पानी और साफ-सफाई

पानी और साफ-सफाई

What's Inside


  • जलापूर्ति और साफ सफाई का मुद्दा राष्ट्रीय अजेंडे में पहली बार प्रथम पंचवर्षीय योजना में दाखिल हुआ। साल 2002 में एक नई जलनीति अख्तियार की गई। पेयजल और साफ सफाई की सुविधा मुहैया कराने का प्राथमिक दायित्व राज्यों का है। केंद्र इसके लिए धन आबंटित करता है।
  • भूमि की सतह और भूगर्भ में मौजूद पानी के कुल इस्तेमाल का 90 फीसदी हिस्सा कृषि-क्षेत्र में खर्च होता है। बाकी हिस्से में उद्योग और घरेलू उपयोग के अन्तर्गत होने वाला पानी-खर्च आता है।
  • भारत में 69 से लेकर 74 फीसदी ग्रामीम आबादी पानी के सुरक्षित स्रोतों से दैनिक उपभोग का पानी हासिल करती है जबकि 26 से 31 फीसदी ग्रामीण लोग सुरक्षित जलस्रोतों के इस्तेमाल से वंचित हैं।
  • शहरी आबादी में 91 से 93 फीसदी को सुरक्षित जलस्रोत से दैनिक उपभोग का पानी हासिल होता है।
  • भारत में पानी की समस्या का एक पहलू इसका सूक्ष्म रासायनिक कणों से संदूषित होना है। 17 राज्यों के कुल 6 करोड़ 60 लोगों को फ्लूरोइड मिला पानी हासिल होता है। देश के 75 प्रखंडों के 1 करोड़ 30 लाख 80 हजार लोगों को आर्सेनिक संदूषित पानी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।लौहतत्व की अधिकता या फिर जीवाणुओं द्वारा संक्रमित होना भी इसी समस्या का एक पहलू है।
     
    विभिन्न स्रोतों से हासिल आंकड़ों के अध्ययन से यह साफ होता है कि आठवीं पंचवर्षीय योजना में पर्याप्त जोर देने के बावजूद केवल 18-19 फीसदी ग्रामीण घरों में शौचालय की सुविधा मुहैया करायी जा सकी है।शहरो में 75 से 81 फीसदी घरों में शौचालय है।
  • साफ पेयजल का बुनियादी ढांचा लगभग 85 फीसदी शहरी और ग्रामीण भारतीयों तक पहुंचा दिया गया है। बहरहाल समाज के गरीब और वंचित तबके तक इस सुविधा की पहुंच सतत बनाये रखने के मार्ग में चुनौतियां बरकरार हैं।
  • साल 1951 से 1997 के बीच सकल सिंचित क्षेत्र में चार गुना बढ़ोतरी हुई और सकल सिंचित इलाके का दायरा 23 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 90 मिलियन हेक्टेयर हो गया। भारत में साफ पानी की सर्वाधिक खपत का सिंचाईं में होती है।
  • एक तरफ भारत में जल संसाधन लगातार कम पड़ रहे हैं और उनपर आपूर्ति का दबाव बढ़ रहा है दूसरी तरफ पेयजल, खेती और उद्योग आदि में उपयोग के लिए पानी की मांग बढती जा रही है।
  • समस्या का एक चिंताजनक पहलू यह है कि बढ़ते शहरीकरण के साथ बड़े शहरों के आसपास के ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता और गुणवता में कमी आ रही है।
  • आजादी के वक्त भारत की आबादी तकरीबन 40 करोड़ थी और प्रति व्यक्ति सालाना पानी की उपलब्धता 5000 क्यूविक मीटर थी। आज की तारीख में भारत की आबादी एक अरब से ज्यादा हो चुकी है और सालाना प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 2000 क्यूविक मीटर रह गई है।
  • साल 2050 के आते आते देश में पानी की जरुरत 1422 बीसीएम हो जाएगी जबकि इस्तेमाल में आ सकने लायक कुल पानी की उपलब्धता उस वक्त 1086 बीसीएम ही होगी।
  • पेयजल आपूर्ति विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में 15917 मानव बस्तियों में पेयजल की सुविधा नहीं पहुंचायी जा सकी है।
  • साफ- सफाई
  • जलजनित बीमारियां जनसामान्य के स्वास्थ्य के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें कुछ बीमारियां संक्रामक हैं तो कुछ जल्दी ही पूरे समुदाय को अपने चपेटे में ले लेती हैं। इन बीमारियों से होने वाली मौतों की संख्या भी ज्यादा है। पुनः कुछ जलजनित बीमारियों का उपचार अत्यंत कठिन है।
  • छोटे बच्चों पर जलजनित बीमारियों का प्रकोप ज्यादा है क्योंकि बच्चों को गंदगी से बचाने के बारे में लोग सचेत नहीं हैं। भारत में हर साल 4 से 5 लाख बच्चे(5 साल तक की उम्र वाले) डायरिया से मरते हैं।
  • पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने के बावजूद जलजनित बीमारियों की बारंबारता या फिर उनसे होने वाली मौतों की तादाद में कमी नहीं आई है क्योंकि जलभंडारण का तरीका दोषपूर्ण होता है अथवा उपभोक्ता जहां पानी का इस्तेमाल कर रहा होता है उस बिन्दु तक जाते जाते पानी संदूषित हो जाता है। यहां साफ-सफाई की व्यक्तिगत आदतों का सवाल भी महत्वपूर्ण है।  जलजनित बीमारियों के कारण बड़े पैमाने पर व्यय करना पड़ता है। आधिकारिक आंकड़ों में इन बीमारियों के फैलाव के बारे में कम करके बताया जाता है। मिसाल के लिए आधिकारिक आंकड़ों में कहा गया है कि विषाणुजनित हेपेटाइटिस प्रत्येक एक लाख जनसंख्या में 12 व्यक्ति को है जबकि समुदाय आधारित दो सर्वेक्षणों का निष्कर्ष है कि यह बीमारी प्रति लाख जनसंख्या में लगभग 100 लोगों को होती है।सामुदायिक सर्वेक्षणों में यह भी कहा गया है कि 5 साल तक की उम्र के बच्चों को साल में दो से तीन दफे डायरिया होता है जबकि आधिकारिक आंकड़ों में डायरिया की बड़ी कम घटनाएं दर्ज होती हैं।




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