मी टू अभियान: यौन हिंसा की पीड़ित महिलाएं इतनी देर चुप क्यों रहीं, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट में

मी टू अभियान: यौन हिंसा की पीड़ित महिलाएं इतनी देर चुप क्यों रहीं, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट में

क्या आप भारत में किसी आंधी की तरह दस्तक दे चुके मी टू अभियान की ‘आपबीतियों' को गौर से पढ़ रहे हैं ? और, क्या आपको भी यह सवाल परेशान कर रहा है कि यौन-दुर्व्यवहार की ‘आपबीती' सुनाने में में इस अभियान की पीड़ित महिलाओं ने इतनी देर क्यों की?


मी टू अभियान को लेकर आपके ऐसे कई सवालों का संभावित जवाब एक सरकारी दस्तावेज में दर्ज है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस-4) के तथ्य संकेत करते हैं कि यौन-हिंसा के ज्यादातर मामलों में महिलाएं (1) खुद को बहुत असहाय महसूस करती हैं और, (2) ऐसे मामलों में किसी किस्म की सहायता के लिए उनका सबसे ज्यादा भरोसा अपने परिवार पर होता है जबकि सबसे कम भरोसा पुलिस या फिर सामाजिक सहायता के संगठनों पर.

 

सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक शारीरिक या यौन-हिंसा की शिकार होने वाली कुल महिलाओं में केवल 14 प्रतिशत ने ही ऐसी हिंसा रोकने के लिए किसी से मदद मांगी. ऐसी महिलाओं में 65 प्रतिशत ने अपने परिवार जन से सहायता मांगी जबकि 29 प्रतिशत ने ससुराल पक्ष के सदस्यों से सहायता की उम्मीद लगायी. केवल 3 प्रतिशत ने पुलिस से मदद मांगना उचित समझा और 2 प्रतिशत ने धार्मिक नेताओं से. सामाजिक सहायता के संगठनों से मदद की गुहार लगाने वाली ऐसी महिलाओं की संख्या केवल 1 प्रतिशत थी.


गौरतलब है कि शारीरिक या फिर यौन-हिंसा के शिकार होने वाली महिलाओं की संख्या ऐसे बरताव को रोकने के लिए मदद मांगने वाली महिलाओं की तुलना में बहुत ज्यादा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ें बताते हैं कि 15 साल की उम्र से शीरीरिक हिंसा झलने वाली महिलाओं की तादाद 30 प्रतिशत है जबकि 6 फीसद महिलाओं को अपने जीवन में कभी ना कभी यौन-हिंसा का सामना करना पड़ा है.

 

शारीरिक और यौन-हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं की इस बड़ी तादाद की तुलना में पुलिस या सामाजिक सहायता के संगठनों से मदद की गुहार लगाने वाली पीड़ित महिलाओं की संख्या बहुत कम है.


आखिर क्या वजह है जो कि यौन-हिंसा की शिकार महिलाओं कि प्राथमिक चिन्ता ऐसी घटनाओं को ज्यादातर मामलों में रक्त-संबंधियों (मां-बाप, भाई आदि) या निकट के रिश्तेदारों के बीच सीमित रखकर सुलझाने की होती है, मामले को सार्वजनिक करने पर नहीं ?


रिपोर्ट का एक तथ्य इस जटिल सवाल को सुलझाने में एक हदतक मददगार हो सकता है. एनएफएचएस-4 के तथ्य संकेत करते हैं कि कोई महिला पारिवारिक बंधनों में होने पर अपने साथ हुई यौन-हिंसा की बात को सार्वजनिक करने में बाधा महसूस करती है या फिर यौन-हिंसा की बात तभी सार्वजनिक करती है जब परिवार-जन ऐसा करने में सहायक हों. रिपोर्ट के मुताबिक यौन-हिंसा का शिकार होने पर विधवा, तलाकशुदा, परित्यक्त तथा निकट संबंधियों से अलग रहने वाली महिलाएं अन्य स्त्रियों की तुलना में कहीं ज्यादा संख्या(13 प्रतिशत) में ऐसी घटनाओं को सार्वजनिक करती हैं.


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4(2015-16) के अध्याय 16 में लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा से संबंधित तथ्य दिए गए हैं. इस अध्याय में दिए गए तथ्यों के लिए सर्वेक्षण में शामिल प्रत्येक परिवार से सिर्फ एक महिला का चयन किया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुकूल ध्यान रखा गया कि जानकारी जुटाने में महिला की निजता और गोपनीयता का उल्लंघन ना हो. घरेलू हिंसा से संबंधित बरतावों के आकलन के लिए कुल 83,397 महिलाओं का सर्वेक्षण हुआ और 79,729 महिलाओं से सफलतापूर्वक साक्षात्कार संपन्न हुआ.


यों राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के तथ्यों का मी टू अभियान से उपजते सवालों से कोई सीधा रिश्ता नहीं है फिर भी इस सर्वेक्षण के कुछ तथ्यों से भारत में महिलाओं के साथ होने वाले हिंसा के बरताव, घरेलू हिंसा की व्यापक स्वीकृति तथा स्त्री और पुरुषों में लैंगिक हिंसा के बरताव को लेकर मौजूद रुझान के बारे में व्यापक जानकारी मिलती है. आपकी सुविधा का ध्यान रखते हुए इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज ने ऐसे कुछ तथ्यों का रिपोर्ट से संकलन किया है. पूरी रिपार्ट आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं. राज्यवार आंकड़े देखने के लिए इस पन्ने का इस्तेमाल करें.


