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नरेगा के बजट मे कटौती और आधार लिंकित भुगतान कामगारों के हक का उल्लंघन: नरेगा संघर्ष मोर्चानरेगा के बजट मे कटौती और आधार लिंकित भुगतान कामगारों के हक का उल्लंघन: नरेगा संघर्ष मोर्चा
August 2, 2019

नयी सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लिए चालू वित्तवर्ष में मात्र 60,000 रुपये आबंटित किये हैं. यह रकम साल 2018-19 के संशोधित बजट अनुमान (नरेगा) की तुलना में 1,084 करोड़ रुपये कम है. पिछले साल जिस तादाद में रोजगार गारंटी योजना के तहत काम की मांग की गई, अगर सरकार उन्हें पूरा करती और मजदूरी का भुगतान श्रमिकों को समय पर होता तो नरेगा के मद में व्यय की रकम कहीं ज्यादा होती. इस साल के बजट में से 4,000 करोड़ रुपये बीते साल के बकाया रकम को चुकता करने में खर्च हुए हैं. सो, साल के बाकी बचे महीनों के लिए नरेगा के मद में मात्र 56,000 करोड़ रुपये की राशि ही शेष बची है.   आबंटित राशि की मात्रा कम होने के साथ ही साथ एक तथ्य यह भी है कि सरकार आबंटित रकम को नियमित अंतराल पर निर्गत नहीं करती. इससे मजदूरी का भुगतान विलंब से

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दूषित पेयजल: बिहार, बंगाल और यूपी आर्सेनिक मिले पेयजल से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यदूषित पेयजल: बिहार, बंगाल और यूपी आर्सेनिक मिले पेयजल से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य
June 22, 2019

जल-संसाधन मंत्रालय की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक देश की सघन आबादी वाले आठ राज्यों में भूमिगत जल विषैले रसायन आर्सेनिक से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. रिपोर्ट में असम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, मध्यप्रदेश, पंजाब, उत्तरप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के आर्सेनिक प्रभावित इलाकों पर विशेष चर्चा की गई है.   कुएं तथा चापाकल से लिए गये पानी के नमूने में आर्सेनिक की 0.01 से 0.05 मिलीग्राम प्रतिलीटर सांद्रता के आधार पर रिपोर्ट में देश के कुल 94 जिलों को सबसे ज्यादा आर्सेनिक प्रभावित इलाके के रुप में चिह्नित किया गया है. इनमें 19 जिले सिर्फ बिहार में हैं.   रिपोर्ट के मुताबिक आर्सेनिक की विशेष सांद्रता वाला जिलों की संख्या सबसे ज्यादा (19) बिहार में है. प्रतिलीटर 0.01-0.05 मिलीग्राम आर्सेनिक सांद्रता वाले जिलों की संख्या उत्तरप्रदेश तथा गुजरात में प्रत्येक में 12 तथा पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश में प्रत्येक में 8 है. असम में ऐसे जिलों की तादाद 7 है.   गौरतलब है कि प्रतिलीटर 0.05 मिलीग्राम से ज्यादा आर्सेनिक-सांद्रता

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सेहत के मानकों पर देश के सबसे पिछड़े 50 जिलों में एक है मुजफ्फरपुर !सेहत के मानकों पर देश के सबसे पिछड़े 50 जिलों में एक है मुजफ्फरपुर !
June 18, 2019

