राजस्थान में आदिवासी अधिकारों की अनदेखी
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सामाजिक
अधिकारिता के कानूनों के होने भर से किसी समुदाय के सशक्तीकरण की गारंटी होती तो
राजस्थान का आदिवासी समुदाय ना तो शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित रहता और ना
ही अपनी जीविका के जरुरी साधन जमीन से।
मिसाल के
लिए इन तथ्यों पर गौर करें।राजस्थान की कुल आबादी में आदिवासी समुदाय की तादाद
१२.४४ फीसदी है और साक्षरता-दर है ४४.७ फीसदी जबकि सूबे की औसत साक्षरता दर इससे
कहीं ज्यादा ऊंची(६१.०३ फीसदी) है। क्या शिक्षा का अधिकार कानून के बाद इस स्थिति
में सुधार आ सकता है।इसकी संभावना थोड़ी धूमिल दिखाई देती है क्योंकि ८१.७ प्रतिशत
आदिवासी छात्र-छात्राएं दसवीं से पहले ही पढाई छोड देते है और हाल ही सरकार द्वारा
(जुलाई २०१०) करवाये गये चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे के अनुसार आदिवासी क्षेत्र में
सबसे अधिक (६ से १४ वर्ष की आयु के) बच्चे
विद्यालयों से ड्राप-आउट या अनामांकित है।इसका बड़ा कारण है प्रशासनिक उपेक्षा।
राजस्थान
में आदिवासी समुदाय के बीच गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की मांग करते हुए
आदिवासी अधिकार मंच द्वारा कहा गया है कि सूबे के आदिवासी बहुल जिलों उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही, प्रतापगढ, सवाईमाधोपुर, कोटा, बांरा और बूंदी में आज भी शिक्षकों के १११९३ पद रिक्त पडे हैं।
आदिवासी क्षेत्रों में अधिकतर प्राथमिक विद्यालयों में एक शिक्षक ही नियुक्त है।
इसकी वजह से निजी अवकाश और राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे जनगणना, पल्सपोलियो, चुनाव और कई तरह के
सर्वे कार्यों के दौरान विद्यालय बंद रहते है।
फिर आदिवासी क्षेत्रों के विद्यालयों में अधिकतर अध्यापक शिक्षामित्र, पैराटीचर, शिक्षा सहयोगी और
प्रबोधक की हैसियत से काम कर रहे हैं जिनकी योग्यता है- आठवीं से दसवीं पास।
राजस्थान
के आदिवासी समुदाय के बीच प्राथमिक शिक्षा के हालात एक जिस प्रशासनिक उपेक्षा का
संकेत करते हैं उसका एक पहलू आदिवासियों को उनकी जीविका से वंचित करने से भी
जुड़ता है। आदिवासी अधिकार मंच द्वारा जारी एक और ज्ञापन में कहा गया है कि सूबे
के आदिवासी बहुल दक्षिणी और पूर्वी इलाके में शहरों के आसपास पड़ने वाली अनुसूचित
जनजातियों की जमीन भू-माफिया के हाथो गैर-आदिवासियों को आवासीय या व्यावसायिक
उपयोग के लिए धड़ल्ले से बेची जा रही है जबकि कानून में इस बात की स्पष्ट मनाही की
गई है।
राजस्थान
में आदिवासी समुदाय के भूमि-अधिकारों के अन्तर्गत पांचवी अनुसूची के प्रावधानों के
अनुसार राज्यपाल को विशेष अधिकार दिए गए हैं ताकि आदिवासी समुदाय की भूमि किसी
गैर-आदिवासी को हस्तांतरित नहीं की जा सके। एक और कानूनी उपाय राजस्थान काश्तकारी
अधिनियम-1955 का है
जिसमें धारा ४२ बी जोड़कर इस बात को सुनिश्चित किया गया है कि अनूसूचित-जाति और
जनजाति किसानों की जमीन किसी गैर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को
