Resource centre on India's rural distress
 
 

पानी और साफ-सफाई

खास बात

- भारत में खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या 626 मिलियन है। यह संख्या 18 देशों में खुले में शौच करने वाले लोगों की संयुक्त संख्या से ज्यादा है।#
-ग्रामीण इलाकों में केवल २१ फीसदी आबादी के घरों में शौचालय की व्यवस्था है।*
-पेयजल आपूर्ति विभाग के आंकड़ों के हिसाब से कुल १,५०,७३४९ ग्रामीण मानव बस्तियों में से केवल ७४ फीसदी में पूरी तरह और १४ फीसदी में आंशिक रुप से साफ पेयजल मुहैया कराने की व्यवस्था हो पायी है। *
-देश के १७ राज्यों में कुल २०० जिलों के लगभग ६ करोड़ ६० लाख लोग फ्लूराइड संदूषित पानी की चपेट में हैं। *
-असम, पश्चिम बंगाल बिहार और उत्तरप्रदेश के पूर्वी इलाके में आर्सेनिक संदूषित पानी की समस्या विकराल हो उठी है।*
-१० लाख ८० हजार लोग हर साल सिर्फ डायरिया के कारण काल कवलित होते हैं। इसमें ९० फीसदी तादाद ५ साल तक की उम्र के बच्चों की होती है जो ज्यादातर विकासशील देशों के होते हैं। **
 
* ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का दस्तावेज, भारत सरकार
** वाटर सैनिटेशन एंड हाइजिन लिंक्स टू हेल्थ फैक्टस् एंड फीगर्स
# विश्व स्वास्थ्य संगठन/ यूनिसेफ ज्वाईंट मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2012:
 
**page**
 
[inside]नीति आयोग द्वारा प्रस्तुत कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स(समग्र जल प्रबंधन सूचकांक, जून 2018)[/inside]के मुख्य तथ्य -- 
 
नीति आयोग ने समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (सीडब्ल्यूएमआई) पर एक रिपोर्ट 14 जून 2018 को जारी की. समग्र जल प्रबंधन सूचकांक जल संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन में राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शन के आकलन और उनमें सुधार लाने का एक प्रमुख साधन है. यह सूचकांक राज्यों और संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों को उपयोगी सूचना उपलब्ध कराएगा जिससे वे अच्छी रणनीति बना सकेंगे और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में उसे लागू कर सकेंगे. रिपोर्ट में गुजरात को वर्ष 2016-17 के लिए प्रथम श्रेणी में रखा गया, इसके बाद मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र का नंबर आता है. पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में वर्ष 2016-17 के लिए त्रिपुरा को प्रथम श्रेणी दी गई, इसके बाद हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, और असम का स्थान रहा. सूचकांक में वृद्धि संबंधी बदलाव के संदर्भ में (2015-16 स्तर) सभी राज्यों में राजस्थान को प्रथम श्रेणी में रखा गया जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में त्रिपुरा प्रथम स्थान पर रहा. पीपीटी के लिए यहां क्लिककरें,  प्रेस विज्ञप्ति के लिए यहां क्लिक करें, मूल रिपोर्ट के लिए यहां क्लिक करें
 
भारत फिलहाल अपने इतिहास में जल-संकट के सबसे बुरे दौर में है :
 

60 करोड़ लोगों को पानी के अभाव का सामना करना पड़ रहा है. इस अभाव को गंभीर या फिर अति गंभीर श्रेणी का माना जा सकता है.
 

देश के 75% परिवारों को उनकी रिहाइश के अहाते यानी घर के दायरे में पेयजल हासिल नहीं है. ग्रामीण इलाकों में 84 प्रतिशत परिवारों को नलकी के जरिए मिलने वाला पानी(पाइप्ड वाटर एक्सेस) मुहैया नहीं.
 

देश में 70% पानी संदूषित श्रेणी का है. भारत जल गुणवत्ता सूचकांक के एतबार से 122 देशों की सूची में 120वें स्थान पर है.
 

देश में दो लाख लोग हर साल स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में हासिल ना होने के कारण मौत के शिकार होते हैं.
 

देश के 60% फीसद राज्यों ने पानी की उपलब्धता के लिहाज से अपने अंकमान में हल्का सा सुधार किया है.
 

देश के कुल आठ राज्य ऐसे हैं जिन्होंने एक साल की अवधि में अपने अंकमान में 5 या इससे ज्यादा अंकों का इजाफा किया है. ऐसा इन राज्यों में जल-स्रोतों के संवर्धन और पुनर्बहाली के कारण हो सका है या फिर जलाच्छादन के विकास तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति में विस्तार के कारण.
 

राजस्थान ने जल की उपलब्धता के लिहाज से सर्वाधिक प्रगति की है. उसके अंकमान में कुल 9 अंकों का इजाफा हुआ है.
 

हिमालयी क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय, त्रिपुरा तथा सिक्किम अपने अंकमान में सुधार करने वाले अन्य बड़े राज्य हैं. इनके अंकमान में 7.5 अंकों का इजाफा हुआ है जिससे संकेत मिलता है कि जल-नीति संबंधी कार्य इन राज्यों में अन्य सूबों की अपेक्षा बेहतर हुए हैं.
 

हर राज्य को स्थिति सुधारने की जरुरत
 

तीन राज्य—गुजरात, मध्यप्रदेश तथा आंध्रप्रदेश 100 में 65 से ज्यादा अंकों के साथ जल-प्रबंधन सूचकांक के लिहाज से शीर्ष के राज्य हैं.
 

सात राज्यों ने 50-65 के बीच अंक हासिल किए हैं और इनके कामकाज को जल-प्रबंधन सूचकांक के लिहाज से मंझोले दर्जे का माना जा सकता है.
 

देश के लगभग 60 प्रतिशत ( 24 में से 15) राज्यों को सूचकांक में 50 से कम अंक हासिल हुआ है और जल-प्रबंधन के लिहाज से उनके कामकाज को निचले दर्जे का माना जा सकता है.
 

ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि जल प्रबंधन के मामले में जिन राज्यों का कामकाज निचले दर्जे का है उन राज्यों में देश की लगभग 50 फीसद आबादी रहती है जिससे जाहिर होता है कि भारत में जल-संकट कभी भी विकराल रुप ले सकता है.
 

