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मध्य प्रदेशः शौचालय में बनाया जा रहा खाना, मंत्री ने कहा- इसमें कोई दिक्कत नहीं

भोपालः मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा की एक आंगनबाड़ी के शौचालय में बच्चों के लिए मिड-डे मील तैयार किया जा रहा है. आंगनबाड़ी में जगह की कमी का हवाला देकर शौचालय में खाना पकाने की बात की जा रही है. समाचार एजेंसी आईएएनएस की रिपोर्ट के मुताबिक, आंगनबाड़ी की एक कर्मचारी राजकुमारी योगी ने बताया कि आंगनबाड़ी में जगह की दिक्कत है इसलिए शौचालय के एक हिस्से में मिड डे मील तैयार किया जाता है. उन्होंने बताया कि खाना बनाने के लिए जगह नहीं होने का मामला कई बार संबंधित प्रशासन के समक्ष उठाया गया लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. इसलिए वे शौचालय में खाना बनाने को मजबूर हैं. महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रोजेक्ट ऑफिसर प्रियंका बंकर ने कहा कि शौचालय में निर्माण पूरा नहीं हुआ है और इसे रसोई के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है और और कहीं भी पानी की सप्लाई का

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‘आरटीआई संशोधन बिल मूलभूत अधिकारों के लिए खतरा’

नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार 2.0 सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून में बदलाव कर रही है. सरकार के इस कदम का विपक्ष, आरटीआई कार्यकर्ताओं और पूर्व केन्द्रीय सूचना आयुक्तों ने विरोध किया है. उनका आरोप है कि इस विधेयक में सूचना आयोगों का प्राधिकार कम करने का प्रयास किया गया है और सरकार इस संशोधन के माध्यम से आरटीआई कानून को पूरी तरह से कमजोर करना चाहती है. उनका मानना है कि सरकार द्वारा सूचना का अधिकार कानून में प्रस्तावित संशोधनों से इस पारदर्शिता पैनल की स्वायत्तता से समझौता होगा, क्योंकि यह उसे कार्यपालिका का अधीनस्थ बना देगा. आपको बता दें कि विपक्षी पार्टियों के कड़े विरोध के बावजूद आरटीआई संशोधन बिल लोकसभा में पारित हो चुका है और अब राज्यसभा में विचाराधीन है. नई दिल्ली के वीमेन प्रेस क्लब में केंद्रीय सूचना आयोग के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला, दीपक संधू एवं पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, श्रीधर आचार्यालु, एमएम

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अब एक फोन कॉल से ही किसान जान जाएगा अपने खेत के मौसम का हाल

नई दिल्ली: दिनभर खेत पर कैसा मौसम रहेगा, बारिश होगी या नहीं इसकी जानकारी अब किसान फोन पर ले सकेंगे. फोन से कृषि विशेषज्ञों से बात करने के बाद किसान अपने खेत में बुआई, जुताई और कटाई कर सकेंगे. इसकी शुरुआत कृषि मंत्रालय अगस्त माह से तीन राज्य महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश में शुरू करने जा रहा है. केंद्र सरकार ने इसके लिए हाल ही में एक प्रमुख आईटी कंपनी के साथ करार किया है जो प्रतिदिन मौसम की ताज़ा जानकारी खेतवार किसान को देगी. वर्तमान में किसान मौसम संबंधित जानकारी ज़िला स्तर पर स्थापित किसान विज्ञान केंद्र से लेते हैं. ज़िले का क्षेत्रफल अधिक होता है और दो अलग-अलग दिशाओं में खेत के होने से मौसम एक जैसा रहेगा या नहीं यह सटीक बता पाना बेहद ही मुश्किल होता है.आमतौर पर यह देखने में भी आया है कि ज़िले स्तर पर मौजूद किसान विज्ञान केंद्र द्वारा बताए गए पूर्वानुमान के

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भारत की खरबों डॉलर की संपदा झुग्गियों में बंद पड़ी है, उन्हें मुक्त करने का समय आ चुका है

भारत में हर साल रोज़गार की लाईन में लगने वाले 70 से 80 लाख लोगों को नौकरी देने के लिए जीडीपी की वृद्धि दर को 10 प्रतिशत से ऊपर ले जाना होगा और इसके लिए चाहिए अगले पांच वर्षों तक सालाना एक खरब डॉलर का निवेश. इतनी बचत करना और उससे भी ज़्यादा ज़रूरी, इस पूंजी का उद्यमियों द्वारा लाभदायक इस्तेमाल सुनिश्चित करना एक दुष्कर कार्य है. लेकिन जैसा कि पेरू के अर्थशास्त्री हर्नांडो डि सोटो के विचारों के सहारे हमने नीचे प्रदर्शित किया है. इस आवश्यक पूंजी का एक बड़ा हिस्सा, कोई 2-3 खरब डॉलर, देश में मौजूद है पर उसका पूरी तरह दोहन नहीं हो पाया है. करीब 20-30 लाख छोटे उद्यमियों के पास ये पूंजी है पर वे इसका पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. जबकि उनके पास छोटे व्यवसायों को सफलतापूर्वक चलाने का अपार अनुभव है. सालाना एक खरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी जुटाने के लिए

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कहां ले जाएगी जल की अनदेखी -- रामचंद्र गुहा

बहुत साल हो गए, जब मेरा सामना पर्यावरण संबंधी जिम्मेदारी की चौंकानी वाली परिभाषा से हुआ था, ‘हम एक सीमित क्षेत्र के भीतर से जो कुछ भी चाहते हैं, उसका उत्पादन करते हैं, तो हम उत्पादन के तरीकों की निगरानी की स्थिति में होते हैं; जबकि अगर हम पृथ्वी के किसी अन्य छोर से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, तो वहां उत्पादन की स्थितियों की गारंटी देना हमारे लिए असंभव हो जाता है।' यह सूत्र वर्ष 1948 में आजादी के तुरंत बाद जे सी कुमारप्पा ने गढ़ा था। महात्मा गांधी के करीबियों में शामिल अर्थशास्त्री कुमारप्पा के शब्द मेरी याद में तब लौटे, जब मैं गांवों के हिस्से के पानी को बेंगलुरु शहर की ओर मोड़ने के विरोध के बारे में पढ़ रहा था। मेरे शहर बेंगलुरु की जरूरतें एक समय उसकी झीलों, जलाशयों के नेटवर्क से बहुत हद तक पूरी हो जाती थीं, लेकिन जब यह बड़ा नगर बन

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