Resource centre on India's rural distress
 
 

बेरोजगारी

 

 

एक नजर


सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर लगातार ऊंची बनी होने के बावजूद भारत अपनी ग्रामीण जनता की जरुरत के हिसाब से मुठ्ठी भर भी नये रोजगार का सृजन नहीं कर पाया है। नये रोजगारों का सृजन हो रहा है लेकिन यह अर्थव्यवस्था के ऊंचली पादान के सेवा-क्षेत्र मसलन वित्त-जगत, बीमा, सूचना-प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी के दम पर चलने वाले हलकों में हो रहा है ना कि विनिर्माण और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में जहां ग्रामीण इलाकों से पलायन करके पहुंचे कम कौशल वाले लोगों को रोजगार हासिल करने की उम्मीद हो सकती है। किसी तरह घिसट-खिसट करके चलने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था, ग्रामीण इलाकों के कुटीर और शिल्प उद्योगों का ठप्प पड़ना, घटती खेतिहर आमदनी और मानव-विकास के सूचकांकों से मिलती खस्ताहाली की सूचना-ये सारी बातें एकसाथ मिलकर जो माहौल बना रही हैं उसमें ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी को बढ़ना तो है ही, शहरों की तरफ ग्रामीण जनता का पलायन भी होना है।


अर्थव्यवस्था के मंदी की चपेट में आने से पहले भी नये रोजगार का सृजन नकारात्मक वृद्धि के रुझान दिखा रहा था।नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूस) के मुताबिक खरबों डॉलर की हमारी इस अर्थव्यवस्था में हर 10 में 9 व्यक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और कुल भारतीयों का तीन चौथाई हिस्सा रोजाना 20 रुपये में गुजारा करता है। बहुत से अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि गांवों से शहरों की तरफ पलायन अर्तव्यवस्था की तरक्की के लिहाज से एक जरुरी शर्त है। बहरहाल, वैश्विक अर्थव्यवस्था के भीतर भारत कम लागत के तर्क से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है और इससे आमदनी में कम बढ़ोतरी का होना लाजिमी है। ऐसे में चूंकि क्रयशक्ति मनमाफिक नहीं बढ़ रही इसलिए घरेलू मांग में बढोतरी ना होने के कारण नये रोजगारों का सृजन भी खास गति से नहीं हो रहा।



आंकड़ों से जाहिर होता है कि वांछित लक्ष्य तक पहुंचने की जगह रोजगार के मामले में हमारी गाड़ी उलटे रास्ते पर लुढ़कने लगी है।मिसाल के तौर पर साल साल 1994 से 2005 के बीच के दशक में बेरोजगारी में प्रतिशत पैमाने पर 1 अंक की बढ़ोतरी हुई है। अस्सी के दशक के शुरुआती सालों से लेकर 2005 के बीच ग्रामीण पुरुषों में स्वरोजगार प्राप्त लोगों की तादाद 4 फीसदी कम हुई है।आंकड़ों से जाहिर है कि घटती हुई आमदनी के बीच कार्यप्रतिभागिता के मामले में ग्रामीण गरीब एक दुष्चक्र में फंस चुके हैं।

आंकड़ों से यह भी जाहिर होता है कि अस्सी के दशक के शुरुआती सालों से ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के लिए रोजगार की सूरते हाल या तो ज्यों की त्यों ठहरी हुई है या फिर और बिगड़ी दशा को पहुंची है। एक तो किसानों की आमदनी खुद ही कम है उसपर गजब यह कि इस आमदनी का 45 फीसदी हिस्सा कृषि-इतर कामों से हासिल होता है और कृषि-इतर काम कहने से बात थोड़ी छुपती है मगर सीधे सीधे कहें तो यह दिहाड़ी मजदूरी का ही दूसरा नाम है। मजदूरी भी कम मिलती है क्योंकि गांव के दरम्याने में जो भी काम करने को मिल जाय किसानों को उसी से संतोष करना पड़ता है। फिलहाल केवल 57 फीसदी किसान स्वरोजगार में लगे हैं और 36 फीसदी से ज्यादा मजदूरी करते हैं। इस 36 फीसदी की तादाद का 98 फीसदी दिहाड़ी मजदूरी के भरोसे है यानी आज काम मिला तो ठीक वरना आसरा कल मिलने वाले काम पर टिका है।

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[inside]श्रमबल सर्वेक्षण(2017-18) के नये आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित शोध आलेख सर्जिकल स्ट्राइक ऑन एम्पलॉयमेंट: द रिकार्ड ऑफ द फर्स्ट मोदी गवर्नमेंट[/inside] के अनुसार:

 

--- साल 2017-18 में ग्रामीण क्षेत्रों के कार्य-योग्य आयु के 25 फीसद पुरुष और 75 फीसद महिलाओं को रोजगार हासिल नहीं था.

 

--- साल 2011-12 में रोजगार की दशा पर केंद्रित एनएसएसओ का पिछला सर्वेक्षण हुआ था और साल 2017-18 में हालिया पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे. इस अवधि के बीच बेरोजगारी की दशा में नाटकीय बदलाव आये हैं.

 

--- अखिल भारतीय स्तर पर देखें तो उक्त अवधि में ग्रामीण क्षेत्रों की कार्य-योग्य आयु वाली आबादी में रोजगार-प्राप्त पुरुषों की संख्या में 6.8 प्रतिशत की कमी आयी है जबकि कार्य-योग्य उम्र की ग्रामीण महिला आबादी में रोजगार प्राप्त महिलाओं की संख्या 11.7 प्रतिशत घटी है.

 

--- शहरी क्षेत्रों में कार्य योग्य आबादी में रोजगार प्राप्त पुरुषों की संख्या उक्त अवधि(2011-12 से 2017-18 के बीच) में 4.2 प्रतिशत घटी है जबकि महिलाओं में 1.2 प्रतिशत.

 

--- कार्य प्रतिभागिता दर में गिरावट का रुझान नये आंकड़ों में तकरीबन सभी बड़े राज्यों में नजर आ रहा है और यह रुझान ग्रामीण तथा शहरी एवं स्त्री तथा पुरुष कामगारों पर समान रुप से लागू होता है.

 

---- देश की सर्वाधिक आबादी वाले 22 राज्यों में कोई भी राज्य ऐसा नहीं जहां कार्य-प्रतिभागिता दर में कमी नहीं आयी हो.

 

--- कार्य-योग्य आयु की ग्रामीण महिला आबादी में बेरोजगारों की तादाद में इजाफा विशेष रुप से उल्लेखनीय है. अखिल भारतीय स्तर पर देखें तो साल 2017-18 में कार्य-योग्य उम्र की मात्र एक चौथाई महिलाओं को रोजगार हासिल था.

 

---- राज्य स्तर पर यह आंकड़ा और भी ज्यादा खराब स्थिति के संकेत करता है. मिसाल के लिए, साल 2017-18 में बिहार में मात्र 4 फीसद ग्रामीण महिलाओं को रोजगार हासिल हुआ. उत्तरप्रदेश और पंजाब में 15 प्रतिशत से भी कम ग्रामीण महिलाओं(कार्य-योग्य आयु की) को रोजगार हासिल हुआ.

 

--- देश की सर्वाधिक आबादी वाले 22 राज्यों में केवल तीन राज्य--- आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा हिमाचल प्रदेश ही ऐसे हैं जहां साल 2017-18 में कार्य-योग्य आयु की 50 फीसद से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को रोजगार हासिल हुआ. साल 2011-12 में 22 राज्यों में से 7 राज्यों में 50 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को रोजगार हासिल हुआ था.

 

---- साल 2011-12 से 2017-18 के बीच कृषि-क्षेत्र में रोजगार पाने वाले पुरुषों की तादाद में 4 प्रतिशत तथा इस क्षेत्र में रोजगार पाने वाली महिलाओं की तादाद में 6 प्रतिशत की कमी आयी है. साल 2017-18 में कृषि-क्षेत्र में 28 प्रतिशत ग्रामीण पुरुषों तथा 13 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं को कृषि-क्षेत्र में रोजगार हासिल हुआ.

 

--- उक्त अवधि में निर्माण-कार्य(कंस्ट्रक्शन) के क्षेत्र में रोजगार की स्थिति में भारी तब्दीली आयी है. साल 2004-05 से 2011-12 के बीच निर्माण-कार्य का क्षेत्र रोजगार के विस्तार के लिहाज से प्रमुख क्षेत्र बनकर उभरा. साल 2004-05 से 2011-12 के बीच निर्माण-कार्य के क्षेत्र में रोजगार-प्राप्त लोगों में ग्रामीण पुरुषों की तादाद 3.4 प्रतिशत तथा ग्रामीण महिलाओं की तादाद 1.1 प्रतिशत बढ़ी.

 

--- निर्माण-कार्य के क्षेत्र में रोजगार-प्राप्त ग्रामीण आबादी के बढ़ने की प्रमुख वजह रही रोजगार की तलाश में पलायन कर निकले लोगों का किसी अन्य क्षेत्र में रोजगार हासिल ना होना और अंतिम विकल्प के रुप में निर्माण-कार्य के क्षेत्र में गहन परिश्रम और सामाजिक सुरक्षा विहीन काम चुनना.