जल-प्रबंधन के लिहाज से जिन राज्यों का कामकाज निचले दर्जे का है उन राज्यों का देश के कृषि-उपज में 20-30 प्रतिशत का योगदान है. इससे संकेत मिलता है कि इन राज्यों में जल-प्रबंधन की स्थिति नहीं सुधरी तो देश को खाद्य-सुरक्षा के लिहाज से जोखिम की स्थिति का सामना करना पड़ेगा.
 
 
**page**
 
 

[inside]विश्व स्वास्थ्य संगठन/ यूनिसेफ ज्वाईंट मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2012: प्रोग्रेस ऑन ड्रिंकिंग वाटर एंड सैनिटेशन[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार http://www.who.int/water_sanitation_health/publications/2012/jmp2012.pdf,

• भारत में खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या 626 मिलियन है। यह संख्या 18 देशों में खुले में शौच करने वाले लोगों की संयुक्त संख्या से ज्यादा है।


• खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या पूरे दक्षिण एशिया में 692 मिलियन है। इस संख्या का 90 फीसदी भारत में रहता है।

• विश्व में कुल 1.1 बिलियन लोग खुले में शौच करते हैं। इस संख्या का 59 फीसदी भारत में रहता है।

• पेयजल के संवर्धित स्रोतों से वंचित लोगों की संख्या भारत में 97 मिलियन है। इस मामले में भारत बस चीन से ही पीछे यानी दूसरे स्थान पर है।.

• साल 1990 के बाद से चीन में 593 मिलियन और भारत में 251मिलियन लोगों को साफ-सफाई की संवर्धित सेवाएं हासिल हुई हैं।.

• साफ-सफाई की सुविधा की दिशा में विश्व में जितनी प्रगति हुई है उसका तकरीबन 50 फीसदी हिस्सा सिर्फ दो देशों भारत और चीन का है।

पानी

• साल 2010 में विश्व की 89 फीसदी यानी 6.1 बिलियन लोगों को पेयजल की संवर्धित सेवा हासिल थी। MDG के अन्तर्गत लक्ष्य 88 फीसदी का था। साल 2015 तक यह तादाद 92 फीसदी तक पहुंच जाएगी।

• साल 1990 और 2010 के बीच तकरीबन 2 बिलियन लोगों को संवर्धित पेयजल-स्रोत हासिल हुए।

• दुनिया की 11 फीसदी यानी 783 मिलियन आबादी अब भी पेयजल की सुविधा से वंचित है।

• विश्व स्वास्थ्य संगठन / यूनिसेफ जेएमपी का आकलन है कि साल 2015 तक पेयजल की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या 605 मिलियन पहुंच सकती है।

साफ-सफाई

• दुनिया की 63 फीसदी आबादी टॉयलेट तथा साफ-सफाई की अन्य संवर्धित सेवाओं का इस्तेमाल करती है।

• साल 2015 तक दुनिया के तकरीबन 67 लोगों को साफ-सफाई की संवर्धित सेवाएं हासिल हो जाएंगी। इस मामले में एमडीजी(सहस्राब्दि विकास लक्ष्य) के अन्तर्गत लक्ष्य 75 फीसदी आबादी का था।

• साल 1990 से अबतक तकरीबन 1.8 बिलियन लोगों को साफ-सफाई की संवर्धित सेवाएं हासिल हुई हैं।

• दुनिया में 2.5 बिलियन लोग साफ-सफाई की संवर्धित सेवाओं से वंचित हैं। इनकी संख्या 2015 तक 2.4 बिलियन होने का अनुमान है।

• तकरीबन 1.1 बिलियन (यानी विश्व की 15 फीसदी आबादी)लोग खुले में शौच करते हैं।

• खुले में शौच करने वाले लोगों की कुल संख्या में 949 मिलियन लोग गांवों में रहते हैं।

निम्नलिखित देशों में खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या का एक-तिहाई हिस्सा रहता है-:

भारत (626 मिलियन)
इंडोनेशिया (63 मिलियन)
पाकिस्तान (40 मिलियन)
ईथोपिया (38 मिलियन)
नाईजीरिया (34मिलियन)
सूडान (19 मिलियन)
नेपाल (15 मिलियन)
चीन (14 मिलियन)
नाईजर (12 मिलियन)
बुरकीना फासो (9.7मिलियन)
मोजाम्बिक (9.5मिलियन)
कंबोडिया (8.6 मिलियन)
 
  **page**

[inside]वाटरऐड द्वारा प्रस्तुत ऑफ ट्रैक, ऑफ टारगेट- व्हाई इन्वेस्टमेंट इन वाटर, सैनिटेशन एंड हायजीन इज नॉट रीचिंग दोज हू नीड इट मोस्ट (2011)[/inside], नामक दस्तावेज के अनुसार,
http://www.wateraid.org/documents/Off-track-off-target.pdf


भारत ने वादा किया है कि साल 2012 तक वह सर्वजन को साफ पेयजल की सुविधा महैया करा देगा। ग्रामीण साफ-सफाई के संबंध में भारत का राजनीतिक वादा 2017 तक सर्वजन तक इस सुविधा को पहुंचाने का है।

 


भारत में पेयजल की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या 14 करोड़70 लाख 30 हजार है। इसी तरह देश में साफ-सफाई की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या 81 करोड़ 80 लाख 40 हजार है। 


भारत सरकार ने साल 2008 में पानी और साफ-सफाई की सुविधा पर अपनी जीडीपी का 0.57 फीसदी खर्च किया, साल 2009 में इससे कम यानी 0.54 फीसदी और साल 2010 में और भी कम ( जीडीपी का 0.45 फीसदी)


भारत में साल 1995 से 2008 के बीच 20 करोड़ लोगों को साफ-सफाई की सुविधा मुहैया करायी गई। बहरबाल इस दिशा में प्रगति असमानतापरक है।निर्धनतम आबादी में से सिर्फ 50 लाख लोगों को यह सुविधा हासिल हो पायी जबकि धनी लोगों में यह सुविधा 93 लाख लोगों को हासिल हुई।


सिक्किम और केरल में प्रत्येक घर साफ-सफाई की सुविधा से संपन्न है जबकि तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और पश्चिम बंगाल ने इस दिशा में साल 2001 से प्रगित की है। बिहार में 73 फीसदी आबादी साफ-सफाई की सुविधा से वंचित है और देशव्यापी स्तर पर देखें तो तकरीबन एक तिहाई ग्रामीण आबादी को यह सुविधा हासिल नहीं है।


