चर्चा में.....

वन और पर्यावरण मंत्रालय की नई रिपोर्ट में नया क्या है..
January 1, 1970

ग्रीन हाऊस गैंसों के उत्सर्जन  के सवाल पर कोपेनहेग्न में इस साल के दिसंबर में सम्मेलन होने जा रहा है और इससे ठीक पहले अपने देश में पर्यावरण की दशा को बताने वाली दो रिपोर्टें जारी हुई हैं। ११ अगस्त २००९ के दिन वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने नेशनल स्टेट ऑव द एन्वायर्नमेंट रिपोर्ट जारी की जबकि दूसरी वर्ल्ड इकॉनॉमिक एंड सोशल सर्वे रिपोर्ट है जिसे सेंटर फॉर साईंस एंड एन्वायर्नमेंट की निदेशक सुनीता नारायण ने जारी किया। इसमें कोई शक नहीं कि रिपोर्ट नई है मगर कायदे से पढ़ने पर पता चलता है कि पुरानी कहानी को नये कलेवर में दोहरा दिया गया है।      पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट को मंत्रालय के लिए डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स ने तैयार किया है।रिपोर्ट में जल, जमीन, हवा और जैवविविधता की दशा का जायजा लिया गया है और पर्यावरण के बदलाव, खाद्य, जल और उर्जा सुरक्षा और शहरीकरण के रुझानों पर भी नजर

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कुपोषण-मछरी जल बीच मरत पियासी
January 1, 1970

कुपोषण के बारे में अक्सर मान लिया जाता है कि यह तो गरीब राज्यों का लक्षण है और अपेक्षाकृत समृद्ध राज्य कुपोषण को मिटाने की राह पर हैं। लेकिन सच्चाई इसके उलट है। कुपोषण की शिकार महिलाओं और औसत से कम वजन के बच्चों की एक बड़ी तादाद धनी माने जाने वाले राज्यों में मौजूद है और ध्यान रहे कि इन दोनों को मानव-विकास के निर्देशांक में बड़ा महत्वपूर्ण माना जाता है। . हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों में प्रति व्यक्ति आय ज्यादा है लेकिन ये राज्य इस समृद्धि को महिलाओं और बच्चों की जिन्दगी में साकार करने में असफल रहे हैं। मिसाल के लिए औसत से कम वजन के बच्चों की सर्वाधिक तादाद के मामले में गुजरात देश के राज्यों के बीच चौथे पादान पर है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-३ के आंकड़ों के अनुसार गुजरात में ३ साल तक के आयुवर्ग में औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद ४७.४ फीसदी

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ना ना करो बहाना करो- प्रभाष जोशी
January 1, 1970

फरियादी भी थे, और मुंसिफ भी था-फरियाद हुई मगर फैसला नहीं हुआ। कारण, मुंसिफ बीच बहस से उठकर चला गया। कुछ ऐसा ही नजारा पेश आया जयपुर स्थित स्थानीय विश्वविद्यालय के मानविकी विभाग के सभागार में। मौका था मजदूर किसान शक्ति संगठन और साथी संगठन द्वारा आयोजित जन-सुनवाई का और शिकायतें थीं राजस्थान के सूचना आयुक्त के कार्यालय से। सूचना आयुक्त एम डी कौरानी आये और सैकड़ों फरियादियों से भरी उस जनसुनवाई से चंद मिनटों में व्यस्तता की बात कहकर चले गए। बहरहाल राजस्थान के सूचना आयोग की व्यस्तता कितनी है, इसका अंदाजा होता है सूचना के अधिकार को ताकतवर बनाने के लिए सूचना अधिकार मंच(राजस्थान) द्वारा जारी सुझावपत्र से। ६० सुझावों वाली इस सूचि में  सूचना आयोग में अपील करने वाले लोगों की तरफ से कहा गया है कि सूचना आयोग को १० से ६ बजे तक काम करना चाहिए। अभी तो १२-३ बजे तक ही बैठने का रिवाज

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वाई एस आर- एक नाम गरीबों के दर्दमंद का
January 1, 1970

  कोई कहता था वाई एस राजशेखर रेड्डी तो कोई सिर्फ वाई एस आर । मेडिकल की पढ़ाई फिर प्रैक्टिस और उसके बाद राजनीति में उतरे आंध्रप्रदेस के मु्ख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी का आकस्मिक और दुखद निधन अधिकारों के दायरे को बढ़ाकर भारत का विकास करने वाली सोच पर एक आघात की तरह है। राजशेखर रेड्डी ने नरेगा और वृद्धावस्था पेंशन जैसे सैकड़ों ग्रामीण विकास योजनाओं को लागू करने में अग्रणी भूमिका निभायी। याद रहे, ये योजनाओं गरीबों पर मेहरबानी करके नहीं चलायी गईं बल्कि इनके भीतर से ग्रामीण अधिकारिता की भाषा गूंज रही थी। अधिकारिता पर अधारित विकास के मामले में राजशेखर रेड्डी की सक्रियता की बानगी देखिए। आंध्रप्रदेश के सबसे गरीब और पिछड़े इलाकों में शुमार किए जाने वाले जिले अनंतपुर में सबसे पहले नरेगा को बतौर आजमाइश के चलाया गया। अनंतपुर के बाद इसे साल २००५ में २०० जिलों में लागू किया गया और बाद में नरेगा का दायरा

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नरेगा- बदले बदले से सरकार नजर आते हैं..
January 1, 1970

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पक्का भरोसा है कि नरेगा  के आगे इस साल का सूखा पानी भरता नजर आएगा लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाले बहुत से कार्यकर्ता नरेगा की कामयाबी को लेकर अब आशंकित हो उठे हैं, खासकर नरेगा के प्रावधानों में हालिया फेरबदल के बाद। इधर सूखे ने कुल २४६ जिलों को अपनी चपेट में ले लिया है उधर बहस इस बात पर सरगर्म हो रही है कि नरेगा के जरिए गरीब जनता के हाथ कानूनी तौर पर मजबूत किए जायें या फिर जोर गांवों में ऐसे संसाधन गढ़ने पर दिया जाय जो आगे चलकर गरीबों की जीविका का आसरा साबित हों।हालांकि ये दोनों बातें परस्पर पूरक हैं लेकिन नरेगा समर्थक  इसके स्वरुप को लेकर  दो खेमों में बंट गए हैं। . यूपीए सरकार जिस तरह से नरेगा का कायाकल्प करने पर जुटी है उसे देखकर देश के १४ संगठनों ने असहमति में अपनी मुठ्ठियां भींच ली हैं।

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