 

--- साल 2011-12 के बाद निर्माण-कार्य के क्षेत्र में उपलब्ध रोजगार में कमी आयी है. साल 2011-12 से 2017-18 के बीच निर्माण-कार्य के क्षेत्र में रोजगार प्राप्त लोगों की तादाद में ग्रामीण पुरुषों की संख्या 0.4 प्रतिशत बढ़ी है जबकि ग्रामीण महिलाओं की तादाद में 0.7 प्रतिशत की कमी आयी है.

 

--- दिहाड़ी कामगारों के एतबार से देखें तो ग्रामीण और शहरी तथा स्त्री और पुरुष सरीखे तमाम कामगार-वर्गों के लिए रोजगार के अवसर कम हुए हैं. रोजगार के अवसरों में कुल 3 प्रतिशत की कमी आयी है.

 

---- स्वरोजगार प्राप्त लोगों की संख्या में भी कमी के रुझान हैं. साल 2011-12 में स्वरोजगार प्राप्त लोगों की तादाद 20.2 प्रतिशत थी जो साल 2017-18 में घटकर 18.1 प्रतिशत हो गई. 

 

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लेबर ब्यूरो की पांचवी सालाना एम्पलॉयमेंट-अनएम्पलॉयमेंट सर्वे(2015-16), खंड-1 साल 2015 के अप्रैल से दिसंबर के बीच हुए सर्वेक्षण पर आधारित है. सर्वेक्षण के लिए नमूने के रुप में 1,56,563 घरों का चयन ग्रामीण इलाके से तथा 67,780 घरों का चयन शहरी इलाके से हुआ. 

सर्वेक्षण में 7,81,793 व्यक्तियों का साक्षात्कार लिया गया जिसमें 4,48,254 व्यक्ति ग्रामीण घरों से तथा 3,33,539 व्यक्ति शहरी घरों से थे.


[inside]लेबर ब्यूरो(चंडीगढ़) के पांचवें सालाना एम्पलॉयमेंट-अनएम्पलॉयमेंट सर्वे(2015-16) के खंड-1( सितंबर 2016 में जारी) के मुख्य तथ्य[/inside] : 

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•  अगर यूपीएस(यूजअल प्रिन्सपल स्टेटस्) को आधार बनायें तो राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी की दर 5.0 प्रतिशत है. ग्रामीण इलाकों के लिए बेरोजगारी दर 5.1 प्रतिशत है जबकि शहरी इलाकों के लिए 4.9 प्रतिशत.


• राष्ट्रीय स्तर पर महिला कामगारों में बेरोजगारी की दर 8.7 प्रतिशत है जबकि पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 4.0 प्रतिशत का है.


• राष्ट्रीय स्तर पर श्रमबल प्रतिभागिता दर (लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट-एलएफपीआर) 50.3 प्रतिशत है. 


•ग्रामीण इलाकों में एलएफपीआर 53 प्रतिशत है जबकि शहरी इलाकों के लिए यह आंकड़ा 43.5 प्रतिशत का है.


•  भारत में महिला कामगारों के लिए एलएफपीआर राष्ट्रीय स्तर पर 23.7 प्रतिशत है जबकि पुरुष कामगारों के लिए 48 प्रतिशत जबकि ट्रांसजेंडर के लिए 48 प्रतिशत.


• यूपीएस पद्धति को आधार बनाते बनायें तो राष्ट्रीय स्तर पर वर्कर्स पॉपुलेशन रेशियो(डब्ल्यूपीआर) के 47.8 प्रतिशत होने के अनुमान हैं. 


• ग्रामीण इलाकों में डब्ल्यूपीआर के 50.4 प्रतिशत होने के अनुमान हैं जबकि शहरी इलाकों के लिए यह आंकड़ा 41.4 प्रतिशत का है.


• महिला कामगारों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर डब्ल्यूपीआर 21.7 प्रतिशत है जबकि पुरुष कामगारों के लिए 72.1 प्रतिशत तथा ट्रांसजेंडर के लिए 45.9 प्रतिशत.


• चाहे यूपीएस पद्धति को आधार बनायें या फिर यूपीपीएस(यूजअल प्रिन्सिपल एंड सब्सिडरी स्टेटस्) को रोजगार-प्राप्त लोगों में सर्वाधिक संख्या स्वरोजगार की श्रेणी में लगे कामगारों की है. 

 

• भारत में 46.6 प्रतिशत कामगार जीविका के लिए स्वरोजगार की श्रेणी में लगे हैं, अनियत कालिक रोजगार में लगे कामगारों की तादाद 32.8 प्रतिशत है जबकि 17 फीसद कामगार नियमित वेतन वाले रोजगार की श्रेणी में लगे हैं. शेष 3.7 प्रतिशत कामगार अनुबंध आधारित कामगार की श्रेणी में हैं.


•  राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 46.1 प्रतिशत कामगार कृषि, वानिकी तथा मत्स्यपालन के क्षेत्र में कार्यरत हैं. यह अर्थव्यवस्था का प्राथमिक क्षेत्र कहलाता है. द्वितीयक( विनिर्माण) क्षेत्र में 21.8 प्रतिशत तथा तृतीयक क्षेत्र(सेवा) में 32 प्रतिशत कामगारों को रोजगार हासिल है. 


• भारत में स्वरोजगार में लगे 67.5 प्रतिशत कामगारों की औसत मासिक आमदनी 7500 रुपये से ज्यादा नहीं है. स्वरोजगार में लगे केवल 0.1 प्रतिशत कामगारों की आमदनी 1 लाख रुपये से ज्यादा है.


• इसी तरह नियमित वेतन/पारिश्रमिक पाने वाले 57.2 प्रतिशत कामगारों की औसत मासिक आमदनी 10 हजार रुपये से ज्यादा नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 38.5 प्रतिशत अनुबंधित श्रेणी के कामगार तथा 59.3 प्रतिशत अनियतकालिक कामगारों की औसत मासिक आमदनी मात्र 5000 रुपये तक सीमित है.


• भारत में ज्यादातर बेरोजगार व्यक्ति जीविका पाने के लिए एक से ज्यादा तरीके अपनाते हैं, जैसे दोस्तों और रिश्तेदारों से संपर्क साधना(24.1 प्रतिशत) तथा नौकरी के विज्ञापन के बरक्स आवेदन करना(23.7 प्रतिशत) और एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज का सहारा लेना(4.3 प्रतिशत).


• देशस्तर पर देखें तो बीए स्तर की शिक्षा प्राप्त 58.3 प्रतिशत तथा एमए स्तर तक की शिक्षा प्राप्त 62.4 प्रतिशत बेरोजगारों का कहना है उनकी शिक्षा या अनुभव के स्तर के लायक काम मौजूद नहीं है और यही उनकी बेरोजगारी का प्रधान कारण है. बीए स्तर की शिक्षा प्राप्त 22.8 प्रतिशत तथा एमए स्तर की शिक्षा प्राप्त 21.5 प्रतिशत बेरोजगारों का कहना था कि पारिश्रमिक कम होना उनकी बेरोजगारी का प्रधान कारण है.


• भारत में नियमित वेतन वाले 64.9 प्रतिशत कामगार तथा 95.3 प्रतिशत अनियतकालिक कामगार बिना किसी लिखित करार के जीविकोपार्जन में लगे हैं. नियमित वेतन वाले तकरीबन 27 प्रतिशत कामगार तथा अनुबंधित श्रेणी में आने वाले तकरीबन 11.5 प्रतिशत कामगार तीन साल या इससे अधिक अवधि के लिखित करार पर जीविकापार्जन में लगे हैं. 

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राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 68 वें दौर के आकलन पर आधारित [inside]एम्पलॉयमेंट एंड अनएम्पलॉमेंट सिचुएशन अमांग सोशल ग्रुप्स इन इंडिया(प्रकाशित जनवरी 2015)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

 

- भारत में करीब 68.8 प्रतिशत परिवार ग्रामीण क्षेत्रों से थे जो कुल जनसंख्या का करीब 71.2 प्रतिशत है।



-- देश में करीब 8.8 प्रतिशत परिवार अनुसूचित जनजाति के थे। अनुसूचित जाति के परिवारों की संख्या  करीब 18.7 प्रतिशत और अन्य पिछड़ी जातियों के परिवारों की संख्या 43.1 प्रतिशत है।

-- ग्रामीण भारत में वैसा परिवार जिसके आय का प्रमुख स्रोत स्वरोजगार था, यह अन्य वर्ग में सबसे अधिक(58.4 प्रतिशत) था। इसके बाद अति पिछड़ा वर्ग(52.9 प्रतिशत), अनुसूचित जनजाति(49.5 प्रतिशत) तथा अनुसूचित जाति(33.7 प्रतिशत) परिवारों का स्थान है।

--ग्रामीण भारत में, उन परिवारों का अनुपात जिनकी आमदनी का प्रमुख स्रोत आकस्मिक श्रम(दिहाड़ी) है, सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति(52.6प्रतिशत) है। अनुसूचित जनजाति के बीच ऐसे परिवारों का अनुपात 38.3 प्रतिशत है जबकि अतिपिछड़ा वर्ग में 32.1 प्रतिशत। अन्य श्रेणी में शामिल 21 प्रतिशत परिवार आय अर्जन के प्रमुख स्रोत के रुप में आकस्मिक श्रम पर आश्रित हैं।

