बेरोजगारी

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एक नजर


सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर लगातार ऊंची बनी होने के बावजूद भारत अपनी ग्रामीण जनता की जरुरत के हिसाब से मुठ्ठी भर भी नये रोजगार का सृजन नहीं कर पाया है। नये रोजगारों का सृजन हो रहा है लेकिन यह अर्थव्यवस्था के ऊंचली पादान के सेवा-क्षेत्र मसलन वित्त-जगत, बीमा, सूचना-प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी के दम पर चलने वाले हलकों में हो रहा है ना कि विनिर्माण और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में जहां ग्रामीण इलाकों से पलायन करके पहुंचे कम कौशल वाले लोगों को रोजगार हासिल करने की उम्मीद हो सकती है। किसी तरह घिसट-खिसट करके चलने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था, ग्रामीण इलाकों के कुटीर और शिल्प उद्योगों का ठप्प पड़ना, घटती खेतिहर आमदनी और मानव-विकास के सूचकांकों से मिलती खस्ताहाली की सूचना-ये सारी बातें एकसाथ मिलकर जो माहौल बना रही हैं उसमें ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी को बढ़ना तो है ही, शहरों की तरफ ग्रामीण जनता का पलायन भी होना है।


अर्थव्यवस्था के मंदी की चपेट में आने से पहले भी नये रोजगार का सृजन नकारात्मक वृद्धि के रुझान दिखा रहा था।नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूस) के मुताबिक खरबों डॉलर की हमारी इस अर्थव्यवस्था में हर 10 में 9 व्यक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और कुल भारतीयों का तीन चौथाई हिस्सा रोजाना 20 रुपये में गुजारा करता है। बहुत से अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि गांवों से शहरों की तरफ पलायन अर्तव्यवस्था की तरक्की के लिहाज से एक जरुरी शर्त है। बहरहाल, वैश्विक अर्थव्यवस्था के भीतर भारत कम लागत के तर्क से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है और इससे आमदनी में कम बढ़ोतरी का होना लाजिमी है। ऐसे में चूंकि क्रयशक्ति मनमाफिक नहीं बढ़ रही इसलिए घरेलू मांग में बढोतरी ना होने के कारण नये रोजगारों का सृजन भी खास गति से नहीं हो रहा।



आंकड़ों से जाहिर होता है कि वांछित लक्ष्य तक पहुंचने की जगह रोजगार के मामले में हमारी गाड़ी उलटे रास्ते पर लुढ़कने लगी है।मिसाल के तौर पर साल साल 1994 से 2005 के बीच के दशक में बेरोजगारी में प्रतिशत पैमाने पर 1 अंक की बढ़ोतरी हुई है। अस्सी के दशक के शुरुआती सालों से लेकर 2005 के बीच ग्रामीण पुरुषों में स्वरोजगार प्राप्त लोगों की तादाद 4 फीसदी कम हुई है।आंकड़ों से जाहिर है कि घटती हुई आमदनी के बीच कार्यप्रतिभागिता के मामले में ग्रामीण गरीब एक दुष्चक्र में फंस चुके हैं।

आंकड़ों से यह भी जाहिर होता है कि अस्सी के दशक के शुरुआती सालों से ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के लिए रोजगार की सूरते हाल या तो ज्यों की त्यों ठहरी हुई है या फिर और बिगड़ी दशा को पहुंची है। एक तो किसानों की आमदनी खुद ही कम है उसपर गजब यह कि इस आमदनी का 45 फीसदी हिस्सा कृषि-इतर कामों से हासिल होता है और कृषि-इतर काम कहने से बात थोड़ी छुपती है मगर सीधे सीधे कहें तो यह दिहाड़ी मजदूरी का ही दूसरा नाम है। मजदूरी भी कम मिलती है क्योंकि गांव के दरम्याने में जो भी काम करने को मिल जाय किसानों को उसी से संतोष करना पड़ता है। फिलहाल केवल 57 फीसदी किसान स्वरोजगार में लगे हैं और 36 फीसदी से ज्यादा मजदूरी करते हैं। इस 36 फीसदी की तादाद का 98 फीसदी दिहाड़ी मजदूरी के भरोसे है यानी आज काम मिला तो ठीक वरना आसरा कल मिलने वाले काम पर टिका है।

 



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