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.....ताकि चुनाव-चर्चा के बीच आप भुखमरी से हो रही मौतों को ना भूल जायें !.....ताकि चुनाव-चर्चा के बीच आप भुखमरी से हो रही मौतों को ना भूल जायें !
November 22, 2018

झारखंड में बीते 30 दिनों में कम से कम दो जन भुखमरी के कारण मौत की चपेट में आये हैं.  भोजन का अधिकार अभियान ने यह जानकारी एक तथ्यान्वेषी दल की रिपोर्ट के आधार पर दी है.   रिपोर्ट में राज्य के दुमका जिले में जामा प्रखंड के महुआटांड गांव के कलेश्वर सोरेन और देवघर जिले में  मार्गोमंडा प्रखंड के मोती यादव की मौत के पीछे भुखमरी को एक कारण के रुप में चिह्नित किया गया है. भोजन का अधिकार अभियान की प्रेस विज्ञप्ति नीचे पाठकों की सुविधा के लिए पेस्ट की जा रही है.(तत्यान्वेषी दल की रिपोर्ट को डाऊनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें)   गौरतलब है कि देश के अलग-अलग इलाकों में पिछले एक साल से भुखमरी से होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है. इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज ने अपने जून माह के न्यूज एलर्ट में पाठकों का ध्यान इस तथ्य को ओर खींचा था कि बीते एक साल

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पत्रकारों के लिए सुनहरा मौका: एनएफआई का मीडिया अवार्ड कार्यक्रम, आवेदन  की आखिरी तारीख अब 10 जनवरी 2019 तकपत्रकारों के लिए सुनहरा मौका: एनएफआई का मीडिया अवार्ड कार्यक्रम, आवेदन की आखिरी तारीख अब 10 जनवरी 2019 तक
December 15, 2018

नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया ने अपने नेशनल मीडिया अवार्ड कार्यक्रम 2019 के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं. यह अवार्ड कार्यक्रम युवा और पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ सालों तक योगदान कर चुके पत्रकारों के लिए है. अवार्ड कार्यक्रम के जरिए चयनित पत्रकार राष्ट्रीय महत्व के वैसे मुद्दों पर अपने शोध आलेख/ या फोटो-लेख प्रकाशित कर सकेंगे जिनपर मीडिया में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है. अवार्ड कार्यक्रम में गहरी छान-बीन पर आधारित जमीनी शोध कार्य को वरीयता दी जायेगी. एक अपेक्षा यह भी है कि शोध कार्य रचनात्मक हो और उसे पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर तैयार किया जाय. इस अवार्ड कार्यक्रम के अंतर्गत 10 से 12 फोटो जर्नलिस्ट या प्रिन्ट माध्यम के पत्रकारों का चयन किया जायेगा. प्रत्येक चयनित अभ्यर्थी को 125,000 रुपये की अवार्ड राशि दी जायेगी. एनएफआई का नेशनल मीडिया अवार्ड कार्यक्रम अपनी स्थापना के 24वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है. कार्यक्रम में अभी तक देश भर के 250 पत्रकारों

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मी टू अभियान: यौन हिंसा की पीड़ित महिलाएं इतनी देर चुप क्यों रहीं, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट मेंमी टू अभियान: यौन हिंसा की पीड़ित महिलाएं इतनी देर चुप क्यों रहीं, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट में
November 5, 2018

