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बिहार के 20 जिलों में सूखे के हालात, बचाव और राहत के जल्द हों उपाय- एनएपीएमबिहार के 20 जिलों में सूखे के हालात, बचाव और राहत के जल्द हों उपाय- एनएपीएम
July 27, 2018

बिहार के 20 जिलों में मॉनसून ने दगा किया है, इन जिलों में जून-जुलाई के महीने में 80 से 50 फीसद तक कम बारिश हुई है लेकिन कम बारिश वाले जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया जाना अभी बाकी है.   कम बारिश वाले जिलों में धान की रोपाई के रकबे में आई कमी की तरफ ध्यान दिलाते हुए जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय(एनएपीएम) की बिहार इकाई ने मांग की है कि प्रदेश की सरकार को हालात के मद्देनजर जल्दी से जल्दी राहत के उपाय करने चाहिए.   गौरतलब है कि जून और जुलाई के महीने में कुल बारिश अगर सामान्य से 50 प्रतिशत या इससे कम हो तो राज्य की सरकार किसी इलाके को सूखाग्रस्त करार दे सकती है. यह बात केंद्रीय कृषि मंत्रालय के सूखे की समस्या और उसके निदान से संबंधित 2016 निर्देशिका में लिखी है लेकिन बिहार सरकार के कृषि विभाग या फिर आपदा प्रबंधन विभाग ने इस एलर्ट के लिखे जाने तक राज्य में जारी सूखे की

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छह राज्यों की साठ फीसद किशोरियों ने कहा- हां, बाहर जाने में लगता है डर..!छह राज्यों की साठ फीसद किशोरियों ने कहा- हां, बाहर जाने में लगता है डर..!
July 25, 2018

क्या आप मानते हैं कि ‘भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक' देश है जैसा कि एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने हाल में जनमत सर्वेक्षण के आधार पर कहा था ? या आपको लगता है कि ऐसा कहना किसी ‘देश को बदनाम' करने की कोशिश है, जैसा कि भारत सरकार ने कहा ?   अपना जवाब तय करने से पहले खूब गौर से सोचिए क्योंकि एक नई रिपोर्ट आयी है, इस बार देश के भीतर से ही आयी है और इस नई रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि देश की ज्यादातर किशोरियां घर से बाहर की दुनिया को अपने लिए असुरक्षित मानती हैं. उन्हें स्कूल और बाजार जाने में ही नहीं बल्कि सार्वजनिक शौचालयों तक के इस्तेमाल में डर लगता है !   किशोर उम्र की लड़कियों के मन में घर से बाहर की दुनिया के लिए मौजूद भय-भावना की बात करने वाली इस नई रिपोर्ट का नाम है- ‘वर्ल्ड ऑफ इंडियन गर्ल्स: ए स्टडी ऑन द परसेप्शन ऑफ गर्ल्स सेफ्टी इन पब्लिक स्पेसेज'.

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बाढ़ का गणित : 64 सालों में कब कितना हुआ नुकसान, पढ़े इस न्यूज एलर्ट मेंबाढ़ का गणित : 64 सालों में कब कितना हुआ नुकसान, पढ़े इस न्यूज एलर्ट में
July 23, 2018

क्या आप जानना चाहते हैं कि बाढ़ या भारी बारिश के कारण देश में हर साल कितने लोगों की जान जाती है, कितने मवेशी मौत का शिकार होते हैं, कितने मोल की फसल मारी जाती है और देश को हर साल कितनी संपत्ति का नुकसान होता है ?   आपके इन सवालों के जवाब छुपे हैं केंद्रीय जल आयोग के नये आंकड़ों में. बीते 64 सालों में बाढ़ और भारी बारिश से होने वाले नुकसान का एक आकलन आयोग ने पिछले मई महीने में प्रकाशित किया.   राज्यवार तथा अखिल भारतीय स्तर के इन आंकड़ों के मुताबिक 1953 से 2016 के बीच भारी बारिश या बाढ़ से हर साल औसतन 3.2 करोड़ लोगों को जान-ओ-माल का नुकसान उठाना पड़ा है, सालाना 1648 लोगों की जान गई है और इस अवधि में हर साल औसतन 94,104 पशु मौत के शिकार हुए हैं.   आयोग के नये आंकड़ों का एक संकेत यह भी है कि पिछले दशक (2007-2016) में बाढ़ और भारी

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'बीते एक साल में 20 लोगों की भुखमरी से मौत, सभी वंचित तबके के'-- रोजी रोटी अधिकार अभियान'बीते एक साल में 20 लोगों की भुखमरी से मौत, सभी वंचित तबके के'-- रोजी रोटी अधिकार अभियान
June 25, 2018

उत्तर कर्नाटक के नारायण, झारखंड के रूपलाल मरांडी, बरेली की सफीना अशफाक और ओड़ीशा के कुंदरु नाग के बीच क्या समानता हो सकती है ? शायद, कोई नहीं- सिवाय इसके कि ये सभी समाज के वंचित वर्ग के हैं और इन सबकी मौत पिछले एक साल के दौरान भुखमरी के कारण हुई तथा इन सभी को एक ना एक कारण से पीडीएस से अनाज नहीं मिल सका.(पिछले एक साल के दौरान भुखमरी से हुई मौतों की सूची के लिए यहां क्लिक करें) दलित समुदाय के नारायण की मौत 7 जुलाई 2017 को हुई. उन्हें छः महीनों तक राशन नहीं मिला क्योंकि उनका राशन कार्ड आधार से जुड़े न होने के कारण रद्द हो गया था. आदिवासी समुदाय के रुपलाल मरांडी की मौत 23 अक्तूबर 2017 को हुई. परिवार को दो महीनों का राशन नहीं मिला क्योंकि न तो रूपलाल और न ही उसकी बेटी राशन दुकान में आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन में सफ़ल

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वैश्विक शांति सूचकांक में भारत का दर्जा पहले से बेहतर लेकिन अंदरुनी संघर्ष के मोर्चे पर हालात चिन्ताजनकवैश्विक शांति सूचकांक में भारत का दर्जा पहले से बेहतर लेकिन अंदरुनी संघर्ष के मोर्चे पर हालात चिन्ताजनक
June 21, 2018

नये वैश्विक शांति सूचकांक रिपोर्ट में भारत की स्थिति पिछले साल के मुकाबले बेहतर हुई है लेकिन समाजी अमन और सियासी स्थिरता के एतबार से रिपोर्ट से निकलते संकेत भारत के लिए चिन्ताजनक हैं.   रिपोर्ट के मुताबिक सत्ता के शिखर पर ताकत के सिमटते जाने के कारण भारत का अंकमान सियासी अतिवाद तथा अंदरुनी संघर्ष के पैमाने पर चिन्ताजनक ऊंचाई पर है. रिपोर्ट में भारत को 163 देशों की सूची में इस साल 136 वां स्थान हासिल हुआ है जबकि 2016 में 141वां तथा 2015 में 143 वां स्थान हासिल हुआ था.   सूचकांक में पिछले सालों के मुकाबले भारत की स्थिति बेहतर होने का कारण बताते हुए कहा गया है कि हिंसक अपराधों को रोकने के सरकारी प्रयास कामयाब हुए हैं और हथियारों के आयात में कमी होने के कारण सैन्यीकरण पहले की तुलना में घटा है. गौरतलब है कि वैश्विक शांति सूचकांक में किसी देश का दर्जा तय करने के लिए उसके सामाजिक सुरक्षा-संरक्षा के

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