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जब कभी दुनिया की गरीबी पर कोई रिपोर्ट जारी होती है, तो उसमें दक्षिण एशिया- उसमें भी खासकर भारत सबसे बदहाल दिखता है। हमारे यहां न सिर्फ सबसे ज्यादा संख्या में कम वजन (अंडरवेट) के बच्चे हैं, बल्कि प्रसूति के दौरान माताओं की मृत्यु की दर भी बेहद ऊंची है। भारत में ही सबसे ज्यादा ऐसे बच्चे हैं, जो स्कूल नहीं जाते और विश्व कुपोषण सारणी में भी भारत का नाम सबसे ऊपर लिखा है।
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बहरहाल, 2011 के संयुक्त राष्ट्र ग्रामीण गरीबी रिपोर्ट में गरीबी मिटाने की मिसाल बनीं भारत में अपनाई गई कुछ योजनाओं का भी जिक्र है। साथ ही चिंता के आम क्षेत्रों का भी इसमें उल्लेख है। रिपोर्ट बताती है कि 1990 के दशक में ग्रामीण सड़क निर्माण पर खर्च किए गए हर दस लाख रुपयों (23,000 अमेरिकी डॉलर) से 881लोगों को गरीबी से निकाला जा सका। जो गांव शहरों के करीब हैं, गरीबी कम करने के मामले में उनका रिकॉर्ड दूसरे गांवों से बेहतर है। भारत में बड़े शहरों से जुड़े परिवहन गलियारों (ट्रांसफोर्ट कॉरिडोर्स) के आसपास के इलाकों में गैर-कृषि आर्थिक विकास तेजी से हो रहा है। यह विकास कृषि से बिल्कुल असंबंधित है।
ग्रामीण गरीबी रिपोर्ट 2011: नई वास्तविकताएं, नई चुनौतियां- भावी पीढ़ी के लिए नए अवसर* नाम से जारी हुई है। इसके मुताबिक हालांकि पिछले दशक में 35करोड़ ग्रामीण लोगों को गरीबी से निकाला गया है, लेकिन आज भी दुनिया के ज्यादातर गरीब देहाती इलाकों में ही रहते हैं। इसलिए इस रिपोर्ट में कृषि में आज की तुलना में ज्यादा निवेश और आजीविका के संसाधन बढ़ाने के लिए ज्यादा प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया है।
*(रिपोर्ट की पीडीएफ लिंक नीचे है) ***
भारत में अस्थायी (कैजुअल) मजदूरों की वास्तविक मजदूरी में बीते वर्षों के दौरान वढ़ोतरी हुई है। इसकी आंशिक वजह परिवहन (एवं अन्य) बुनियादी ढांचे में सुधार है। जहां बुनियादी ढांचा बेहतर है, वहां मजदूरी ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में मोबाइल फोन रखने के बढ़ते चलन से महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता में बढ़ोतरी हुई है और उनका अकेले सफर करना आसान हुआ है। लैंगिक विषमता घटाने के लिहाज से मोबाइल फोन दो से चार साल तक अतिरिक्त शिक्षा के बराबर महत्त्व के साबित हुए हैं।
फिर भी, रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण गरीबी में गिरावट के बावजूद दक्षिण एशिया किसी अन्य क्षेत्र की तुलना में सबसे ज्यादा ग्रामीण गरीब आबादी का घर है- करीब 50 करोड़ ऐसे लोगों का। दक्षिण एशिया के तमाम अति गरीब लोगों का अस्सी फीसदी हिस्सा देहाती इलाकों में रहता है।
रिपोर्ट बताती है कि 2006 से 2008 के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों की कीमत दोगुना हो जाने का परिणाम यह हुआ कि दस करोड़ ग्रामीण और शहरी गरीब भुखमरी के शिकार लोगों की श्रेणी में पहुंच गए। रिपोर्ट में यह हिसाब लगाया गया है कि 2050 तक दुनिया की आबादी नौ अरब से ऊपर होगी और उसे खिलाने के लिए दुनिया में अनाज की पैदावार आज की तुलना में 70 फीसदी बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि खेतों के बंटवारे से पिछले 50 वर्षों के दौरान प्रति किसान औसतन खेतों का आकार घटा है। मसलन, भारत में 1960 में प्रति किसान खेतों का औसत आकार 2.6 हेक्टेयर था, जो सन 2000 में 1.4 हेक्टेयर हो गया। यह क्रम अभी भी जारी है।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि खाद्यान्न की कीमतों में लगातार अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता एवं प्रभावों और प्राकृतिक संसाधन संबंधी विभिन्न रुकावटों की वजह से ग्रामीण गरीबी को घटाने की कोशिशें और जटिल हो जाएंगी।
