स्वच्छ चुनाव के विभिन्न आयाम- अजीत रानाडे

हाल में सुप्रीम कोर्ट ने वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें ‘अपराधी' उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गयी थी. याचिकाकर्ता का तात्पर्य ऐसे उम्मीदवारों से था, जिन पर हत्या, हत्या की कोशिश, भयादोहन, बलात्कार, अपहरण या गबन के अभियोग लगे हैं, पर अभी उन्हें उक्त अपराध में दोषसिद्ध करार न दिया गया हो.

चूंकि न्यायिक प्रक्रिया दशकों लंबी खिंच सकती है और जब तक कोई व्यक्ति दोषसिद्ध न हो जाये, उसे निर्दोष ही माना जाता है, इसलिए उसे चुनाव में उम्मीदवारी से कानून द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया गया है.

राज्य एवं केंद्र की विधायिकाओं में ऐसे दागी उम्मीदवारों को लेकर बड़ी चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं, क्योंकि आपराधिक मामलों के आरोपी निर्वाचित सांसदों तथा विधायकों की वर्तमान संख्या 1,580 है, जो उनकी कुल संख्या का लगभग 33 प्रतिशत है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी वर्ष 2014 में संसद में दिये गये अपने प्रथम वक्तव्य में ऐसी चिंताएं व्यक्त की थीं.

उन्होंने अदालतों से इन आपराधिक मामलों की सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया था, ताकि ऐसे निर्वाचित सांसद या तो दोषमुक्त हों या दोषसिद्ध होकर संसद से बाहर किये जा सकें. पर तब से पांच वर्षों बाद भी ऐसा नहीं हो सका है, क्योंकि ऐसे मामलों की तादाद बहुत कम रही, जिनकी सुनवाई में तेजी लाकर उन्हें निबटारे के करीब लाया जा सका.

यह याचिका खारिज करते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता के मद्देनजर निर्वाचन आयोग तथा सियासी पार्टियों से यह अनुरोध किया कि आपराधिक मामलों से संबद्ध सूचनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाये. उसने ऐसे मामलों को समाचार पत्रों में कम-से-कम तीन बार प्रकाशित करने और वेबसाइटों पर प्रमुखता से डालने के निर्देश दिये.

आगामी चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन मामलों का ऐसा प्रचार ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने और उनके निर्वाचन को कहां तक कम कर सका. बहुत सारे सियासतदां यह कह कर बच निकलते हैं कि उनके विरुद्ध लगे आरोप मनगढ़ंत या राजनीति से प्रेरित हैं.

पर यह प्रश्न तो तब भी शेष रह जाता है कि चुनावी अखाड़े में उतरने के पूर्व क्यों वे इन आरोपों से पाक-साफ नहीं हो लेते? एक अरब तीस करोड़ नागरिकों का यह देश निश्चित रूप से कुछ हजार बेदाग उम्मीदवार तो पा ही सकता है, जो लोकसेवा के क्षेत्र में आना चाहते हों.
आपराधिक तत्वों को उजागर करने हेतु सोशल मीडिया समेत प्रचार-प्रसार की प्रौद्योगिकी का व्यापक इस्तेमाल किया जा सकता है.

एक सलाह यह भी दी जा सकती है कि स्व-घोषित शपथ पत्रों के जरिये उम्मीदवारों पर आपराधिक मामलों के विस्तृत विवरण मतदान केंद्रों के बाहर चिपकाये जायें, जो उम्मीदवारों के बारे में मतदाताओं को अंतिम हिदायत दे सकें. निर्वाचन आयोग ऐसे उम्मीदवारों के नामों के आगे लाल बिंदु भी लगा सकता है, ताकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार उनके नाम वस्तुतः उजागर किये जा सकें.

स्वच्छ निर्वाचन का अर्थ केवल स्वच्छ उम्मीदवार ही नहीं, बल्कि स्वच्छ निर्वाचन प्रक्रिया भी है. धन-बल के भीषण हमले के रूप में निर्वाचन आयोग एक ऐसी विराट समस्या से जूझ ही रहा है, जो निर्वाचन प्रक्रिया को पूरी तरह विद्रूप कर देती है. मतदाताओं को रिश्वत की पेशकश एक चुनावी भ्रष्टाचार है, जो उम्मीदवार को तत्काल अयोग्य ठहरा दे सकता है. ऐसे भ्रष्टाचार को रंगे हाथ पकड़ने का एक तरीका निर्वाचन आयोग द्वारा प्रचारित सी-विजिल नामक एप का इस्तेमाल भी है.