ना तो बक्सीस के तौर पर दी जा सके ना ही वसीयत रुप में।
पेसा कानून
में इस बात की पूरी व्यवस्था है कि देश के आदिवासी-बहुल इलाकों में जनजातियों की
सांस्कृतिक पहचान, परंपरागत
मान्यताएं और स्वशासन की सामुदायिक व्यवस्था अपनी निरंतरता में बनी रहे लेकिन क्या
जमीन पर यह सपना साकार हो पाया है। राजस्थान का उदाहरण इसका नकारात्मक उत्तर देता
है। राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार पेसा कानून
राजस्थान की विधान सभा में १९९९ में पारित किया गया लेकिन विसंगतियों के साथ। और
लागू होने के १२ साल बाद भी, इसके क्रियांवयन के लिए कोई ठोस नीति नहीं अपनायी जा सकी।ऐसे
में राज्य के आदिवासी बहुल इलाके स्वशासन के तर्क से अपने सामुदायिक फैसले खुद
लेना चाहें तो कानून के रहते भी नहीं ले सकते।
गुजरे 16 मार्च को राजस्थान
के जयपुर में उद्योग मैदान के नजदीक स्टैच्यू सर्किल पर राजस्थान आदिवासी अधिकार
मंच की तऱफ से सूबे में जनजातीय के सशक्तीकरण से संबंधित वनाधिकार कानून, पेसा(पंचायत एक्सटेंशन टू शिड्यूल एरिया) कानून के अमल में हो
बदइंतजामी सहित आदिवासी अधिकार के कई मुद्दों पर चर्चा की गई। चर्चा में बी डी
शर्मा, केबी
सक्सेना, अरुणा राय
और निखिल डे सहित कई नामचीन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शिरकत की। इस चर्चा में
इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की टोली ने शिरकत की। चर्चा की विस्तृत जानकारी के लिए
नीचे राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच की तरफ से राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव को लिखे
गए पत्र के मूल प्रारुप को दिया जा रहा
है. साथ इस विषय से संबंधित कुछ जरुरी लिंक दिए गए हैं---
पेसा कानून- http://hppanchayat.nic.in/pdf%20files/Pesa.pdf
वनाधिकार कानून- http://www.fra.org.in/
आदिवासी अधिकार मंच, राजस्थान द्वारा जारी प्रतिवेदन
राजस्थान आदिवासी
अधिकार मंच
७०, न्यू विध्यानगर, संयम बाग के पास, हिरण मंगरी, सेक्टर ४,
जिला- उदयपुर, (राज.)
पिनकोड-३१३००१
माननीय मुख्यसचिव महोदय,
दिनांक- १६ मार्च, २०११
राजस्थान सरकार
जयपुर
विषयः- राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
सुनिश्चित कराने के सम्बंध में
महोदय,
राज्य के उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही, प्रतापगढ, सवाईमाधोपुर, कोटा, बांरा एवं बूंदी
मुखय जिले है जिनमें भील,
भील
मीणा, मीणा, गरासिया, सहरिया एवं कथोडी प्रमुख जनजातियां दक्षिण व पूर्वी क्षेत्रों में
निवास करती है। राज्य की कुल जनसंखया में से १२.४४ प्रतिद्गात आदिवासी जनसंख्या है
जिनकी साक्षरता दर ४४.७ प्रतिद्गात है जबकि राज्य की साक्षरता प्रतिद्गात ६१.०३
है। इनमें आदिवासी महिलाओं का साक्षरता प्रतिद्गात मात्र २६.२ प्रतिद्गात है। एक
सर्वे के अनुसार ८१.७ प्रतिद्गात आदिवासी छात्र-छात्राऐं दसवीं से पूर्व ही पढाई
छोड देते है। इस प्रकार आदिवासी समुदाय शिक्षा
जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में पिछडा हुआ है
जिसके निम्न कारण है-
१.
