‘जब तक यहां से वेदांता रिफाइनरी नहीं हटती, नियमगिरी की लड़ाई जारी रहेगी’

‘नियमगिरी से वेदांता अभी गई नहीं है. कोर्ट का फैसला बदल भी सकता है. जब तक अपनी जीवनशैली और जंगल को बचाने के लिए आंदोलन जारी नहीं रहेगा, तब तक नियमगिरी की सुरक्षा नहीं हो सकती.' कुछ ही दिन पहले जमानत पर रिहा किए गए नियमगिरी सुरक्षा समिति के नेता लिंगराज आजाद यह बताते हैं.

ब्रिटिश माइनिंग कंपनी वेदांता भले ही कुछ साल पहले नियमगिरी में बॉक्साइट माइनिंग करने को लेकर डोंगरिया कोंद आदिवासियों से लड़ाई हार गई हो, लेकिन अब तक न तो आदिवासियों का डर गया है और न ही उनका संघर्ष खत्म हुआ है.

ओडिशा के कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों के बीच में नियमगिरी की पहाड़ियां हैं. लखपरदार गांव इन्हीं पहाड़ियों के बीच में बसा हुआ है. सुबह पांच बजे गांव से थोड़ी-सी दूरी पर ऊपर चढ़ते ही एक जगह बनी हुई है जहां पर कुछ पत्थर बिछे हुए हैं.

गांव के कई पुरुष वहीं पर बैठे हुए हैं. सब लोग टकटकी लगाकर ऊपर एक पहाड़ की तरफ देख रहे हैं. वहां पर खजूर के एक ऊंचे पेड़ से एक व्यक्ति हाथ में दो बोतलें लिए उतर रहा है. वह नीचे आकर उसे छानता है. यह शलप है.

बाहर के लोग इसे ताड़ी (एक तरह की शराब) भी कहते हैं, पर नियमगिरी के लोग इसे (मां के) दूध के बराबर मानते हैं. सब लोग थोड़ा-थोड़ा शलप पीते हैं और फिर बात करने लगते हैं.

द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


http://thewirehindi.com/78703/niyamgiri-hills-vedanta-dongria-kondhs-tribe-lakhpardar/

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