रिपोर्ट में भारत के अनोखे (महात्मा गांधी) राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून का खास जिक्र किया गया है। इसके मुताबिक 2007/2008 तक इस योजना के तहत तीन करोड़ ग्रामीण गरीब परिवारों को 100 दिन रोजगार मुहैया कराया जा रहा था। जहां इन परियोजनाओं को लागू किया गया है, वहां से मजदूरों के पलायन में कमी देखी है- साथ ही कुछ इलाकों में मजदूरों की संख्या घटने की वजह से कृषि मजदूरी में बढ़ोतरी हुई है। नरेगा के तहत 2007/2008 में काम करने वाले मजदूरों में 44फीसदी महिलाएं थीं। केरल, तमिलनाडु और राजस्थान में तो यह संख्या और भी ज्यादा थी। आम तौर पर महिला कामगारों को रोजाना 47-58 रुपए मजदूरी मिलती है, जबकि नरेगा के तहत औसतन 85 रुपए मजदूरी मिली।
यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) की तरफ से तैयार किया गया है। इसके मुताबिक पिछले दशक के दौरान अति गरीबी में जीने वालों लोगों- जो रोजाना 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम पर जिंदगी गुजारते हैं- की कुल संख्या में गिरावट आई है। यह संख्या 48 प्रतिशत से गिर कर अब 34 प्रतिशत पर है। रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि पूर्वी एशिया, खासकर चीन के ग्रामीण इलाकों में गरीबी में गिरावट आई है। चीन में पिछले दशक के दौरान अति गरीबों की संख्या में दो तिहाई की गिरावट आई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्राजील, चीन और भारत जैसी तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाएं आज विश्व बाजार के महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं। ये कृषि पैदावार की मांग और आपूर्ति दोनों के विशाल स्रोत हैं। लेकिन भारत को रिपोर्ट में पाकिस्तान, फिलीपीन्स और सेनेगल के साथ उन देशों की श्रेणी में रखा गया है, जिनका विकास तो हो रहा है, लेकिन जहां भुखमरी के शिकार लोगों की ऊंची संख्या है और इस मोर्चे पर प्रगति की रफ्तार धीमी है। भारत में गरीबों के बीच उजड़े वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों की संख्या उनकी आबादी की तुलना में ज्यादा है।
दुनिया के कुछ हिस्सों- खास कर पूर्वी एशिया- में पिछले दो दशकों के दौरान गरीबी घटाने की दिशा में भारी प्रगति हुई है। इसके बावजूद विकासशील देशों में करीब एक अरब चालीस करोड़ लोग रोजाना 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम पर जिंदगी गुजारने पर मजबूर हैं और इनमें से करीब एक अरब लोग भुखमरी का शिकार है।
ग्रामीण गरीबी सब-सहारा अफ्रीका में काफी ज्यादा है, जहां दुनिया की अति गरीब आबादी का एक तिहाई हिस्सा रहता है। पिछले दशक के दौरान वहां अति गरीबों की संख्या 26 करोड़ 80 लाख से बढ़कर 30 करोड़ 60 लाख हो गई। लेकिन सब-सहारा अफ्रीका के देहाती इलाकों में अति गरीबी की दर में गिरावट आई और यह 65 से घटकर62फीसदी पर आ गई।
ग्रामीण गरीबी रिपोर्ट 2011की खास बातें:
* दुनिया के किसी भी दूसरे क्षेत्र या उप-क्षेत्र की तुलना में सबसे ज्यादाग्रामीण गरीब आबादी दक्षिण एशिया है- करीब 50 करोड़।
* दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और सब-सहारा अफ्रीका में तीन चौथाई सेज्यादा आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। शहरीकरण के बावजूद इस अनुपात मेंशायद ही कोई गिरावट आ रही है।
* अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) के मुताबिक 2004 में पचासकरोड़ लोग अपनी रोजाना जिंदगी 0.75 अमेरिकी डॉलर से कम पर गुजार रहे थे,जिन्हें अति गरीब कहा जा सकता है। इनमें से 80 फीसदी लोग सब-सहारा अफ्रीका औरदक्षिण एशिया में थे। इनमें से ज्यादातर आबादी ग्रामीण थी।
