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मनरेगा :4 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों में नहीं बढ़ी मजदूरी! कहीं 1 रुपये तो कहीं 2 रुपये की बढ़ोत्तरी !मनरेगा :4 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों में नहीं बढ़ी मजदूरी! कहीं 1 रुपये तो कहीं 2 रुपये की बढ़ोत्तरी !
May 6, 2019

सबकुछ बदलने के बाद भी आखिर वह क्या जो नहीं बदलता ? दार्शनिक मिजाज के इस सवाल का एकदम ही व्यावहारिक सा जवाब हो सकता है- मनरेगा की मजदूरी!  बात तनिक बुझौवल सी लगी तो इन तथ्यों पर गौर करें: साल 2019-20 के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट के तहत दिहाड़ी मजदूरी की दर की अधिसूचना 26 मार्च को जारी हुई. अधिसूचना से जाहिर होता है कि गोवा(254रुपये), कर्नाटक(249 रुपये), केरल(271रुपये) तथा पश्चिम बंगाल(191रुपये) के लिए मनरेगा की मजदूरी यथावत (यानि साल 2018-19 जितनी) रखी गई है. इसी तरह संघशासित प्रदेशों अंडमान एवं निकोबार(250 रुपये) तथा लक्षद्वीप (248 रुपये) के लिए मनरेगा की निर्धारित मजदूरी में बदलाव नहीं हुआ है. इन दो संघशासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी साल 2019-20 में भी 2018-19 जितनी ही रखी गई है.  मजदूरी के ठहरे होने की एक स्थिति और भी है. साल 2018-19 से 2019-20 के बीच कुछ राज्यों के लिए मनरेगा की मजदूरी दर में इजाफा

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तीस लाख मतदाता चाहें भी तो इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकते- आखिर क्यों, पढ़िए इस एलर्ट में !तीस लाख मतदाता चाहें भी तो इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकते- आखिर क्यों, पढ़िए इस एलर्ट में !
April 24, 2019

‘वोट इंडिया वोट' के नारे के साथ एक सरकारी वेबसाइट पर लिखा है- ‘ मतदान प्रक्रिया में भाग लें, मतदाता होने पर गर्व महसूस करें.' लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि भारत की एक बड़ी कामगार आबादी चाहे तो भी वोट नहीं कर सकती ? ऐसे कामगारों में एक नाम आता है ईंट भट्ठे के मजदूरों का ! इस बार ईंट भट्ठे पर काम करने वाले तकरीबन 30 लाख मजदूर अपने मताधिकार के उपयोग नहीं कर पायेंगे.   ईंट भट्ठे के मजदूर अपने मताधिकार का प्रयोग क्यों नहीं कर पायेंगे इसकी वजह जानने से पहले आइए जरा गौर करें कि चुनावी गणित के हिसाब से 30 लाख मतदाताओं का मतलब क्या निकलता है ?   मतदाताओं की तादाद के लिहाज से देखें तो देश का सबसे बड़ा लोकसभा चुनाव क्षेत्र है तेलंगाना का मलकाजगिरी. यहां मतदाताओं की संख्या साढ़े उनतीस लाख (29,53,915) से ज्यादा है. सबसे छोटा लोकसभा चुनाव क्षेत्र है लक्षद्वीप- यहां मतदाताओं की संख्या तकरीबन

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निर्धारित लक्ष्य से पीछे चल रही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, कवरेज भी घटा !निर्धारित लक्ष्य से पीछे चल रही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, कवरेज भी घटा !
March 18, 2019

