पुलिस के कामकाज और लोगों में पुलिस की धारणा पर कॉमनकॉज की रिपोर्ट का लोकार्पण

नई दिल्ली, 9 मई:  कॉमनकॉज और सीएसडीएस के लोकनीति प्रोग्राम ने आज इंडिया हैबिटेट सेंटर में देश का पहला स्टेटस् ऑफ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट(SPIR 2018) जारी किया. रिपोर्ट के लोकार्पण के बाद ‘जन-केंद्रित पुलिसिंग एवं विधि-व्यवस्था’ पर एक परिचर्चा हुई. 

परिचर्चा में विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस ए पी शाह, पूर्व डीजीपी तथा इंडियन पुलिस फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री प्रकाश सिंह तथा मानवाधिकारों से जुड़े मामलों की वकील सुश्री वारिशा फरासत ने भाग लिया. परिचर्चा की अध्यक्षता लोकनीति कार्यक्रम के सह-निदेशक प्रोफेसर सुहास पळशीकर ने किया. 

रिपोर्ट में देश के 22 राज्यों में विधि-व्यवस्था को सवालिया नजरों से परखा गया है और भारत में पुलिस-व्यवस्था की स्थिति का जायजा लेते हुए मूल्यांकन करने की कोशिश की गई है. रिपोर्ट पुलिस के कामकाज तथा इस कामकाज को लेकर लोगों में प्रचलित धारणा के बारे में है. इसके लिए रिपोर्ट में आधिकारिक आकड़ों का 
विश्लेषण किया गया है तथा लोगों में पुलिस के कामकाज को लेकर प्रचलित धारणा के बारे में एक व्यापक सर्वेक्षण का सहारा लिया गया है. रिपोर्ट में पुलिस की व्यवस्था से जुड़ी उन कमियों की भी चर्चा की गई है जिनके बारे में सीएजी(CAG) ने बार बार अपनी रिपोर्टों में आगाह किया है और जो देश में तकरीबन हर राज्य में नजर आती हैं.. 

एसपीआईआर(SPIR) 2018 का एक मकसद देश के अलग-अलग प्रांतों में लोगों तथा पुलिस के बीच मौजूद रिश्तों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ना भी है. दरअसल रिपोर्ट में विश्लेषण को एक खास अंदाज में पेश किया गया है कि ताकि जाहिर हो सके कि पुलिस-व्यवस्था के मामले में किन राज्यों का प्रदर्शन अच्छा है और किन राज्यों का बुरा. रिपोर्ट में उम्र, लिंग, जाति, समुदाय, शहरी/ग्रामीण या आर्थिक/सामाजिक स्थिति के एतबार से सूचनाएं दी गई है. रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए सर्वेक्षण के तथ्यों के सहारे इस बात का झटपट पता लगाया जा सकता है कि इंसाफ और दंड से संबंधित हमारी विधि-व्यवस्था संकट और अपराध की स्थितियों में कितनी निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करती है तथा समाज के वंचित तबके से बरताव के मामले में वह किस हद तक निष्पक्ष है, उस तक समाज के वंचित तबकों की पहुंच कितनी कम या ज्यादा है.

पुलिस के कामकाज से संबंधित सूचकांकों का निर्माण पांच साल (2016 तक) के आधिकारिक आंकड़ों के इस्तेमाल के जरिए किया गया है. सूचकांकों के लिए कुल 43 आधार-बिन्दुओं(वेरियबल्स) को छह व्यापक श्रेणियों( जैसे, अपराध-दर, पुलिस और अदालत द्वारा मामलों का निबटारा, पुलिस बल में मौजूद सामाजिक बहुलता, पुलिस व्यवस्था से जुड़ा आधारभूत ढांचा, कारागार से संबंधित आंकड़े तथा अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति, महिलाओं तथा बच्चों से संबंधित मामलों का निपटारा) में बांटा गया है. बीते एक दशक में सीएजी ने 11 राज्यों से संबंधित अपनी ऑडिट रिपोर्ट में जिन कमियों पर ध्यान दिलाया है, रिपोर्ट में उनका भी उल्लेख है.

रिपोर्ट से जाहिर होता एक मुख्य संदेश यह है कि राज्यों को पुलिस-व्यवस्था में सुधार के लिए फौरी तौर पर कदम उठाने होंगे और इस मामले में आम जनता की जरुरतों को तरजीह देनी होगी. पुलिस व्यवस्था के मामले में किसी राज्य के कामकाज को परखने और कामकाज से जुड़े किसी खास पहलू को सामने रखते हुए किसी राज्य के बारे में विस्तार से जानने में भी रिपोर्ट मददगार होगी. इसके लिए रिपोर्ट के आखिर के हिस्से में विशेष परिशिष्ट दिए गए हैं

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
- सर्वक्षण में शामिल तकरीबन 82 फीसद उत्तरदाताओं का कहना था कि पिछले 4-5 साल की अवधि में उनका पुलिस से कोई संपर्क नहीं हुआ है.

