वनाधिकार कानून का सफेद और स्याह

वनाधिकार कानून की यात्रा साल 2006 के बाद से आज दिन तक किस मुकाम तक पहुंची है- इसका जायजा लेने के लिए देश भर से कुछ समूह दिल्ली में जुटे थे। वनाधिकार कानून को अक्सर ऐतिहासिक करार दिया जाता है क्योंकि इस कानून वनक्षेत्र और उसके आस-पास रहने वाले समुदायों और व्यक्तियों को भूस्वामित्व का हकदार बनाया, इस हकदारी को अवैध करार देने वाले सदियों पुराने चलन का खात्मा किया। अंग्रेजी जमाने से माना जाता रहा है कि वनक्षेत्र की संरक्षा और सुरक्षा नौकरशाही के जिम्मे है। वनाधिकार कानून ने इस मान्यता को भी तोड़ा और वनवासी समुदायों को वनक्षेत्र की संरक्षा-सुरक्षा से जोड़कर देखा। 10 राज्यों के वनक्षेत्र में सक्रिय कई समूहों ने इस कानून के अमल में आने वाली चुनौतियों को मुखर किया। लेकिन, इस बात का एक दूसरा पहलु भी है। जनजातीय मामलों से संबद्ध मंत्रालय प्रांतों के अधिकारियों को इस बात का प्रशिक्षण दे रहा है कि वनाधिकार कानून को कैसे कारगर तरीके से लागू किया जाय़ और दिल्ली में जुटे समूहों ने मंत्रालय की इस पहलकदमी की प्रशंसा की। दिल्ली में हुए जमावड़े में निम्नलिखित बिन्दु प्रमुखता से उठे-

• वनवासियों द्वारा अपनी हकदारी के पक्ष में जो दावे किए गए हैं, बड़ी संख्या में वे दावों का निपटारा नहीं हुआ है। इन दावे में व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार के दावे शामिल हैं। जिन वनक्षेत्रों में खनन-परियोजना चल रही है, वहां यह समस्या ज्यादा गंभीर है।


• राज्य सरकारे या जिला मुख्यालय की और से ऐसे सर्कुलर(परिपत्र) जारी किए जाते हैं जो वनाधिकार कानून के प्रावधानों के विपरीत हैं।


• पेसा कानून का मसविदा राज्यों द्वारा इस भांति प्रस्तुत किया जाता है कि वह वनाधिकार कानून के प्रावधानों के विपरीत पड़ता है- मिसाल के लिए जिस लघु वनोपज को वनवासी समुदाय ने एकत्र किया है उसकी रायल्टी सरकार या फिर वनोपज का विपणन करने वाली सरकारी एजेंसी को देने की बात कही जाती है।


• वनवासी या वनाश्रित समुदाय अथवा ग्रामसभा की सहमति के बगैर वनभूमि को वनेतर उपयोगों के लिए अधिकृत किया जा रहा है। यह समस्या सबसे ज्यादा उन जगहों पर है जहां खनन-परियोजनाएं चल रही हैं।


• कुछ वनवासी समुदाय विकास परियोजनाओं के कारण अपने मूल वासस्थान से विस्थापित हो रहे हैं मगर इस विस्थापन को साबित करने के लिए उनके पास कागजात नहीं है। ऐसे समुदाय वनाधिकार कानून के तहत भूस्वामित्व के हकदार हैं लेकिन सबूत ना होने के कारण वे हकदारी से वंचित हैं।


• ओडिसा के नियमगिरी इलाके में बसने वाले कुछ समुदाय जैसे डोंगरिया कोंड प्राथमिक जनजातीय समूहों में गिने जाते हैं। इनके वासगत अधिकार के बारे में सरकारी नीति स्पष्ट नहीं है।झूम-खेती करने वाले अथवा पशुचारक समुदायों के मामले में भी यही स्थिति है।


• वनक्षेत्र से जुड़ी नौकरशाही अब भी समुदायों को अधिकार देने के मामले में आनाकानी कर रही है। यह आनाकानी उन जगहों पर और भी ज्यादा स्पष्ट है जहां मामला नॉन टिम्बर वनोपज से अर्जित होने वाले राजस्व का है।


• सरकार द्वारा बनायी गई समिति ने भले कह दिया हो कि लघु वनोपज का एक न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होना चाहिए लेकिन यह समर्थन मूल्य अब भी तय किया जाना शेष है।


• वनाधिकार कानून से संबंधित जारी निर्देशों, किए गए कामों और इस दिशा में हुई प्रगति को लेकर राज्य सरकारें पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरत रहीं।

समुदायगत अधिकार के बारे में जनजातीय मामलों से संबद्ध मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध नवीनतम(31 मार्च 2012) जानकारी-

राज्य    समदायगत अधिकार के दावे     समदायगत अधिकार के दावों का निपटारा

आंध्रप्रदेश    6714                                      2106

असम       5193                                       860

छत्तीसगढ़    4736                                       775

गुजरात      8723                                       1758

कर्नाटक     2917                                         53

केरल        1395                                             4

मध्यप्रदेश    13125                                       -

महाराष्ट्र      5041                                         1033

ओडिसा      3304                                          879

राजस्थान   346                                         53

त्रिपुरा       277                                             55

उत्तरप्रदेश    1135                                        814

पश्चिम बंगाल  7824                                    108



कथा विस्तार के लिए देखें नीचे दिए गए लिंक्स-

 

 

A brief background to FRA:

http://www.forestrightsact.com/what-is-this-act-about

 Status as of Dec 2012 on state-wise progress in implementing FRA

http://tribal.nic.in/writereaddata/mainlinkFile/File1507.pdf

 The updated FRA rules issued in September 2012:

http://tribal.nic.in/writereaddata/mainlinkFile/File1434.pdf

A database on ongoing litigation and relevant Supreme Court and National Green Tribunal rulings with regard to forest areas:

http://www.forestcaseindia.org/

 A brief on FRA in Protected Areas:

http://kalpavriksh.org/images/Documentation/Advocacy/Brief
_FRAtoPAs.pdf

 A case study of Gadchiroli’s Mendha-lekha village, where the community is protecting its deciduous forests and has became the country’s first village to harvest and sell its own bamboo produce – a right which was meant to move from the forest and state bureaucracy to the community, under FRA.

http://www.cenesta.net/icca/images/media/grd/mendha_india_
report_icca_grassroots_discussions.pdf

 

 ( कथा में ली गई तस्वीर का स्रोत http://ntui.org.in/files/reports/Photos000_%2837%29_thumb.jpg. हम इसके लिए उक्त स्रोत के आभारी हैं) 

 

 




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