-- अन्य की श्रेणी में शामिल देश के केवल 13.3 प्रतिशत ग्रामीण परिवार ही आय-अर्जन के प्रमुख स्रोत के रुप में नियमित वेतन पर आश्रित हैं। अनुसूचित जनजाति के ऐसे परिवारों की संख्या ग्रामीण इलाकों में 6.3 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति के ऐसे परिवारों की संख्या 8.5 प्रतिशत है। आमदनी के प्रमुख स्रोत के रुप में नियमित वेतन पर आश्रित अति पिछड़ा वर्ग के ग्रामीण परिवारों की संख्या 37.6 प्रतिशत है।

-- देश के ग्रामीण अंचल में अति पिछड़ा वर्ग के 3.2 प्रतिशत परिवारों के पास धारित भूमि का आकार 4.01 हैक्टेयर या उससे अधिक है। अनुसूचित जनजाति के करीब 1.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास कुल धारित भूमि 4.01 हैक्टेयर या उससे अधिक है जबकि अनुसूचित जाति के ऐसे परिवारों की संख्या केवल 0.8 प्रतिशत है।

-- देश के ग्रामीण अंचलों में अनुसूचित जनजाति के 57.2 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति के 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास मनरेगा जॉबकार्ड हैं।

-- मनरेगा जॉबकार्ड वाले ग्रामीण ओबीसी परिवारों की संख्या 34.2 प्रतिशत है जबकि अन्य की श्रेणी में शामिल मनरेगा जॉबकार्ड वाले परिवारों की संख्या एसटी-एससी समुदायों की तुलना में तकरीबन दोगुनी से कम(27.1 प्रतिशत) है।

 

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नेशनल सैंपल सर्वे के 66 वें दौर की गणना पर आधारित [inside]स्टेटस ऑव एजुकेशन एंड वोकेशनल ट्रेनिंग इन इंडिया-एनएसएसओ[/inside] नामक दस्तावेज के कुछ तथ्य-

http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/nss_report_551.pdf


यह रिपोर्ट जुलाई 2009 से जून 2010 के दौरान संचालित एनएसएस के 66 वें दौर में रोजगार में बेरोजगारी की स्थिति पर किए गए आठवें पंचवार्षिक सर्वेक्षण पर आधारित है।  सर्वेक्षण के अंतर्गत 7402 गांवों और 5252 नगरीय प्रखंडों के 100957 परिवारों( ग्रामीण क्षेत्र के 59129 और नगरीय क्षेत्र के 41828)का अवलोकन करके आंकड़े एकत्र किए गए। रिपोर्ट की कुछ मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-

- तकरीबन 70 फीसदी परिवार ग्रामीण इलाके में बसते हैं यानि देश की जनसंख्या का 73 फीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाके में है।

- ग्रामीण इलाके में परिवार का औसत आकार 4.6 व्यक्तियों का है जबकि शहरी इलाके में 4.1 व्यक्तियों का। साल 2009-10 के दौरान भारतीय परिवारों में लिंग अनुपात औसतन 936 का था। प्रतिहजार पुरुषों पर ग्रामीण इलाके में महिलाओं की संख्या 947 थी जबकि शहरों में 909।

- साल 2009-10 के दौरान तकरीबन 52 फीसदी ग्रामीण परिवार स्वरोजगार में लगे थे जबकि 39 फीसदी ग्रामीण परिवार आमदनी के लिए मजदूरी पर निर्भर थे। शहरी इलाके में केवल 39 फीसदी परिवार ऐसे थे जिन्हें नियमित रोजगार के तौर पर आमदनी का स्थायी जरिया हासिल था, जबकि 41 फीसदी परिवार आमदनी के लिए स्वरोजगार पर निर्भर थे।

- ग्रामीण क्षेत्रों के करीब 20 प्रतिशत और नगरीय क्षेत्र के करीब 6 प्रतिशत परिवारों में 15 वर्ष एवं उससे अधिक आयु वाला कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो समझदारी के साथ एक साधारण संदेश को लिख या पढ़ सके।

- 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं के मामले में देखा गया कि ग्रामीण परिवारों के करीब 40 प्रतिशत और नगरीय परिवारों की करीब 15 प्रतिशत महिलायें साक्षर नहीं थीं।

- वैसे ग्रामीण परिवार जिनमें 15 वर्ष या इससे अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति साक्षर नहीं था, सबसे कम तादाद में केरल(1 फ्रतिशत) में पाये गए जबकि झारखंड में ऐसे परिवारों की तादाद 35 फीसदी थी। नगरीय क्षेत्रों में एक बार फिर से ऐसे परिवारों की सबसे कम तादाद केरल(0.4 फ्रतिशत) में थी जबकि बिहार के नगरीय क्षेत्रों में ऐसे परिवारों की संख्या 15 प्रतिशत पायी गई।

- भारत में साल 2009-10 के दौरान ग्रामीण इलाकों में साक्षरता केरल में सबसे अधिक(87फीसदी)  थी जबकि बिहार के ग्रामीण इलाकों में सबसे कम(53 फीसदी)। दूसरी तरफ प्रमुख राज्यों के नगरीय क्षेत्रों में यह साक्षरता जिन राज्यों में सर्वाधिक थी उनके नाम हैं- करेल, असम और हिमाचल( प्रत्येक में 88 प्रतिशत) उत्तरप्रदेश के नगरीय इलाकों में यह साक्षरता सबसे कम यानि 70 प्रतिशत पायी गई।

- 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वाले व्यक्तियों में केवल 2 फीसदी के पास तकनीकी डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट थे। यह अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 1 प्रतिशत एवं नगरीय क्षेत्रों में 5 प्रतिशत था।

- 5 से 29 वर्ष की आयु-वर्ग के व्यक्तियों में शैक्षिक संस्था में वर्तमान उपस्थिति करीब 54 प्रतिशत था। पुरुषों में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत है जबकि महिलाओं में 50 फीसदी।

- ग्रामीण पुरुषों में(5-29 वर्ष) जो वर्तमान में उपस्थिति नहीं दे रहे थे लेकिन कभी किसी शैक्षिक संस्था में उपस्थित हुए थे,करीब 62 फीसदी ने बताया कि शैक्षिक संस्था में उनकी मौजूदा अनुपस्थिति का कारण परिवार के लिए अनुपूरक आमदनी जुटाना है। इस मामले में नगरीय क्षेत्र में ऐसा कहने वाले पुरुषों की संख्या 66 फीसदी थी।

- जहां तक ग्रामीण महिलाओं का सवाल है,46 फीसदी महिलाओं ने कहा कि घरेलू कार्य की बाध्यता के कारण अब उनका शैक्षिक संस्था में जाना संभव नहीं होता, लेकिन वे पहले जरुर किसी ना किसी शैक्षिक संस्था मे गई थीं। नगरीय क्षेत्र में ऐसा कहने वाली महिलाएं 47 प्रतिशत थीं।

- 15-29 वर्ष के व्यक्तियों में करीब 2 प्रतिशत ने औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की रिपोर्ट दरज की जबकि अन्य 5 प्रतिशत ने गैर-औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की रिपोर्ट दर्ज करवायी।

- 15-29 आयु वर्ग में उन व्यक्तियों का अनुपात जिन्होंने औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया , बेरोजगारों में सर्वाधिक था। नौकरी पाने वालों में ऐसे व्यक्तियों का अनुपात 2 फीसदी पाया गया जबकि बेरोजगारों में 12 प्रतिशत।

- 15-29 वर्ष के आयुवर्ग के व्यक्तियों में जिन्होंने औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया था सबसे अधिक मांग वाला प्रशिक्षण का क्षेत्र कंप्यूटर ट्रेडस् था और 26 फीसदी ने ऐसा प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

- ग्रामीण पुरुषों में प्रशिक्षण की सर्वाधिक मांग ड्राइविंग और मोटर मैकेनिक के क्षेत्र(18 फीसदी) रही। ग्रामीण इलाके में इसके बाद प्रशिक्षण की सर्वाधिक मांग कंप्यूटर ट्रेडस्(17) फीसदी रही। शहरी क्षेत्र में प्रशिक्षण की सर्वाधिक मांग वाला क्षेत्र कंप्यूटर ट्रेडस् (30 फीसदी) रहा जबकि इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रानिक इंजीनियरिंग में प्रशिक्षण का क्षेत्र  मांग के मामले में दूसरे नंबर(19 फीसदी) पर रहा।

• ग्रामीण इलाके की महिलाओं में प्रशिक्षण की सर्वाधिक मांग का क्षेत्र टैक्सटाईल(26 फीसदी) से संबंधित रहा। कंप्यूटर ट्रेडस की मांग 18 फीसदी रही जबकि स्वास्थ्य और इससे जुड़े देखभाल के कामों में प्रशिक्षण से संबंधित मांग का स्थान तीसरा(14 फीसदी) रहा। इसकी तुलना में शहरी क्षेत्र में महिलाओं के बीच प्रशिक्षण के मामले में सर्वाधिक मांग कंप्यूटर ट्रेडस्(32 प्रतिशत) की रही।

 

 

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 अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(आईएलओ) द्वारा जारी [inside]ग्लोबल एम्पलॉयमेंट ट्रेन्डस्- रिकवरिंग फ्राम सेकेंड जॉब डिप[inside] नामक दस्तावेज के अनुसार

http://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---dgreports/---dcomm/---publ/documents/publication/wcms_202326.pdf

 

             वैश्विक वित्तीय संकट के पांचवें साल में, विश्वस्तर पर अर्थव्यवस्था की वृद्धि-दर में कमी आई है और एक बार फिर से बेरोजगारी बढ़ रही है। साल 2012 में विश्वस्तर पर 19 करोड़ 70 लाख लोग बेरोजगार थे। इसके अतिरिक्त इसी साल तकरीबन 3 करोड़ 90 लाख लोग श्रम-बाजार से बाहर हुए क्योंकि पहले की तुलना में नौकरियां कम हो गईं।

             अनुमान है कि बेरोजगारी की दर अगले दो सालों में बढ़ेगी, साल 2013 में बेरोजगारों की संख्या में वैश्विक स्तर पर 51 लाख का इजाफा होगा और इस संख्या में 2014 में 30 लाख बेरोजागार और जुड़ जायेंगे।

             साल 2012 में बेरोजगारों की संख्या में हुई वृद्धि का एक चौथाई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित रहा जबकि तीन चौथाई विश्व के अन्य क्षेत्रों में। पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया और उप-सहारीय अफ्रीका सबसे ज्यादा बेरोजगारी प्रभावित इलाके रहे।.