क्या आप भारत में किसी आंधी की तरह दस्तक दे चुके मी टू अभियान की ‘आपबीतियों' को गौर से पढ़ रहे हैं ? और, क्या आपको भी यह सवाल परेशान कर रहा है कि यौन-दुर्व्यवहार की ‘आपबीती' सुनाने में में इस अभियान की पीड़ित महिलाओं ने इतनी देर क्यों की? मी टू अभियान को लेकर आपके ऐसे कई सवालों का संभावित जवाब एक सरकारी दस्तावेज में दर्ज है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस-4) के तथ्य संकेत करते हैं कि यौन-हिंसा के ज्यादातर मामलों में महिलाएं (1) खुद को बहुत असहाय महसूस करती हैं और, (2) ऐसे मामलों में किसी किस्म की सहायता के लिए उनका सबसे ज्यादा भरोसा अपने परिवार पर होता है जबकि सबसे कम भरोसा पुलिस या फिर सामाजिक सहायता के संगठनों पर.   सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक शारीरिक या यौन-हिंसा की शिकार होने वाली कुल महिलाओं में केवल 14 प्रतिशत ने ही ऐसी हिंसा रोकने के लिए किसी से मदद मांगी. ऐसी महिलाओं में 65

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ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2018: किसी फैसले पर पहुंचने से पहले इस न्यूज एलर्ट को जरुर पढ़ेंग्लोबल हंगर इंडेक्स 2018: किसी फैसले पर पहुंचने से पहले इस न्यूज एलर्ट को जरुर पढ़ें
November 1, 2018

इतिहास अपने को दोहराता है- पहली बार त्रासदी और दूसरी दफे प्रहसन के रुप में. ग्लोबल हंगर इंडेक्स को लेकर मुख्यधारा की मीडिया में ऐसा ही वाकया पेश आया है.   पिछले साल ग्लोबल हंगर इंडेक्स(जीएचआई) पर 119 देशों के बीच भारत 100 वें स्थान पर था. मुख्यधारा की मीडिया ने सुर्खी लगायी कि 2014 के मुकाबले भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर 45 स्थान नीचे खिसका है. मीडिया में यह भ्रम इतना फैला कि नीति आयोग को स्पष्टीकरण देना पड़ा. नीति आयोग ने कहा कि 2017 के वैश्विक भुखमरी सूचकांक पर भारत के स्थान की तुलना 2014 के वैश्विक भुखमरी सूचकांक में हासिल स्थान से नहीं की जा सकती.   ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर भारत के स्थान को लेकर मुख्यधारा की मीडिया में भ्रम इस बार भी बरकरार रहा. हिन्दी के ज्यादातर अखबारों ने लिखा कि भारत में भुखमरी के मामले में सरकार पूरी तरह फेल हो गई है, देश 4 साल में 55 से 103वें पायदान पर पहुंच गया

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तेजी से घटी है गरीबी मगर भारत में गरीबों की तादाद अब भी सबसे ज्यादा- एमपीआई रिपोर्टतेजी से घटी है गरीबी मगर भारत में गरीबों की तादाद अब भी सबसे ज्यादा- एमपीआई रिपोर्ट
September 27, 2018

एक दशक के भीतर भारत में गरीबों की संख्या घटकर आधी रह गई है लेकिन अब भी दुनिया के गरीब लोगों की सबसे बड़ी तादाद भारत में मौजूद है. ये निष्कर्ष है हाल ही में जारी साल 2018 के ग्लोबल मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स(एमपीआई) रिपोर्ट का.   रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साल 2005/6 से 2015/16 के बीच भारत में गरीबी की दर 55 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत हो गई है. एक दशक के भीतर लगभग 27 करोड़ 10 लाख लोग गरीबी की दशा से बाहर निकले हैं लेकिन बहुआयामी गरीबी(मल्टीडायमेंशनल पावर्टी) की दशा में पड़े लोगों की संख्या भारत में अब भी 36 करोड़ 40 लाख है. यह संख्या दुनिया के बाकी मुल्कों की तुलना में सबसे ज्यादा है. भारत के बाद बहुआयामी गरीबी की दशा में पड़े लोगों की सबसे ज्यादा तादाद नाइजीरिया(9 करोड़ 70 लाख), इथियोपिया(8 करोड़ 60 लाख), पाकिस्तान(8 करोड़ 50 लाख) तथा बांग्लादेश(6 करोड़ 70 लाख) में है.   चिन्ता

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