- सर्वेक्षण में शामिल जिन उत्तरदाताओं ने कहा कि उनका पुलिस से संपर्क हुआ है उनमें से 67 फीसद तादाद ऐसे लोगों की थी जिन्होंने खुद पुलिस से संपर्क किया था. ऐसे केवल 17 फीसद मामलों में संपर्क पुलिस के द्वारा किया गया. 
- जिन मामलों में संपर्क पुलिस की तरफ से किया गया उनमें सर्वाधिक तादाद(27 फीसद) आदिवासी समुदाय से जुड़े व्यक्तियों की थी. इसके बाद मुस्लिम (21 प्रतिशत), ओबीसी (17 प्रतिशत, दलित (16 प्रतिशत तथा अगड़ी जाति(13 प्रतिशत) का नंबर है. 
- पुलिस से खुद संपर्क करने के मामलों में सबसे आगे (74 प्रतिशत) धनी व्यक्ति हैं जबकि पुलिस ने जिन मामलों में अपनी तरफ से संपर्क किया उनमें गरीब सबसे ज्यादा(21 प्रतिशत) हैं. धनी व्यक्ति (12 प्रतिशत) की अपेक्षा गरीब व्यक्ति (21 प्रतिशत) से पुलिस के संपर्क साधने की संभावना तकरीबन दोगुनी ज्यादा है.  
- सर्वेक्षण में शामिल 44 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें पुलिस और उसकी प्रताड़ना का बहुत ज्यादा डर है. 

- जहां तक धार्मिक समुदायों का सवाल है सिख(मुख्य रुप से पजाब) समुदाय में पुलिस का खौफ ज्यादा है. सर्वेक्षण में इस समुदाय के 37 फीसद लोगों ने कहा कि उन्हें पुलिस से बहुत ज्यादा डर लगता है.(यह राष्ट्रीय औसत का दोगुना है)

- सर्वेक्षण में शामिल ज्यादातर (51 प्रतिशत) लोगों ने कहा कि पुलिस वर्गीय आधार पर भेदभाव करती है, लिंग के आधार पर पुलिस द्वारा भेदभाव करने की बात सर्वेक्षण में शामिल तकरीबन 30 फीसद लोगों ने कही. पुलिस के जाति के आधार पर भेदभाव करने की बात कहने वालों की तादाद सर्वेक्षण में 26 प्रतिशत रही जबकि धार्मिक आधार पर पुलिस के भेदभाव भरे बरताव की बात 19 प्रतिशत लोगों ने कही.

 
- सर्वेक्षण में शामिल 38 फीसद उत्तरदाता इस बात से सहमत थे कि पुलिस दलित समुदाय के लोगों को झूठे मामलों में फंसाती है, 28 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि आदिवासियों पर माओवादी होने के आरोप मढ़ते हुए उन्हें झूठे मामलों में फंसाया जाता है तथा 27 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि मुसलमानों को आतंकवाद के आरोप मढ़कर झूठे मामलों में फंसाया जाता है. 

- अगर पूरे पांच साल की अवधि के औसत को आधार माने तो चुनिन्दा 22 राज्यों में से केवल 3 राज्य(पंजाब, उत्तराखंड, दिल्ली) ऐसे हैं जिनमें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पुलिस के पदों पर बहाली हुई. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पुलिस के कुल पदों पर बहाली करने में सिर्फ छह राज्य( बिहार, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, नगालैंड, तेलंगाना, उत्तराखंड) कामयाब हुए. केवल नौ राज्य (आंध्रप्रदेश, असम, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओड़ीशा, पंजाब, तेलंगाना, उत्तराखंड) ऐसे हैं जिनमें ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत आरक्षित पुलिस के कुल पदों पर बहाली हुई. कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहां महिलाओं के लिए आरक्षित पुलिस के 33 प्रतिशत पदों पर पूर्ण बहाली हुई हो.

सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट के मुख्य तथ्यों का विश्लेषण:

स्टॉफ क्वार्टर की कमी का मामला गंभीर है. असम के कुछ चुनिन्दा जिलों में स्टॉफ क्वार्टर की कमी का अनुपात 99 प्रतिशत, बिहार में 80 प्रतिशत तथा हिमाचल में 88 प्रतिशत है.

मध्यप्रदेश में 50 महिला पुलिस-कर्मियों में 48 ने कहा कि उन्हें असुविधा( समुचित टॉयलेट का ना होना, बैठने-सुस्ताने तथा काम करने की उचित जगह का ना होना) होती है. 

पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए उपलब्ध फंड के इस्तेमाल ना होने का मामला भी बहुत गंभीर है. बिहार में इस श्रेणी के उपलब्ध फंड का 71 फीसद हिस्सा इस्तेमाल ना हो सका, यूपी में इस श्रेणी के इस्तेमाल ना हुए फंड की मात्रा 41 प्रतिशत तथा असम में 32 प्रतिशत है. 

उत्तरप्रदेश ने प्रशिक्षण सामग्री के मद में उपलब्ध कराये गए 80 फीसद फंड खर्च नहीं किए, लौटा दिए. 

पूरी रिपोर्ट निम्नलिखित लिंक से डाऊनलोड की जा सकती है www.commoncause.in




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