके में झुग्गीबस्तियों की संख्या लगभग ५२ हजार है और इसमें ५१ फीसदी अधिसूचित कोटि में आती हैं।


  • आकलन के अनुसार शहरी इलाके में रहने वाला हर सांतवां व्यक्ति झुग्गीबस्ती का निवासी है।


  • लगभग ६५ फीसदी झुग्गीबस्ती सरकारी जमीन पर आबाद हैं।इन जमीनों की मिल्कियत यै तो स्थानीय निकायों के हाथ में है अथवा राज्य सरकार के हाथ में।


  • देश में सबसे ज्यादा झुग्गीबस्तियों की संख्या महाराष्ट्र में है।महाराष्ट्र में लगभग १७३ से लेकर ११३ झुग्गीबस्तियां अधिकृत की कोटि में आती है जबकि ६० झुग्गीबस्तियां अनधिकृत हैं।

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[inside]योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ११ वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार[/inside]-http://www.planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v3/11v3_ch4.pdf:


  • पिछले तीन दशकों में गांवों में रहने वाले लोगों की संख्या में कमी हुई है और शहरों में रहने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। इस तथ्य से संकेत मिलते हैं कि ग्रामीण जन अपनी गरीबी से निकलने के लिए शहरों का रूख कर रहे हैं। साल १९९९-२००० में देश में आप्रवासी मजदूरों की संख्या १० करोड़ २७ लाख थी।यह एक बड़ी और चौंकाऊ तादाद है।मौसमी तौर पर पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या कम सेकम २ करोड़ होने का अनुमान है।

 

असंगठित क्षेत्र के उद्यम और रोजगार से संबंधित आयोग यानी नेशनल कमीशन ऑन इंटरप्राइजेज इन अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(NCEUS) के दस्तावेज- [inside]रिपोर्ट ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर[/inside] के अनुसार-

http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf


  • ग्रामीण श्रमिकों से संबंधित राष्ट्रीय आयोग यानी द नेशनल कमीशन ऑन रुरल लेबर (NCRL (1991) की रिपोर्ट में कहा गया है कि गांवों में ज्यादातर वही लोग मौसमी तौर पर पलायन करते हैं जिनके पास खेती की जमीन कम या नहीं है अथवा जो मजदूरी करते हैं।ऐसे आप्रवासी लोग वंचितों की कोटि में आते हैं क्योंकि ये लोग भयंकर गरीबी से त्रस्त होते हैं और इनके पास अपने काम की एवज में मोलभाव करने की भी कोई खास क्षमता नहीं होती। इन्हें असंगठित क्षेत्र में काम करना पड़ता है जहां उनके हितों की सुरक्षा करने वाला कामकाज का कोई खास नियम नहीं होता।ऐसी स्थिति आप्रवासी मजदूरों को सामाजिक रुप से और भी ज्यादा कमजोर बनाती है।उन्हें सरकारी अथवा स्वयंसेवी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों में उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है,साथ ही ऐसे लोगों से संबंधित श्रम-कानून भी ज्यादा कारगर नहीं हैं।


  • खेतिहर मजदूरों में शामिल महिलाओं के बीच रोजगार के लिए पलायन करने की प्रवृति सबसे ज्यादा है जबकि पुरुषों में सबसे ज्यादा करने वाले गैर-खेतिहर मजदूर हैं।खेती-बाड़ी का काम मौसमी होता है और इस कारण जब खेती का काम नहीं हो रहा होता तो खेतिहर मजदूर दूसरी जगहों पर रोजगार हासिल करने के लिए चले जाते हैं।


  • एनसीआरएल के अनुसार विभिन्न राज्यों में खेती का विकास असमान रुप से हुआ है।इस वजह से जिन इलाकों में मजदूरी की दर कम है उन इलाकों से मजदूर ज्यादा मजदूरी वाले इलाके अथवा राज्यों में पलायन कर जाते हैं।


  • यह बात खासतौर पर हरित क्रांति के बाद हुई। बिहार के मजदूरों ने रोजगार के लिए पंजाब,हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश का रुख किया।


  • कम विकसित इलाकों में खेती के बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्चे की दर कम है।इससे देश के विभिन्न इलाकों के बीच खेती का विकास असमान रुप से हुआ है।


  • एनसीआरएल यानी नेशनल कमीशन ऑन रुरल लेबर के अनुसार देश में मौसमी तौर पर पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या १ करोड़ से ज्यादा है।साल १९६० के बाद खेती के व्यावसायीकरण की प्रवृति तेज हुई और खेती में उन्नत तकनीक का चलन बढा।इससे खेती के काम में साल की एक खास अवधि में मजदूरों की मांग ज्यादा होती है।इसी अवधि में देश के विभिन्न इलाकों से एक तरफ मजदूरों का पलायन होता है तो दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर मजदूरों को उपलब्ध रोजगार में गिरावट आती है।


