45 परिवारों की जिंदगी झोपड़ी में, 55 वर्षों में न अनाज मिला

रामगढ़ शहर से 15 किलोमीटर दूर कुजू-घाटो मुख्य सड़क से उतरने पर बमुश्किल 200 मीटर दूर कुंदरिया बस्ती का मल्हार टोला़ इस टोले तक जाने के लिए पथरीली संकरी सड़क, जंगल के बीच एक ऊंचे टीले पर प्लास्टिक से बनी दर्जनों झोपड़िया़ं जंगल की सूखी झाड़ियों की घेराबंदी कर बांस-बल्ली में प्लास्टिक लगा कर लाेगाें ने 40 से 50 झोपड़ी बना लिये़ ये कोई खानाबदोश नहीं, बल्कि अपने झारखंड की अनुसूचित जाति के मल्हार है़ं


दक्षिणी कुज्जू पंचायत के इस मल्हार टोली में 45 चूल्हे जलते है़ं इस बस्ती के चप्पे-चप्पे में पसरी गरीबी-तंगहाली शत-प्रतिशत ओडीएफ व विद्युतीकृत रामगढ़ जिले की सच्चाई बयां करती है़


न वृद्धा, न विधवा पेंशन : मांडू विधानसभा क्षेत्र की इस बस्ती की झोपड़ियां ही इनकी गरीबी की दास्तां बताने के लिए काफी है़ं बस्ती में रहनेवाले दो सौ से ज्यादा लोगों तक सामाजिक सुरक्षा के लिए चलायी जानेवाली एक भी योजना नहीं पहुंची़ दर्जनों वृद्ध गांव में रहते हैं, लेकिन पेंशन नसीब नहीं है़


विधवा महिलाओं को भी पेंशन नहीं मिल रहा है़ गांव के महज 17 लोगों के पास राशन कार्ड है़ं पूरी बस्ती में एक भी शौचालय नहीं है़ गांव के लोग एक किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाते है़ं उज्जवला योजना, जनधन योजना सहित केंद्र और राज्य सरकार की एक भी योजना इस बस्ती तक नहीं पहुंच पायी है़


हालांकि गांव के लोगों के वोटर आइडी और आधार कार्ड जरूर है़ं इनके पास एक ईंच जमीन नहीं है़ गरीब परिवारों ने दूर से बांस-बल्ली लगा कर खुद टोले में किसी तरह बिजली लायी है़ विभाग के स्तर पर यहां किसी को बिजली का कनेक्शन नहीं दिया गया है़

टीले में बनाया ठिकाना


मल्हार परिवार बताते हैं कि वे कुंदरिया बस्ती में 55 वर्षों से रह रहे हैं. पहले कुंदरिया के करमाली टोला के पास इनके पूर्वज 30 वर्षों तक रहे. यहां से भी लोगों ने उन्हें भगा दिया. बाद में स्कूल के पीछे करीब 20 वर्षों तक गैरमजरूआ भूमि पर रहे. कुछ लोगों ने इस जमीन का भी कागजात बनाकर उन्हें बेदखल कर दिया़ एक वर्ष से कुंदरिया बस्ती के पास वाली वन भूमि में बदती जिंदगी जीने को मजबूर हैं.
इस स्थान को लेकर भी लोग संशकित है़ं


दीया, बर्तन, रस्सी बनाते हैं


कुंदरिया बस्ती के मल्हार पयला, दीया, बर्तन, रस्सी बनाने जैसे परंपरागत काम के अलावा नौजवान दिहाड़ी मजदूरी कर पेट भरते है़ं बस्ती के अधिकतर नौजवान किसी तरह चौथी से सातवीं तक की पढ़ाई पूरी कर पाये है़ं इस गांव के कुछ लोग भीख मांग और कचरा चुन कर जीवन बसर कर रहे है़ं


सरकार एक घर दे देती ताे.... : मनभरण मल्हार कहते हैं: हमारे पूर्वज इसी हाल में मर गये़ आजा-आजी चले गये़ हम भी चले जायेंगे़ सरकार एक घर दे देती, तो हमारे बच्चों का जीवन पार हो जाता़ इस प्लॉस्टिक की झोपड़ी में बरसात, फिर ठंड पार करना मुश्किल होता है़ गांव के राजदेव मल्हार से यह पूछने पर कि शहर में जाकर काम क्यों नहीं करते़, वह कहता है : हमें काम कौन देगा़ हम इसी जंगल में रहे हैं और आगे भी रहेंगे़ यहीं मजदूरी कर जीवन काट लेंगे़ देवी प्रसाद और शिवचंद्र मल्हार गांव के बुजुर्ग है़ं


70 वर्ष के करीब उम्र होगी़ भारी मन से अपना हाल बताते हैं कि हमें सरकार की ओर से कोई पेंशन नहीं मिलता़ खाने-खाने को मोहताज है़ं भदरी देवी कहती है कि मेहनत-मजदूरी कर पेट तो भर लेते है़ं, लेकिन रहने का ठिकाना नहीं है़ कुछ लोगों का राशन कार्ड बना है, लेकिन बाकी लोगों का नहीं बन रहा़ ब्लॉक मेें हमारी कोई सुननेवाला नहीं है़ यहां से भी कब काैन उजाड़ देगा, मालूम नही़ं