---- सर्वेक्षण में शामिल कुल 30 फीसद महिलाओं ने कहा कि उनके साथ 15 साल की उम्र के बाद से कभी ना कभी शारीरिक हिंसा का बरताव हुआ है. कुल 6 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्हें अपने जीवन में कभी ना कभी यौन-हिंसा के बरताव का सामना करना पड़ा है. गर्भ धारण कर चुकी महिलाओं में 4 प्रतिशत ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान उनके साथ हिंसा का सलूक हुआ है.

 

--- सर्वेक्षण में शामिल शादीशुदा महिलाओं में 33 प्रतिशत ने कहा कि उनके साथ पति या ससुराल पक्ष के लोगों ने शारीरिक, यौनिक या फिर मानसिक हिंसा का बरताव किया है.



--- शारीरिक या यौन-हिंसा झेलने वाली कुल महिलाओं में मात्र 14 फीसद ने कहा कि उन्होंने ऐसी हिंसा को रोकने के लिए मदद की गुहार लगायी.

 

---- अगर महिला किसी रोजगार में है तो उसके हिंसा के बरताव का शिकार होने की आशंका ज्यादा है बनिस्बत उस महिला के जो रोजगार में नहीं है. सर्वेक्षण में शामिल रोजगारशुदा(नकदी का अर्जन करने वाली) कुल 39 फीसदी महिला ने माना कि उनके साथ शारीरिक हिंसा का बरताव हुआ है जबकि गैर-रोजगारशुदा महिलाओं में यह संख्या 26 प्रतिशत थी.

 

---- महिलाओं की स्कूली शिक्षा तथा उन्हें हासिल धन की मात्रा के बढ़ने के साथ उनके साथ हिंसक बरताव में कमी आती है. 12 साल या उससे ज्यादा अवधि तक शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में हिंसा के बरताव का शिकार होने वाली महिलाओं की तादाद 17 फीसद है जबकि स्कूली शिक्षा से एकदम वंचित रही महिलाओं में यह संख्या 41 प्रतिशत है. सर्वेक्षण में शामिल सर्वाधिक धनी परिवारों में हिंसा के बरताव का शिकार होने वाली महिलाओं की संख्या 19 प्रतिशत रही जबकि सबसे कम धनी परिवारों में ऐसी महिलाओं की तादाद 40 प्रतिशत थी.

 

--- उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं से हिंसा के बरताव में वृद्धि का रुझान देखा गया. 15-19 साल की महिलाओं में हिंसा के बरताव का शिकार होने वाली महिलाओं की तादाद 17 प्रतिशत थी तो 40-49 आयुवर्ग में ऐसी महिलाओं की संख्या 35 फीसद थी. अविवाहित महिलाओं की तुलना में विवाहित महिलाओं के साथ हिंसा के बरताव की आशंका ज्यादा है. --- सर्वेक्षण में 15-49 साल की महिलाओं से पूछा गया कि क्या कभी बचपन में या फिर व्यस्क होने पर आपके साथ यौन-हिंसा का बरताव हुआ है. कुल 6 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि हां, जीवन में कभी ना कभी उनके साथ ऐसा बरताव हुआ है. एनएफएचएस-3 में ऐसा कहने वाली महिलाओं की संख्या 9 प्रतिशत थी.

 

--- सर्वेक्षण में शामिल 15-19 आयुवर्ग की 3 प्रतिशत महिलाओं ने अपने साथ यौन-हिंसा का बरताव होने की बात कही जबकि 20-24 साल की महिलाओं में ऐसा कहने वाली की तादाद 5 प्रतिशत थी और इससे ज्यादा उम्र वाली महिलाओं में यह संख्या 7 प्रतिशत रही.

 

--- शिक्षा बढ़ने के साथ यौन-हिंसा के बरताव में कमी के रुझान देखे गये. स्कूली शिक्षा से एकदम वंचित रही महिलाओं में 9 प्रतिशत ने कहा कि उनके साथ यौन-हिंसा का बरताव हुआ है जबकि 12 साल या इससे ज्यादा अवधि तक स्कूली शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में यह संख्या 3 प्रतिशत है. सर्वेक्षण में शामिल सबसे कम धनी परिवारों में 10 फीसद महिलाओं ने कहा कि उनके साथ यौन-हिंसा का बरताव हुआ है जबकि सबसे धनी परिवारों में ऐसा कहने वाली महिलाओं की तादाद 3 प्रतिशत थी.

 

---- सर्वेक्षण में शामिल 52 प्रतिशत महिलाओं तथा 42 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि निम्नलिखित सात कारणों में कोई एक या एक से ज्यादा कारण मौजूद हो तो उस सूरत में पत्नी को पीटा जा सकता है: 1. अगर पत्नी बिना बताये कहीं जाये, 2.घर और बच्चों की अनदेखी करे, 3.अगर पत्नी बहस करे , 4.पत्नी यौन-संबंध के लिए मना करे, 5.खाना ठीक से ना पकाये, 6.पति के चरित्र पर शंका करे और, 7.सास-ससुर की अवमानना करे.




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