गरीबी का एक फसाना आईएलओ के हवाले से

गरीबी का एक फसाना आईएलओ के हवाले से

कहते हैं हकीकत कल्पना से कहीं ज्यादा हैरतअंगेज होती है। ऐसी ही हैरतअंगेज हकीकत है कि भारत में बीते बीस सालों में तेज आर्थिक-वृद्धि हुई है लेकिन गरीब कामगारों की तादाद में कोई खास कमी नहीं आई है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(आईएलओ) के एक हालिया रिपोर्ट (इकॉनॉमिक क्लास एंड लेबर मार्केट इन्क्लूजन: पुअर एंड मिडिल क्लास वर्कर्स इन डेवलपिंग एशिया एंड द पैसेफिक) में कहा गया है कि भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में ज्यादातर (91 फीसदी) कामगार एकदम गरीबया फिर कमोबेश गरीबकी श्रेणी में हैं। आईएलओ के दस्तावेज के अनुसार एशिया और पैसेफिक क्षेत्र के रोजगार के रुझानों के उलट भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में साल 2012 में श्रमशक्ति के 61 फीसदी हिस्से की रोजाना की आमदनी/उपभोग 1.25 डॉलर से 2 डॉलर के बीच था। दस्तावेज में ऐसे कामगारों को एकदम गरीब कहा गया है। अन्य 30 फीसदी कामगारों की रोजाना की आमदनी/उपभोग  2 से 4 डॉलर के बीच होने के कारण उन्हेंकमोबेश गरीब की श्रेणी में रखा गया है।(देखें नीचे दी गई लिंक)

गौरतलब है कि हाल में भारत के योजना आयोग ने देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बताते हुए कहा था कि 2004-05 में देश में 37.2 फीसदी लोग गरीब थे, लेकिन 2011-12 में यह आंकड़ा घट कर 21.9 फीसदी रह गया है। आयोग के अनुसार पिछले 7 सालों में देश में गरीबों की संख्या में 15.3 फीसदी की कमी आई है।(देखें नीचे दी गई लिंक)

दक्षिण एशिया की श्रमशक्ति में एकदम गरीबया फिर कमोबेश गरीबकामगारों की तादाद का इतनी बड़ी संख्या में होना एक तो योजना आयोग के आकलन पर संदेह जगाता है, साथ ही पूरे एशिया-पैसेफिक क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि और रोजगार के रुझानों से एकदम उलट है। आईएलओ के दस्तावेज के अनुसार बीते दो दशकों में एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में आर्थिक प्रगति का सूत्रधार मुख्य रुप से मध्यवर्ग( रोजाना की आमदनी या उपभोग 4 से 13 डॉलर के बीच) रहा है जबकि भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में आर्थिक प्रगति का पहिया गरीब कामगारों के बूते चला है।

मिसाल के लिए पूर्वी एशिया के देशों में मध्यवर्ग का आकार साल 1991 में 5 फीसदी था जो साल 2012 में बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया।ठीक इसी तरह दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की श्रमशक्ति में मध्यवर्गीय रोजगार वाले लोगों की संख्या साल 1991 से 2012 के बीच 12 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी हो गई। बहरहाल, आईएलओ के दस्तावेज के अनुसार दक्षिण एशिया में स्थिति इस रुझान से अलग रही। भारत सहित दक्षिण एशियाई क्षेत्र के देशों में साल 1991-2012 के बीच श्रमशक्ति में मध्यवर्गीय रोजगार वाले लोगों की संख्या में महज 7 फीसदी( 2 फीसदी से बढ़कर 9 फीसदी) की बढोत्तरी हुई।

अनुमान है कि तेज आर्थिक प्रगति के बावजूद साल 2017 तक भारत सहित दक्षिण एशिया की श्रमशक्ति में एकदम गरीब और कमोबेश गरीब श्रेणी के कामगारों की संख्या में खास कमी नहीं आयेगी। आईएलओ के दस्तावेज में कहा गया है कि साल 2017 तक इस इलाके में तकरीबन 87 फीसदी कामगार एकदम गरीबया फिर कमोबेश गरीबकी श्रेणी में रहेंगे। यह इलाका दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया की तुलना में रोजगार की बेहतर स्थितियों के मामले में बहुत पीछे रहेगा। अगले पाँच सालों में एशिया-पैसेफिक क्षेत्र की गरीब कामगार आबादी का तीन चौथाई हिस्सा सिर्फ दक्षिण एशिया में मौजूद होगा जबकि मध्यवर्गीय कामगारों की तादाद पूरे इलाके की तुलना में बहुत कम (10 फीसदी) रहेगी।

आईएलओ के दस्तावेज में कहा गया है कि बेहतर स्थिति और ज्यादा आमदनी वाले रोजगार का एक रिश्ता कामगार को हासिल शिक्षा से है। दस्तावेज के अनुसार भारत में प्रत्येक 10 मध्यवर्गीय कामगार में कम से कम 7 कामगार माध्यमिक स्तर तक शिक्षित है जबकि गरीब कामगारों के बीच माध्यमिक स्तर की शिक्षा वाले व्यक्तियों की संख्या 6 में 1 है। भारत में एकदम गरीब और कमोबेश गरीब की श्रेणी में आने वाले ज्यादातर(86 फीसदी से 77 फीसदी तक) कामगारों की शिक्षा प्राथमिक स्तर या फिर इससे कम हुई है।

आईएलओ का दस्तावेज एशिया-पैसेफिक क्षेत्र के गरीब, कमोबेश गरीब और मध्यवर्गीय कामगार आबादी के रुझानों की आपसी तुलना पर केंद्रित है और इसमें भारत सहित कंबोडिया, इंडोनेशिया और वियतनाम की कामगार आबादी के बारे में विशेष रुप से जिक्र किया गया है। दस्तावेज समावेशी श्रम-बाजार तैयार करने, कामगार आबादी की गरीबी को कम करने और मध्यवर्गीय रोजागार को बढ़ाने के लिहाज से तैयार की जाने वाली जरुरी नीतियों के लिए साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं।

कथा-विस्तार के लिए कृपया निम्नलिखित लिंक देखें-

Economic class and labour market inclusion: Poor and middle class workers in developing Asia and the Pacific

http://www.ilo.org/asia/whatwedo/publications/WCMS_218752/
lang--en/index.htm

POVERTY ESTIMATES FOR 2011-12

http://planningcommission.nic.in/news/pre_pov2307.pdf

Busting a few myths about poverty-Ajit K Ghose

http://www.im4change.org/latest-news-updates/busting-a-few
-myths-about-poverty-ajit-k-ghose-22480.html

Non-monetary indicator of poverty-RR Prasad

http://www.im4change.org/latest-news-updates/non-monetary-
indicator-of-poverty-rr-prasad-22444.html

Irrational poverty figures -Devinder Sharma

http://www.im4change.org/latest-news-updates/irrational-po
verty-figures-devinder-sharma-22326.html

(पोस्ट में इस्तेमाल की गई तस्वीर के लिए इन्कूलिसिव मीडिया फॉर चेंज http://newswing.com/sites/default/files/imagecache/highslide_full/bpl_family.jpg की आभारी है)




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