             भारत की विकास दर 4.9 फीसदी पर पहुंच गई जो पिछले एक दशक में सबसे कम विकास दर है( यह आईएलओ का आकलन है, भारत सरकार का आकलन 2012 के लिए 5.9 फीसदी की विकासदर का है)। पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में जीडीपी की वृद्धि-दर में 1.6 फीसदी की गिरावट आई है।

             भारत में, निवेश में हुई वृद्धि का योगदान साल 2012 में जीडीपी की वृद्धि में 1.5 फीसदी रहा जो साल 2012 की तुलना में 1.8 फीसदी कम है। इसी तरह साल 2012 में जीडीपी की वृद्धि में उपभोग का योगदान 2.8 फीसदी रहा जबकि साल 2011 में यह 3.2 फीसदी था।

             विश्व की चुनिन्दा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत ही एकमात्र देश है जहां साल 2012 में मुद्रास्फीति बढ़ी है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 10 फीसदी की बढोतरी हुई है। साल 2011 में यह बढोत्तरी 9 फीसदी की थी।

             जैसा कि ग्लोबल एम्पलॉयमेंट ट्रेन्डस् 2012 रिपोर्ट में कहा गया है, साल 2000 के दशक में दक्षिण एशिया में तेज आर्थिक वृद्धि हुई है लेकिन यह वृद्धि श्रम की उत्पादकता में बढोत्तरी का परिणाम है ना कि नौकरियों की संख्या में हुई वृद्धि का। इस परिघटना को जॉबलेस ग्रोथ यानि बिना नौकरी के विकास की संज्ञा दी जाती है और परिघटना सबसे ज्यादा भारत में दीखती है।

             युवाओं के बीच सर्वाधिक बेरोजगारी मालदीव में पायी गई है। साल 2006 में इसकी दर मालदीव में 22.2 फीसदी थी जबकि भारत में यही आंकड़ा साल 2010 के लिए 10 फीसदी से ज्यादा का है।

             भारत में साल 2004-05 से 2009-10 के बीच कुल रोजगार की संख्या में महज 27 लाख की बढ़त हुई जबकि इसके पीछे के पाँच सालों(1999-2000 से 2004-05 के बीच) रोजगार की संख्या में इजाफा 6 करोड़ का हुआ था।

             विश्व के अनेक क्षेत्रों के समान आर्थिक-वृद्धि दक्षिण एशिया में भी अर्थव्यवस्था के संगठित क्षेत्र में बेहतर नौकरियां सृजित कर पाने में नाकाम रही है। यह बात सबसे ज्यादा भारत में दीखती है। साल 1999-2000 में भारत में संगठित क्षेत्र का योगदान नौकरियों में 9 फीसदी का था जो साल 2009-10 में घटकर 7 फीसदी हो गया, जबकि ये साल सर्वाधिक तेज आर्थिक-वृद्धि के साल माने जाते हैं।

             उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में असंगठित क्षेत्र (कृषि-एतर) में कामगारों की 83.6 फीसदी तादाद है(साल 2009-10) जबकि पाकिस्तान में यह तादाद इसी अवधि के लिए 78.4 फीसदी तथा श्रीलंका में 62.1 फीसदी है।

             दक्षिण एशिया में संरचनागत बदलाव की प्रक्रिया चल पड़ी है लेकिन इसका दायरा और दिशा अभी दोनों अनिश्चित हैं। खात तौर पर यह बात अभी अनिश्चित है कि क्या विनिर्माण का क्षेत्र(मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर) भारत जैसे देशों में उस तादाद को खपा सकेगा जो फिलहाल नौकरी की तलाश में हैं।मिसाल के लिए भारत में साल 2009-10 में कामगारों की तादाद महज 11 फीसदी थी और एक दशक पहले की स्थिति से तुलना करने पर इसे ऊँचा नहीं माना जा सकता।

             भारत में अब भी रोजगार देने के मामले में खेती का योगदान बहुत बड़ा है। साल 2010 में देश के कामगारों का 51.1 फीसदी को खेती से रोजगार हासिल था। नेपाल में साल 2001 के लिए यही आंकड़ा 65.7 फीसदी का था। इसके विपरीत मालदीव में रोजगार में सेवाक्षेत्र का योगदान साल 2006 में सर्वाधिक(60 फीसदी) था जबकि श्रीलंका में साल 2010 में सेवाक्षेत्र का योगदान रोजगार देने के मामले में 40.4 फीसदी का रहा।

             भारत जैसे देश में रोजगार-वृद्धि की दर कम रहने का एक बड़ा कारण महिला कार्यशक्ति की प्रतिभागिता दर का कम होना है। भारत में महिला कार्यशक्ति की प्रतिभागिता साल साल 2004-05 में 37.3 फीसदी थी जो साल 2009-10 में घटकर 29.0 फीसदी पर आ गई।

             भारत में उच्चकौशल के कामगारों के बीच बेरोजगारी ज्यादा है। डिप्लोमाधारी भारतीय पुरुषों के बीच साल 2009-10 में बेरोजगारी 18.9 फीसदी थी तो ऐसी महिलाओं के बीच 34.5 फीसदी। बहरहाल जिन लोगों ने प्रौद्योगिकी-उन्मुख शिक्षा हासिल की है उनके बीच बेरोजगारी की दर इससे कम है।

             इसके अतिरिक्त भारत में बेरोजगारी का एक पक्ष यह भी है कि काम की प्रकृति से रोजागार तलाश करने वाले लोगों के कौशल का मेल नहीं हो पा रहा और इस कारण नियोक्ताओं को खाली पदों पर नियुक्ति करने में कठिनाई हो रही है। साल 2011 में प्रकाशित मैनपॉवर टैलेंट शार्टेज सर्वे के अनुसार तकरीबन 67 फीसदी नियोक्ताओं का कहना था कि उन्हें खाली पदों को भरने के लिए योग्य लोग नहीं मिल रहे।

             युवाओं के बीच सर्वाधिक बेरोजगारी मालदीव में पायी गई है। साल 2006 में इसकी दर मालदीव में 22.2 फीसदी थी जबकि भारत में यही आंकड़ा साल 2010 के लिए 10 फीसदी से ज्यादा का है।

 

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नेशनल सैम्पल सर्वे द्वारा जारी(24 जून,2011) [inside]की इंडीकेटर्स् ऑव एम्पलॉयमेंट एंड अन-इम्पलॉयमेंट इन इंडिया-2009-10[/inside] नामक दस्तावेज से संबंधित (प्रेस विज्ञप्ति) के अनुसार-

http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/Press_Note_KI_E&UE_66th_English.pdf:

सर्वे के 66 वें दौर से प्राप्त भारत में रोजगार और बेरोजगारी की सूरते हाल से संबंधित ये आंकड़े कुल 1,00,957 परिवारों के आकलन पर आधारित हैं। इनमें से 59,129 परिवार ग्रामीण क्षेत्र के हैं और 41,828 परिवार शहरी क्षेत्र के। गांवों(कुल 7,402 ) और शहरी प्रखंडों (कुल 5,252)  का चयन देश के सभी प्रदेशों और केद्रशासित क्षेत्रों को मिलाकर किया गया। इस आकलन में जिन क्षेत्रों को छोड़ा गया है उसका ब्यौरा है-(i) बस-रुट से पाँच किलोमीटर दूर पड़ने वाले नगालैंड के गांव (ii) वर्षभर यातायात के लिहाज से सुगम ना रहने वाले अंडमान निकोबार के कुछ गांव (iii) लेह, करगिल और जम्मू-कश्मीर का पूंछ जिला।

 

 

राष्ट्रीय स्तर पर, कामगारों की सकल संख्या में 51 फीसदी तादाद स्वरोजगार में लगे लोगों की है। तकरीबन 33.5 फीसदी तादाद दिहाड़ी मजदूरी करने वालों की और 15.6 फीसदी तादाद नियमित मजदूरी या वेतन पाने वालों की है।

 

ग्रामीण क्षेत्र के कामगारों में 54.2 फीसदी तादाद स्वरोजगार में लगे लोगों की है। तकरीबन 38.6 फीसदी लोग दिहाड़ी मजदूर की श्रेणी में हैं और 7.3 कामगार नियमित मजदूरी या वेतन पाने वाले हैं।.