जिन पाँच देशों में साफ-सफाई की सुविधा से वंचित लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है उनके नाम हैं- चीन, भारत, इंडोनेशिया,नाइजीरिया और पाकिस्तान। ये सारे देश मध्य आय वाले हैं और यहां कुल मिलाकर 1 अरब 70 करोड़ आबादी साफ-सफाई की सुविधा से वंचित है।


भारत को लगातार नौ साल और चीन को लगातार आठ साल तक पानी, साफ-सफाई की सुविधा और स्वच्छता संबंधी कामों के लिए सर्वाधिक मदद दी गई है। ये देश इस मद में सबसे ज्यादा आर्थिक मदद पाने वाले शीर्ष के 10 देशों में शामिल है।


सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान में यह माना गया है कि किसी घर के लिए व्यक्तिगत स्तर पर शौचालय बनाया जा रहा है तो अगर घर गरीबी रेखा से ऊपर का है तो निर्माणखर्च वही उठाएगा। अगर घर गरीबी रेखा से नीचे के परिवार का है तो निर्माण खर्च केद्र सरकार, प्रदेश सरकार और संबद्ध घर साझे में उठायेंगे।


डायरिया के कारण सर्वाधिक संख्या में बच्चों की मृत्यु अफ्रीका में होती है। विश्वस्तर भी बच्चों की मौत के कारणों में इसका स्थान दूसरा है। डायरिया के कारण प्रतिवर्ष तकरीबन 20 लाख 20 हजार बच्चों की मौत होती है और इसमें 88 फीसदी मामलों में कारण होता है स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई आदि की सुविधा का अभाव।


अफ्रीकी और एशियाई देशों को स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई की सुविधा की कमी की भारी कीमत(जीडीपी का अधिकतम 6 फीसदी तक का घाटा) चुकानी पड़ती है।


दक्षिण एशिया में अमीर व्यक्ति की तुलना में गरीब व्यक्ति को साफ-सफाई की सुविधा मिलने की संभावना 13 गुना कम है जबकि अफ्रीका में यही आंकड़ा 15 गुने का है।


स्वच्छ पेयजल की सुविधा मामले में शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच खाई स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। विकासशील देशों में 94% शहरी आबादी को स्वच्छ पेयजल की सुविधा हासिल है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी में महज 76% को। साफ-सफाई की सुव्यवस्थित सुविधा के मामले में भी यही बात(शहरी आबादी- 68 फीसदी, ग्रामीण आबादी 40 फीसदी) है।


जिन घरों में स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं है वहां महिलाओं और लड़कियों को पानी भरने की जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ती है। 45 देशों के आंकड़ों से यह बात साबित हो गई।


यदि कम आय वाले देशों तथा विश्व के हर क्षेत्र में स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई की सुविधा के मामले में सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को 2020 तक हासिल करना है तो इस मद में खर्च को जीडीपी के 3.5% तक बढ़ाना होगा।

  **page**
 

[inside]प्रोवाइडिंग सेफ वाटर- इविडेंसेज फ्रॉम रैंडोमाईज्ड इवैल्यूएशन्स्(अमृता आहूजा, माइकेल क्रेमर और एलिक्स पीटर्सन् ज्वैने-अप्रैल 2010)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

 

http://www.economics.harvard.edu/files/faculty/36_ARRE_CLEAN_2010_04_14.pdf:

 

सालान 10 लाख 60 हजार बच्चों की मौत डायरिया या फिर पेट की ऐसी बीमारियोंसे होती है जिनका सीधा रिश्ता प्रदूषित पेयजल है।

 

प्रदूषित पेयजल से सबसे ज्यादा खतरा कमउम्र बच्चों को होता है। गौरतलब है कि महिलायें और बच्चे ही सबसे ज्यादा पानी एकत्र करने का काम करते हैं।.

 

बहुविध जांच से पता चलता है कि पानी का शोधन कीमत के लिहाज से भी जेब पर ज्यादा भारी नहीं पड़ने वाला और इससे डायरिया के मामलों में भारी कमी आ सकती है। बहरहाल पानी के बहुतेरे उपभोक्ता साफ पानी के लिए अपनी जेब से रकम खर्च करने को तैयार नहीं हैं। मौजूदा व्यवस्था(रीटेल मॉडल) के तहत महज 10 फीसदी घरों में ही शोधित पानी के लिए रकम खर्च की जाती है।

 

यदि पानी भरने की जगह पर क्लोरिन का घोल निशुल्क वितरित किया जाय, और इसके लिए स्थानीय स्तर पर प्रोमोटर रखे जायें तो संशोधित पेयजल की उपलब्धता 10 फीसदी से बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच सकती है।

 

कई मामलों की जांच से संकेत मिलते हैं कि उपभोक्ता पेयजल के सहज सुलभ होने के जो स्वास्थ्येतर फायदे हैं उसे महत्वपूर्ण मानते हैं, और इस कारण पेयजल की सहज सुलभता के लिए रकम खर्च करने को तैयार हैं।

 

पानी की मात्रा और पानी की गुणवत्ता का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है इसे अलग-अलग जांचने की जरुरत है क्योंकि पानी की उपलब्धता को संभव बनाने के लिए जो हस्तक्षेप किए जाते हैं उनका पानी की मात्रा और गुणवत्ता पर अलग-अलग प्रभाव होता है। मिसाल के लिए क्लोरिन का इस्तेमाल पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है ना कि उसकी मात्रा को। ठीक इसी तरह उन घरों में म्यूनिस्पैल्टी की तरफ से पानी की नलियां पहुंचाना जहां अभी तक स्टैंडपाईप का इस्तेमाल हो रहा है, पेयजल की उपलब्ध मात्रा पर असर करता है ना कि उसकी गुणवत्ता पर।

 

पानी की मात्रा बढ़ जाय और उसको हासिल करना भी सुगम हो जाय तो लोगों के लिए बार-बार हाथ धोना, नहाना या फिर कपड़े-बर्तन आदि धोना मुश्किल नहीं होगा, इसका असर सामान्य साफ-सफाई पर पड़ेगा और जल-जनित बीमारियों का खतरा भी कम होगा। इस बात के गहरे संकेत मिलते हैं कि हाथ धोने से स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

