चर्चा में.....

भोजन का अधिकार विधेयक-छूट ना जाये पत्तल में छेद
January 1, 1970

भोजन के अधिकार बिल पर चर्चा चल निकली है और अपनी निष्ठा जताते हुए सरकार ने उसको अमली जामा पहनाने की कवायद शुरु कर दी है। ऐसे में नागरिक-संगठनों के कार्यकर्ता और गंवई समस्याओं के गहरे जानकार विशेषज्ञों को यह आशंका सता रही है कि पोषण की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लक्ष्य से जुड़ा यह महत्वाकांक्षी बिल  अपने मूल मंतव्य से चूककर कहीं सूरदास को सूंघाने के लिए कढ़ाही में चढाया हुआ घी बनकर ना रह जाये। मुख्य चिन्ता तो इस बात की है कि  सारे प्रावधान, उपबंध और मुहावरेबाजी के बावजूद कहीं ऐसा ना हो कि यह बिल हर जगह हर समय और हरेक को आहार उपलब्ध करवाने के मामले में असफल  साबित हो और कहीं किसी नागरिक को प्रावधानों के बावजूद भूखे पेट ना सोना पड़ जाये। भोजन का अधिकार विधेयक से जुड़ी चिन्ताओं के कई छोर हैं। पहली और गहरी चिन्ता तो यही है कि निर्धनतम परिवारों

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इस सूखे में संभावना
January 1, 1970

इस साल के सूखे ने एक बार फिर ध्यान दिलाया है कि देश के जिन इलाकों में सिंचाई के साधनों के टोटे हैं वहां चावल और गेंहूं जैसे पेट भर पानी पीकर लहलहानी वाली फसलों के बजाय मोटहन मसलन-ज्वार-बाजार,मरुआ-मसुरिया जैसी फसलों को उपजाने की जरुरत है क्योंकि इन फसलों को पानी की कम जरुरत होती है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश की कुल ७० फीसदी कृषि भूमि सिंचाई के लिए सिर्फ वर्षाजल पर निर्भर है और यह भूमि देश के उन इलाकों में है जहां पानी की कमी है। इस तथ्य दिन के उजाले की तरह साफ है कि देश में मोटहन उपजाने का एक भरा पूरा संसार है और यह फसल सूखे के वक्त किसान के लिए संकटमोचन साबित हो सकती है, खासकर उन इलाकों में जहां पानी की कमी है या फिर जो इलाके थोड़े कम उपजाऊ हैं।  बहरहाल, सूखे के हालात कुछ और इशारा करते हैं मगर

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शिक्षा का अधिकार विधेयक-देर आये- कम लाये?
January 1, 1970

कहा जा रहा है कि शिक्षा का अधिकार विधेयक ने एक इतिहास रचा है लेकिन क्या सचमुच ऐसा है। पक्ष और विपक्ष में ढेर सारी दलीलें हैं लेकिन यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इस विधेयक ने देश के शिक्षाविदों और नागरिक-संगठनों का कार्यकर्ताओं दोनों को समान रुप से निराश किया है। लोकसभा में अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का प्रावधान करने वाला जो विधेयक पास हुआ वह एक तरह से अपने ही पुराने वादे से मुकरने जैसा था-वादा यह कि शिक्षा हरेक को दी जायेगी, समान गुणवत्ता की दी जाएगी और बिना भेदभाव के दी जाएगी। जो विधेयक संसद में पास हुआ उससे शिक्षा तक बच्चों की पहुंच आसान तो हो जाएगी लेकिन यह शिक्षा ना समतामूलक होगी और ना ही समान रुप से हर जगह गुणवत्तापूर्ण। बड़ी समस्या यह है कि विधेयक में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं जतायी गई है और ना ही इस विधेयक

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खनन और विस्थापन-दर्द की वही दास्तान हर जगह
January 1, 1970

भारत सरकार खनन-क्षेत्र की दक्षिण कोरियाई कंपनी पोस्को के उड़ीसा स्थित ५१ हजार करोड़ के इस्पात संयत्र के लिए कोई वैकल्पिक जगह आबंटित करने की जुगत में है क्योंकि सरकार को डर है कि अगर आदिवासियों को उनकी जमीन और जीविका छोड़ने के लिए जबर्दस्ती मजबूर किया गया तो परिणाम गंभीर होंगे।सरकार की योजना है कि कंपनी को उड़ीसा में ही कहीं और जमीन दे दी जाय ताकि उसे प्रान्त से बाहर नहीं जाना पड़े। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि मोटा मुनाफा देने वाले खनन-उद्योग में भ्रष्टाचार का बोलबाला है और उसे जमीन भी औने-पौने में अविचारित ढंग से दे दी जाती है जबकि यह उद्योग विस्थापितों के पुनर्वास की मांग की एक नहीं सुनता।  बहरहाल, सरकार अभी भूमि-अधिग्रहण बिल को नये सिरे से लाने का विचार कर रही है लेकिन आदिवासियों की जीविका और रहवास से जुड़े इस प्रश्न पर उन्हें शामिल करने के तनिक भी

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