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पीएम-किसान सम्मान निधि योजना: आखिर किन किसान परिवारों को सहायता मिलेगी ?पीएम-किसान सम्मान निधि योजना: आखिर किन किसान परिवारों को सहायता मिलेगी ?
February 8, 2019

‘पैसा ना कौड़ी, बीच बाजार में दौड़ा-दौड़ी’- क्या आपने कभी ये कहावत सुनी है? इस कहावत का ठीक-ठीक अर्थ समझना हो तो इस बार के अंतरिम बजट की एक खास घोषणा को गौर से पढ़िये! घोषणा हुई है कि दो हैक्टेयर तक की जोत वाले किसानों को सालाना आमदनी-सहायता के रुप में छह हजारे मिलेंगे, रुपया सीधा किसानों के बैंक-खाते में जायेगा. लेकिन क्या आपने अंतरिम वित्तमंत्री के अंतरिम बजट के हिसाब किताब पर गौर किया कि दो हैक्टेयर तक की जोत वाले किसानों की तादाद कितनी है और उनके लिए सरकार ने कितना रुपया आबंटित किया है ?  बजट भाषण में वित्तमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री-किसान सम्मान निधि योजना के तहत जो हैक्टेयर तक की जोत वाले किसान परिवारों को 6000 रुपये की आमदनी-सहायता 2000 रुपये चौमाहे के हिसाब से दी जायेगी. वित्तमंत्री के मुताबिक योजना से लगभग 12 करोड़ किसान-परिवारों को फायदा होगा. आइए, पहले मंत्री के इसी दावे की परीक्षा करें : नवीनतम

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प्राथमिक शिक्षा : तीन सालों में डेढ़ गुणा से ज्यादा बढ़ी है ड्रॉपआउट रेटप्राथमिक शिक्षा : तीन सालों में डेढ़ गुणा से ज्यादा बढ़ी है ड्रॉपआउट रेट
January 28, 2019

छब्बीस जनवरी की परेड में रंग-बिरंगे कपड़ों में हिस्सेदारी करते स्कूली बच्चों की तस्वीरें जब आप टेलीविजन पर देख रहे होंगे तो देश में प्राथमिक स्तर की शिक्षा के हालात बयान करती दो नई रिपोर्टस् सार्वजनिक जनपद में आ चुकी हैं. प्राथमिक स्तर की शिक्षा के सार्वीकरण के मोर्चे पर एक रिपोर्ट से अच्छी खबर निकलती है तो दूसरी रिपोर्ट से निकलते संकेत खतरे की घंटी हैं.   इस न्यूज एलर्ट में सबसे पहले गौर करते हैं खुशखबरी पर. हाल ही प्रकाशित एनुअल स्टेटस् ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट का एक निष्कर्ष है कि 2007 से अब तक के दस सालों से भी ज्यादा के अरसे में 6-14 साल के बच्चों के स्कूली नामांकन की दर 95 प्रतिशत से ज्यादा रही है. छह से चौदह साल के आयुवर्ग में अनामांकित बच्चों की तादाद 3 प्रतिशत से घटक 2018 में 2.8 प्रतिशत पर आ गई है.(देखें नीचे दी गई लिंक)   लेकिन क्या स्कूली नामांकन की इस

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एमएसपी बढ़े तो किसान की आमदनी भी बढ़े, कोई जरुरी तो नहीं !एमएसपी बढ़े तो किसान की आमदनी भी बढ़े, कोई जरुरी तो नहीं !
January 11, 2019

समर्थन मूल्य के बढ़ने पर क्या इस बात की गारंटी हो जाती है कि किसान को ऊपज का लाभकर मूल्य ही जायेगा ? और, क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य के बढ़वार का खाद्य-वस्तुओं की महंगाई से कोई सीधा रिश्ता है, जैसा कि अर्थशास्त्रियों का एक तबका अक्सर तर्क देता है ?   अगर आप सोच रहे हैं कि हां, ऐसा हो सकता है तो फिर नीचे लिखे तथ्यों को गौर से पढ़िये- हो सकता है, आपको झटका लगे !   ऊपर के सवाल का जवाब जानने के लिए इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की चौदह फसलों के समर्थन मूल्य के इजाफे को उनके थोक मूल्य सूचकांक की बढ़ोत्तरी बरक्स रखकर कुछ गुणा भाग करने की कोशिश की. खरीफ की इन फसलों के नाम हैं : धान, ज्वार, बाजरा, रागी, मकई, अरहर, मूंग, उड़द, कपास, मूंगफली, सोयाबीन, सफेद तिल और कराली यानि रामतिल.   जो जवाब निकलकर सामने आया- उससे शायद आपको हैरानी हो. तीन साल की अवधि (2016-17 से 2018-19) में इन खऱीफ फसलों

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कृषि जोतों के आकार में कमी चिन्ता का सबब: नई कृषि जनगणनाकृषि जोतों के आकार में कमी चिन्ता का सबब: नई कृषि जनगणना
December 24, 2018

खेती-किसानी के मोर्चे से एक बुरी खबर आयी है. नयी कृषि जनगणना के आंकड़ों का संकेत है देश में कृषि जोतों का औसत आकार लगातार कम हो रहा है.(आंकड़ों के लिए देखें नीचे दी गई लिंक)   साल 2010-11 में कृषि जोतों का आकार 1.15 हेक्टेयर(राष्ट्रीय औसत) था जो पांच साल बाद 2015-16 में घटकर 1.08 हेक्टेयर हो गया है. कृषि-जोतों के आकार में कमी लागत और व्यावहारिकता के तकाजे से चिन्ता का सबब है.   सीमांत जोतों का औसत आकार साल 2011-12 के 0.39 हेक्टेयर से घटकर 0.38 हेक्टेयर हो गया है जबकि इस अवधि में छोटी जोतों के आकार 1.42 हेक्टेयर से घटर 1.41 हेक्टेयर पर पहुंचा है. जहां तक बड़ी जोतों का सवाल है, इनका औसत आकार उपर्युक्त पांच साल की अवधि में 17.38 हेक्टेयर से घर 17.10 हेक्टेयर हो गया है.   देश में जोतों के उप-विभाजन और विखंडन के कारण कुल जोतों की संख्या साल 2010-11 के 138.3 मिलियन से बढ़कर

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मोदी राज में किसान: डबल आमद या डबल आफत?मोदी राज में किसान: डबल आमद या डबल आफत?
December 7, 2018

खेती-किसानी के मोर्चे पर केंद्र सरकार ने गुजरे चार सालों में क्या कुछ किया है, उसपर आप महज एक घंटे में राय बनाना चाहते हैं तो फिर यह पुस्तक आप ही के लिए है.(पुस्तक आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं)   किसानी के मोर्चे पर केंद्र सरकार के हासिल-लाहासिल को परखने के तीन रास्ते हो सकते हैं. एक तो सरकार के वादों को परखना कि वे किस हद तक पूरे हैं. दूसरे, सरकार के दावों को तौलना कि उनमें कितना दिखावा और कितनी सच्चाई है और तीसरे, यह देखना कि जीविका के लिए खेती-बाड़ी पर निर्भर आबादी के साथ किसी प्राकृतिक आपदा(मिसाल के लिए सूखा या बाढ़) के वक्त सरकार ने क्या सलूक किया.   किसानी के मोर्चे पर सरकार के कामकाज और सोच को परखने के लिए किताब में इन तीन कसौटियों का इस्तेमाल किया गया है और किताब के लेखक तथ्यसंगत-तर्कसंगत विश्लेषण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं के केंद्र की नरेन्द्र मोदी

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