 
  **page**

ऱाष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा प्रस्तुत हाऊसिंग कंडीशन एंड एमेनिटीज इन इंडिया, 2008-09 नामक दस्तावेज के अनुसार, http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/press_note_535_15nov10.pdf: 

 

  • इस राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के लिए मौका मुआयना का काम जुलाई 2008 से जून 2009 के बीच हुआ। इस रिपोर्ट को 1,53,518 घरों के मौका मुआयने के बाद तैयार किया गया है। इसमें 97,144 घर ग्रामीण इलाकों के और 56,374 शहरी इलाकों के हैं।

 

पेयजल की सुविधा

 

ग्रामीण इलाके में पेयजल के लिए सर्वाधिक इस्तेमाल ट्यूबवेल और हैंडपंप का होता है। तकरीबन 50 फीसद घर अपने पेयजल के लिए इसी साधन का उपयोग करते हैं। 30 फीसद घरों में टैप की व्यवस्था है।

शङरी इलाके में टैप पेयजल की सुविधा के लिए सर्वाधिक इस्तेमाल में लाया जाना वाला साधन है(तकरीबन 74 फीसदी घरों में) ट्यूबवेल और हैंडपंप का इस्तेमाल पेयजल के लिए शहरी इलाकों में महज 18 फीसदी घरों में होता है।

 

पेयजल के तीन साधन यानी टैप, ट्यूबवेल-हैंडपंप और कुआं को एक साथ मिलाकर देखें तो ग्रामीण इलाके में 97 घरों में इन्हीं से पेयजल की आवश्यकता की पूर्ति होती है जबकि शहरी इलाके में  95 घरों में।.

 

तकरीबन 86 फीसदी ग्रामीण घर 91 फीसदी शहरी घरों में उपरोक्त तीन स्रोतों में से एक से पूरे साल भर पेयजल की आपूर्ति होती है।

 

पेयजल की आपूर्ति में कमी मार्च के महीने से शुरु होती है और मई के महीने में पेयजल का अभाव सर्वाधिक होता है।इसके बाद , अगस्त के महीने से पेयजल की आपूर्ति में क्रमश सुधार होता है।

 

मई के महीने में 13 फीसदी ग्रामीण परिवार और 8 फीसदी शहरी परिवार पेयजल के अभाव से जूझते हैं यानी पर्याप्त पेयजल नहीं मिल पाता।

 

41 फीसद ग्रामीण परिवारों को पेयजल की सुविधा आवासीय परिसार में ही उपलब्ध है जबकि शहरों में 75 फीसदी घरों को।.

 

स्नानघर की सुविधा

 

64 फीसदी ग्रामीण घरों में स्नानघर की सुविधा नहीं है।शहरी इलाके में स्नानघर की सुविधा से वंचित घरों की तादाद 22 फीसदी है।

ग्रामीण इलाके में डिटैच्ड बाथरुम ज्यादा हैं(तकरीबन 23 फीसदी घरों में) जबकि 13 फीसदी घरों में अटैच्ड बाथरुम की सुविधा है।.

 

शहरी इलाके में ज्यादातर घरों(48 फीसदी) में अटैच्ड बाथरुम की सुविधा है, फिर भी शहरी इलाके में 31 फीसदी घरों में अटैच्ड बाथरुम नहीं है।.

 

साफ-सफाई की सुविधा

 

तकरीबन 65 फीसदी ग्रामीण घरों में लैट्रिन की फेसेलिटी नहीं है जबकि लैट्रिन की सुविधा से वंचित शहरी घरों की तादाद 11फीसदी है।

 

तकरीबन 14 फीसदी ग्रामीण  और 8 फीसदी शहरी घरों में संडास(पिट लैट्रिन) का इस्तेमाल होता है।

ग्रामीण इलाके में सेप्टिक टैंक / फ्लश लैट्रिन की सुविधा 18 फीसदी घरों में है जबकि शहरी घरों में यह आंकड़ा 77 फीसदी का है।

 

बिजली की सुविधा

 

अघिल भारतीय स्तर पर देखें तो तकरीबन 75 फीसदी परिवार में घरेलू इस्तेमाल के लिए बिजली की सुविधा हासिल कर पाये हैं। इस मामले में शहरी और ग्रामीण घरों के बीच अच्छा खास अन्तर नजर आता है। तकरीबन 66 फीसदी ग्रामीण घरों में बिजली की सुविधा है जबकि, शहरी इलाके में बिजली की सुविधा वाले घरों की तादाद 96 फीसदी है।

 

 

 

तकरीबन 18 फीसदी ग्रामीण घरों में तीनों बुनियादी सुविधायें( आवासीय परिसर में पेयजल, लैट्रिन और बिजली) उपलब्ध हैं जबकि शहरी इलाके में ऐसे घरों की तादाद 68 फीसदी है।

 

घरों के आसपास पर्यावरण परिवेश

 

ग्रामीण इलाके में तकरीबन 19 फीसदी और शहरी इलाके में लगभग 6 फीसदी घरों में कच्ची नाली-परनाली का इस्तेमाल होता है। ग्रामीण इलाके में 57 फीसदी और शहरी इलाके में 15 फीसदी घरों में किसी भी तरह की ड्रेनेज सुविधा मौजूद नहीं है।

 

गार्वेज डिस्पोजल व्यवस्था केवल 24 फीसदी ग्रामीण परिवारों को हासिल हो सकी है जबकि शहरों में ऐसे घरों की तादाद 79 फीसदी है।

 

गंवई इलाके में 18 फीसद और शहरी इलाके में 6 फीसदी घर ऐसे हैं जिनका निकास सीधे सड़क पर नहीं होता ।

 

  **page**

[inside]वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन और यूनिसेफ द्वारा प्रस्तुत प्रोग्रेस ऑन सैनिटेशन एंड ड्रिंकिंग वाटर 2010 अपडेट[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार, http://www.unicef.org/media/files/JMP-2010Final.pdf:

 

  • दक्षिण एशिया और उपसहारीय अफ्रीकी देशों में समुन्नत साफ-सफाई की सुविधा का इस्तेमाल कम होता है।.

