बेरोजगारी

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 असंगठित क्षेत्र में रोजगार की स्थिति से संबंधित राष्ट्रीय आयोग यानी नेशनल कमीशन फॉर द इन्टरप्राइजेज इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस) के दस्तावेज-रिपोर्ट ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रोमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर के अनुसार,

http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf


· खेत-मजदूरों की संख्या साल २००४-०५ में ८ करोड़ ७० लाख थी यानी किसानों और खेत-मजदूरों की कुल संख्या(२५ करोड़ ३० लाख) में खेत-मजदूरों की तादाद ३४ फीसदी थी।


· दैनिक रोजगार के आधार पर देखें तो खेत-मजदूरों में बेरोजगारी की स्थिति भयावह है।१६ फीसदी पुरूष खेत-मजदूर और १७ फीसदी महिला खेत-मजदूर बेरोजगार हैं।


· साल १९९३-९४ और २००४-०५ के बीच खेत-मजदूरों के बीच छुपी हुई बेरोजगारी(अंडरएंप्लॉयमेंट) बढ़ी है।साल २००५-०६ में खेत-मजदूरों के बीच बेरोजगारी १६ फीसदी थी।


· खेत-मजदूरों को मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी कितनी हो--इसके बारे में बस एक ही कानूनी प्रावधान है।यह प्रावधान मिनिमम वेजज एक्ट,१९४८(न्यूनतम मजदूरी अधिनियम,१९४८) के नाम से जाना जाता है।साल २००४-०५ में खेत-मजदूरों ने जितने दिन काम किया उसमें लगभग ९१ फीसदी कार्यदिवसों को उन्हें राष्ट्रीय स्तर की न्यूनतम मजदूरी से कहीं कम मेहनताना हासिल हुआ जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एनसीआरएल (एनसीयूएस के दस्तावेज में एनसीआरएल के बारे में जानकारी देते हुए कहा गया है कि-१९९१ में हनुमंत राव की अध्यक्षता में एक आयोग नेशनल कमीशन ऑन रूरल लेबर नाम से बना था।इस आयोग ने ग्रामीण इलाके के लिए एक राष्ट्रीय स्तर पर लागू होने वाली एक आभासी न्यूनतम मजदूरी की अनुशंसा की थी।आयोग ने यह भी कहा था कि ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों को सरकार सामाजिक सुरक्षा के फायदों के तौर पर वृद्धावस्था पेंशन,जीवन बीमा,मेटरनिटी बेनेफिट और काम के दौरान दुर्घटना की स्थिति में मुआवजा फराहम करे।) द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के मानक को आधार मानें तो साल २००४-०५ में खेत-मजदूरों ने जितने दिन काम किया उसमें लगभग ६४ फीसदी कार्यदिवसों को उन्हें कम मेहनताना हासिल हुआ।.


· खेतिहर कामगारों(खेतिहर मजदूर और किसान) की संख्या साल २००४-०५ में २५ करोड़ ९० लाख थी।देश की कुल श्रमशक्ति में खेतिहर कामगारों की तादाद ५७ फीसदी है।इनमें २४ करोड़ ९० लाख ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।इस तरह यह संख्या कुल ग्रामीण श्रमशक्ति (३४ करोड़ ३० लाख) के ७३ फीसदी के बराबर बैठती है।ग्रामीण इलाके की अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र के रोजगार में इनकी हिस्सेदारी ९६ फीसदी की और असंगठित कृषि-क्षेत्र के रोजगार में इनकी हिस्सेदारी ९८ फीसदी की है।


· लगभग दो तिहाई(६४ फीसदी) खेतिहर कामगार स्वरोजगार में लगे हैं,या कहें फिर कह लें कि ग्रामीण श्रमशक्ति जो हिस्सा स्वरोजगार में लगा है वह मूलतः किसान है और बाकि एक तिहाई यानी ३६ फीसदी जीविका के लिए मजदूरी पर निर्भर है और जीविका के लिए मजदूरी पर निर्भर कामगारों में ९८ फीसदी अनियमित मजदूर हैं।


· देश के कुल कामगारों में खेतिहर कामगारों की तादाद साल २००४-०५ में ५६.६ फीसदी थी जबकि साल १९८३ में कुल कामगारों में इनकी तादाद ६८.६ फीसदी थी।इस तरह पिछले २० सालों कुल कामगारों में खेतिहर कामगारों की तादाद में कमी आयी है।ग्रामीण इलाकों में खेतिहर कामगारों की तादाद ८१.६ फीसदी थी।यह संख्या २००४-०५ में घटकर ७२.६ फीसदी रह गई।


·खेतिहर श्रमशक्ति में किसानों की संख्या ज्यादा है,हालांकि प्रतिशत पैमाने पर धीरे-धीरे इनकी संख्या में कमी आयी है।साल १८८३ में खेतिहर श्रमशक्ति में किसानों की संख्या ६३.५ फीसदी थी जबकि साल १९९९-२००० में घटकर ५७.८ फीसदी हो गई।


· साल १९८३-१९८४ और साल १९९३-९४ के बीच की अवधि यानी एक दशक पर नजर रखकर रोजगार की बढ़ोत्तरी की दर की तुलना करें तो पता चलेगा कि खेतिहर रोजगार में पिछले एक दशक में कमी आयी है।जहां साल १९८३-१९८४ में खेतिहर रोजगार में बढ़ोत्तरी की दर १.४ फीसद थी वहीं एक दशक बाद यह दर घटकर ०.८ फीसदी रह गई। हालांकि सकल रोजगार में भी इस अवधि में २.१ फीसदी के मुकाबले १.९ फीसदी की गिरावट आयी लेकिन सकल रोजगार में गिरावट की तुलना में खेतिहर रोजगार में गिरावट की रफ्तार कहीं ज्यादा रही।


· साल १९९३-९४ में भूमिहीन परिवारों की संख्या १३ फीसदी थी जबकि साल २००४-०५ में भूमिहीन परिवारों की संख्या बढ़कर १४.५ फीसदी हो गई।साल २००४-०५ में खेतिहर मजदूरों में १९.७ फीसदी मजदूर भूमिहीन थे जबकि ६० फीसदी से ज्यादा खेतिहर मजदूरों के पास ०.४ हेक्टेयर से भी कम जमीन थी और इनकी संख्या में इस पूरी अवधि में खास बदलाव नहीं आया। ज्यादातर,भूमिहीनता या फिर जमीन के बड़े छोटे टुकड़े पर स्वामित्व होने के कारण ग्रामीण इलाकों में लोग अपने भरण-पोषण के लिए मजदूरी करने को बाध्य होते हैं।




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