पानी और साफ-सफाई

पानी और साफ-सफाई

What's Inside

 
 
 
  • साल १९९१ की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ५५.५४ फीसदी ग्रामीण आबादी को साफ पेयजल की सुविधा हासिल थी। पेयजल आपूर्ति विभाग के नवीनतम आंकड़ों के हिसाब से देखें तो १ अप्रैल २००७ तक देश के कुल १५०७३४९ मानव-बस्तियों में से ११२१३६६ यानी ७४.३९ फीसदी को पूर्णतया और १४.६४ फीसदी को अंशतया साफ पेयजल की सुविधा हासिल है।
  • मौजूदा आकलन कहते हैं कि देश में २.१७ लाख मानव बस्तियों में पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित है और साल २००५ की पहली अप्रैल तक  ७० हजार मानव बस्तियों में पानी की गुणवत्ता को सुधारने के उपाय किए गए थे।
  • साल २००१ की जनगणना के मुताबिक देश की केवल ३६ फीसदी आबादी ऐसी है जिसके घर में शौचालय की व्यवस्था है। ग्रामीण इलाके में केवल २१ फीसदी आबादी के ही आवासीय परिसर में शौचालय है।
  • साल १९७२-७३ में भारत सरकार ने एक्सलरेटेड रुरल वाटर सप्लाई प्रोग्राम नाम से पेयजल की आपूर्ति की एक महत्वाकांक्षी योजना शुरु की। इसके अन्तर्गत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पेयजल की सुविधा के लिए सहायता मुहैया करायी जानी थी। १९८६ में इस कार्यक्रम को एक मिशन में बदल दिया गया और तब इसे टेकनालाजी मिशन ऑन ड्रिकिंग वाटर एंड रिलेटेड वाटर मैनेजमेंट कहा गया। साल १९९१-९२ में इसी मिशन का नाम बदलकर राजीव गांधी नेशनल ड्रिंकिंग वाटर मिशन रखा गया।
     
    साल १९९९ में ग्रामीण विकास मंत्रालय के अन्तर्गत ग्रामीण जलापूर्ति और शौचालय आदि की सुविधा के लिए पेयजल आपूर्ति विभाग बनाया गया। इसी साल कई और पहल किए गए जिसमें एक का प्रतिफलन साल २००२ में स्वजलधारा के रुप में सामने आया।
  • देश में २.१७ लाख मानव बस्तियों में पानी की गुणवत्ता किसी ना किसी कारण से प्रभावित है। इनमें से आधे यानी ११८०८८ मानव बस्तियों में पानी में लौहतत्व ज्यादा है जबकि ३१३०६ मानव बस्तियों में फ्लूराइड, २३४९५ मानव बस्तियों में अम्लीयता, १३९५८ बस्तियों में नाइट्रेट और ५०२९ बस्तियों में आर्सेनिक की अधिकता है।२५ हजार मानव बस्तियों के पेयजल मे एक से ज्यादा संदूषक मौजूद हैं। 
  • कुल १७ राज्यों के २०० जिलों में पानी में फ्लूराइड की अधिकता है और इस अधिकता का दुष्प्रभाव लगभग ६ करोड़ ६० लाख आबादी पर पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में आरसेनिक संदूषित पानी की समस्या विकराल हो चुकी है। आर्सेनिक से प्रभावित पेयजल पावे इलाके बिहार उत्तरप्रदेश और असम तक फैले हुए हैं।
  • ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य रखा गया है कि साल २००९ तक पूरी आबादी को साफ पेयजल मुहैया करा दिया जाएगा। भारत निर्माण योजना के अन्तर्गत कुल २.१७ लाख संदूषित पेयजल वाली बस्तियों में साफ पेयजल मुहैया कराया जाएगा। इसके साथ ही जिन मानव बस्तियों में अभी साफ पेयजल उपलब्ध नहीं है उनमें से ५५०६७ बस्तियों में पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा।

 

वाटर, सेनिटेशन, एंड हाइजिन लिंक्स टू फैक्ट एंड फीगर(नवंबर २००४) के आंकड़ों के अनुसार-

 

  • १० लाख ८० हजार लोग हर साल डायरिया से काल कवलित होते हैं। इसमें ९० फीसदी ५ साल तक की उम्र के बच्चे होते हैं और ऐसी ज्यादातर मौतें विकासशील मुल्कों में होती हैं। 
  • डायरिया के ८८ फीसदी मामलों में प्रमुख कारण संदूषित पेयजल और साफ-सफाई की कमी का होना पाया गया है। पेयजल की गुणवत्ता में सुधार से डायरिया से होने वाली मौतों में २५ फीसदी की कमी लायी जा सकती है।
  • साफ सफाई की व्यवस्था सुधरे त डायरिया से होने वाली मौतों में ३२ फीसदी की कमी आएगी। अगर हाथ धोने जैसी आदतों के प्रति लोगों को जागरुक बनाया जाय तो डायरिया से होने वाली मौतों में ४५ फीसदी की कमी आ सकती है।
  • घरों में इस्तेमाल होने वाले पानी उपयोग स्थल पर क्लोरिन से उपचार कर दिया जाय तो डायरिया की घटना में ३५ से ३९ फीसदी की कमी आएगी। .
  • १० लाख ३० हजार व्यक्ति हर साल मलेरिया से काल कवलित होते हैं। इनमें ९० फीसदी ५ साल तक उम्र वाले बच्चे होते हैं। हर साल मलेरिया से ३९ करोड़ ६० लाख लोग पीडित होते हैं। इनमें ज्यादातर लोग विकासशील और अविकसित मुल्कों के हैं। 
  • सिंचाई की सघन व्यवस्था, बांधों और जलपरियोजनाओं के कारण मलेरिया की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। जल परियोजनाओं के बेहतर प्रबंधन से मलेरिया की घटनाओं में कमी लायी जा सकती है।
  • साल २००२ तक विश्व में एक अरब १० करोड़ यानी १७ फीसदी आबादी साफ पेयजल से महरुम थी। .
  • साफ पेयजल से महरुम कुल १ अरब १० करोड़ की आबादी में दो तिहाई लोग सिर्फ एशिया में रहते हैं। अफ्रीका के सहारीय इलाके में ४२ फीसदी आबादी साफ पेयजल से महरुम है।
 
 



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