रोजगारपरक शिक्षा- राह भूले थे कहां से हम...

रोजगारपरक शिक्षा- राह भूले थे कहां से हम...

सरकार का लक्ष्य साल 2022 तक 50 करोड़ लोगों को रोजगारपरक शिक्षा देने का है। क्या यह लक्ष्य देश के ग्रामीण अंचल में मौजूद जीविका के संकट के समाधान से प्रेरित है? और, क्या यह लक्ष्य देश की श्रमशक्ति की वास्तविक जरुरतों से मेल खाता है?

 
रोजगारपरक शिक्षा की जरुरतों के तहत नए शिक्षा आयोग के गठन कीकवायद और इसी तर्क के सहारे एक मशहूर केंद्रीय विद्यालय विश्वविद्यालय द्वारा पाठ्यक्रम में किए गए बदलाव के बीच आई हाल की दो शोध-रिपोर्टों का कहना है कि ना तो 50 करोड़ लोगों को रोजगारपरक शिक्षा देने का सरकारी लक्ष्य का वास्तविकता से मेल है ना ही बेरोजगारी दूर करने की प्राथमिकता के लिहाज इस लक्ष्य सही दिशा में उठा कदम माना जा सकता है। गौरतलब है कि इन रिपोर्टों में से एक इंस्ट्टीयूट ऑव अप्लायड मैनपावर रिसर्च(आईएएमआर) की है, जो योजना आयोग के अधीन संचालित होता है।

 
आईएएमआर ने एस्टीमेटिंग द स्किल गैप ऑन रियलिस्टिक बेसिस फॉर 2022 नामक अध्ययन में कहा है कि सरकार ने ग्याहरवी पंचवर्षीय योजना के शुरुआती सालों में नेशनल पॉलिसी ऑन स्किल डेवलपमेंट के तहत 50 करोड़ लोगों को रोजगार के लिहाज से हुनरमंद बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया जबकि साल 2022 तक अधिकतम 29 करोड़ कुशल कामगारों की जरुरत होगी। अध्ययन में कहा गया है कि सरकारी लक्ष्य में जरुरत की तस्वीर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है क्योंकि एक तो आकलन में “कौशल”(स्किल) कोई परिभाषा निर्धारित नहीं की गई है, दूसरे गैर-खेतिहर क्षेत्रों में कार्यरत श्रमशक्ति की संख्या का अनुमान सरकारी लक्ष्य में वास्तविकता से अधिक कर लिया गया है और मान लिया गया है कि सभी खेतिहर मजदूर एक ना एक दिन “खेती-किसानी का काम छोड़ देंगे”।

 
अध्ययन के अनुसार साल 2009-10 में रोजगार के लिए देश की कुल श्रमशक्ति का 53 फीसदी हिस्सा(24 करोड़ 40 लाख) खेती-किसानी पर निर्भर था और साल 2020 तक मौजूदा चलन को देखते हुए जीविका के लिए खेती-किसानी पर निर्भर लोगों की संख्या हद से ज्यादा घटने के बावजूद कम से कम 19 करोड़ रहेगी जो कि कुल श्रमशक्ति का 33 फीसदी हिस्सा होगा। अध्ययन में एक रुचिकर दलील यह दी गई है कि खेती-किसानी के काम को अकुशल श्रम नहीं कहा जा सकता क्योंकि “ क्योंकि सदियों से ये लोग किसान के रुप में अपना काम कुशलतापूर्वक करते आये हैं और जब खेती-किसानी के काम को छोड़कर गैर-खेतिहर काम की और कदम बढ़ाते हैं तब ही उन्हें अकुशल कहा जा सकता है।”

अर्थव्यवस्था की गति को बनाये रखने के लिए कुशल श्रम की जरुरतों को पूरा करने के लिहाज से सरकार के द्वारा उठाये गए कदमों की आलोचना करते हुए दूसरे शोध-अध्ययन शार्टेज ऑव स्किल्ड वर्कर्स- अ पैरॉडाक्स ऑव इंडियन इकॉनामी में कहा गया है कि भारत में दी जा रही रोजगारपरक शिक्षा का अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं से मेल नहीं है क्योंकि भारत में श्रमशक्ति का 90 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में एक बड़ी तादाद अशिक्षित और गरीब दिहाड़ी मजदूरों की है जो ग्रामीण क्षेत्रों से जीविका की खोज में शहर चले आते हैं। इस तादाद को नए रोजगार के लिए सबसे कौशल की सबसे ज्यादा जरुरत होती है जबकि रोजगारपरक प्रशिक्षण की मौजूदा व्यवस्था उनके विरुद्ध काम करती है। कौशल अर्जित करने के किसी भी कार्यक्रम से जुड़ने के लिए किसी व्यक्ति का कम से कम आठवीं जमात पास होना जरुरी है और ऐसी व्यवस्था अपनी बनावट के कारण ज्यादातर जरुरतमंदों को नामांकन की शुरुआती प्रक्रिया में शामिल होने से पहले ही बाहर कर देती है।

 
गौरतलब है कि भारत की कुल श्रमशक्ति में 15-59 साल के आयु-वर्ग के लोगों की संख्या 43 करोड़ 10 लाख है और इसमें 12 करोड़ 60 लाख(29 फीसदी) रोजगारपरक शिक्षा तो दूर की बात है, कायदे से साक्षर भी नहीं हैं। देश की श्रमशक्ति में 24 फीसदी(10 करोड़ 20 लाख) तादाद ऐसे लोगों की है जो या तो प्राथमिक स्तर तक शिक्षित हैं या फिर उससे भी कम(विस्तार के लिए देखें एनएसएसओ की रिपोर्ट)। देश की श्रमशक्ति( 15-59 साल के आयुवर्ग के लोग) में रोजगारपरक प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले या कर रहे लोगों की संख्या साल 2009-10 में मात्र 4 करोड़ 30 लाख थी यानि श्रमशक्ति के मात्र 10 फीसदी हिस्से को ही रोजगारपरक कौशल हासिल था।

इस कथा के विस्तार और मूल रिपोर्टस् के लिए कृपया निम्नलिखिति लिंक्स खोलें-

एस्टीमेटिंग द स्किल गैप ऑन रियलिस्टिक बेसिस फॉर 2022 नामक अध्ययन

http://iamrindia.gov.in/epw.pdf

शार्टेज ऑव स्किल्ड वर्कर्स- अ पैरॉडाक्स ऑव इंडियन इकॉनामी नामक अध्ययन

http://www.skope.ox.ac.uk/sites/default/files/WP111.pdf

एनएसएसओ की तकनीकी शिक्षा की मौजूदा स्थिति पर रिपोर्ट

http://www.im4change.org/farm-crisis/unemployment-30.html?pgno=2

 केंद्रीय विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम के बदलाव से संबंधित लिंक

http://kafila.org/2013/05/22/in-search-of-a-liberal-education/

 नए शिक्षा आयोग के गठन से संबंधित लिंक

http://www.telegraphindia.com/1130615/jsp/nation/story_170
10152.jsp#.UcFZvtj9UtU


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