कुपोषण

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सेव द चिल्ड्रेन और वर्ल्डविजन नामक संस्था द्वारा प्रस्तुत द न्यूट्रीशन बैरोमीटर: गॉजिंग नेशनल रेस्पांसेज टू अंडरन्यूट्रीशन (2012) नामक दस्तावेज के अनुसार- http://www.savethechildren.in/images/resources_documents/nutrition_barometer_asia.pdf:

 

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑव कांगो, भारत और यमन की प्रगति बाल-पोषण के मामले में काफी कमजोर रही, परिणाम अच्छे नहीं आये और इन देशों ने बाल-पोषण के मामले में बड़ी लचर प्रतिबद्धता जाहिर की। इस दस्तावेज में बाल-पोषण के मोर्चे पर भारत की प्रगति के आंकड़े पुराने हैं। ये आंकड़े नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-3 पर आधारित हैं जिसकी अवधि 2005-06 है। चूंकि भारत ने आधिकारिक तौर पर बाल-पोषण के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर कोई सर्वेक्षण प्रस्तुत नहीं किया है इसलिए नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-3 के ही आंकड़ों का व्यवहार होता है।

साल 2005-06 के बाद भारत में बाल-पोषण के लिहाज से क्या प्रगति हुई, इसे जानने के लिए राष्ट्रीय स्तर के सर्वे की त्वरित जरुरत है। चौथा फैमिली हैल्थ सर्वे साल 2014 में होना है।

भारत की अर्थव्यवस्था ने भले चमत्कारिक प्रगति की हो लेकिन इस प्रगति की प्रतिबिंब बाल-पोषण के रुप में नहीं दिखता। अर्थव्यवस्था की प्रगति के कारण करोड़ों लोग गरीबी के जाल से बाहर निकले हैं लेकिन आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के एक छोटे से तबके को बाकी लोगों की तुलना में बहुत ज्यादा हुआ है। कई शोध-आकलनों में कहा गया है कि भारत में आधे से ज्यादा बच्चे सामान्य से कम वज़न के हैं और उनकी लंबाई भी सामान्य से कम है। भारत में 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं और बच्चे गंभीर पोषणगत कमियों से जूझ रहे हैं जिसमें एनीमिया एक है।

इस बात की संभावना दोगुनी है कि कोई बच्चा अगर गरीब घर में पैदा हुआ है तो धनी घर में पैदा हुए बच्चे की तुलना में उसकी लंबाई सामान्य से कम होगी। बहरहाल भारत के सर्वाधिक धनी 20 फीसदी परिवारों में हर पाँच में से एक बच्चा पोषणगत कमी का शिकार है।

पोषण के पैमाने पर शून्य से 2 साल की अवधि को बच्चे के आगे के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। समेकित बाल विकास योजना की एक आलोचना यह कहकर की जाती है कि इस योजना में उपर्युक्त आयु-वर्ग के बच्चों की अनदेखी की जाती है।

इस सर्वेक्षण में कुल 36 देशों को शामिल किया गया था। इसमें 13 यानी तकरीबन एक तिहाई देशों में बाल-पोषणगत प्रतिबद्धता और परिणाम एक ही दिशा में संकेत करते हैं।  तीन देश- ग्वाटेमाला, मलावी और पेरु बाल-पोषण के मामले में राजनीतिक और वित्तीय प्रतिबद्धता दिखाने तथा इसी के अनुरुप बेहतर परिणाम हासिल करने के मामले में बाकी देशों से आगे हैं।

इस सर्वेक्षण में यह भी पता चला कि सर्वेक्षण में शामिल देशों में कुल 12 देश ऐसे हैं जहां बाल-पोषण के मामले में राजनीतिक-वैधानिक और वित्तीय प्रतिबद्धता तो खूब है लेकिन नतीजे के मोर्चे पर हासिल बड़ा कम है।

 

 

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