 

शहरी क्षेत्र के कामगारो में 41.1 फीसदी तादाद स्वरोजगार में लगे लोगों की है, 17.5 फीसदी दिहाड़ी मजदूर हैं और नियमित मजदूरी या वेतन पाने वाले कामगारों की संख्या 41.4 फीसदी है।

 

2. उद्योगवार कामगारों की तादाद

 

ग्रामीण क्षेत्रों में तकरीबन 63 फीसदी पुरुष कामगार कृषिक्षेत्र में कार्यरत हैं जबकि अर्थव्यवस्था के द्वितीयत और तृतीयक क्षेत्र में लगे कामगारों की तादाद क्रमश 19 फीसदी और 18 फीसदी है। महिला कामगारों की भारी संख्या कृषि-क्षेत्र में कार्यरत है। कृषिक्षेत्र में कार्यरत महिला कामगारों की संख्या 79 फीसदी है जबकि अर्थव्यवस्था के द्वतीयत और तृतीयक क्षेत्र में कार्यरत महिला कामगारों की संख्या क्रमश 13 फीसदी और 8 फीसदी है।

 

शहरी क्षेत्रों में यह तस्वीर एकदम अलग है। अर्थव्यवस्था के तृतीयक क्षेत्र में तकरीबन 59 फीसदी स्त्री-पुरुष कामगार कार्यरत हैं जबकि द्वितीयक क्षेत्र में कार्यरत पुरुषों की तादाद 35 फीसदी और महिलाओं की 33 फीसदी है। शहरी श्रमशक्ति की कृषिक्षेत्र में हिस्सेदारी पुरुषों के मामले में 6 फीसदी और स्त्रियों के मामले में 14 फीसदी है।

 

3.दिहाड़ी मजदूरों और नियमित पारिश्रमिक वाले कामगारों की पारिश्रमिक-दर(वेजरेट)

 

नियमित पारिश्रमिक या वेतन पाने वाले कामगारों के संबंध में- शहरी क्षेत्र में औसत पारिश्रमिक दर. 365 रुपये प्रतिदिन और ग्रामीण क्षेत्रों में. 232 रुपये प्रतिदिन है। ग्रामीण क्षेत्र में इस श्रेणी के पुरुष कामगारों के लिए प्रतिदिन औसत पारिश्रमिक. 249 रुपये और महिलाओं के लिए 156 रुपये पायी गई।इस तरह स्त्री-पुरुष कामगारों के पारिश्रमिक दर में अन्तर 0.63 अंकों का है।. शहरी क्षेत्र में इस श्रेणी के पुरुष कामगारों के लिए प्रतिदिन औसत पारिश्रमिक. 377 रुपये और महिलाओं के लिए 309 रुपये पायी गई।इस तरह स्त्री-पुरुष कामगारों के पारिश्रमिक दर में अन्तर 0.82 अंको का है।

 

दिहाड़ी मजदूरों के संबंध में- ग्रामीण क्षेत्र में इस श्रेणी के कामगारों के लिए प्रतिदिन पारिश्रमिक की दर ( सरकारी काम को छोड़कर) 93 रुपये पायी गई जबकि शहरी क्षेत्र में 122 रुपये। ग्रामीण क्षेत्रों में दिहाड़ी मजदूरी के काम में लगे पुरुष मजदूर को प्रतिदिन औसतन 102 रुपये के हिसाब से काम मिला जबकि महिला श्रमिक को. 69 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से।शहरी क्षेत्र में पुरुष श्रमिक को दिहाड़ी. 132 रुपये प्रतिदिन और महिला को. 77 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से हासिल हुई।.

 

ग्रामीण क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले पुरुष श्रमिक को सरकारी काम में मजदूरी (मनरेगा के अन्तर्गत मिलने वाले काम छोड़कर) औसतन. 98 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मिली जबकि महिला को 86 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से। मनरेगा के अन्तर्गत मिलने वाले काम में मजदूरी का भुगतान पुरुष श्रमिक के लिए 91 रुपये प्रतिदिन और महिला श्रमिक के लिए 87 रुपये प्रतिदिन की पायी गई।

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राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण यानी [inside]नेशनल सैंपल सर्वे की भारत में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति पर केंद्रित ६२ वें दौर की गणना[/inside] के अनुसार-

  • साल १९९३-९४ से तुलना करें तो एक दशक बाद यानी २००५-०६ में बेरोजगारी की दर में प्रतिशत पैमाने पर एक अंक की बढो़त्तरी हुई।शहरी इलाके में रोजगारयाफ्ता महिलाओं के मामले में स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।
  • ग्रामीण इलाके में साल २००४-०५ और २००५-०६ के बीच वर्क पार्टिसिपेशन रेट,पुरूषों के मामले में ५५ फीसदी पर स्थिर रहा जबकि महिलाओं के मामले में इसमें प्रतिशत पैमाने पर २ अंको की कमी आयी।एक साल के अंदर महिलाओं के मामले में वर्क पार्टिसिपेशन रेट ३३ फीसदी से घटकर ३१ फीसदी पर आ गया।
  • ग्रामीण इलाके में, स्वरोजगार में लगे पुरूषों का अनुपात साल १९८३ में ६१ फीसदी था जबकि दो दशक बाद साल २००५-०६ में यह अनुपात घटकर ५७ फीसदी रह गया। स्वरोजगार में लगी महिलाओं के मामले में स्थिरता रही।साल १९८३ में स्वरोजगार में लगी महिलाओं का अनुपात ६२ फीसदी था और २००५-०६ में यही अनुपात कायम रहा।
  • असंगठित क्षेत्र को आधार माने तो ग्रामीण इलाके में ३५ फीसदी और शहरी इलाके में १८ फीसदी कार्य-दिवसों को महिलाओं को रोजगार नहीं मिला।ग्रामीण इलाके में ११ फीसदी और शहरी इलाके में ५ फीसदी कार्य-दिवसों में पुरूषों को रोजगार नहीं मिला।
  • ग्रामीण इलाके में अर्थव्यवस्था के द्वितीयक क्षेत्र (खनन और खादान की खुली कटाई समेत) में काम करने वाले पुरूषों के अनुपात में बढोत्तरी हुई है।१९८३ में अर्थव्यवस्था के द्वितीयक क्षेत्र (खनन और खादान की खुली कटाई समेत) में काम करने वाले पुरूषों का अनुपात १० फीसदी था जो साल २००५-०६ में बढ़कर १७ फीसदी हो गया।महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा इस अवधि में ७ फीसदी से बढ़कर १२ फीसदी पर पहुंच गया।
  • ग्रामीण इलाके में १५ साल और उससे ऊपर की उम्र के केवल ५ फीसदी लोगों को लोक-निर्माण के हलके में काम हासिल है।इस आयु वर्ग के ७ फीसदी लोग काम की तलाश में हैं लेकिन उन्हें काम नहीं मिलता जबकि ८८ फीसदी लोक-निर्माण के कार्यो में रोजगार की तलाश भी नहीं करते।अगर लोक-निर्माण के कार्यों में ग्रामीण इलाके के पुरूषों को हासिल रोजगार के लिहाज से इस आंकड़े को देखें तो केवल ६ फीसदी पुरूषों को रोजगार हासिल है,८ फीसदी लोक-निर्माण के कार्यों में रोजगार खोजते हैं लेकिन उन्हें हासिल नहीं होता जबकि ८५ फीसदी लोक-निर्माण के कार्यों में रोजगार की तलाश तक नहीं करते।महिलाओं के मामले में यही आंकड़ा क्रमशः ३,, और ९१ फीसदी का है।
  • लोक-निर्माण के अंतर्गत आने वाले कामों में रोजगार पाने वाले व्यक्तियों का अनुपात प्रति व्यक्ति मासिक व्यय (एमपीसीई-मंथली पर कैपिटा एक्पेंडिचर) की बढ़ोत्तरी के साथ घटा है।यह बात स्त्री और पुरूष दोनों के मामले में देखी जा सकती है।प्रति व्यक्ति मासिक व्यय यानी एमपीसीई के सबसे ऊंचले दर्जे (६९० रूपये और उससे ज्यादा) में आने महज २ फीसदी पुरूषों को लोक-निर्माण के कार्यों में रोजगार हासिल था जबकि एमपीसीई के सबसे निचले दर्जे(३२० रूपये और उससे कम) के ९ फीसदी पुरूषों को, यानी एमपीसीई के ऊपरले दर्जे की तुलना में एमपीसीई के निचले दर्जे के लगभग ५ गुना ज्यादा पुरूषों को लोक-निर्माण के कामों में रोजगार हासिल था।महिलाओं के मामले में यही आंकड़ा एमपीसीई के ऊपरले दर्जे में १ फीसदी और एमपीसीई के निचले दर्जे में ४ फीसदी का है,यानी दोनों के बीच का अंतर ४ गुना है।
  • लोक-निर्माण के कार्यों में पिछले ३६५ दिनों (साल २००५-०६) स्त्री और पुरूषों को लोक-निर्माँण के काम औसतन क्रमशः १८ और १७ कार्यदिवसों को रोजगार हासिल हुआ।पिछले ३६५ दिनों (साल २००५-०६) में एमपीसीई के ऊपरले दर्जे (६९० रूपये और उससे ज्यादा) में आने वाले पुरूषों को सबसे ज्यादा कार्यदिवसों (२४ दिन) को रोजगार हासिल हुआ जबकि इसी अवधि में एमपीसीई के बिचले दर्जे (५१०-६९० रूपये) की महिलाओं को लोक-निर्माण के कार्यों में सबसे ज्यादा कार्यदिवसों (२३ दिन) को रोजगार हासिल हुआ।
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श्रम और रोजगार मंत्रालय के [inside]लेबर ब्यूरो द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ऑन एम्पलॉयमेंट एंड अनएम्पलॉयमेंट सर्वे (2009-10)[/inside] के अनुसार

http://labourbureau.nic.in/Final_Report_Emp_Unemp_2009_10.pdf:

 

लेबर ब्यूरो द्वारा तैयार हालिया एम्पलॉयमेंट-अनएम्पलॉयमेंट सर्वे 28 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों का है जहां देश की कुल 99 फीसदी आबादी रहती है। 

 

इस सर्वे में कुल 45,859 परिवारों के 2,33,410 लोगों के साक्षात्कार लिए गए।

 

इस सर्वे में 1.4.2009 से 31.3.2010  की अवधि तक की सूचनाएं जुटायी गई हैं।

 

सर्वे के अनुसार रोजगार में लगे कुल लोगों में 45.5 फीसदी किसानी,मत्स्य-पालन और वनोपज एकत्र करने के कामों में लगे हैं। रोजगार में लगे केवल 8.9 फीसदी लोग ही मैन्युफैक्चरिंग में हैं जबकि 7.5 फीसदी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में।

 

ग्रामीण इलाकों में कामगार आबादी का 57.6 फीसदी हिस्सा खेती-किसानी के काम में लगा है, 7.2 फीसदी हिस्सा कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में और 6.7 फीसदी हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग(विनिर्माण) में।

 

शहरी इलाके में 9.9 फीसदी कामगार आबादी खेती-किसानी में लगी है,. 8.6 फीसदी कामगार आबादी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में जबकि 15.4 फीसदी मैन्युफैक्चरिंग के काम में। कामगार आबादी का तकरीबन 17.3 फीसदी हिस्सा होलसेल, रिटेल आदि के कामों में लगा है।

 

सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि खेती-किसानी का क्षेत्र ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कोई अतिरिक्त रोजगार का सृजन नहीं करने वाला।बहरहाल विनिर्माण-क्षेत्र में रोजगार के 4 फीसदी की दर से बढ़ने की संभावना जतायी गई है जबकि सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में परिवहरन और संचार(ट्रान्सपोर्ट एंड क्म्युनिकेशन) के क्षेत्र में रोजगार की बढ़ोत्तरी क्रमश 8.2 और 7.6 फीसदी की दर से हो सकती है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कुल श्रमशक्ति में साढ़े चार करोड़ का इजाफा होने की संभावना है। इसके बरक्स योजना में, 5 करोड़ 80 लाख की तादाद में रोजगार सृजन का लक्ष्य रखा गया है। उम्मीद की गई है कि इससे बरोजगारी की दर 5 फीसदी पर रहेगी। बहरहाल, मौजूदा सर्वे के परिणामों से जाहिर होता है कि अखिल भारतीय स्तर पर श्रमशक्ति का 9.4 फीसदी हिस्सा बेरोजगार है। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एक साथ मिलाकर भारत में बेरोजगारों की तादाद 4 करोड़ बैठती है।

 

अखिल भारतीय स्तर पर देखें तो बरोजगारों में सर्वाधिक(80 फीसदी) ग्रामीण क्षेत्र से हैं।

 

ग्रामीण भारत में बेराजगारी की दर 10.1 फीसदी है जबकि शहरी भारत में 7.3 फीसदी। पुरुषों में बेरोजगारी दर  8.0 फीसदी की है जबकि महिलाओं में 14.6 फीसदी की।

 

लेबर ब्यूरो सर्वे (2009-10) और एनएसएसओ द्वारा किए गए एम्पलॉयमेंट-अनएम्पलॉयमेंट सर्वे(2007-08) के आंकड़ों की आपसी तुलना से जाहिर होता है कि लेबर ब्यूरो के सर्वे में बेरोजगारी की दर ज्यादा बतायी गई है। कुल बेरोजगारी में कृषि क्षेत्र का हिस्सा एनएसएसओ की तुलना में 10 फीसदी ज्यादा मानने के कारण ऐसा हो सकता है।

 

सर्वे के नतीजों से पता चलता है कि 1000 लोगों में 351 आदमी रोगारशुदा हैं, 36 लोग बेरोजगार हैं जबकि 613 लोग ऐसे हैं जिनकी  श्रमशक्ति के भीतर गिनती नहीं की जाती। रोजगारशुदा कुल 351 लोगों में 154 लोग स्वरोजगार की श्रेणी में हैं, 59 लोग नियमित वेतनभोगी की श्रेणी में जबकि 138 लोग ऐसे हैं जिन्हें दिहाड़ी मजदूर कहा जा सकता है। ग्रामीण इलाके में 1000 लोगों की तादाद में 356 लोग रोजगारशुदा की श्रेणी में हैं, 40 लोग बेरोजगार की कोटि में जबकि 604 लोग ऐसे हैं जिनकी गणना श्रमशक्ति में नहीं की जाती। शहरी इलाके में प्रति 1000 व्यक्तियों में रोजगारप्राप्त व्यक्तियों की तादाद 335 है, बेरोजगारी की संख्या 27 और 638 जने ऐसे हैं जिनकी गिनती श्रमशक्ति में नहीं की जाती।

 

शहरी क्षेत्र में 86 फीसदी और ग्रामीण इलाके में 81 फीसदी महिलायें ऐसी हैं जिनकी गिनती श्रमशक्ति में नहीं की जाती।

 

सर्वे के अनुसार स्वरोजगार में लगे लोगों में ज्यादातर खेती-किसानी के काम से जुड़े हैं(प्रति 1000 में 572) जबकि थोक और खुदरा व्यापार करने वालों की तादाद स्वरोजगार करने वाली कोटि के भीतर प्रति हजार व्यक्ति में 135 है।

 

नियनित वेतनभोगियों की श्रेणी में देखें तो पता चलता है कि ज्यादातर कम्युनिटी सर्विसेज से जुड़े( प्रति 1000 में 227) लोग हैं जबकि विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों की तादाद प्रति हजार नियमित वेतनभोगियों में 153 है।

 

दिहाड़ी मजदूरी करने वालों में सर्वाधिक तादाद खेतिहर मजदूर, मछली मारने या वनोपज से जीविका चलाने वालों की (दिहाड़ी कमाने वाले प्रति हजार व्यक्ति में से 467 व्यक्ति) है जबकि कंस्ट्रक्सन के काम में लगे ऐसे व्यक्तियों की तादाद प्रति हजार में 148 है।

 

सर्वे के अनुसार रोजगार-प्राप्त लोगों में ज्यादातर वैसे उद्यमों में काम करते हैं जिन्हें प्रोपराइटी टाईप कहा जाता है। ऐसे उद्यमों में रोजगार-प्राप्त लोगों की प्रति हजार संख्या में 494 वयक्ति ऐसे उद्यमों में काम करते हैं जबकि सार्वजनिक या फिर निजी क्षेत्र की लिमिटेड कंपनियों में काम करने वालों की तादाद ऐसे लोगों में प्रतिहजार पर 200 है।

 

सर्वे के आंकड़ों से पता चलता है कि रोजगार प्राप्त प्रतिहजार व्यक्तियों में केवल 157 लोगों को ही पेड़-लीव की सुविधा मिलती है। कम्युनिटी सर्विसेज ग्रुप में प्रति हजार व्यक्तियों में 443 लोगों को पेड़-लीव की सुविधा है जबकि खेती-किसानी,वानिकी या फिर मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त लोगों में 1000 में 54 व्यक्तियों को ही यह सुविधा हासिल हो पाती है।

 

जहां तक प्राविडेन्ट फंड, ग्रेच्युटी, स्वास्थ्य सुविधा और मेटरनिटी बेनेफिट जैसी सुविधाओं का सवाल है विभिन्न उद्यमों में काम करने वाले प्रति हजार व्यक्तियों में से मात्र 163 ने कहा कि उन्हें इनमें से कुछ ना कुछ सुविधा मिलती है। कम्युनिटी सर्विसेज ग्रुप के सर्वाधिक लोगों(प्रति हजार में 400) ने कहा कि हमें ऐसी सुविधा मिलती है जबकि खेती-किसानी में रोजगार प्राप्त लोगों में से मात्र 82 लोगों(प्रति 1000 में) ने कहा कि उन्हें इनमें से कुछ ना कुछ सुविधा हासिल होती है।

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 असंगठित क्षेत्र में रोजगार की स्थिति से संबंधित राष्ट्रीय आयोग यानी नेशनल कमीशन फॉर द इन्टरप्राइजेज इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस) के दस्तावेज-[inside]रिपोर्ट ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रोमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर[/inside] के अनुसार,

http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf


· खेत-मजदूरों की संख्या साल २००४-०५ में ८ करोड़ ७० लाख थी यानी किसानों और खेत-मजदूरों की कुल संख्या(२५ करोड़ ३० लाख) में खेत-मजदूरों की तादाद ३४ फीसदी थी।


· दैनिक रोजगार के आधार पर देखें तो खेत-मजदूरों में बेरोजगारी की स्थिति भयावह है।१६ फीसदी पुरूष खेत-मजदूर और १७ फीसदी महिला खेत-मजदूर बेरोजगार हैं।


· साल १९९३-९४ और २००४-०५ के बीच खेत-मजदूरों के बीच छुपी हुई बेरोजगारी(अंडरएंप्लॉयमेंट) बढ़ी है।साल २००५-०६ में खेत-मजदूरों के बीच बेरोजगारी १६ फीसदी थी।


