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एमएसपी बढ़े तो किसान की आमदनी भी बढ़े, कोई जरुरी तो नहीं !एमएसपी बढ़े तो किसान की आमदनी भी बढ़े, कोई जरुरी तो नहीं !
January 11, 2019

समर्थन मूल्य के बढ़ने पर क्या इस बात की गारंटी हो जाती है कि किसान को ऊपज का लाभकर मूल्य ही जायेगा ? और, क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य के बढ़वार का खाद्य-वस्तुओं की महंगाई से कोई सीधा रिश्ता है, जैसा कि अर्थशास्त्रियों का एक तबका अक्सर तर्क देता है ?   अगर आप सोच रहे हैं कि हां, ऐसा हो सकता है तो फिर नीचे लिखे तथ्यों को गौर से पढ़िये- हो सकता है, आपको झटका लगे !   ऊपर के सवाल का जवाब जानने के लिए इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की चौदह फसलों के समर्थन मूल्य के इजाफे को उनके थोक मूल्य सूचकांक की बढ़ोत्तरी बरक्स रखकर कुछ गुणा भाग करने की कोशिश की. खरीफ की इन फसलों के नाम हैं : धान, ज्वार, बाजरा, रागी, मकई, अरहर, मूंग, उड़द, कपास, मूंगफली, सोयाबीन, सफेद तिल और कराली यानि रामतिल.   जो जवाब निकलकर सामने आया- उससे शायद आपको हैरानी हो. तीन साल की अवधि (2016-17 से 2018-19) में इन खऱीफ फसलों

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कृषि जोतों के आकार में कमी चिन्ता का सबब: नई कृषि जनगणनाकृषि जोतों के आकार में कमी चिन्ता का सबब: नई कृषि जनगणना
December 24, 2018

खेती-किसानी के मोर्चे से एक बुरी खबर आयी है. नयी कृषि जनगणना के आंकड़ों का संकेत है देश में कृषि जोतों का औसत आकार लगातार कम हो रहा है.(आंकड़ों के लिए देखें नीचे दी गई लिंक)   साल 2010-11 में कृषि जोतों का आकार 1.15 हेक्टेयर(राष्ट्रीय औसत) था जो पांच साल बाद 2015-16 में घटकर 1.08 हेक्टेयर हो गया है. कृषि-जोतों के आकार में कमी लागत और व्यावहारिकता के तकाजे से चिन्ता का सबब है.   सीमांत जोतों का औसत आकार साल 2011-12 के 0.39 हेक्टेयर से घटकर 0.38 हेक्टेयर हो गया है जबकि इस अवधि में छोटी जोतों के आकार 1.42 हेक्टेयर से घटर 1.41 हेक्टेयर पर पहुंचा है. जहां तक बड़ी जोतों का सवाल है, इनका औसत आकार उपर्युक्त पांच साल की अवधि में 17.38 हेक्टेयर से घर 17.10 हेक्टेयर हो गया है.   देश में जोतों के उप-विभाजन और विखंडन के कारण कुल जोतों की संख्या साल 2010-11 के 138.3 मिलियन से बढ़कर

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मोदी राज में किसान: डबल आमद या डबल आफत?मोदी राज में किसान: डबल आमद या डबल आफत?
December 7, 2018

खेती-किसानी के मोर्चे पर केंद्र सरकार ने गुजरे चार सालों में क्या कुछ किया है, उसपर आप महज एक घंटे में राय बनाना चाहते हैं तो फिर यह पुस्तक आप ही के लिए है.(पुस्तक आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं)   किसानी के मोर्चे पर केंद्र सरकार के हासिल-लाहासिल को परखने के तीन रास्ते हो सकते हैं. एक तो सरकार के वादों को परखना कि वे किस हद तक पूरे हैं. दूसरे, सरकार के दावों को तौलना कि उनमें कितना दिखावा और कितनी सच्चाई है और तीसरे, यह देखना कि जीविका के लिए खेती-बाड़ी पर निर्भर आबादी के साथ किसी प्राकृतिक आपदा(मिसाल के लिए सूखा या बाढ़) के वक्त सरकार ने क्या सलूक किया.   किसानी के मोर्चे पर सरकार के कामकाज और सोच को परखने के लिए किताब में इन तीन कसौटियों का इस्तेमाल किया गया है और किताब के लेखक तथ्यसंगत-तर्कसंगत विश्लेषण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं के केंद्र की नरेन्द्र मोदी

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.....ताकि चुनाव-चर्चा के बीच आप भुखमरी से हो रही मौतों को ना भूल जायें !.....ताकि चुनाव-चर्चा के बीच आप भुखमरी से हो रही मौतों को ना भूल जायें !
November 22, 2018

झारखंड में बीते 30 दिनों में कम से कम दो जन भुखमरी के कारण मौत की चपेट में आये हैं.  भोजन का अधिकार अभियान ने यह जानकारी एक तथ्यान्वेषी दल की रिपोर्ट के आधार पर दी है.   रिपोर्ट में राज्य के दुमका जिले में जामा प्रखंड के महुआटांड गांव के कलेश्वर सोरेन और देवघर जिले में  मार्गोमंडा प्रखंड के मोती यादव की मौत के पीछे भुखमरी को एक कारण के रुप में चिह्नित किया गया है. भोजन का अधिकार अभियान की प्रेस विज्ञप्ति नीचे पाठकों की सुविधा के लिए पेस्ट की जा रही है.(तत्यान्वेषी दल की रिपोर्ट को डाऊनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें)   गौरतलब है कि देश के अलग-अलग इलाकों में पिछले एक साल से भुखमरी से होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है. इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज ने अपने जून माह के न्यूज एलर्ट में पाठकों का ध्यान इस तथ्य को ओर खींचा था कि बीते एक साल

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पत्रकारों के लिए सुनहरा मौका: एनएफआई का मीडिया अवार्ड कार्यक्रम, आवेदन  की आखिरी तारीख अब 10 जनवरी 2019 तकपत्रकारों के लिए सुनहरा मौका: एनएफआई का मीडिया अवार्ड कार्यक्रम, आवेदन की आखिरी तारीख अब 10 जनवरी 2019 तक
December 15, 2018

नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया ने अपने नेशनल मीडिया अवार्ड कार्यक्रम 2019 के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं. यह अवार्ड कार्यक्रम युवा और पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ सालों तक योगदान कर चुके पत्रकारों के लिए है. अवार्ड कार्यक्रम के जरिए चयनित पत्रकार राष्ट्रीय महत्व के वैसे मुद्दों पर अपने शोध आलेख/ या फोटो-लेख प्रकाशित कर सकेंगे जिनपर मीडिया में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है. अवार्ड कार्यक्रम में गहरी छान-बीन पर आधारित जमीनी शोध कार्य को वरीयता दी जायेगी. एक अपेक्षा यह भी है कि शोध कार्य रचनात्मक हो और उसे पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर तैयार किया जाय. इस अवार्ड कार्यक्रम के अंतर्गत 10 से 12 फोटो जर्नलिस्ट या प्रिन्ट माध्यम के पत्रकारों का चयन किया जायेगा. प्रत्येक चयनित अभ्यर्थी को 125,000 रुपये की अवार्ड राशि दी जायेगी. एनएफआई का नेशनल मीडिया अवार्ड कार्यक्रम अपनी स्थापना के 24वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है. कार्यक्रम में अभी तक देश भर के 250 पत्रकारों

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