  • अगर किसी मजदूर को उसकी परंपरागत वास-भूमि में जीविका के साधन अथवा रोजगार के उचित अवसर उपलब्ध नहीं हो तो इस स्थिति में मजदूर पलायन कर सकता है।यह बात खास तौर पर १९९० के दशक पर लागू होती है जब खेती-बाड़ी के काम में रोजगार के सृजन में ठहराव आ गया जबकि इसी अवधि में ग्रामीण इलाकों में गैर-खेतिहर कामों में विस्तार की गति धीमी रही।


  • गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सामाजिक और आर्थिक रुप से दयनीय दशा में रहने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों ने पिछले दशक में सामूहिक रुप से पलायन किया है।

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साऊथ एशिया नेटवर्क ऑन डैमस्,रीवरस् एंड पीपल(SANDRP), द्वारा प्रस्तुत [inside]लार्ज डैम प्रोजेक्टस् एंड डिस्पलेस्मेंट इन इंडिया[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

http://www.sandrp.in/dams/Displac_largedams.pdf:


  • भारत में सरकार बड़े बांधों की अनेक परियोजनाओं की योजनाकार,धनदाता,निर्माता और मालिक है लेकिन सरकार के पास १९४७ के बाद से बने बड़े बांधों द्वारा विस्थापित हुए लोगों की संख्या के बारे में कोई आंकड़ा नहीं है।


  • संख्या के लिहाज से देखें तो बड़े बांधों को बनाने वाले देशों में भारत का स्थान तीसरा है।भारत में ३६०० से ज्यादा बड़े बांध हैं और ७०० की तादाद में बड़े बांधों पर काम चल रहा है।


  • विश्वबैंक के आंकड़ों के अनुसार इस बैंक द्वारा वित्तपोषित परियोजना से विस्थापित होने वाले कुल लोगों के बीच बड़े बांधों से विस्थापित होने वाले लोगों की तादाद २६.६ फीसदी है।अगर इसी आंकड़े को कुल विस्थापित लोगों की संख्या से तुलना करके देखें तो पता चलेगा कि कुल विस्थापित लोगों में ६२.८ फीसदी लोग विश्वबैंक द्वारा वित्तपोषित बड़ी बांध-परियोजनाओं के कारण विस्थापन के शिकार हुए हैं।


  • यह बात भी स्पष्ट है कि बड़ी बांधों से जुड़े परियोजना अधिकारी विस्थापन और पुनर्वास को परियोजना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा नहीं मानते।ऐसी परियोजनाओं का प्रमुख सरोकार इंजीनियरिंग से जुड़ी सहूलियत और सिंचाई अथवा बिजली-उत्पादन से होने वाला लाभ होता है।

 

  • हीराकुड बांध से विस्थापित होने वाले लोगों की तादाद लगभग १.६ लाख थी जबकि सरकारी आंकड़े में इसे १.१ लाख बताया गया।


  • सरकार के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार सरदार सरोवर परियोजना के अंतर्गत बनने वाले जलागार से ४१ हजार परिवार विस्थापित होंगे।इस परियोजना के अन्तर्गत बनने वाली नहरों से २४ हजार खातेदारों(भूस्वामियो) को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ेगा।इसके अतिरिक्त जलप्रवाहक की विपरीत दिशा में निवास करने वाले १० हजार मछुआरे परिवारों से उनकी आजीविका छिन जाएगी क्योंकि बांध के कारण गैर-मॉनसूनी महीनों में इस इलाके में जलप्रवाह एकदम रुक जाएगा।


  • ५४ बड़ी बांध परियोजनाओं के सर्वेक्षण के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है कि पिछले पचास सालों में बड़े बांधों के निर्माण से विस्थापित होने वाले लोगों की तादाद ३ कोरड़ ३० लाख है।


  • विश्वबैंक के अनुसार फिलहाल हर बड़े बांध के निर्माण से औसतन १३ हजार लोग विस्थापित होते हैं।

 

  • भारत सरकार के आकलन के अनुसार पिछले पचपन सालों में बड़े बांधों के निर्माण से विस्थापित हुए कुल ४ करोड़ लोगों में एक चौथाई से भी कम लोगों का पुनर्वास हो पाया है।

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पीप,ल्स यूनियन ऑव डेमोक्रेटिक राइटस् (PUDR) द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज [inside]इन द नेम ऑव नेशनल प्राइड(रिपोर्ट)[/inside] के अनुसार

http://www.pudr.org/index.php?option=com_docman&task=doc_details&Itemid=63&gid=179:

 

  • कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किए जा रहे खेल परिसर के निर्माण कार्यों में श्रमिक कानून की भारी अवहेलना हो रही है।