दक्षिण राजस्थान के आदिवासी सम्भाग में आज भी ५१४७० कुल पदों की तुलना में
१११९३ पद रिक्त पडे हैं।
२. एक विद्यालय को
नियमानुसार वर्ष में कम से कम २२० कार्य दिवस संचालित किया जाना आवश्यक है जबकि
आदिवासी क्षेत्रों में अधिकतर प्राथमिक विद्यालयों में एकल शिक्षक ही नियुक्त है
जिस कारण से उसके व्यक्गित अवकाश एवं राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे जनगणना, पल्सपोलियो, चुनाव एवं विभिन्न
प्रकार के सर्वे के कार्यों के दौरान विद्यालय बंद रहते है। अतः ऐसे विद्यालय वर्ष
में औसतन १४० दिन ही खुलते है।
३. आदिवासी क्षेत्रों
के विद्यालयों में अधिकतर अध्यापक शिक्षाकर्मी, पैराटीचर, शिक्षा सहयोगी एवं प्रबोधक है जिनकी योग्यता आठवीं से
दसवीं पास है। ऐसे अध्यापक नाममात्र के अध्यापक है जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नही दे
पा रहे है।
४. आदिवासी
क्षेत्रों के प्रशिक्षित एवं योग्य अध्यापक ब्लॉक, जिला मुख्यालय एवं अन्य विभागों में
प्रतिनियुक्ति पर लगे हुए है।
उक्त स्थिति का नतीजा हाल ही सरकार द्वारा जुलाई २०१० में
करवाये गये चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे के अनुसार भी आदिवासी क्षेत्र में सबसे अधिक ६
से १४ वर्ष आयु के लाखों बच्चे विद्यालयों से ड्रोप आउट या अनामांकित है।
अतः हमारी मांग है कि-
१. आदिवासी क्षेत्रों
में रिक्त पदों को शीघ्र प्राथमिकता से भरा जाय।
२. प्राथमिक विद्यालय में एकल शिक्षक की बजाय कम से
कम तीन अध्यापकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए।
३. अध्यापकों की नियुक्ति स्थान से अन्य विभागों या
कार्यालयों में प्रतिनियुक्ति पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जायें।
४. अध्यापकों को
सरकार द्वारा करवाये जाने वाले गैर शिक्षण कार्यों से मुक्त किये जाये।
५. चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे से प्राप्त आदिवासी
क्षेत्र के ६ से १४ वर्ष आयु के शिक्षा से वंचित बाल मजदूरों सहित सभी बच्चों को शिक्षा
से जोड़ने लिए विद्गोष योजना लागू की जानी चाहिए।
भवदीय
समस्त
आदिवासी सदस्य राजस्थान
राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच
७०,न्यु विद्यानगर,संयम बाग के पास,हिरण मगरी, सेक्टर ४,
जिला,
उदयपुर, (राज.) पिनकोड-
३१३००१
सम्पर्क फोन-९९२८१६६६४३
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सेवामें,
माननीय
मुख्य सचिव महोदय
राजस्थान
सरका
जयपुर
विषय :- आदिवासियों की भूमि हस्तान्तरण पर रोक लगाने बाबत।
महोदय,
राजस्थान
में आदिवासी समुदाय के भूमि अधिकारों में पांचवी अनूसूची के प्रावधानों के अनुसार
राज्यपालों को आदिवासियों की भूमि गैर आदिवासियों को हस्तान्तरित नही हो इस बाबत
विशेष अधिकार दिये गये है। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम १९५५ में ४२ बी जोड़कर अनूसूचित
जाति और जनजाति के खातेदार कृषकों की भूमि गैर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के
लोगों को बक्सीस या वसीयत के माध्यम से भूमि हस्तान्तरण को भी अवैध घोषित किया हुआ
हैं।
लेकिन
दक्षिणी राजस्थान व पूर्वी राजस्थान के सहरिया क्षेत्र में शहरों के आसपास की
अनुसूचित जनजातियों की भूमि भू माफियाओं के द्वारा गैर आदिवासियों को आवासीय एवं
व्यावसायिक रूपान्तरण कर धडल्ले से बेचान हो रही हैं।