* कुपोषण ग्रस्त लोगों में बच्चों का अनुपात उनकी कुल संख्या की तुलना मेंज्यादा है। इस पहलू का भावी विकास और उन परिवारों एवं समाजों के लिए गंभीरपरिणाम हो सकता है।
* सभी विकासशील क्षेत्रों में ग्रामीण बच्चों के भूखा होने की संभावना शहरीबच्चों की तुलना में ज्यादा रहती है। 2008 में दक्षिण एशिया और सब-सहाराअफ्रीका में यह अनुपात 1.4 तथा लैटिन अमेरिका, कैरीबियाई देशों और पश्चिम एशियामें 2.5:1 था। पूर्वी एशिया में यह असंतुलन सबसे ज्यादा है, जहां गांवों मेंअंडरवेट बच्चों की संख्या शहरों की तुलना में पांच गुना ज्यादा है।
* दुनिया में अति गरीबों का कम से कम 70 फीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाकों में रहताहै। गरीब औऱ भूखी आबादी में बच्चों औऱ नौजवानों का अनुपात ज्यादा है।
* आज दुनिया में करीब एक अरब ग्रामीण गरीब हैं। आज भी तकरीबन एक अरब चालीसकरोड़ लोग अपनी रोजाना जिंदगी 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम पर गुजारते हैं औऱ करीबएक अरब लोग भुखमरी का शिकार हैँ।
* लगभग तीन अरब दस करोड़ लोग, यानी दुनिया की कुल आबादी का 55 फीसदी हिस्सादेहाती इलाकों में रहता है। लेकिन 2020 से 2025 के बीच कुल ग्रामीण आबादी अपनेचरम बिंदु पर पहुंच जाएगी और उसके बाद घटने लगेगी। तब विकासशील देशों में शहरीआबादी देहाती आबादी की तुलना में ज्यादा हो जाएगी।
* आज विकासशील देशों की कुल आबादी में 35 फीसदी से कुछ कम को अति गरीब कीश्रेणी में रखा जाता है। 1988 में यह संख्या 54 फीसदी थी। उस समय दो अमेरिकीडॉलर रोजाना खर्च के आधार पर तय गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या80 प्रतिशत थी, जो आज 60 प्रतिशत है। यह गिरावट मुख्य रूप से पूर्वी एशिया मेंगरीबी घटने की वजह से आई है। पूर्वी एशिया में आज रोजाना कम से कम दो अमेरिकीडॉलर खर्च न कर पाने वाली आबादी का हिस्सा 35 प्रतिशत है, जबकि रोज1.25अमेरिकी डॉलर से कम पर जिंदगी गुजारने वालों की संख्या15 फीसदी है।
* 2006 से 2008 के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों की कीमत मेंदोगुना बढ़ोतरी की वजह से दुनिया में दस करोड़ ग्रामीण और शहरी गरीब भुखमरी काशिकार हो गए।
* 2008 में खाद्यान्न की कीमत बढ़ने का असर एशिया और सब-सहारा के लोगों पर सबसेज्यादा पड़ा। एशिया में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या सबसे ज्यादा यानी करीब64 करोड़ है। सब-सहारा क्षेत्र में कुल आबादी की तुलना में कुपोषण ग्रस्त लोगोंकी संख्या सबसे ज्यादा यानी 32 फीसदी है।
* पिछले दशक के दौरान अति गरीबी के शिकार लोगों- यानी वो लोग जो अपनी जिंदगीरोजाना 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम पर गुजारते हैं- की कुल संख्या में गिरावट आई।यह संख्या 48 से घटकर 34 प्रतिशत रह गई।
* सब-सहारा अफ्रीका में अति गरीब ग्रामीण लोगों की संख्या पिछले एक दशकमें 26करोड़80 लाख से बढ़ कर 30 करोड़ 60 लाख हो गई है।
* दक्षिण एशिया में ग्रामीण गरीबी में धीमी गति से गिरावट आई है। यहां आजभी 45प्रतिशत लोग अति गरीब की श्रेणी में हैं, जबकि दो अमेरिकी डॉलर सेकम पर रोज कीजिंदगी गुजारने वाले लोगों की संख्या 80 प्रतिशत है। सब-सहारा अफ्रीकामें 60फीसदी आबादी रोजाना1.25 अमेरिकी डॉलर पर जिंदगी गुजारती है, जबकि रोजाना दो अमेरिकी डॉलर से कम परजिंदगी गुजारने वाले लोगों की संख्या लगभग 90 फीसदी है।
* लैटिन अमेरिका एवं कैरीबियाई देशों, और पश्चिम एशिया एवं उत्तर अफ्रीका मेंक्रमशः सिर्फ एक करोड़ दस लाख और साठ लाख लोग ही अति गरीब की श्रेणी में हैं।
* एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की तुलना मेंकृषि से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में होने वाली एक फीसदी बढ़ोतरी से सबसेगरीब 30 आबादी अपना खर्च ढाई गुना बढ़ाने की स्थिति में पहुंच जाती है। एक अन्यअध्ययन का नतीजा है कि गैर कृषि क्षेत्रों में विकास की तुलना में कृषि क्षेत्रमें विकास एक अमेरिकी डॉलर रोजाना खर्च के आधार पर मापी जाने वाली गरीबी कोघटाने में 3.2 गुना ज्यादा योगदान करता है।
* पिछले पचास साल के दौरान भारत में प्रति किसान खेत के औसत आकार में तेजी सेगिरावट आई है। उदाहरण के लिए, 1960 में जहां औसत खेत स्वामित्व 2.6 हेक्टेयरथा, वहीं यह सन् 2000 में 1.4 हेक्टेयर रह गया। घटने का यह क्रम अभी भी जारीहै।
* भारत में 1990 के दशक में ग्रामीण सड़क निर्माण पर हुए हर दस लाख रुपए खर्चसे 881लोग गरीबी से उबर गए।
* रिपोर्ट में गरीब छोटे किसानों और ग्रामीण उद्यमियों की उत्पादकता बढ़ाने परखास जोर दिया गया है।
इस विषय पर ज्यादा जानकारी के लिए निम्न लिखित वेबलिंक्स पर क्लिक करें:
ग्रामीण गरीबी रिपोर्ट 2011: नई वास्तविकताएं, नई चुनौतियां- भावी पीढ़ी के लिए नए अवसर
http://www.ifad.org/rpr2011/report/e/rpr2011.pdf
http://www.ifad.org/rpr2011/index.htm
प्रगति के बावजूद दुनिया के ज्यादातर गरीब आज भी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का निष्कर्ष, संयुक्त राष्ट्र, 6 दिसंबर, 2010
http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=36967&Cr=rural&Cr1=
ग्रामीण इलाकों के सामने अति गरीबी को खत्म करने की चुनौती, जेम्स मेलिक की रिपोर्ट, बीबीसी, 6 दिसंबर, 2010
http://www.bbc.co.uk/news/business-11909255
दुनिया की गरीबी घटाने में चीन की अग्रिम भूमिका, दारियो थुबर्न, 7 दिसंबर, 2010
http://www.google.com/hostednews/afp/article/ALeqM5gPdE_3zulE_iGntcHBnFzSpkwbXw?docId=CNG.8ee75df3b4b509a2fd62344f967f6bd0.441
http://www.unmultimedia.org/tv/unifeed/d/16508.html
ग्रामीण भारत अनुमान से ज्यादा गरीब: तेंदुलकर समिति
http://www.im4change.org/news-alert/rural-india-poorer-than-estimated-tendulkar-panel-780.html
एएचआरसी: मध्य प्रदेश में कुपोषण से 28 बच्चों की मौत
http://www.im4change.org/news-alert/ahrc-28-children-die-of-malnutrition-in-mp-1266.html
मध्य प्रदेश और राजस्थान में भूख से मौतें
http://www.im4change.org/news-alert/starvation-deaths-in-madhya-pradesh-rajasthan-1026.html
जलवायु परिवर्तन से बाल कुपोषण की हालत बदतर होगी
http://www.im4change.org/news-alert/climate-change-will-worsen-child-malnutrition-666.html
प्रसूति के दौरान दुनिया में होने वाली मौतों में 22 फीसदी भारत में
http://www.im4change.org/news-alert/india-accounts-for-22-per-cent-of-global-maternal-deaths-504.html
नाकाम खाद्य शिखर सम्मेलन और बढ़ती भूख
http://www.im4change.org/news-alert/failed-food-summit-and-rising-hunger-462.html
भूख पर एक्शन एड की रिपोर्ट में भारत की नाकामी का ब्योरा
http://www.im4change.org/news-alert/action-aid-report-on-hunger-identifies-india-as-a-loser-300.html
भूख और कुपोषण पर दो नई रिपोर्ट
http://www.im4change.org/news-alert/two-more-newly-released-reports-on-hunger-and-malnutrition-299.html
कुपोषण घटाने में धनी राज्यों का खराब प्रदर्शन
http://www.im4change.org/news-alert/richer-states-poor-performance-in-reducing-malnutrition-122.html
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