  • यूनियन के सूत्रों के मुताबिक कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किए जा रहे खेल परिसर की निर्माणभूमि पर ६००० मजदूरों को रोजगार हासिल है।क्षेत्रीय श्रमआयुक्त (रिजनल लेबर कमीशनर) के अनुसार कॉमनवेल्थ खेलगांव के निर्माण स्थल पर महज ४१०६ मजदूर काम कर रहे हैं जिसमें २२९ का दर्जा कुशल मजदूर का है और ८३३ अर्ध-कुशल मजदूर हैं जबकि अकुशल मजदूरों के दर्जे में ३००४ मजदूर हैं।


  • इस खेलगांव के निर्माण में लगे मजदूरों के अनुसार कभी-कभी मजदूरों की तादाद लगभग १५००० हो जाती है। मजदूरों की संख्या को आधिकारिक तौर पर ठीक-ठीक ना बता पाना इस बात का संकेत करता है कि ठेकेदार इस बहाने अपने को जवाबदेही से बचा ले जाते हैं।


  • कॉमनवेल्थ खेलगांव के निर्माण कार्य में लगे मजदूरों का दावा है कि काम की स्थिति ठीक ना होने के कारण अब तक कम से कम ७० मजदूर काम के दौरान जान गंवा चुके हैं।यूनियन के प्रतिनिधियों का कहना है कि जानलेवा दुर्घटनाएं २० की तादाद में हुई हैं।यह संख्या भी अपने आप में खतरे की घंटी है।


  • कॉमनवेल्थ खेलगांव के निर्माण स्थल पर काम करने वाले मजदूर बिहार,झारखंड,उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल के हैं।कुछ मजदूर पंजाब के भी हैं।साथ ही कुछ मजदूर ऐसे हैं जिनका मूल निवास स्थान तो बिहार का है मगर जो खेलगांव के लिए काम करने से पहले महाराष्ट्र के पुणे में काम करते थे और वहां उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हो जाने के बाद यहां आए।


  • खेलगांव के निर्माण कार्य से जुड़े अधिकांश ठेकेदारों ने साल १९७९ के इन्टर स्टेट माइग्रेन्ट वर्कमेन(रेग्युलेशन ऑव एंप्लॉयमेंट एंड कंडीशन ऑव सर्विस) अधिनियम के अन्तर्गत जरुरी लाइसेंस नहीं बनवाये हैं।

 

  • केंद्रीय लोक-निर्माण विभाग(सेंट्रल पब्लिक वर्कस् डिपार्टमेंट),दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए),नई दिल्ली नगरनिगम(एनडीएमसी) और दिल्ली नगरनिगम(एमसीडी) के अंतर्गत होने वाले बुनियादी ढांचे के विकास के अधिकांश कामों को अनुबंध के आधार पर बहुराष्ट्रीय कंस्ट्रक्शन कंपनियों को सौंप दिया गया है। इसका गहरा दुष्प्रभाव ठेके पर बहाल मजदूरों के हक पर पड़ रहा है।

 

  • अधिकांश मजदूरों के पास अपना पहचान पत्र नहीं है।उन्हें सिर्फ गेटपास दिया जाता है।इस गेटपास पर उस कंपनी या ठेकेदार का नाम नहीं होता जिसके लिए वे काम कर रहे हैं ना ही इस पर यह दर्ज होता है कि वे कितने दिनों से काम पर लगे हैं। खेलगांव के निर्माण कार्य में लगे अकुशल दर्जे वाले मजदूरों को ८ घंटे के काम के ८५ से १०० रुपये की दिहाड़ी मिलती है जबकि फरवरी २००९ तक दिल्ली में ऐसे कामों के लिए न्यूनतम मजदूरी १४२ रुपये निर्धारित थी।

 

  • खेलगांव परिसर के लिए निर्माण कार्य में लगे मजदूरों में ५ फीसदी तादाद महिलाओं की है।उन्हें समान काम के लिए पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है।

 

  • खेलगांव परिसर के निर्माण कार्य में लगे मजदूरों को बहाल करने वाली कंपनी के बारे में शायद ही कोई जानकारी है।

 

  • मजदूरी के भुगतान का तरीका और अवधि में मनमानापन है और इससे शोषण की झलक मिलती है।किसी भी मजदूरी को कभी भी पूरी मजदूरी एक साथ नहीं दी जाती।उन्हें भुगतान की गई रकम की पर्ची तक नहीं दी जाती। मजदूरों से ठेकेदार एक पंजी पर दस्तखत करवा लेता है। इस पंजी पर भुगतान की गई रकम और कार्यदिवसों अथवा घंटों के लिए यह भुगतान किया गया उसका कोई जिक्र नहीं होता। मजदूरों को हमेशा भय सताता है कि बकाया रकम मिलेगी या नहीं।


  • अंतिम भुगतान(इसे फाइनल कहा जाता है) के समय ठेकेदार शायद ही मजदूर को उसकी पूरी बकाया राशि का भुगतान करता है।