इसके अलावा
खनन उद्योग, राष्ट्रीय
राजमार्ग विकास के नाम पर बनने वाले बांधो उद्योगों के लिये भूमि आवप्ति जारी है
कई लोगों को विस्थापित होना पड़ रहा है।
उनके पुर्नवास की समुचित व्यवस्था नहीं हैं। राज्य द्वारा की जा रही भूमि अवाप्ति
में मुआवजा राशि के निर्धारण में दोहरे मापदण्ड नजर आते है। आदिवासियों को बहुत ही
कम मुआवजा दिया जाता है। राज्य की शह पर भूमाफिया पिछले २० वर्षों से बड़ें पैमाने
पर कृषि भूमि का हस्तान्तरण करवा कर गैर आदिवासियों को बेचने में लगा हुआ है।
आदिवासी समुदाय को जिस गति से विस्थापित किया जा रहा है उसके गम्भीर परिणाम होंगे
ही। आदिवासी प्रकृति से अलग रहकर जिन्दा नहीं रह सकता है इसलिये संविधान निर्माताओं
ने संविधान की पांचवी अनुसूची बनाकर राज्यपालों एवं जनजाति सलाहकार परिषद का गठन
कर उन्हें विशेष अधिकार दिये लेकिन इन अधिकारों का उपयोग आदिवासियों की भूमि के
संरक्षण में नही हुआ। अतः सरकार को संवैधानिक दायित्व निभाने व संविधान की भावना
के अनुसार तत्काल निम्न कदम उठाने की आवश्यकता हैं:
१ आदिवासियों की भूमि को गैर आदिवासियों को
आवासीय या व्यावसायिक स्वरूप में परिवर्तन करवाकर हो रहे हस्तान्तरण पर तत्काल रोक
लगे यानी भू राजस्व अधिनियम की धारा ९० बी को समाप्त किया जाये।
२ जो भूमि आदिवासियों से, आवासीय या
व्यावसायिक स्वरूप में परिवर्तन होकर गैर आदिवासियों के नाम चली गयी है उसकी पहचान
कर उसे पुनः आदिवासियों को लोटाया जाये।
३ खेती करने वाले काश्तकारों के अलावा अन्य
व्यवसाय जैसे- नोकरी आदि करने वालो द्वारा खेती की जमीन क्रय करने पर सरकार द्वारा
रोक लगाई जाये। आदिवासी समुदाय को सम्बन्धित विस्थापन के,पूर्व भूमि के बदले
भूमि दी जाय। भूमि उपलब्ध नहीं होने की परिस्थिति मे,पुर्नवास की पूरी
आयोजना के साथ पुर्नवास किया जाये उसके बाद परियोजना लागू हो।
५ अब तक जिन आदिवासी परिवारों का समुचित
पुर्नवास नहीं किया गया है उनका सर्वे करवाकर उनके पुर्नवास की व्यवस्था की जाये।
६ गैर आदिवासियों, भूमि दलालों द्वारा
आदिवासियों की भूमि जबरन कब्जा करने जैसे मामलों पर सख्त कार्यवाही हो।
७ गैर आदिवासियों खनन करने वालों द्वारा उनकी
जमीन पर खनन की स्लरी डालने से उनकी जमीन का उपजाऊपन समाप्त हो रहा है। अन्त में
उस जमीन को गैर कानूनी तरीके से खनन मालिकों द्वारा हड़प लिया जाता है। इस पर
तत्काल कार्यवाही हो।
८ आदिवासी क्षेत्र के भूमि विवाद हल करने बाबत
विशेष कोर्ट/शिविर लगाकर मौके पर ही विवादों का फैसला किया जाये जिससे आदिवासी
समुदाय को शीघ्र न्याय मिल सके।
९ शहरों के आसपास आदिवासियो की भूमि को युआई-टी
व नगरपालिका क्षेत्र में लेने से भूमाफिया आदिवासियो की भूमि सरकार द्वारा अवाप्त
करने का डर बताकर बेनामी रजिस्ट्रियां करवा रहे है इसे रोका जाय।
अतः हम
आपसे अनुरोध करते है कि आदिवासियों के लिए संविधान मे की गई विद्गोष व्यवस्थाओ
पांचवी अनुसूची के प्रावधानो एवं पंचायत उपबन्ध अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार
अधिनियम को लागू करवाकर आदिवासियों की महत्वपूर्ण आजीविका भूमि को अन्य व गैर
आदिवासियों को हस्तांतरित होने से बचाने हेतु ठोस कदम उठाये जाय।
इसी आशा के साथ
भवदीय
समस्त आदिवासी सदस्य
राजस्थान
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