· खेत-मजदूरों को मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी कितनी हो--इसके बारे में बस एक ही कानूनी प्रावधान है।यह प्रावधान मिनिमम वेजज एक्ट,१९४८(न्यूनतम मजदूरी अधिनियम,१९४८) के नाम से जाना जाता है।साल २००४-०५ में खेत-मजदूरों ने जितने दिन काम किया उसमें लगभग ९१ फीसदी कार्यदिवसों को उन्हें राष्ट्रीय स्तर की न्यूनतम मजदूरी से कहीं कम मेहनताना हासिल हुआ जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एनसीआरएल (एनसीयूएस के दस्तावेज में एनसीआरएल के बारे में जानकारी देते हुए कहा गया है कि-१९९१ में हनुमंत राव की अध्यक्षता में एक आयोग नेशनल कमीशन ऑन रूरल लेबर नाम से बना था।इस आयोग ने ग्रामीण इलाके के लिए एक राष्ट्रीय स्तर पर लागू होने वाली एक आभासी न्यूनतम मजदूरी की अनुशंसा की थी।आयोग ने यह भी कहा था कि ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों को सरकार सामाजिक सुरक्षा के फायदों के तौर पर वृद्धावस्था पेंशन,जीवन बीमा,मेटरनिटी बेनेफिट और काम के दौरान दुर्घटना की स्थिति में मुआवजा फराहम करे।) द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के मानक को आधार मानें तो साल २००४-०५ में खेत-मजदूरों ने जितने दिन काम किया उसमें लगभग ६४ फीसदी कार्यदिवसों को उन्हें कम मेहनताना हासिल हुआ।.


· खेतिहर कामगारों(खेतिहर मजदूर और किसान) की संख्या साल २००४-०५ में २५ करोड़ ९० लाख थी।देश की कुल श्रमशक्ति में खेतिहर कामगारों की तादाद ५७ फीसदी है।इनमें २४ करोड़ ९० लाख ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।इस तरह यह संख्या कुल ग्रामीण श्रमशक्ति (३४ करोड़ ३० लाख) के ७३ फीसदी के बराबर बैठती है।ग्रामीण इलाके की अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र के रोजगार में इनकी हिस्सेदारी ९६ फीसदी की और असंगठित कृषि-क्षेत्र के रोजगार में इनकी हिस्सेदारी ९८ फीसदी की है।


· लगभग दो तिहाई(६४ फीसदी) खेतिहर कामगार स्वरोजगार में लगे हैं,या कहें फिर कह लें कि ग्रामीण श्रमशक्ति जो हिस्सा स्वरोजगार में लगा है वह मूलतः किसान है और बाकि एक तिहाई यानी ३६ फीसदी जीविका के लिए मजदूरी पर निर्भर है और जीविका के लिए मजदूरी पर निर्भर कामगारों में ९८ फीसदी अनियमित मजदूर हैं।


· देश के कुल कामगारों में खेतिहर कामगारों की तादाद साल २००४-०५ में ५६.६ फीसदी थी जबकि साल १९८३ में कुल कामगारों में इनकी तादाद ६८.६ फीसदी थी।इस तरह पिछले २० सालों कुल कामगारों में खेतिहर कामगारों की तादाद में कमी आयी है।ग्रामीण इलाकों में खेतिहर कामगारों की तादाद ८१.६ फीसदी थी।यह संख्या २००४-०५ में घटकर ७२.६ फीसदी रह गई।


·खेतिहर श्रमशक्ति में किसानों की संख्या ज्यादा है,हालांकि प्रतिशत पैमाने पर धीरे-धीरे इनकी संख्या में कमी आयी है।साल १८८३ में खेतिहर श्रमशक्ति में किसानों की संख्या ६३.५ फीसदी थी जबकि साल १९९९-२००० में घटकर ५७.८ फीसदी हो गई।


· साल १९८३-१९८४ और साल १९९३-९४ के बीच की अवधि यानी एक दशक पर नजर रखकर रोजगार की बढ़ोत्तरी की दर की तुलना करें तो पता चलेगा कि खेतिहर रोजगार में पिछले एक दशक में कमी आयी है।जहां साल १९८३-१९८४ में खेतिहर रोजगार में बढ़ोत्तरी की दर १.४ फीसद थी वहीं एक दशक बाद यह दर घटकर ०.८ फीसदी रह गई। हालांकि सकल रोजगार में भी इस अवधि में २.१ फीसदी के मुकाबले १.९ फीसदी की गिरावट आयी लेकिन सकल रोजगार में गिरावट की तुलना में खेतिहर रोजगार में गिरावट की रफ्तार कहीं ज्यादा रही।


· साल १९९३-९४ में भूमिहीन परिवारों की संख्या १३ फीसदी थी जबकि साल २००४-०५ में भूमिहीन परिवारों की संख्या बढ़कर १४.५ फीसदी हो गई।साल २००४-०५ में खेतिहर मजदूरों में १९.७ फीसदी मजदूर भूमिहीन थे जबकि ६० फीसदी से ज्यादा खेतिहर मजदूरों के पास ०.४ हेक्टेयर से भी कम जमीन थी और इनकी संख्या में इस पूरी अवधि में खास बदलाव नहीं आया। ज्यादातर,भूमिहीनता या फिर जमीन के बड़े छोटे टुकड़े पर स्वामित्व होने के कारण ग्रामीण इलाकों में लोग अपने भरण-पोषण के लिए मजदूरी करने को बाध्य होते हैं।

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[inside]टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साइंसेज और एडको इंस्टीट्यूट,लंदन द्वारा तैयार द इंडिया लेबर मार्केट रिपोर्ट(२००८)[/inside] में भारत में मौजूद बेरोजगारी और छुपी हुई बेरोजगारी की स्थिति के बारे में कहा गया है कि

http://www.macroscan.org/anl/may09/pdf/Indian_Labour.pdf

 

 

· भारत में ग्रामीण इलाके के व्यक्ति की तुलना में शहरी इलाके के व्यक्ति के लिए बेरोजगारी की दर कहीं ज्यादा है।शहरी महिलाओं में बेरोजगारी की दर ९.२२ फीसदी है जबकि ग्रामीण महिलाओं में यह दर ७.३१ फीसदी है।

 


· बेरोजगारी की प्रकृति का आकलन राज्यवार करें तो पता चलेगा कि गोवा और केरला जैसे तुलनात्मक रूप से विकसित राज्यों में बेरोजगारी की दर कहीं ज्यादा है।गोवा में बेरोजगारी की दर ११.३९ फीसदी और केरल में ९.१३ फीसदी है।बेरोजगारी की न्यूनतम दर अपेक्षाकृत कम विकसित राज्यों मसलन उत्तरांचल(.४८ फीसदी) और छत्तीसगढ़(.७७ फीसदी) में है।


· दस से चौबीस साल के आयुवर्ग में सबसे ज्यादा लोग बेरोजगार हैं।इससे यह धारणा बलवती होती है कि भारत में युवाओं में बेरोजगारी बढ़ रही है।


· रिपोर्ट का आकलन है कि बेरोजगारी की दर और व्यक्ति के शिक्षा-स्तर में संबंध है।अगर व्यक्ति का शिक्षा-स्तर ज्यादा है तो बेरोजगारी की दर भी उसके लिए ज्यादा है।जिन व्यक्तियों ने माध्यमिक स्तर से ज्यादा ऊंची शिक्षा हासिल की है उनके बीच बेरोजगारी की दर इससे कम दर्जे शिक्षा हासिल करने वालों की तुलना में कहीं ज्यादा है।ग्रामीण और शहरी दोनों ही इलाकों में शिक्षित महिलाओं के बीच बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है।


· छुपी हुई बेरोजगारी की स्थिति के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के बीच छुपी हुई बेरोजगारी की स्थिति कहीं ज्यादा है और खासतौर पर यह बात ग्रामीण इलाके की महिलाओं पर लागू होती है।


· स्वरोजगार और दिहाड़ी मजदूरी में लगे लोगों के बीच छुपी हुई बेरोजगारी की स्थिति कहीं ज्यादा सघन है।इसकी तुलना में वेतनभोगी कर्मचारियों अथवा नियमित मजदूरी पर लगे लोगों के बीच छुपी हुई बेरोजगारी ना के बराबर है।


स्वरोजगार

स्वरोजगार में लगे लोगों की तादाद राज्यवार ३० फीसदी से लेकर ७० फीसदी तक है।आकलन से पता चलता है कि अपेक्षाकृत कम विकसित राज्य मसलन बिहार(६१ फीसदी),उत्तरप्रदेश(६९ फीसदी)राजस्थान(७० फीसदी)में स्वरोजगार में लगे लोगों की संख्या ज्यादा है।अपेक्षाकृत ज्यादा विकसित राज्यों मसलन केरल (४२ फीसदी),दिल्ली(३८ फीसदी) और गोवा में (३४ फीसदी) कम संख्या में लोग स्वरोजगार में लगे हैं।


स्वरोजगार में लगे लोगों में शहरी लोगों की संख्या कम और ग्रामीण लोगों की संख्या ज्यादा है।


स्वरोजगार में लगे लोगों में कम शिक्षा-स्तर वाली महिलाओं का अनुपात पुरूषों की अपेक्षा ज्यादा है।कुल मिलाकर देखें तो स्वरोजगार में लगे लोगों में अधिकांस कम शिक्षा-स्तर वाले हैं।