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में अगर कोई बच्चा साफ-सफाई की कमी से होने वाली ‘डायरिया' जैसी आम बीमारी से पीड़ित हो तो इस बात की कितनी संभावना है उसे प्राथमिक उपचार के तौर पर जीवन-रक्षक घोल(ओआरएस) मिल जाये? बच्चों के तंत्रिका-तंत्र पर आघात करने वाली एक्यूट इन्सेफलाइटिस सिन्ड्रोम (एईएस) सरीखी गंभीर बीमारी से बचाव और उपचार की व्यवस्था को पल भर भूल जायें और मुजफ्फरपुर जिले में मौजूद बुनियादी स्वास्थ्य-ढांचे की हालत का पता देने वाले इस सवाल का जवाब तलाशें. चमकी' के चंगुल में जान गंवा रहे बच्चों की बढ़ती तादाद के बीच जब बिहार की सरकारी चिकित्सा-व्यवस्था और प्रशासन सवालों के घेरे में है तो यह सवाल पूछा जा सकता है.   ऊपर के सवाल के जवाब के लिए आपको राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण(एनएफएचएस-4) के आंकड़ों पर नजर डालनी होगी. ये आंकड़े ( साल 2015-16) ज्यादा पुराने नहीं है. प्रदेशवार और जिलावार स्वास्थ्य की दशा के कुछ बुनियादी संकेतकों का जायजा लेने वाले इन आंकड़ों

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बेरोजगारी दर कैसे 6.1 प्रतिशत से भी ज्यादा हो सकती है, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट मेंबेरोजगारी दर कैसे 6.1 प्रतिशत से भी ज्यादा हो सकती है, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट में
June 17, 2019

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी श्रमबल सर्वेक्षण के नये आंकड़ों में बेरोजगारी दर के साल 2017-18 में 6.1 प्रतिशत होने की बात कही गई है लेकिन मंत्रालय के आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित एक शोध-आलेख में आशंका जतायी गई है कि बेरोजगारी की मार झेल रहे लोगों की वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है.(आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण की मूल रिपोर्ट के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)   ‘सर्जिकल स्ट्राइक ऑन एम्पलॉयमेंट: द रिकार्ड ऑफ द फर्स्ट मोदी गवर्नमेंट' शीर्षक इस लेख में कहा में कहा गया है कि ‘बेरोजगारी दर' की मौजूदा परिभाषा की कुछ सीमाएं हैं और इन सीमाओं के कारण बेरोजगारों की एक बड़ी तादाद की गिनती नहीं हो पाती.   शोध-आलेख के लेखकों (विकास रावल एवं प्राची बंसल) का तर्क है कि उपलब्ध कुल श्रमबल में बेरोजगार लोगों के अनुपात को बेरोजगारी दर मानने का चलन है और जितने लोग सक्रिय रुप से रोजगार की तलाश में होते हैं उनकी संख्या को श्रमबल कहा जाता है.

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अगर आप समाचारों के ऑनलाइन पाठक हैं तो ये न्यूज एलर्ट जरुर पढ़ें!अगर आप समाचारों के ऑनलाइन पाठक हैं तो ये न्यूज एलर्ट जरुर पढ़ें!
May 8, 2019

भारत में समाचारों के आस्वाद की दुनिया तेजी से बदली है : लोगों का समाचारों पर से विश्वास घटा है और समाचार के पाठकों की दुनिया की एक बड़ी तादाद को आशंका सताती है कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपने राजनीतिक विचारों का इजहार किया तो उन्हें अधिकारी-वर्ग से परेशानी उठानी पड़ेगी.   अंग्रेजी भाषी पाठकों के बीच किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक टेलिविजन, अखबार या फिर रेडियो नहीं बल्कि समाचार हासिल करने का प्रमुख माध्यम अब स्मार्टफोन हो गये हैं. ज्यादातर पाठक अब न्यूज फ्लेटफार्म जैसे कि गूगल सर्च और सोशल मीडिया के सहारे समाचारों पढ़, देख और सुन रहे हैं- समाचारों के प्रकाशित-प्रसारित होने की मूल जगहों से कम.   रॉयटर इंस्टीट्यूट द्वारा भारत के अंग्रेजी-भाषी पाठकों के बीच करवाये गये सर्वेक्षण के निष्कर्ष इंडिया डिजिटल न्यूज रिपोर्ट 2019 में दर्ज हैं. सर्वेक्षण में शामिल 68 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे समाचार के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं. कुल 18 प्रतिशत उत्तरदाताओं का

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