इस एप के द्वारा मोबाइल कैमरा किसी ऐसी घटना का जीपीएस द्वारा प्रमाणित वक्त और स्थान दर्ज कर शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखते हुए उसे सुरक्षित रूप से निर्वाचन आयोग के वेब सर्वरों पर अपलोड कर सकता है. ऐसे वीडियो या फोटो आधारित साक्ष्य निर्वाचन आयोग द्वारा कार्रवाई किये जाने के लिए पर्याप्त हैं.

हालांकि, यह प्रौद्योगिकी भलीभांति जांची-परखी है, पर मतदाता अपनी शिकायतें अपलोड करने को लेकर पर्याप्त साहस दिखा सकेंगे या नहीं, यह देखना अभी बाकी है. दरअसल, वे अपनी डिजिटल गैर-जानकारी की वजह से अथवा ऐसे निराशाजनक विचारों से प्रेरित होकर भी हिचक सकते हैं कि उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी.

एक अन्य प्रौद्योगिक साधन मतदान केंद्रों में सीसीटीवी कैमरों की स्थापना भी है. कोई जरूरी नहीं कि उन्हें सभी मतदान केंद्रों में स्थापित किया जाये, पर संवेदनशील क्षेत्रों में उनका उपयोग अवश्य ही किया जा सकता है. जोर-जबरदस्ती, धमकियों और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) से छेड़छाड़ के मामलों में तो निर्वाचन आयोग को स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए.

तीसरा उदाहरण ऑनलाइन भुगतानों की समीक्षा है. बैंकों से यह कहा जा सकता है कि वे चुनाव से पूर्व निकासी की गयी सभी बड़ी रकमों या मतदाताओं के बैंक खातों में एक जैसी रकमें भेजने के मामलों की रिपोर्ट करें.

इनसे सियासी पार्टियों द्वारा मतदाताओं के खातों में एक तरह के ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण' की पहचान की जा सकेगी. चौथा उदाहरण ‘अल्गोरिदम' एवं ‘मशीन लर्निंग' का इस्तेमाल कर झूठी खबरों तथा नफरत पैदा करनेवाली तकरीरों की पहचान के लिए सोशल मीडिया की मॉनिटरिंग है. फेसबुक ‘लाइक' तथा ‘शेयर' बटनों के अलावा एक ‘रिपोर्ट' का बटन भी मुहैया कर सकता है, ताकि सतर्क उपयोगकर्ता किसी दुरुपयोग की शिकायत तत्काल कर सके.

सोशल मीडिया कंपनियों से सरकार पहले ही यह कह चुकी है कि वे झूठी खबरों एवं नफरत पैदा करनेवाले संदेशों को मॉनिटर करने और उन्हें तेजी से हटाने के लिए उपयुक्त साधन विकसित करें. व्हाॅट्सएप द्वारा ‘फॉरवर्ड' करने की एक सीमा देकर ऐसे संदेशों के तेज प्रसार पर लगाम लगायी गयी है.

आगामी लोकसभा चुनाव अमर्यादित तथा आक्रामक रूप से लड़ा जायेगा. समस्त अंकुशों के बावजूद एक झूठा वीडियो केवल कुछ दिन चलकर चुनावी सरगर्मियों के दौरान मारक प्रभाव पैदा कर सकता है. जब तक वह झूठा घोषित होगा, तब तक वह अपना उद्देश्य पूरा कर चुका होगा. यह भी हो सकता है कि जो लोग ऐसे वीडियो फैलाते हों, वे किसी दुर्भावनावश ऐसा न कर रहे हों.

इसलिए, प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल अहम होते हुए भी पर्याप्त नहीं है. अंततः मतदाताओं के सतर्क, संदेहपूर्ण, जानकार तथा नैतिक होने का कोई विकल्प नहीं है. स्वच्छ चुनाव का दारोमदार आखिर मतदाताओं पर ही तो है.
https://www.prabhatkhabar.com/news/columns/clean-elections-different-dimensions/1258149.html

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