पानी और साफ-सफाई

पानी और साफ-सफाई

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वाटरऐड द्वारा प्रस्तुत ऑफ ट्रैक, ऑफ टारगेट- व्हाई इन्वेस्टमेंट इन वाटर, सैनिटेशन एंड हायजीन इज नॉट रीचिंग दोज हू नीड इट मोस्ट (2011), नामक दस्तावेज के अनुसार,
http://www.wateraid.org/documents/Off-track-off-target.pdf


भारत ने वादा किया है कि साल 2012 तक वह सर्वजन को साफ पेयजल की सुविधा महैया करा देगा। ग्रामीण साफ-सफाई के संबंध में भारत का राजनीतिक वादा 2017 तक सर्वजन तक इस सुविधा को पहुंचाने का है।

 


भारत में पेयजल की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या 14 करोड़70 लाख 30 हजार है। इसी तरह देश में साफ-सफाई की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या 81 करोड़ 80 लाख 40 हजार है। 


भारत सरकार ने साल 2008 में पानी और साफ-सफाई की सुविधा पर अपनी जीडीपी का 0.57 फीसदी खर्च किया, साल 2009 में इससे कम यानी 0.54 फीसदी और साल 2010 में और भी कम ( जीडीपी का 0.45 फीसदी)


भारत में साल 1995 से 2008 के बीच 20 करोड़ लोगों को साफ-सफाई की सुविधा मुहैया करायी गई। बहरबाल इस दिशा में प्रगति असमानतापरक है।निर्धनतम आबादी में से सिर्फ 50 लाख लोगों को यह सुविधा हासिल हो पायी जबकि धनी लोगों में यह सुविधा 93 लाख लोगों को हासिल हुई।


सिक्किम और केरल में प्रत्येक घर साफ-सफाई की सुविधा से संपन्न है जबकि तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और पश्चिम बंगाल ने इस दिशा में साल 2001 से प्रगित की है। बिहार में 73 फीसदी आबादी साफ-सफाई की सुविधा से वंचित है और देशव्यापी स्तर पर देखें तो तकरीबन एक तिहाई ग्रामीण आबादी को यह सुविधा हासिल नहीं है।


जिन पाँच देशों में साफ-सफाई की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है उनके नाम हैं- चीन, भारत, इंडोनेशिया,नाइजीरिया और पाकिस्तान। ये सारे देश मध्य आय वाले हैं और यहां कुल मिलाकर 1 अरब 70 करोड़ आबादी साफ-सफाई की सुविधा से वंचित है।


भारत को लगातार नौ साल और चीन को लगातार आठ साल तक पानी, साफ-सफाई की सुविधा और स्वच्छता संबंधी कामों के लिए सर्वाधिक मदद दी गई है। ये देश इस मद में सबसे ज्यादा आर्थिक मदद पाने वाले शीर्ष के 10 देशों में शामिल है।


सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान में यह माना गया है कि किसी घर के लिए व्यक्तिगत स्तर पर शौचालय बनाया जा रहा है तो अगर घर गरीबी रेखा से ऊपर का है तो निर्माणखर्च वही उठाएगा। अगर घर गरीबी रेखा से नीचे के परिवार का है तो निर्माण खर्च केद्र सरकार, प्रदेश सरकार और संबद्ध घर साझे में उठायेंगे।


डायरिया के कारण सर्वाधिक संख्या में बच्चों की मृत्यु अफ्रीका में होती है। विश्वस्तर भी बच्चों की मौत के कारणों में इसका स्थान दूसरा है। डायरिया के कारण प्रतिवर्ष तकरीबन 20 लाख 20 हजार बच्चों की मौत होती है और इसमें 88 फीसदी मामलों में कारण होता है स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई आदि की सुविधा का अभाव।


अफ्रीकी और एशियाई देशों को स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई की सुविधा की कमी की भारी कीमत(जीडीपी का अधिकतम 6 फीसदी तक का घाटा) चुकानी पड़ती है।


दक्षिण एशिया में अमीर व्यक्ति की तुलना में गरीब व्यक्ति को साफ-सफाई की सुविधा मिलने की संभावना 13 गुना कम है जबकि अफ्रीका में यही आंकड़ा 15 गुने का है।


स्वच्छ पेयजल की सुविधा मामले में शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच खाई स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। विकासशील देशों में 94% शहरी आबादी को स्वच्छ पेयजल की सुविधा हासिल है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी में महज 76% को। साफ-सफाई की सुव्यवस्थित सुविधा के मामले में भी यही बात(शहरी आबादी- 68 फीसदी, ग्रामीण आबादी 40 फीसदी) है।


जिन घरों में स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं है वहां महिलाओं और लड़कियों को पानी भरने की जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ती है। 45 देशों के आंकड़ों से यह बात साबित हो गई।


यदि कम आय वाले देशों तथा विश्व के हर क्षेत्र में स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई की सुविधा के मामले में सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को 2020 तक हासिल करना है तो इस मद में खर्च को जीडीपी के 3.5% तक बढ़ाना होगा।

 


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