बस्ती में इंटर पास बहू, लेकिन मजदूरी कर चला रही है परिवार


कुंदरिया बस्ती के युवा-युवतियों में अनिशा सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी है़ अनिशा ने इंटर तक की पढ़ाई रांची से की है़ इसी वर्ष जनवरी में उसकी शादी श्याम मल्हार से हुई है़ वह कहती है कि सरकार की तो योजना है, लेकिन कुछ लोग उसे गरीबों तक आने नहीं देते़ वह आगे की पढ़ाई भी करना चाहती है़ रामगढ़ के किसी निजी संस्थान में काम करने के लिए भी तैयार है़ पति श्याम फिलहाल दिहाड़ी मजूदर है़


उठे थे भूख से मौत के सवाल, हो गयी लीपापोती


बस्ती के एक बुजुर्ग चिंतामन मल्हार की मौत पर सवाल उठे थे़ चिंतामन की मौत को भूख से मौत बताया गया था, लेकिन जिला प्रशासन की जांच में बीमारी से हुई मौत बताया गया़ वहीं चिंतामन का बेटा विदेशी मल्हार कहता है : घर में गरीबी है़ खाने की किल्लत है़ पिताजी की मौत के समय ब्लॉक से बीडीओ-सीओ सब आये़ नौकरी बचाने की दुहाई दे रहे थे़


उस समय उन लोगों ने कहा था कि जैसा कहते हैं, बोलो, सारी सुविधाएं मिलेंगी़ बिजली, पानी, राशन सब यहां पहुंचेगा़ विदेशी मल्हार कहता है: उस दिन के बाद यहां कोई झांकने नहीं आया़ आज तक गांव को कुछ नहीं मिला़ 30 वर्ष पूर्व बसे पूर्वजों को हटाया गया, दूसरी जगह 20 वर्ष से रह रहे थे, फिर उजाड़ा गया पूरी बस्ती के चप्पे-चप्पे में गरीबी की दास्तां, सामाजिक सुरक्षा की योजना से लेकर जन-धन, उज्ज्वला कुछ नहीं पहुंचा किसी के पास एक इंच जमीन नहीं, एक किलोमीटर दूर से लाते हैं पीने का पानी अभियान चला कर भूमिहीनों को जमीन देने का सरकार ने लिया है फैसला 19 दिसंबर, 2017 को झारखंड कैबिनेट ने राज्य के सुयोग्य भूमिहीनों को जमीन देने का फैसला किया. कैबिनेट के प्रस्ताव में कहा गया कि भूमिहीनों को गृहस्थल यानी वास भूमि उपलब्ध कराना प्राथमिकता है़ इसके लिए राजस्व व भूमि सुधार विभाग द्वारा अभियान चला कर सुयोग्य भूमिहीन परिवारों को चिह्नित कर भूमि उपलब्ध कराने की कार्यवाही की जानी है़


हुआ क्या : विभाग के स्तर पर कोई पहल कुंदरिया के इन भूमिहीनों के लिए नहीं हुई़

भूदान की सैकड़ों एकड़ जमीन पड़ी है

इन भूमिहीन परिवारों को बसाने के लिए प्रशासन तत्परता दिखाता, तो कई रास्ते थे़ गैरमजरुआ जमीन की बंदोबस्ती से लेकर भूदान की सैकड़ों एकड़ जमीन पड़ी थी़ इन गरीबों को आवास के लिए जमीन मिल जाती, तो फिर कई तरह की योजनाओं का लाभ इनके चाैखट तक पहुंचता़


वोटर-अाधार कार्ड है, पार्टियों ने इनसे वोट भी लिया


मल्हार परिवार के सदस्यों के पास वोटर आइडी और आधार कार्ड है़ राजनीतिक दल के लोग चुनाव के समय पहुंचते है़ं मनभरण मल्हार बताते हैं कि सभी परिवार हर चुनाव में वोट करते है़ं वोट के समय नेता आते हैं, वोट मांगते हैं, लेकिन कभी कुछ मिला नही़ं वोटर आइडी, आधार कार्ड और 17 लोगों के राशन कार्ड के अलावा किसी योजना का लाभ नहीं मिला़ राशन कार्ड डीलर को ग्रामीणों ने बैंक में खाता खुलवाने के लिए सौ-सौ रुपये दिये हैं, जिससे सब्सिडी का पैसा खाते में आ सके़


ये योजनाएं क्यों नहीं पहुंची?

1. राशन कार्ड (17 परिवारों का ही)
2. एक रुपये किलो अनाज
3. प्रधानमंत्री आवास योजना
4. जन-धन योजना
5. उज्ज्वला योजना : फ्री गैस
6. मुफ्त बिजली कनेक्शन, एक बल्ब का सौभाग्य योजना
7. आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा
8. पेयजल के लिए योजना
9. सखी मंडल, सेल्फ हेल्प ग्रुप
10. कारीगरों के प्रशिक्षण के लिए चलनेवाली योजनाएं
11. एसटी-एससी बच्चों के कल्याण और पढ़ाई के लिए योजनाएं


क्या कहते हैं बीडीओ


फिलहाल 17 परिवारों का राशन कार्ड बना है़ राशन कार्ड बनाने की प्रक्रिया चल रही है़ प्रखंड मुख्यालय में आकर फॉर्म भरना होगा़ ये लाेग वन भूमि पर बाहर से आकर बसे हैं, इसलिए चापानल नहीं लगाया जा सका है़ जहां तक इनको बसाने की बात है, तो जिला के अधिकारियों और अंचल अधिकारी से बात कर हल निकालना होगा़
मनाेज कुमार गुप्ता, बीडीआे, मांडू


https://www.prabhatkhabar.com/news/ranchi/ranchi-45-families-life-cottage-55-years-no-grains-no-housing-or-government-plans-reached/1225751.html

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