अगर स्वरोजगार में लगे लोगों की संख्या को अर्थव्यवस्था के क्षेत्रवार देखें तो मजर आएगा कि खेती में सबसे ज्यादा लोगों को स्वरोजगार हासिल है।इसका बाद नंबर आता है व्यापार का।खेती और व्यापार में कुल मिलाकर कुल तीन-चौथाई लोग स्वरोजगार में लगे हैं।


अनियमित यानी दिहाड़ी मजदूरी का बाजार


राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के ६२ वें दौर की गणना को आधार मानकर ऊपर्युक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि ३१ फीसदी रोजगार दिहाड़ी श्रम बाजार में हासिल है और इस श्रम बाजार में महिलाओं की प्रतिभागिता पुरूषों की तुलना में ज्यादा है।


दिहाड़ी श्रम बाजार में रोजगार हासिल करने वाले ग्रामीण स्त्री और पुरूष के आयु वर्ग में ज्यादा फर्क नहीं है जबकि दिहाड़ी पर खटने वाले शहरी इलाके के पुरूषों के मामले में बाल श्रमिकों (आयुवर्ग ५ से ९) की संख्या ज्यादा है।


दिहाड़ी श्रम बाजार में ३४ साल तक की उम्र के मजदूरों को रोजगार के कहीं ज्यादा अवसर उपलब्ध हैं।इस आयु के बाद दिहाड़ी श्रम बाजार में उनको हासिल रोजगार के अवसरों में कमी देखी गई है।


दिहाड़ी मजदूरी के बाजार में शिक्षा के बढ़ते स्तर के साथ प्रतिभागिता में कमी देखी जा सकती है।दिहाड़ी मजदूरों का अधिकतर हिस्सा या तो अशिक्षित है या फिर उसे प्राथमिक स्तर की शिक्षा हासिल हुई है।


खेती में दिहाड़ी मजदूरों की तादाद के ७० फीसदी हिस्से को रोजगार हासिल है।इसके बाद सबसे ज्यादा तादाद में दिहाड़ी मजदूर उद्योग और सेवा-क्षेत्र में लगे हैं।अपेक्षाकृत विकसित राज्यों मसलन महाराष्ट्र, कर्नाटक,तमिलनाडु और पंजाब में खेती में दिहाड़ी मजदूरों की तादाद कहीं ज्यादा है जबकि अपेक्षाकृत कम विकसित राज्यों मसलन राजस्थान,झारखंड,उत्तरप्रदेश और उत्तरांचल में उद्योग-क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या खेती में लगे दिहाड़ी मजदूरों की संख्या से ज्यादा है।


कम विकसित राज्यों में उद्योग क्षेत्र के अंदर विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) दिहाड़ी मजदूरों की संख्या ज्यादा है।कंस्ट्रक्शन के अंतर्गत रोजगार पाने वाले दिहाड़ी मजदूरों की संख्या भी कम विकसित राज्यों में अपेक्षाकृत ज्यादा है।


आबादी जो श्रमबाजार में प्रतिभागी नहीं है-


जो आबादी श्रमशक्ति में प्रतिभागी नहीं है उसमें महिलाओं की संख्या पुरूषों की तुलना में बहुत ज्यादा है।


ग्रामीण इलाके की महिलाओं की तुलना में शहरी इलाके की महिलाएं कहीं ज्यादा तादाद में श्रमबाजार से बाहर हैं।जहां अधिकांश राज्यों के ग्रामीण इलाके में ६० से ७० फीसदी महिलाएं श्रमबाजार से बाहरह हैं वहीं शहरी इलाकों की महिलाओं के बीच यह आंकड़ा ८० फीसदी का है।


२५ से ५९ साल के आयुवर्ग की महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा (४७ से ५७ फीसदी तक) श्रमबाजार से बाहर है जबकि इस आयुवर्ग के पुरूषों के बीच यह आंकड़ा तुलनात्मक रूप से ना के बराबर(१ से ९ फीसदी) बैठता है।इसके अतिरिक्त श्रमबाजार से बाहर रहने वाली महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं का है।स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त लगभग ६८ फीसदी महिलाएं श्रमबाजार से बाहर हैं जबकि इसी शिक्षास्तर के १३ फीसदी पुरूष श्रमबाजार से बाहर हैं।स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा हासिल कर चुकी ५३ फीसदी महिलाएं श्रमबाजार से बाहर हैं जबकि इसी शिक्षास्तर के १० फीसदी पुरूष श्रमबाजार से बाहर हैं।


महिलाओं की एक बड़ी तादाद घरेलू कामकाज के कारण श्रमबाजार से बाहर है।२५ से २९ साल के कामकाजी आयुवर्ग में भी श्रमबाजार से बाहर रह जाने वाली महिलाओं की तादाद ६० फीसदी है।ये आंकड़े ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों की महिलाओं पर लागू होते हैं।


श्रमबाजार से बाहर रह जाने वाली महिलाओं की संख्या दिल्ली में सबसे ज्यादा(९२.१० फीसदी) है।इस मामले में छत्तीसगढ़ दूसरे पादान पर है जहां ८९.५० फीसदी महिलाएं श्रमबाजार से बाहर हैं।इस मामले में सबसे अच्छी स्थिति हिमाचल प्रदेश की है।वहां सिर्फ ५१.७० फीसदी महिलाएं श्रमबाजार से बाहर हैं।



शारीरिक रूप से विकलांग माने जाने वाले व्यक्तियों में ज्यादा तादाद (४० फीसदी) २५ से ४० साल के आयुवर्ग में आने वाले पुरूषों की है और ग्रामीण इलाके में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा का है।इस कोटि में आने वाले अधिकांश लोग अशिक्षित हैं।


 

 

  • जहां तक भीख मांगने वाले और यौनकर्मियों का सवाल है,उनकी १९ फीसदी आबादी ५ से ९ साल के आयुवर्ग की है जबकि इस कोटि में आने वाले ३५ फीसदी व्यक्ति ६० साल या उससे ज्यादा उम्र के हैं।इनमें अधिकतर अशिक्षित हैं।

 

 


अर्थव्यवस्था के उभरते हुए हलको में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति-


· अर्थव्यवस्था के उभरते हुए क्षेत्रों पर नजर डालें तो एक बड़ी तादाद लेबर मार्केट के रीटेल सेक्टर(लेबर मार्केट में इसका हिस्सा लगभग साढे़ ७ फीसदी है) में रोजगारयाफ्ता दीखेगी।अर्थव्यवस्था के इस सेक्टर में लेबर मार्केट का संगठित क्षेत्र भी शामिल है और असंगठित क्षेत्र भी।


·भू-निर्माण यानी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री लेबर मार्केट का दूसरा बड़ा हिस्सा(.९ फीसदी) है।इस सेक्टर में सबसे ज्यादा रोजगार पुरूषों को हासिल है और इसका विस्तार शहरों में ज्यादा है।लगभग ८.७ फीसदी शहरी और ५ फीसदी ग्रामीण मजदूरों को इस सेक्टर में रोजगार हासिल है।


· परिवहन यानी ट्रान्सपोर्ट सेक्टर में पुरूष मजदूरो की तादाद ७.५ फीसदी है जबकि महिलाओं की ०.१ फीसदी।भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में ये बात देखी जा सकती है।


· ग्रामीण इलाके में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रोजगार ना के बराबर हासिल है।अर्थव्यवस्था का यह क्षेत्र अपनी प्रकृति में शहरी है और इसमें पढ़े-लिखे तथा उच्चे कौशल वाले लोगों की जरूरत है।आईटी यानी सूचना प्रौद्योगिकी और सॉप्टवेयर के समान मीडिया और फार्मास्यूटिकल्स में भी रोजगार की स्थिति शहरी वर्चस्व की सूचना देती है।

· स्वास्थ्य सुविधाओं और हॉस्पिटेलिटी के सेक्टर में महिलाओं को बाकी की अपेक्षा कहीं ज्यादा रोजगार हासिल है।


· साल २००८ के अक्तूबर से दिसबंर के बीच खनन,सूती वस्त्र-उद्योग,धातुकर्म,रत्न और आभूषण उद्योग,ऑटोमोबाइल तथा बीपीओ-आईटी जैसे क्षेत्रों में हासिल रोजगार में १.०१ फीसदी की कमी आयी।नवंबर के महीने में इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की दर सबसे नीचे(.७४ फीसदी थी लेकिन साल २००९ के जनवरी में इन क्षेत्रों में रोजगार में १.०७ फीसदी का इजाफा हुआ।


· आईटी और बीपीओ को छोड़कर बाकी सभी सेक्टर में साल २००८ के अक्तूबर से दिसंबर के बीच रोजगार की दर में कमी आयी।सबसे ज्यादा गिरावट रत्न और आभूषण के सेक्टर में रही जबकि आईटी और बीपीओ में हासिल रोजगार की दर में इजाफा हुआ।

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· कुल मिलाकर देखें तो साल २००८ के अक्तूबर से दिसंबर के बीच ठेके पर शारीरिक श्रम से रोजगार हासिल करने वाले मजदूरों को बेरोजगारी का कहीं ज्यादा सामना पड़ा जबकि नियमित आधार पर बहाल और मानसिक श्रम वाले कामों में लगे कामगारों को रोजगार के कहीं ज्यादा अवसर हासिल हुए।