 

  • विश्व में 2.6 बिलियन लोग समुन्नत साफ-सफाई की सुविधा से वंचित हैं। इनमें सर्वाधिक लोग दक्षिण एशिया के हैं। पूर्वी एशिया और उपसहारीय अफ्रीकी देशों में भी ऐसे लोगों की तादाद अच्छी-खासी है।

 

  • समुन्नत साफ-सफाई की सुविधा का इस्तेमाल विश्व में 61% लोग करते हैं।

 

  • अगर पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए तो 2015 तक साफ-सफाई की बुनियादी सुविधा से वंचित लोगों की तादाद को मौजूदा तादाद के आधा कर पाना असंभव होगा। अगर सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को पूरा भी कर लिया जाय तब भी दुनिया में 1.7 बिलियन लोग साफ-सफाई की बुनियादी सुविधा से वंचित रह जायेंगे और 2015 तक ऐसी सुविधा से वंचित लोगों की संख्या 2.7 बिलियन तक पहुंच जायेगी।

 

  • पेयजल की सुविधा से वंचित लोगों की तादाद 2015 तक विश्व में 67 करोड़ 20 लाख होगी।

 

 

  • चीन में(आबादी- 1 अरब 30 करोड़), 89% फीसदी लोग समुन्नत स्रोतों से पेयजल हासिल करते हैं। साल 1990 में यह तादाद 67% थी ।भारत (आबादी- 1 अरब 20 करोड़) में , 88% लोग समुन्नत स्रोतों से पेयजल हासिल करते हैं। साल 1990 में यह तादाद 72% फीसदी थी। साल 190 से 2008 के बीच 1 अरब 80 करोड़ लोगों को पेयजल के समुन्नत स्रोत हासिल हुए। इसमें 47 फीसदी लोग सिर्फ भारत-चीन से हैं।

 

  • साल 1990 से 2008 के बीच चीन में साफ-सफाई के समुन्नत स्रोतों का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद 41 फीसदी से बढकर 55 फीसदी और भारत में यह तादाद 18 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी हो गई तो भी विश्व साफ-सफाई के मामले में अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा कर पाने में अभी काफी पीछे है। यह सच है कि सिर्फ भारत-चीन में ही बतायी गई अवधि में 47 करोड़ 50 लाख लोगों को साफ-सफाई की समुन्नत सुविधा हासिल हुई जो कि विश्व में साफ-सफाई की समुन्नत सुविधा(बतायी गई अवधि में) हासिल करने वाले कुल 1 अरब 30 करोड़ लोगों का 38 फीसदी है।

 

  • 1 अरब 30 करोड़ लोगों को साल 1990-2008 के बीच साफ-सफाई की समुन्नत सुविधा हासिल हुई उसमें 64% फीसदी लोग शहरी इलाकों में रहते हैं।.

 

  • विश्वस्तर पर देखें तो समुन्नत स्रोतों से पेयजल हासिल करने वाले लोगों की तादाद 87% है, जबकि विकासशील देशों में ऐसी सुविधा वाले लोगो की तादाद 84% है। विकासशील देशों के शहरी इलाके में 94% फीसदी लोग पेयजल के लिए समुन्नत स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं तो ग्रामीण इलाके के 76% लोग ।

 

  • समुन्नत स्रोतों से पेयजल हासिल करने वाले लोगों की तादाद शहरी इलाके में ग्रामीण इलाके की अपेक्षा 5 गुनी ज्यादा है। जिल 1 अरब 80 करोड़ लोगों ने साल 1990 से 2008 के बीच पेयजल(समुन्नत स्रोत) की सुविधा हासिल की उसमें 59 फीसदी लोग शहरी इलाकों के हैं।

 

 

  • खुले में शौच करने वाले लोगों की तादाद साल 1990 में 25 फीसदी थी जो साल 2008 में घटकर 17% हो गई। उपसहारीय अफ्रीकी देशों में यह कमी 25 फीसदी की हुई लेकिन संख्या के लिहाज से देखें तो साल 1990 में 18 करोड़ 80 लाख लोग खुले में शौच करते थे जबकि साल 2008 में इनकी तादाद 22 करोड़ 40 लाख हो गई है। विश्व में जितने लोगखुले में शौच करते हैं उनकी कुल संख्या का 64 फीसदी दक्षिण एशिया रहता है।.

 

  • साल 1990 से  2008 के बीच 1.2 विलियन से ज्यादा लोगों को आवासीय परिसर में पाईप द्वारा पानी आपूर्ति की सुविधा हासिल हुई।

 

  • विश्व के विकासशील देशो में 73% शहरी आबादी को आवासीय परिसर में पाईप द्वारा पानी आपूर्ति की सुविधा हासिल है जबकि ग्रामीण इलाके में ऐसे लोगों की तादाद 31 फीसदी है।
**page** 
 
 
[inside]ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार[/inside]-
http://planningcommission.gov.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v2/11v2_ch5.pdf:
  • साल १९९१ की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ५५.५४ फीसदी ग्रामीण आबादी को साफ पेयजल की सुविधा हासिल थी। पेयजल आपूर्ति विभाग के नवीनतम आंकड़ों के हिसाब से देखें तो १ अप्रैल २००७ तक देश के कुल १५०७३४९ मानव-बस्तियों में से ११२१३६६ यानी ७४.३९ फीसदी को पूर्णतया और १४.६४ फीसदी को अंशतया साफ पेयजल की सुविधा हासिल है।
  • मौजूदा आकलन कहते हैं कि देश में २.१७ लाख मानव बस्तियों में पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित है और साल २००५ की पहली अप्रैल तक  ७० हजार मानव बस्तियों में पानी की गुणवत्ता को सुधारने के उपाय किए गए थे।
  • साल २००१ की जनगणना के मुताबिक देश की केवल ३६ फीसदी आबादी ऐसी है जिसके घर में शौचालय की व्यवस्था है। ग्रामीण इलाके में केवल २१ फीसदी आबादी के ही आवासीय परिसर में शौचालय है।
  • साल १९७२-७३ में भारत सरकार ने एक्सलरेटेड रुरल वाटर सप्लाई प्रोग्राम नाम से पेयजल की आपूर्ति की एक महत्वाकांक्षी योजना शुरु की। इसके अन्तर्गत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पेयजल की सुविधा के लिए सहायता मुहैया करायी जानी थी। १९८६ में इस कार्यक्रम को एक मिशन में बदल दिया गया और तब इसे टेकनालाजी मिशन ऑन ड्रिकिंग वाटर एंड रिलेटेड वाटर मैनेजमेंट कहा गया। साल १९९१-९२ में इसी मिशन का नाम बदलकर राजीव गांधी नेशनल ड्रिंकिंग वाटर मिशन रखा गया।
     