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का बजट-आबंटन अंतरिम बजट (2019-20) में घट गया है. एक तथ्य यह भी है कि फसल बीमा योजना पिछले दो सालों से अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने में नाकाम रही है. बजट-आबंटन घटने की एक वजह यह भी हो सकती है.   साल 2017-18 की बजट घोषणाओं के क्रियान्वयन की स्थिति बताने वाले दस्तावेज में कहा गया था कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना(पीएमएफबीवाय) की कवरेज सकल फसलित क्षेत्र का 2017-18 में 40 प्रतिशत तथा 2018-19 में 50 प्रतिशत कर दी जायेगी. गौरतलब है कि साल 2016-17 में फसल बीमा योजना का कवरेज सकल फसलित क्षेत्र का 30 प्रतिशत था.   लेकिन लोकसभा में दिए गए कृषि मंत्रालय के राज्यमंत्री के जवाब(अतारांकित प्रश्न संख्या 3398) से पता चलता है कि विभिन्न फसलों की बुवाई का 29 प्रतिशत हिस्सा ही साल 2016-17 में पीएमएफबीवाय) की कवरेज में था और 2017-18 में यह कवरेज का दायरा घटकर 25.0 प्रतिशत रह गया. दूसरे शब्दों में कहें तो प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना

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जम्मू-कश्मीर: हिंसा के कारण विस्थापित होने वालों की तादाद सबसे ज्यादा तादादजम्मू-कश्मीर: हिंसा के कारण विस्थापित होने वालों की तादाद सबसे ज्यादा तादाद
March 8, 2019

पाकिस्तान से बढ़ती सैन्य तनातनी और युद्ध की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने घोषणा की : ‘जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा के आसपास रहने वाले नागरिकों को भी आरक्षण का लाभ दिया जाएगा.' लेकिन क्या सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग सचमुच आरक्षण का लाभ हासिल कर पाने की स्थिति में हैं ?   इस सवाल का उत्तर ढूंढ़ने के लिए इन तथ्यों पर गौर कीजिए : बीते साल जनवरी से जून महीने के दौरान संघर्ष और हिंसा की घटनाओं के कारण पूरी दुनिया में लगभग सवा पचास लाख लोग अपना घर-बार छोड़कर विस्थापित होने पर मजबूर हुये. भारत में ऐसे लोगों की तादाद 2018 के पहले छह महीनों में 1 लाख 66 हजार रही और सबसे ज्यादा संख्या में लोग जम्मू-कश्मीर में विस्थापित हुये. ये तथ्य इंटरनल डिस्प्लेस्मेंट मॉनिटरिंग सेंटर के हैं. संस्था की नई रिपोर्ट के मुताबिक 2018 के पूर्वाद्ध में संघर्ष और हिंसा के हालात के कारण जिन दस देशों में सबसे ज्यादा लोग विस्थापन के शिकार हुये, भारत ऐसे

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प्रति बूंद अधिक फसल योजना : दिन भर चले अढ़ाई कोस!प्रति बूंद अधिक फसल योजना : दिन भर चले अढ़ाई कोस!
March 5, 2019

दो में दो को जोड़ने से हमेशा चार ही आये यह जरुरी नहीं- वह पांच..सात..दस कुछ भी हो सकता है. बात विचित्र लगती हो प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत चलाये जा रहे ‘प्रति बूंद अधिक फसल' के आंकड़ों पर गौर कीजिए.   प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के डैशबोर्ड पर दिख रहा आंकड़ा बताता है कि ‘प्रति बूंद-अधिक फसल' कार्यक्रम के तहत वित्तवर्ष 2017-18 में 11.25 लाख हेक्टेयर जमीन माइक्रो-सिंचाई के अंतर्गत लायी गई है.   लेकिन बीते 11 दिसंबर को लोकसभा में एक अतारांकित प्रश्न(संख्या-5) के जवाब में कहा गया कि प्रति बूंद अधिक फसल अभियान के तहत 10.48 लाख हेक्टेयर जमीन माइक्रो-सिंचाई सुविधा के दायरे में आ सकी है.   जाहिर है, साल 2017-18 में प्रति बूंद अधिक फसल के अंतर्गत माइक्रो-सिंचाई की सुविधा के दायरे में आयी जमीन को लेकर जो आंकड़ा संबंधित डैशबोर्ड पर दिखाया गया है वह लोकसभा में दिये गये जवाब से मेल नहीं खाता. ऐसे में सवाल उठेगा कि किस आंकड़े को सही

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