पोषण और अंडे का संघर्ष- ज्यां द्रेज

बच्चों को लेकर भारत में एक बड़ा विरोधाभास दिखायी देता है. एक तरफ, घर में बच्चों को बहुत प्रेम किया जाता है. दूसरी तरफ, लोक-नीति में बच्चों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. आज भी गरीब बच्चों को न सही शिक्षा मिल रही है, न स्वास्थ्य सुविधा और न ही पोषण.

इसके कारण बांग्लादेश और नेपाल की तुलना में भारत के बाल विकास से संबंधित आंकड़े कमजोर हैं. इससे न केवल बच्चों का भविष्य, बल्कि देश का भविष्य भी पीड़ित है.

बच्चों के लिए आजकल एक छोटी सी खुशी की बात यह है कि कई राज्यों में स्कूल और आंगनवाड़ी में मध्याह्न भोजन के साथ अंडा दिया जा रहा है. तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में स्कूल के बच्चों को अंडा रोज दिया जाता है.

यह बच्चों का पोषण, स्वास्थ्य और पढ़ाई में सुधार लाने के लिए बहुत अच्छा कदम है. अंडे को संपूर्ण पोषण का खाद्य माना जाता है, जिसमें कैलोरी और प्रोटीन के साथ हर तरह के विटामिन और मिनरल होते हैं. अंडा सुरक्षित भी है, सस्ता भी है और ज्यादातर बच्चे अंडे खाना पसंद भी करते हैं.

दुख की बात है कि कई राज्यों में सरकार ऊंची जाति के शाकाहारी लॉबी के प्रभाव के कारण मध्याह्न भोजन में अंडे को जोड़ने से इनकार करती है. सरकारी स्कूल जानेवाले बच्चों में बहुत कम हैं, जो अंडा नहीं खाते हैं. जो नहीं खाते, उनको वहां फल देने का प्रावधान है.

शाकाहारी लॉबी का कोई तर्क नहीं है, केवल अपने रीति-रिवाज दूसरों के ऊपर थोपना चाहते हैं. अगर शादी और सार्वजनिक समारोह में भोजन के लिए शाकाहारी और मांसाहारी की अलग-अलग लाइन हो सकती है, तो स्कूल में क्यों नहीं? याद रखें, भारत को छोड़ कर पूरी दुनिया में अंडे को शाकाहारी माना जाता है. गांधीजी ने भी कहा था कि अगर दूध को शाकाहारी माना जाता है, तो अंडे को भी शाकाहारी मानना चाहिए.

शाकाहारी लॉबी का प्रभाव उन राज्यों में मजबूत है, जहां भाजपा की सरकारें हैं. झारखंड को छोड़ कर लगभग सभी भाजपा शासित राज्यों में अंडे मध्याह्न भोजन से वंचित हैं. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में नयी सरकार आने से अंडों के लिए एक नया अवसर है, लेकिन कांग्रेस पार्टी भी आज कल ऊंची जाति के शाकाहारी लॉबी से प्रभावित है, खासकर राजस्थान में.

बिहार और झारखंड में पिछले कुछ सालों से स्कूल और आंगनवाड़ी में अंडा बांटने की शुरुआत हुई है. बिहार में अब तक केवल हफ्ते में एक बार अंडा बांटने का प्रावधान है. झारखंड के स्कूलों में कई सालों से हफ्ते में तीन बार अंडे दिये जाते हैं और इस पहल का अनुभव अच्छा रहा है. इस साल से आंगनवाड़ियों में भी हफ्ते में तीन बार अंडा देने का प्रावधान है. दुख की बात यह है कि लालच और भ्रष्टाचार के कारण आंगनवाड़ियों में अब भी अंडे बहुत कम बांटे जा रहे हैं.

पिछले महीने लातेहार जिले के मनिका प्रखंड में कई आंगनवाड़ियों का सर्वेक्षण करने पर पता चला कि अंडों का वितरण सही नहीं हो रहा है. पहला, वितरण समय पर नहीं हो रहा है. दूसरा, अंडे कई बार खराब निकलते हैं.

तीसरा, अंडों को आंगनवाड़ी तक पहुंचाने के बदले उनको और कहीं छोड़ दिया जाता है, जैसे पंचायत भवन में या किसी के घर में. कई जगहों से भी इस तरह की रिपोर्ट्स आ रही हैं.

झारखंड की आंगनवाड़ियों में अंडों के वितरण में असफलता होनी ही थी. इसका मुख्य कारण यह है कि पूरे झारखंड में अंडाें के वितरण की जिम्मेदारी एक भ्रष्ट ठेकेदार को दी गयी है. स्कूलों में अंडा वितरण की व्यवस्था दूसरी है.

वहां मध्याह्न भोजन बनानेवाली महिलाएं गांव में या गांव के आसपास से ही अंडे खरीदती हैं. इससे देरी नहीं होती और मेरी जानकारी में स्कूलों में खराब अंडे बांटने की कोई शिकायत नहीं आयी है. साथ ही, स्थानीय मुर्गीपालकों को पैसे कमाने का मौका मिलते है.
इसके विपरीत, झारखंड सरकार ने आंगनवाड़ी में अंडों के वितरण का ठेका किसान पॉल्ट्री फर्म्स नामक एक कंपनी को दिया है, जिसका मुख्यालय तमिलनाडु में है. तमिलनाडु में किसान पॉल्ट्री फर्म्स का नाम बहुत बदनाम है. इसको एक शेल कंपनी माना जाता है, जो क्रिस्टी फ्रीदग्रम इंडस्ट्री चला रही है. इंटरनेट में किसान पॉल्ट्री फर्म्स के बारे में कोई सूचना नहीं है.

क्रिस्टी फ्रीदग्रम इंडस्ट्री केवल आंगनवाड़ी कार्यक्रम (समेकित बाल विकास सेवाएं) का ठेका लेकर कमाने के लिए खड़ा किया गया है. यह तमिलनाडु और कर्नाटक में भी अांगनवाड़ी कार्यक्रम में अंडों का वितरण करती थी, लेकिन बेईमानी के कारण कर्नाटक में उन पर प्रतिबंध लगाया गया और तमिलनाडु में जांच चल रही है. आयकर विभाग का कहना है कि क्रिस्टी फ्रीदग्रम ने तमिलनाडु और अन्य राज्यों में कथित रूप से 2,400 करोड़ का रिश्वत बांटा है.

मामला सर्वोच्च न्यायालय में है. आंगनवाड़ी कार्यक्रम में भ्रष्ट ठेकेदारों के नकारात्मक प्रभाव का लंबा इतिहास है. भोजन का अधिकार अभियान ने झारखंड सरकार को कई बार इसकी चेतावनी दी है. इसके बावजूद सरकार ने किसान पॉल्ट्री फर्म्स को आंगनवाड़ियों में अंडों के वितरण का ठेका क्यों दिया? पाठक इस बात का अंदाजा करें. अागामी दिनों में अंडे का संघर्ष छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जारी होनेवाला है.

वहां भी शाकाहारी लॉबी और भ्रष्ट ठेकेदारों के उल्टे प्रभाव की संभावना है. अंडे का संघर्ष न केवल पोषण की बात है, बल्कि उसके साथ ही यह भ्रष्टाचार और जाति व्यवस्था हटाने के संघर्ष का एक प्रतीक भी है.


https://www.prabhatkhabar.com/news/columns/nutrition-eggs-struggle/1237570.html

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