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सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को फटकार, कोई देश अपने लोगों को मरने के लिए गैस चैंबर में नहीं भेजता

नई दिल्ली: देश में मैनुअल स्कैवेंजर्स (मैला ढोने के काम में लगे लोग) की मौतों और उन्हें सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार की खिंचाई की. शीर्ष अदालत ने कहा कि देश की स्वतंत्रता को 70 साल से अधिक बीत चुके हैं लेकिन आज भी जातिगत भेदभाव बरकरार है. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, अदालत ने कहा, ‘दुनिया के किसी देश में लोगों को मरने के लिए गैस चैंबर्स में नहीं भेजा जाता है. हर महीने मैला ढोने के काम में लगे चार से पांच लोग की मौत हो रही है.' जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ केंद्र सरकार की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस याचिका में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से उसके पिछले साल के फैसले की समीक्षा की मांग की थी जिसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को लगभग खत्म कर दिया गया था. मैला

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बाधाएं बहुत, पर आगे बढ़े हैं लोग-- श्रीनाथ राघवन

जब केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में नए युग की शुरुआत हो चुकी है। वैसे जम्मू-कश्मीर के इतिहास में यह कोशिश इतनी नई भी नहीं है। इंदिरा गांधी भी कश्मीर में यथास्थिति बदलना चाहती थीं। इस राज्य के विशेष दर्जे को खत्म करने के निर्णय को सही ठहराते हुए मोदी सरकार ने नई व्यवस्था के तहत कश्मीर के तेज विकास और राजनीतिक फायदे पर जोर दिया है। जब हम यह सोच रहे हैं कि यह नई व्यवस्था कैसे काम करेगी, तब हमें इस मोर्चे पर इंदिरा गांधी द्वारा की गई कोशिशों पर भी नजर डाल लेनी चाहिए। जून 1970 में श्रीनगर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘हम नए कश्मीर का निर्माण करेंगे, यदि आप सहयोग करें, तो जल्दी, यदि सहयोग न करें, तो धीरे-धीरे, लेकिन हम निर्माण करेंगे जरूर।'

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चार धाम परियोजना की कछुआ चाल, 31 महीनों में 1.1 किमी ही बनी सड़क

ई दिल्ली: मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी चार धाम परियोजना काफी धीमी गति से चल रही है. 889 किलोमीटर लंबा हाइवे बनाकर चार धाम को जोड़ने वाली है यह परियोजना. हिंदू समुदाय के धार्मिक स्थानों को जोड़ने की इस योजना के तहत 425 मीटर प्रति साल सड़क ही बन पा रही है. दिप्रिंट को यह जानकारी मिली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2016 में इस परियोजना की शुरुआत की थी. तब से लेकर मात्र 1.1 किलोमीटर सड़क ही बनी है. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि, ‘राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार पेड़ों को गिराने के लिए अनुमति देने में काफी देर कर रही है.' द प्रिन्ट हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 

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इस फसल को चाहिए नई बहार- हरजिंदर

बरसों से वे हमारे दरवाजे पर खड़ी थीं और हम कोई फैसला नहीं कर सके, वही जीएम या जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें अब जब पिछले दरवाजे से हमारे घर में घुस आई हैं, तो हम परेशान हैं कि इसका करें क्या? वैसे इसे रोकने के बाकायदा नियम-कानून हैं। पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत ऐसे लोगों के लिए पांच साल की कैद और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है, जो गैर-कानूनी रूप से ऐसी जीएम फसलों की खेती कर रहे, जिन्हें अभी सरकार से इजाजत नहीं मिली। लेकिन यह आसान नहीं है। खासकर तब, जब खबर यह आ रही है कि देश का 15 फीसदी कपास उत्पादन ऐसी ही फसलों से हो रहा है। तस्करी के जरिए इसके बीज देश में आ रहे हैं और बाजारों में आसानी से उपलब्ध हैं। कहा जाता है कि महाराष्ट्र के कुछ किसानों ने इसकी सफलता का स्वाद पिछली फसल के समय चख

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छत्तीसगढ़: भारी विरोध के बीच परसा कोयला खदान को पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी

नई दिल्ली: केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने स्थानीय लोगों की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए छत्तीसगढ़ के सरगुजा और सूरजपुर जिलों में परसा कोल ब्लॉक में खनन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है. मंत्रालय ने 12 जुलाई 2019 को इस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय मंजूरी दी और इससे संबंधित पत्र कुछ दिन पहले ही मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया. इस फैसले से भारत में वन संरक्षण, जल स्रोत और वन्य प्राणियों के लिए दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. छत्तीसगढ़ के परसा में घने हसदेव अरंद जंगल में ओपन कास्ट कोल माइनिंग को ंमंजूरी मिली है. इस खदान की क्षमता पांच लाख टन प्रतिवर्ष है और इसे राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम (आरवीयूएनएल) को आवंटित किया गया है. द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहांक्लिक करें 

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