    साल १९९९ में ग्रामीण विकास मंत्रालय के अन्तर्गत ग्रामीण जलापूर्ति और शौचालय आदि की सुविधा के लिए पेयजल आपूर्ति विभाग बनाया गया। इसी साल कई और पहल किए गए जिसमें एक का प्रतिफलन साल २००२ में स्वजलधारा के रुप में सामने आया।
  • देश में २.१७ लाख मानव बस्तियों में पानी की गुणवत्ता किसी ना किसी कारण से प्रभावित है। इनमें से आधे यानी ११८०८८ मानव बस्तियों में पानी में लौहतत्व ज्यादा है जबकि ३१३०६ मानव बस्तियों में फ्लूराइड, २३४९५ मानव बस्तियों में अम्लीयता, १३९५८ बस्तियों में नाइट्रेट और ५०२९ बस्तियों में आर्सेनिक की अधिकता है।२५ हजार मानव बस्तियों के पेयजल मे एक से ज्यादा संदूषक मौजूद हैं। 
  • कुल १७ राज्यों के २०० जिलों में पानी में फ्लूराइड की अधिकता है और इस अधिकता का दुष्प्रभाव लगभग ६ करोड़ ६० लाख आबादी पर पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में आरसेनिक संदूषित पानी की समस्या विकराल हो चुकी है। आर्सेनिक से प्रभावित पेयजल पावे इलाके बिहार उत्तरप्रदेश और असम तक फैले हुए हैं।
  • ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य रखा गया है कि साल २००९ तक पूरी आबादी को साफ पेयजल मुहैया करा दिया जाएगा। भारत निर्माण योजना के अन्तर्गत कुल २.१७ लाख संदूषित पेयजल वाली बस्तियों में साफ पेयजल मुहैया कराया जाएगा। इसके साथ ही जिन मानव बस्तियों में अभी साफ पेयजल उपलब्ध नहीं है उनमें से ५५०६७ बस्तियों में पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा।

 

वाटर, सेनिटेशन, एंड हाइजिन लिंक्स टू फैक्ट एंड फीगर(नवंबर २००४) के आंकड़ों के अनुसार-

 

  • १० लाख ८० हजार लोग हर साल डायरिया से काल कवलित होते हैं। इसमें ९० फीसदी ५ साल तक की उम्र के बच्चे होते हैं और ऐसी ज्यादातर मौतें विकासशील मुल्कों में होती हैं। 
  • डायरिया के ८८ फीसदी मामलों में प्रमुख कारण संदूषित पेयजल और साफ-सफाई की कमी का होना पाया गया है। पेयजल की गुणवत्ता में सुधार से डायरिया से होने वाली मौतों में २५ फीसदी की कमी लायी जा सकती है।
  • साफ सफाई की व्यवस्था सुधरे त डायरिया से होने वाली मौतों में ३२ फीसदी की कमी आएगी। अगर हाथ धोने जैसी आदतों के प्रति लोगों को जागरुक बनाया जाय तो डायरिया से होने वाली मौतों में ४५ फीसदी की कमी आ सकती है।
  • घरों में इस्तेमाल होने वाले पानी उपयोग स्थल पर क्लोरिन से उपचार कर दिया जाय तो डायरिया की घटना में ३५ से ३९ फीसदी की कमी आएगी। .
  • १० लाख ३० हजार व्यक्ति हर साल मलेरिया से काल कवलित होते हैं। इनमें ९० फीसदी ५ साल तक उम्र वाले बच्चे होते हैं। हर साल मलेरिया से ३९ करोड़ ६० लाख लोग पीडित होते हैं। इनमें ज्यादातर लोग विकासशील और अविकसित मुल्कों के हैं। 
  • सिंचाई की सघन व्यवस्था, बांधों और जलपरियोजनाओं के कारण मलेरिया की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। जल परियोजनाओं के बेहतर प्रबंधन से मलेरिया की घटनाओं में कमी लायी जा सकती है।
  • साल २००२ तक विश्व में एक अरब १० करोड़ यानी १७ फीसदी आबादी साफ पेयजल से महरुम थी। .
  • साफ पेयजल से महरुम कुल १ अरब १० करोड़ की आबादी में दो तिहाई लोग सिर्फ एशिया में रहते हैं। अफ्रीका के सहारीय इलाके में ४२ फीसदी आबादी साफ पेयजल से महरुम है।
 
