पानी और साफ-सफाई

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नीति आयोग ने समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (सीडब्ल्यूएमआई) पर एक रिपोर्ट 14 जून 2018 को जारी की. समग्र जल प्रबंधन सूचकांक जल संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन में राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शन के आकलन और उनमें सुधार लाने का एक प्रमुख साधन है. यह सूचकांक राज्यों और संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों को उपयोगी सूचना उपलब्ध कराएगा जिससे वे अच्छी रणनीति बना सकेंगे और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में उसे लागू कर सकेंगे. रिपोर्ट में गुजरात को वर्ष 2016-17 के लिए प्रथम श्रेणी में रखा गया, इसके बाद मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र का नंबर आता है. पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में वर्ष 2016-17 के लिए त्रिपुरा को प्रथम श्रेणी दी गई, इसके बाद हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, और असम का स्थान रहा. सूचकांक में वृद्धि संबंधी बदलाव के संदर्भ में (2015-16 स्तर) सभी राज्यों में राजस्थान को प्रथम श्रेणी में रखा गया जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में त्रिपुरा प्रथम स्थान पर रहा. पीपीटी के लिए यहां क्लिककरें,  प्रेस विज्ञप्ति के लिए यहां क्लिक करें, मूल रिपोर्ट के लिए यहां क्लिक करें
 
भारत फिलहाल अपने इतिहास में जल-संकट के सबसे बुरे दौर में है :
 

60 करोड़ लोगों को पानी के अभाव का सामना करना पड़ रहा है. इस अभाव को गंभीर या फिर अति गंभीर श्रेणी का माना जा सकता है.
 

देश के 75% परिवारों को उनकी रिहाइश के अहाते यानी घर के दायरे में पेयजल हासिल नहीं है. ग्रामीण इलाकों में 84 प्रतिशत परिवारों को नलकी के जरिए मिलने वाला पानी(पाइप्ड वाटर एक्सेस) मुहैया नहीं.
 

देश में 70% पानी संदूषित श्रेणी का है. भारत जल गुणवत्ता सूचकांक के एतबार से 122 देशों की सूची में 120वें स्थान पर है.
 

देश में दो लाख लोग हर साल स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में हासिल ना होने के कारण मौत के शिकार होते हैं.
 

देश के 60% फीसद राज्यों ने पानी की उपलब्धता के लिहाज से अपने अंकमान में हल्का सा सुधार किया है.
 

देश के कुल आठ राज्य ऐसे हैं जिन्होंने एक साल की अवधि में अपने अंकमान में 5 या इससे ज्यादा अंकों का इजाफा किया है. ऐसा इन राज्यों में जल-स्रोतों के संवर्धन और पुनर्बहाली के कारण हो सका है या फिर जलाच्छादन के विकास तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति में विस्तार के कारण.
 

राजस्थान ने जल की उपलब्धता के लिहाज से सर्वाधिक प्रगति की है. उसके अंकमान में कुल 9 अंकों का इजाफा हुआ है.
 

हिमालयी क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय, त्रिपुरा तथा सिक्किम अपने अंकमान में सुधार करने वाले अन्य बड़े राज्य हैं. इनके अंकमान में 7.5 अंकों का इजाफा हुआ है जिससे संकेत मिलता है कि जल-नीति संबंधी कार्य इन राज्यों में अन्य सूबों की अपेक्षा बेहतर हुए हैं.
 

हर राज्य को स्थिति सुधारने की जरुरत
 

तीन राज्य—गुजरात, मध्यप्रदेश तथा आंध्रप्रदेश 100 में 65 से ज्यादा अंकों के साथ जल-प्रबंधन सूचकांक के लिहाज से शीर्ष के राज्य हैं.
 

सात राज्यों ने 50-65 के बीच अंक हासिल किए हैं और इनके कामकाज को जल-प्रबंधन सूचकांक के लिहाज से मंझोले दर्जे का माना जा सकता है.
 

देश के लगभग 60 प्रतिशत ( 24 में से 15) राज्यों को सूचकांक में 50 से कम अंक हासिल हुआ है और जल-प्रबंधन के लिहाज से उनके कामकाज को निचले दर्जे का माना जा सकता है.
 

ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि जल प्रबंधन के मामले में जिन राज्यों का कामकाज निचले दर्जे का है उन राज्यों में देश की लगभग 50 फीसद आबादी रहती है जिससे जाहिर होता है कि भारत में जल-संकट कभी भी विकराल रुप ले सकता है.
 

जल-प्रबंधन के लिहाज से जिन राज्यों का कामकाज निचले दर्जे का है उन राज्यों का देश के कृषि-उपज में 20-30 प्रतिशत का योगदान है. इससे संकेत मिलता है कि इन राज्यों में जल-प्रबंधन की स्थिति नहीं सुधरी तो देश को खाद्य-सुरक्षा के लिहाज से जोखिम की स्थिति का सामना करना पड़ेगा.
 
 



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