 
**page**
 
[inside]साल 2006 के ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट[/inside] के अनुसार-
http://hdr.undp.org/en/media/hdr06-complete.pdf
  • विश्व के कुल 1 अरब 10 करोड़ लोगों को साफ पेयल की सुविधा हासिल नहीं है। साफ पेयजल की सुविधा से वंचित ज्यादातर लोग एशिया में रहते हैं।
  • शौचालय की सुविधा के मामले में विकसित और विकासशील देशों के बीच खाई और भी गहरी है। 2 अरब 60 करोड़ लोगों यानी विकासशील देशों की आधी आबादी को बुनियादी साफ सफाई की भी सुविधा हासिल नहीं है।
  • बात साफ पेयजल की हो या बुनियादी साफ-सफाई की- इससे वंचित होने की स्थिति राजनीतिक है। इसे पानी की मौजूदगी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता ।
  • विश्व में इतना पानी जरुर मौजूद है कि हरेक को खेती और उद्योग सहति घरेलू उपयोग के लिए हासिल हो सके। वास्तविकता यह है कि गरीब जनता संस्थागत तरीके से इस सुविधा से वंचित की जाती है। उन्हें संसाधनों पर वाजिब कानूनी हक नहीं मिलते और सरकारी नीतियां भी इस तरह की हैं कि गरीब इन सुविधाओं से वंचित होते हैं।
  • जिन 1 अरब 10 करोड़ लोगों को साफ पेयजल की सुविधा हासिल नहीं है उनमें से हरेक व्यक्ति रोजाना औसतन 5 लीटर पानी का उपयोग करता है जबकि इससे दस गुना पानी धनी मुल्कों में कोई व्यक्ति सिर्फ रोजाना शौचालय में फ्लश के लिए इस्तेमाल करता है। योरोप में प्रति व्यक्ति पानी का उपभोग रोजाना 200 लीटर है और अमेरिका में 400 लीटर।
  • अगर कोई एक व्यक्ति योरोप में अपने शौचालय में फ्लश चला रहा है या फिर अमेरिका में शावर कर रहा है तो वह विकासशील मुल्कों में झुग्गी में रहने वाले लाखों लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा पानी का इस्तेमाल कर रहा है। विकसित मुल्कों में रोजाना जितना पानी सिर्फ नलकी की टोंटी की खराबी से टपक जाता है उतना भी पानी विश्व की एक अरब आबादी को रोजाना अपने इस्तेमाल के लिए हासिल नहीं होता।
  • पानी के कुल इस्तेमाल में घरेलू उपभोग में खर्च होने वाले पानी का हिस्सा बहुत कम है( लगभग 5 फीसदी)। लेकिन घरेलू उपभोग के लिहाज से भी विकसित और विकासशील मुल्कों के बीच स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता में भारी अंतर है।
  • एशिया , लातिनी अमेरिका और सहारीय अफ्रीका के शहरों में अमीर लोग सरकार द्वारा सस्ती कीमतों पर उपलब्ध करवाये जा रहे पानी का रोजाना सैकड़ों लीटर की तादाद में इस्तेमाल करते हैं जबकि इन्ही मुल्कों में ग्रामीण और झुग्गीवासी आबादी रोजाना 20 लीटर से भी कम पानी में अपना काम चलाने को मजबूर है।
  • भारत में पानी की किल्लत वाले क्षेत्रों में हालत ये है कि अगर धनी किसान अपने वाटरपंप से धरती से 24 घंटे पानी निकाल रहा है तो उसका पड़ोसी सीमांत किसान खेतों की सिंचाई के लिए बारिश की आस लगाता है।
  • विश्व में सालाना 10 लाख 80 हजार बच्चे डायरिया से मरते हैं यानी रोजाना 4900 बच्चे डायरिया से मर जाते हैं।  विश्व में सर्वाधिक बच्चे डायरिया और गंदगी की वजह से मरते हैं। सन् 1990 के दशक में सशस्त्र संघर्ष में जितने लोगों की मृत्यु हुई इससे छह गुना ज्यादा बच्चे सिर्फ साल 2004 में डायरिया और साफ सफाई की कमी से मरे।
  • हर साल 44 करोड़ 30 लाख स्कूली दिवस का नुकसान सिर्फ जलजनित बीमारियों के कारण होता है।
  • साल को कोई भी वक्त ले लीजिए विकासशील देशों में आधी जनसंख्या आपको जलजनित या फिर गंदगी से पैदा होने वाली एक ना एक बीमारी की चपेट में मिलेगी।
  • संकट पानी की कमी का हो या साफ सफाई की कमी से पैदा होने वाली बीमारियों का- हर हाल में इसका पहला शिकार गरीब ही होते हैं। जिस एक अरब आबादी को साफ पेयजल की सुविधा हासिल नहीं है उसमें हर तीन में से दो व्यक्ति रोजाना 2 डालर से कम में जीवन बसर करते हैं जबकि हर तीन में से एक आदमी रोजाना एक डालर से भी कम में अपना जीवन चलाता है।साफ सफाई की बुनियादी सुविधाओं से वंचित लोगों की तादाद विश्व में 66 करोड़ है और इन्हें रोजाना 2 डालर से कम की आमदनी पर अपना गुजर बसर करना पडता है।इनमें से तकरीबन 38 करोड़ तो एक डालर से भी कम में अपना बसर करने पर मजबूर हैं।
  • जिस परिवार के पास जितनी मात्रा में धन है उस परिवार को उतनी ही मात्रा में पानी और साफ सफाई की सुविधा भी हासिल है। आबादी का 20 फीसदी सबसे धनी हिस्सा पाइप द्वारा पहुंचाए जा रहे कुल पानी का 85 फीसदी हासिल करता है जबकि उसी आबादी का सबसे गरीब तबके के हिस्से में इस पानी का महज 20 फीसदी भाग आता है।
    असमानता सिर्फ सुविधाओं तक पहुंच के मामले में ही नहीं है। पूरे विकासशील देशों में एक विकृत नियम यह लागू होता है कि सबसे गरीब आदमी को ना सिर्फ पानी कम मिलता है बल्कि उसे इस पानी के लिए कीमत भी बहुत ज्यादा चुकानी पड़ती है।
  • जकार्ता और मनीला और नैरोबी की झुग्गियों में रहने वाले लोग प्रति लीटर पानी के लिए अपने ही शहरे के धनी लोगों की तुलना में 5-10 गुना ज्यादा कीमत चुकाते हैं। उनके द्वारा चुकायी कीमत लंदन और न्यूयार्क के उपभोक्ताओं से भी ज्यादा है।
  • ऊंची आमदनी वाले घर कम आमदनी वाले घरों की तुलना में ज्यादा पानी का इस्तेमाल करते हैं। भारत के मुंबई में महलों में रहने वाले झुग्गीवासियों की तुलना में 15 गुना ज्यादा पानी का इस्तेमाल करते हैं।
  • मौजूदा प्रगति को ध्यान में रखें तो सहारीय अफ्रीका पानी का पना लक्ष्य 2040 में पूरा करेगा और साफ सफाई का लक्ष्य 2070 में। साफ-सफाई के लक्ष्यों के मामले में दक्षिण एशिया समय से चार साल पीछे चल रहा है और अरब अमीरात के देश 27 साल पीछे हैं।
  • कुल 55 देश पानी की सुविधा मुहैया कराने के मामले में लक्ष्य से पीछे हैं और इन देशों के 23 करोड़ 40 लाख लोगों को अभी समुचित मात्रा में पानी हासिल नहीं होगा।
  • साफ सफाई की बुनियादी सुविधाए मुहैया कराने के मामले में कुल 74 देश पीछे हैं।  देशों की कुल 43 करोड़ आबादी साफ सफाई की बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रहेगी।
  • अर्जेन्टीना से लेकर बोलविया तक और फिलीपिन्स से लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका तक यह विश्वास ध्वस्त हो चुका है कि निजी क्षेत्र के हाथ में पानी की आपूर्ति को छोड़ देने पर पानी के मामले में समानता आ सकेगी और उसकी आपूर्ति चुस्त-दुरुस्त हो सकेगी।
**page**
[inside]ड्ब्ल्यू एच ओ और युनिसेफ द्वारा प्रायोजित इंडिया असेसमेंट 2002 वाटर एंड सैनिटेशन नामक अध्ययन[/inside] के दस्तावेज के अनुसार http://planningcommission.nic.in/reports/genrep/wtrsani.pdf

  • जलापूर्ति और साफ सफाई का मुद्दा राष्ट्रीय अजेंडे में पहली बार प्रथम पंचवर्षीय योजना में दाखिल हुआ। साल 2002 में एक नई जलनीति अख्तियार की गई। पेयजल और साफ सफाई की सुविधा मुहैया कराने का प्राथमिक दायित्व राज्यों का है। केंद्र इसके लिए धन आबंटित करता है।
  • भूमि की सतह और भूगर्भ में मौजूद पानी के कुल इस्तेमाल का 90 फीसदी हिस्सा कृषि-क्षेत्र में खर्च होता है। बाकी हिस्से में उद्योग और घरेलू उपयोग के अन्तर्गत होने वाला पानी-खर्च आता है।
  • भारत में 69 से लेकर 74 फीसदी ग्रामीम आबादी पानी के सुरक्षित स्रोतों से दैनिक उपभोग का पानी हासिल करती है जबकि 26 से 31 फीसदी ग्रामीण लोग सुरक्षित जलस्रोतों के इस्तेमाल से वंचित हैं।
  • शहरी आबादी में 91 से 93 फीसदी को सुरक्षित जलस्रोत से दैनिक उपभोग का पानी हासिल होता है।
  • भारत में पानी की समस्या का एक पहलू इसका सूक्ष्म रासायनिक कणों से संदूषित होना है। 17 राज्यों के कुल 6 करोड़ 60 लोगों को फ्लूरोइड मिला पानी हासिल होता है। देश के 75 प्रखंडों के 1 करोड़ 30 लाख 80 हजार लोगों को आर्सेनिक संदूषित पानी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।लौहतत्व की अधिकता या फिर जीवाणुओं द्वारा संक्रमित होना भी इसी समस्या का एक पहलू है।
     
    विभिन्न स्रोतों से हासिल आंकड़ों के अध्ययन से यह साफ होता है कि आठवीं पंचवर्षीय योजना में पर्याप्त जोर देने के बावजूद केवल 18-19 फीसदी ग्रामीण घरों में शौचालय की सुविधा मुहैया करायी जा सकी है।शहरो में 75 से 81 फीसदी घरों में शौचालय है।
  • साफ पेयजल का बुनियादी ढांचा लगभग 85 फीसदी शहरी और ग्रामीण भारतीयों तक पहुंचा दिया गया है। बहरहाल समाज के गरीब और वंचित तबके तक इस सुविधा की पहुंच सतत बनाये रखने के मार्ग में चुनौतियां बरकरार हैं।
  • साल 1951 से 1997 के बीच सकल सिंचित क्षेत्र में चार गुना बढ़ोतरी हुई और सकल सिंचित इलाके का दायरा 23 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 90 मिलियन हेक्टेयर हो गया। भारत में साफ पानी की सर्वाधिक खपत का सिंचाईं में होती है।
  • एक तरफ भारत में जल संसाधन लगातार कम पड़ रहे हैं और उनपर आपूर्ति का दबाव बढ़ रहा है दूसरी तरफ पेयजल, खेती और उद्योग आदि में उपयोग के लिए पानी की मांग बढती जा रही है।
  • समस्या का एक चिंताजनक पहलू यह है कि बढ़ते शहरीकरण के साथ बड़े शहरों के आसपास के ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता और गुणवता में कमी आ रही है।
  • आजादी के वक्त भारत की आबादी तकरीबन 40 करोड़ थी और प्रति व्यक्ति सालाना पानी की उपलब्धता 5000 क्यूविक मीटर थी। आज की तारीख में भारत की आबादी एक अरब से ज्यादा हो चुकी है और सालाना प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 2000 क्यूविक मीटर रह गई है।
  • साल 2050 के आते आते देश में पानी की जरुरत 1422 बीसीएम हो जाएगी जबकि इस्तेमाल में आ सकने लायक कुल पानी की उपलब्धता उस वक्त 1086 बीसीएम ही होगी।
  • पेयजल आपूर्ति विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में 15917 मानव बस्तियों में पेयजल की सुविधा नहीं पहुंचायी जा सकी है।
  • साफ- सफाई
  • जलजनित बीमारियां जनसामान्य के स्वास्थ्य के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें कुछ बीमारियां संक्रामक हैं तो कुछ जल्दी ही पूरे समुदाय को अपने चपेटे में ले लेती हैं। इन बीमारियों से होने वाली मौतों की संख्या भी ज्यादा है। पुनः कुछ जलजनित बीमारियों का उपचार अत्यंत कठिन है।
  • छोटे बच्चों पर जलजनित बीमारियों का प्रकोप ज्यादा है क्योंकि बच्चों को गंदगी से बचाने के बारे में लोग सचेत नहीं हैं। भारत में हर साल 4 से 5 लाख बच्चे(5 साल तक की उम्र वाले) डायरिया से मरते हैं।
  • पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने के बावजूद जलजनित बीमारियों की बारंबारता या फिर उनसे होने वाली मौतों की तादाद में कमी नहीं आई है क्योंकि जलभंडारण का तरीका दोषपूर्ण होता है अथवा उपभोक्ता जहां पानी का इस्तेमाल कर रहा होता है उस बिन्दु तक जाते जाते पानी संदूषित हो जाता है। यहां साफ-सफाई की व्यक्तिगत आदतों का सवाल भी महत्वपूर्ण है।  जलजनित बीमारियों के कारण बड़े पैमाने पर व्यय करना पड़ता है। आधिकारिक आंकड़ों में इन बीमारियों के फैलाव के बारे में कम करके बताया जाता है। मिसाल के लिए आधिकारिक आंकड़ों में कहा गया है कि विषाणुजनित हेपेटाइटिस प्रत्येक एक लाख जनसंख्या में 12 व्यक्ति को है जबकि समुदाय आधारित दो सर्वेक्षणों का निष्कर्ष है कि यह बीमारी प्रति लाख जनसंख्या में लगभग 100 लोगों को होती है।सामुदायिक सर्वेक्षणों में यह भी कहा गया है कि 5 साल तक की उम्र के बच्चों को साल में दो से तीन दफे डायरिया होता है जबकि आधिकारिक आंकड़ों में डायरिया की बड़ी कम घटनाएं दर्ज होती हैं।